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Uttarakhand

पीड़ितों के सब्र का बांध भी टूटने लगा

  • संतोष सिंह

ग्लेशियर से बांध परियोजनाओं के साथ ही इंसानी जिंदगियों को जो क्षति हुई उससे उबरने में अभी काफी समय लगेगा। हालांकि सरकार का दावा है कि वह रेस्क्यू और राहत की हर संभव कोशिशें कर रही है, लेकिन आपदा पीड़ित इससे संतुष्ट नहीं हैं

उत्तराखण्ड के लोगों के जेहन से अभी वर्ष 2013 में प्राकृतिक आपदा से हुई तबाही के निशान मिटे भी नहीं थे कि एक बार फिर प्रकृति अपने विकराल रूप में आफत बनकर सामने आ गयी। 07 फरवरी , दिन, रविवार को चमोली जिले में ग्लेशियर फटने से बड़ा हादसा सामने आया है। नीती घाटी व चिपको आंदोलन की प्रणेता गौरा देवी के गांव रैणी में 7 फरवरी की सुबह करीब दस बजे ग्लेशियर टूटने से ऋषिगंगा परियोजना के साथ-साथ एनटीपीसी कंपनी के बैराज साइट तपोवन में भारी नुकसान हुआ है। इन परियोजनाओं में कार्य कर रहे काफी मजदूरों के बहने की सूचना है। इस दुर्घटना की खबर मिलते ही जिले के डीएम व एसडीएम व रेस्क्यू टीम घटनास्थल रैणी-तपोवन पहुंची। प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने रैणी गांव जाकर घटनास्थल का निरीक्षण किया। रैणी गांव में ग्लेशियर आने से मोटर पुल टूट कर बह गया जिसके कारण नीती घाटी के लगभग 13 गांवों का सड़क संर्पक टूट गया। सीएम ने वहां पहुंच कर कहा कि, ‘हमारी कोशिश रहेगी कि जो लोग फंस गए हैं उन तक जल्द से जल्द मदद पहुंचायी जाए।’ उन्होंने टनल में फंसे लोगों को बचाने के लिए रेस्क्यू आॅपरेशन में तेजी लाने की भी बात कही।

मुख्यमंत्री ने कहा, ‘हर जरूरत की पूर्ति करने की पूरी व्यवस्था हमारे पास है। हमारे पास रेस्क्यू टीम, मेडिकल, हेलीकाॅप्टर, आदि पर्याप्त मात्रा में हैं। सरकार का पूरा ध्यान इस बात पर है कि हम अधिक से अधिक लोगों की जान बचा सकें।’

इस दौरान जिला अधिकारी स्वाति एस भदौरिया, डीजीपी अशोक कुमार, एसपी यशवंत सिंह चैहान भी मौके पर मौजूद थे। फिलहाल प्रभावित क्षेत्र में पाॅकलैंड मशीन, एक्सावेटर व जेसीबी मशीन लगाकर टनल से मलबा हटाने का काम जारी है। वहीं जिलाधिकारी ने संपर्क मार्ग टूटने के कारण फंसे लोगों तक शीघ्र रसद एवं जरूरी सामान पहुंचाने हेतु व्यवस्था करा दी है। क्योंकि पुल या कोई अन्य वैकल्पिक व्यवस्था नहीं तैयार है इसलिए हेलीकाॅप्टर के माध्यम से प्रभावित लोगों तक राशन, मेडिकल एवं रोजमर्रा की चीजें पहुंचायी जा रही हैं।

केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने भी आपदा प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण किया। उन्होंने कहा कि, ‘यहां पर फंसे लोगों को रेस्क्यू करना हमारी प्राथमिकता है। जो क्षेत्र, गांव, कट गए हैं उन्हें फिर से मुख्य मार्ग पर जोड़ने के लिए युद्ध स्तर पर काम
होगा।’

गढ़वाल सांसद तीरथ सिंह रावत, जनपद प्रभारी मंत्री डाॅ धन सिंह रावत, विधायक महेंद्र प्रसाद भट्ट, विधायक सुरेंद्र सिंह नेगी, भाजपा जिलाध्यक्ष रघुवीर बिष्ट ने भी तपोवन एवं रैणी में आपदा प्रभावित क्षेत्रों में काम का जायजा लिया। उन्होंने प्रभावित परिवारों से मिलकर उन्हें ढाढ़स बंधाते हुए हर संभव मदद पहुंचाने का भरोसा दिलाया। प्रभारी मंत्री ने कहा कि, ‘यहां पर जिला प्रशासन, पुलिस, आईटीबीपी, आर्मी, एनडीआरएफ, बीआरओ सभी मिलकर युद्ध स्तर पर रातदिन रेस्क्यू में जुटे हैं और जिंदगियों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं।

