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Uttarakhand

उत्तराखण्ड के किसानों की फरियाद भी सुने सरकार!

पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों की समस्या अन्य किसानों की तुलना में अलग है। इसलिए इसका निदान भी अलग तरीके से करने की जरूरत है। यहां छोटी जोत, जंगली जानवर, सिंचाई का अभाव, पलायन जैसी दर्जनों समस्याएं हैं। किसानों की अपनी अलग मांग है जिसे प्रदेश और केंद्र सरकार हमेशा अनसुना करती रही है

कृषि क्षेत्र में बदलाव के लिए लाए गए तीनों कानून को व्यापक विरोध के बाद केंद्र सरकार ने वापस ले लिया। एक साल से अधिक समय से दिल्ली की सीमा पर आंदोलनरत किसानों ने भी अपना आंदोलन वापस ले लिया है। लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि इससे भविष्य में किसानों के जीवन में क्या बदलाव आएगा, खासकर उत्तराखण्ड के किसानों में। जबकि पहाड़ी क्षेत्रों के किसानों (काश्तकार) की समस्याएं अलग तरह की हैं। उत्तराखण्ड का किसान चाहता है कि केंद्र और राज्य सरकार बीजों एवं उपकरणों की अनुदान राशि बढ़ाएं। प्रदेश में कृषि विपणन तंत्र बेहद कमजोर स्थिति में है। उसे मजबूत किया जाय ताकि किसानों को अपने उत्पाद बेचने में दिक्कत न आए। कहने को तो राज्य में मंडी परिषद सहित कई सहकारी समितियां मौजूद हैं लेकिन दूरदराज के काश्तकारों तक इनका लाभ नहीं पहुंच पाता है। नाबार्ड के अनुसार प्रदेश में 8 लाख 91 हजार किसान है। इनमें 8 लाख 43 हजार एक हेक्टेयर से भी कम जमीन में खेतीबाड़ी करते हैं। प्रदेश में बड़े किसानों की संख्या मात्र 0.11 प्रतिशत है। आज भी प्रदेश में कुल सकल घरेलू उत्पाद में किसानों का योगदान 10 प्रतिशत के आस-पास है। किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए आरकेवीआई, नेशनल मिशन फॉर एग्रीकल्चर एक्सटेंशन एंड टेक्नोलॉजी, राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना, किसान पेंशन, सरकार किसान के द्वार, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, नेशनल मिशन फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर जैसी कई योजनाएं संचालित हैं। फिर भी किसानों की समस्याओं का हल नहीं हो पा रहा है।

प्रदेश में कृषि को बढ़ावा देने के लिए हर जिले में दो ग्रोथ सेंटर यानी पूरे प्रदेश में 26 सेंटर स्थापित करने का दावा सरकार करती है। इस समय में राज्य में 55 हेक्टेयर में यूरोपियन सब्जियों की पैदावार हो रही है, 1533.29 हेक्टेयर में फूलों की खेती हो रही हैं, 188.53 हेक्टेयर में जड़ी-बूटी की खेती हो रही है। यह सच है कि कृषि उत्पादों को बढ़ावा देने के प्रयास हो रहे हैं लेकिन वह खेतों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। कागजों पर तो सैकड़ों योजनाएं हैं लेकिन धरातल पर वह गायब दिखती हैं। इन दिनों केन्द्र सरकार की प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उन्नयन योजना चर्चा में हैं। इसमें एक जिला, एक उत्पाद को बढ़ावा दिया है। उत्तराखण्ड में यह 13 जिले, 13 उत्पाद के तहत धरातल पर उतारने की कोशिश हो रही है। अब यह धरातल पर कितनी दौड़ती है, यह देखना अभी बाकी है।

इस योजना के तहत प्रदेश के हर जिले में एक उत्पाद का चिन्हिकरण कर लिया गया है। ओडीओपी के तहत पिथौरागढ़ में हल्दी, चंपावत में तेजपात, बागेश्वर में कीवी, अल्मोड़ा में खुमानी, नैनीताल में आडू, यूएसनगर में आम, उत्तरकाशी में सेब, हरिद्वार में मशरुम, देहरादून में बेकरी, पौड़ी में माल्टा, नीबू, गलगल, टिहरी में अदरक,चमोली में मत्स्य, रूद्रप्रयाग में चौलाई आदि उत्पाद चयनित किये गये हैं। इसमें जैली, जैम, चटनी, कैंडी, जूस, बिस्कुट, रस्क, ब्रेड, केक, स्ववैश, मसाले, चौलाई के लड्डू सहित 1591 प्रसंस्करण इकाइयां लगनी है। माना जा रहा है कि इससे जहां किसानों के लिए रोजगार के नये अवसर सृजित होंगे वहीं उनकी आय में भी बढ़ोतरी होगी। कृषि मंत्री सुबोध उनियाल का भी मानना है कि सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण ईकाइयों को तेजी से स्थापित करने को सरकार प्राथमिकता दे रही है। इस योजना में बागवानी से संबंधित उत्पादों को प्राथमिकता दी गई है।

लेकिन उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती की जमीनी सच्चाई यह है कि कृषकों की जोत छोटी एवं बिखरी हुई है। भूमि की उर्वरा शक्ति का हास हो रहा है। अधिकांश खेती वर्षा पर आधारित है। इसलिए कृषकों को सीमित भूमि से कम आय प्राप्त होती है। जलवायु में विविधता के कारण कृषक वर्ष भर नम तथा उष्ण जलवायु में उगने वाली छोटी अवधि की फसलों को उगाते हैं। बेमौसमी सब्जियां नगदी फसल होने के कारण कृषक व्यावसायिक सब्जी उत्पादन कर तो रहे हैं। लेकिन सड़क मार्गों के बंद होने से वह अपने उत्पाद को बाजार तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं। कृषक सब्जी की खेती में उन्नत प्रजातियों के अतिरिक्त संकर प्रजातियों के बीज का प्रयोग कर रहे हैं। ज्यादातर संकर प्रजातियों में प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण फसलों में बीमारियों और कीटों की समस्याएं अधिक हो रही हैं। अधिक उत्पादन पाने के लिए कृषक अत्यधिक रसायनों का प्रयोग करने लगे हैं। छोटी जोत होने के कारण कृषक उपयुक्त फसल चक्र भी नहीं अपना पाते। इसलिए एक ही खेत में कई वर्षों से लगातार सब्जी का उत्पादन करने से रासायनिक खाद और दवाओं पर उनकी निर्भरता निरंतर बढ़ती जा रही है।

रासायनिक दवा और उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग एवं सघन कृषि से जहां एक ओर जैव विविधता का ह्रास हुआ है वहीं रोग जनकों में रसायनों के प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न होती जा रही है। यही कारण है कि अत्यधिक दवाओं के प्रयोग के बावजूद कीट एवं व्याधियों की समस्याएं निरंतर बढ़ती जा रही हैं। एक दौर था, जब देहरादून की बासमती व लीची की देश-दुनिया में धाक हुआ करती थी। लेकिन बढ़ते शहरीकरण एवं कंक्रीट के जंगलों ने इससे यह पहचान छीन ली। चकराता और हर्षिल की राजमा की भी एक पहचान थी। उर्वरकों व कृषि उपकरणों की लगातार बढ़ती कीमतों, उपज में ठहराव, फसल लागत में बेतहाशा वृद्धि, घटती आय किसानों को खेती से दूर कर रही है। किसान छोटे-बड़े कर्ज तले दबे हैं। हालत यह है कि प्रदेश में राज्य गठन के समय सक्रिय जोतें 9.26 लाख थी, अब 8.91 लाख रह गई हैं। यानी जोत है 3.5 प्रतिशत की कमी आई है।