तपोवन टनल में फंसे 16 लोगों को आईटीबीपी द्वारा सुरक्षित निकाल दिया गया है। स्थानीय लोगों की मानें तो इस जल प्रलय में सैकड़ों लोगों के बहने की सूचना है। घटना स्थल तपोवन पहुंचे संवाद सूत्र राजेंद्र हटवाल ने ‘दि संडे पोस्ट’ को बताया कि इस आपदा में सैंकड़ों लोगों के लापता होने की सूचना है। लोग अपने-अपने परिजनों की ढूंढ़- खोज करने निकले हुए हैं। उन्होंने बताया कि नेपाली मूल के कई मजदूर भी इस तबाही में बह गए हैं। उनके घरों में उनके बच्चे और महिलाएं जिंदा बचे हैं और अपनों की राह जोह रहे हैं।

इस तबाही की सूचना मिलते ही तत्काल जिला प्रशासन ने जिले के नदी तट के इलाकों को अलर्ट जारी कर खाली करवाने का निर्देश दिया। मौके पर पहुंची जिला प्रशासन, पुलिस, एसडीआरएफ, आईटीबीपी, आर्मी सहित स्थानीय लोगों की मदद से रेस्क्यू अभियान शुरू किया गया। जिन 13 गांवों का सड़क टूटने से सम्पर्क टूट गया उनमें गहर, भंग्यूल, रैणी पल्ली, पैंग, लाता, सुराईथोटा, तोलमा, फगरासु आदि गांव शामिल हैं।

रैणी में जुगजू का झूला पुल, जुवाग्वाड- सतधार झूलापुल, भग्यूल- तपोवन झूलापुल तथा पैंग मुरण्डा पुल बह गया है। साथ ही वहां स्थित शिवजी व जुगजू में मां भगवती मंदिर भी आपदा में बह गए हैं।

बताया जा रहा है कि जिस समय यह बाढ़ आई उस समय ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट में लगभग 34 लोग कम कर रहे थे। जबकि तपोवन पाॅवर प्रोजेक्ट में लगभग 178 लोग कार्य कर रहे थे। हालांकि यह बताया गया था कि इन लोगों में से 5 वर्कर इस आपदा से बचकर बाहर भाग आये थे।

8 जनवरी, सोमवार को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने देर शाम तपोवन ऋतिक कंपनी के कार्यालय में आईजी, डीआईजी, डीएम, एसपी, आर्मी, आईटीबीपी, बीआरओ के वरिष्ठ अधिकारियों एवं एनटीपीसी के प्रोजेक्ट इंचार्ज अधिकारियों की बैठक लेते हुए राहत एवं बचाव कार्यों की समीक्षा की। मुख्यमंत्री ने सभी अधिकारियों को बेहतर तालमेल के साथ रेस्क्यू कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए। सुनियोजित तरीके से आवश्यकता अनुसार संसाधनों का प्रयोग किया जाए। उन्होंने कहा कि राशन किट वितरण में कोई भी अनियमितता न हो। इसका विशेष ध्यान रखा जाए। डीएम को समय-समय पर मीडिया को ब्रीफिंग करने को कहा ताकि भ्रामक और गलत खबरें न फैलें।

गांव में फंसे लोगों को राशन किट के साथ 5 किलो चावल, 5 किलो आटा, चीनी, दाल, तेल, नमक, मसाले आदि राहत सामग्री हेलीकाॅप्टर से गांव- गांव तक भेजी जा रही हैं। वहीं जिला प्रशासन द्वारा नीती घाटी के विभिन्न गांवों में फंसे 55 से अधिक लोगों को हेलीकाॅप्टर से रेस्क्यू किया गया। साथ ही वैली के गांवों में मेडिकल टीम भी भेजी गई है। जिला आपदा परिचालन केंद्र से मिली जानकारी के अनुसार अब तक 34 लोगों के शव बरामद हुए हैं और 10 लोगों को रेस्क्यू कर उन्हें सुरक्षित स्थान भेज दिया गया है।

जबकि लगभग 170 लोगों के लापता होने की सूचना है। केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आर के सिंह ने भी घटनास्थल पर जाकर जायजा लिया। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने आईटीबीपी अस्पताल जोशीमठ पहुंच कर आपदा में घायलों का हालचाल जाना। इस दौरान सीएम में घायलों से बातचीत करते हुए उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने भी मौके पर पहुंच कर प्रभावित क्षेत्र का जायजा लिया और राहत बचाव कार्य में लगे सेना के जवानों से मिलकर उनकी हौसला अफजाई भी की। उन्होंने आपदा प्रभावित लोगों से भी बातचीत कर उन्हें हिम्मत बनाये रखने के लिए कहा।

एक तरफ शव मिल रहे हैं तो दूसरी तरफ कई क्षत-विक्षत शव भी मिल रहे हैं। शवों का मौके पर ही पंचनामा, पोस्टमार्टम करवाया जा रहा है और क्षत- विक्षत शरीर के अंगों का डीएनए शिनाख्त के लिए रखे का रहे हैं।

वहीं प्रभावित गांवों से गर्भवती महिलाओं, बीमार व्यक्तियों एवं इधर- उधर फंसे लोगों को हेलीकाॅप्टर से रेस्क्यू कर उनके गंतव्यों तक भेजा जा रहा है। 10 फरवरी को लाता गांव से एक गर्भवती महिला सहित 97 लोगों को हेलीकाॅप्टर की मदद से सुरक्षित जगह भेजा गया।

उत्तराखण्ड की राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने भी 11 फरवरी को तपोवन पहुंचकर प्रभावित क्षेत्र का निरीक्षण किया। फिलहाल सम्पूर्ण तपोवन घाटी में शोक की लहर है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत ने भी सभी सभी प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और आपदा राहत बचाव कार्य का निरीक्षण किया। उन्होंने कहा कि दुःख की इस घड़ी में भारतीय जनता पार्टी परिवार एवं प्रदेश सरकार तत्परता से प्रभावित परिवारों एवं व्यक्तियों के साथ खड़ी है। राहत बचाव कार्य जोरों पर चल रहा है और भारतीय जनता पार्टी के सभी कार्यकर्ता यथाशक्ति आपदा रेस्क्यू टीम के साथ तालमेल बनाकर सेवा कार्य में जुटे हैं। युवा मोर्चा के कार्यकर्ता भंडारा लगाकर सेवा कार्य में जुटे हुए हैं।

उन्होंने साथ में अपनी एक माह की तनख्वाह, आपदा राहत कोष में भी देने की घोषणा की।
इस आपदा में सहयोग के लिए सामाजिक संगठन ‘सेवा इंटरनेशनल धार्मिक कमेटी’ भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है। जिसमें सेवा इंटरनेशनल के 25 कार्यकर्ताओं की एक टीम 24 घण्टे प्रभावित क्षेत्र में अपनी सेवा दे रही है।

हाल की बड़ी आपदाएं

उत्तराखण्ड में बीते तीन दशक के दौरान कई प्राकृतिक आपदाओं ने तबाही मचाई है। इनमें, वर्ष 1991 में उत्तरकाशी भूकंप: अविभाजित उत्तर प्रदेश में अक्टूबर 1991 में 6 .8 तीव्रता का भूकंप आया था। इस आपदा में कम से कम 768 लोगों की मौत हुई और हजारों घर तबाह हो गए।

वर्ष 1998 माल्पा भूस्खलन: पिथौरागढ़ जिले का छोटा सा गांव माल्पा भूस्खलन के चलते बर्बाद हुआ। इस हादसे में 55 कैलाश  मानसरोवर श्रद्धालुओं समेत करीब 255 लोगों की मौत हुई थी। भूस्खलन से गिरे मलबे के चलते शारदा नदी बाधित हो गई थी।
वर्ष 1999 चमोली भूकंप: चमोली जिले में आए 6 .8 तीव्रता के भूकंप ने 100 से अधिक लोगों की जान ले ली। पड़ोसी जिले रुद्रप्रयाग में भारी नुकसान हुआ था। भूकंप के चलते सड़कों एवं जमीन में दरारें आ गई थीं। वर्ष 2013 में एक ही दिन में बादल फटने की कई घटनाओं के चलते भारी बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं हुईं थीं। राज्य सरकार के आंकलन के मुताबिक, माना जाता है कि 5,700 से अधिक लोग इस आपदा में जान गंवा बैठे थे। सड़कों एवं पुलों के ध्वस्त हो जाने के कारण चारधाम को जाने वाली घाटियों में तीन लाख से अधिक लोग फंस गए थे।

संतुष्ट नहीं आपदा पीड़ित

हालांकि सरकार बराबर यह जताने की कोशिश कर रही है कि आपदा में राहत और बचाव की हर संभव कोशिश हो रही है, लेकिन आपदा पीड़ित इससे संतुष्ट नहीं हैं और उनके सब्र का बांध भी टूटने लगा है। कई आपदा पीड़ितों ने शासन पर आरोप लगाते हुए   हा कि, लगभग 100 घंटे बीत जाने पर भी टनल में रेस्क्यू का काम पूरा नहीं हो सका है। वहां फंसे करीब 35 जिंदगियों की डोर महज दो मशीनों पर झूल रही है। हम मांग करते हैं सरकार से कि मंत्री-नेताओं का दौरा बंद हो।

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