प्रदेश में 7,84,117 हेक्टेयर खेती योग्य जमीन है। इसके अलावा पर्वतीय क्षेत्र में 4.63 लाख हेक्टेयर तो मैदानी क्षेत्रों में 35, 338 हेक्टेयर भूमि है। अकेले कुमाऊं में 3,05,750 हेक्टेयर में खरीफ की फसल जिसमें धान मुख्य है तो वहीं 2,36, 790 हेक्टेयर में रबी की फसल जिसमें गेहूं मुख्य है की बुआई की जाती है। लेकिन अब मौसम की मार इस पर लगातार पड़ रही है। अल्मोड़ा में 1,25,244 हेक्टेयर, बागेश्वर में 42,375 हेक्टेयर, चंपावत में 36,604 हेक्टेयर, नैनीताल में 31444 हेक्टेयर पहाड़ी क्षेत्र में एवं 4,53,646 मैदानी क्षेत्र में एवं पिथौरागढ़ में 7,36,88 हेक्टेयर खेती का रकबा है। पिछले 16 सालों में सवा लाख हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर में तब्दील हो चुकी है। खेतों से खाने के लिए राशन की बात तो छोड़िए खेतों में बोने के लिए बीज तक नहीं निकल पा रहा है। पलायन के चलते खेत बंजर हो रहे हैैं। फसलों को सड़क तक पहुंचाने के लिए रोपवे, कोल्ड चेन एवं छोटी मंडियां स्थापित करने की दिशा में काम नहीं हो पाया। एक समय में 8.15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती हुआ करती थी जो अब घटकर 7.01 लाख हेक्टेयर में आ गई है। इसमें 3.28 लाख हेक्टेयर भूमि में ही सिंचाई आदि की व्यवस्था है।

  • उत्तराखण्ड के किसानों की मांगें
    – आपदा में भूमि का मुआवजा प्रति नाली 15 हजार हो।
    – कृषि भूमि के व्यावसायीकरण एवं औद्योगिकीकरण पर रोक लगे।
    – 50 प्रतिशत नुकसान पर आपदा राहत मिले।
    – फसलवार उत्पादों के लिए बेहतर बाजार व्यवस्था हो।
    – किसानों का जल्द व एकमुश्त बकाया भुगतान हो।
    – जंगली जानवरों से बचाव और सुरक्षा की कार्ययोजना धरातल पर उतरे।
    – न्याय पंचायत स्तर पर कोल्ड स्टोरेज बने।
    – कर्ज पर ब्याज छूट सीमा में बढ़ोतरी हो।
    – पर्वतीय क्षेत्रों में टपक सिंचाई योजना लागू हो।
    – नकदी फसलों के साथ ही पॉलीहाउस को बढ़ावा मिले।
    – दुग्ध मूल्य में बढ़ोतरी और आहार पर अनुदान मिले।
    – वर्ग ख और वर्ग चार पर भी भूमिधारी का अधिकार किसानों को मिले।
    – अन्य राज्यों की तर्ज पर मुफ्त सिंचाई जल की व्यवस्था हो।
    – उर्वरक एवं बीजों के मूल्य में छूट मिले।
    – आपदा पीड़ित हर किसान को मुआवजा दिया जाए।
  • पहाड़ों में खेती सिमटने के कारण
  • – गांवों से निरंतर हो रहा पलायन
    – कृषि भूमि पर शहरीकरण
    – जंगली जानवरों का खौफ
    – मौसम की मार
    – सिंचाई साधनों का अभाव
    – विभागीय सुस्ती
    – विपणन व्यवस्था का अभाव
    – शोध कार्यों का फायदा खेतों तक नहीं पहुंच पाना
    – निम्न आय

 

‘प्रदेश में लैंड हो¯ल्डग कम होती जा रही है। ऐसे में उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है। सरकार का पूरा फोकस प्रोडक्टिविटी बढ़ाने पर है। उत्तराखण्ड ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर एक्ट लाने वाला पहला राज्य है। आज प्रदेश में 50 प्रतिशत आर्गेनिक खेती हो रही है। बिचौलियों को खत्म करने के लिए सरकार 1300 आउटलेट्स बना रही है, जहां किसान अपना उत्पाद सीधे बेच सकेंगे।
सुबोध उनियाल, कृषि मंत्री, उत्तराखण्ड

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