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Uttarakhand

धामी पर लगाया दांव रहा सफल

उत्तराखण्ड में युवा नेता पुष्कर सिंह धामी पर भाजपा नेतृत्व का दांव सफल रहा। हालांकि धामी भारी भितरघात के चलते खुद का चुनाव हार गए, उनकी धुआंधार बैटिंग ने भाजपा को राज्य में दोबारा सत्ता दिला दी है। दिग्गज कांग्रेस नेता हरीश रावत की हार चौंकाने वाली तो आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा

एक साल पहले जब उत्तराखण्ड में भाजपा ने त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाकर तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया तब पार्टी की नैया हिचकोले खाते नजर आने लगी थी। महज एक सौ 12 दिन बाद ही भाजपा ने तीरथ सिंह रावत को उनकी गलत बयानबाजी के मद्देनजर हटा दिया। साढ़े 4 साल के कार्यकाल में तीसरे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ताजपोशी की गई। तब भाजपा को सत्ता जाने का डर सता रहा था। 4 साल के तीरथ सिंह रावत कार्यकाल के दौरान जनता भाजपा से दूरी बनाती हुई दिखी थी। लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के संक्षिप्त कार्यकाल के दौरान एक बार फिर करिश्मा हुआ। कहा जा सकता है कि भाजपा को मुख्यमंत्री चेहरा बदलने का फायदा मिला। हालांकि मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार पुष्कर सिंह धामी खटीमा सीट से चुनाव हार गए। उत्तराखण्ड में भाजपा ने न केवल मिथक तोड़ दोबारा बहुमत हासिल किया बल्कि वह एक बार फिर मोदी के बल और धामी के प्रति युवा वोटर में क्रेज के कारण सत्ता में वापसी कर पाई।

कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनावों की तरह इस बार भी सफलता हासिल नहीं हुई। इसके पीछे कई कारण रहे। पहला यह कि कांग्रेस की भितरघात और गुटबाजी का फायदा भाजपा को मिला। जबकि दूसरा यह कि कांग्रेस इस चुनाव को ओवर
कॉन्फिडेंस होकर लड़ रही थी। परिणाम यह रहा कि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत जैसे जमीनी नेता चुनाव हार गए। हरीश रावत ही नहीं बल्कि पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल और कभी हरीश रावत सरकार के सिपहसालार रहे रणजीत रावत भी अपनी डूबती नैया को किनारे नहीं लगा सके। मैदानी क्षेत्र में जहां कहा जा रहा था कि किसान भाजपा से नाराज है और महंगाई भी एक मुद्दा बनकर सामने आएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यहां तक कि भाजपा ने जनता के बीच उपजी एंटी इंकम्बेंसी को भी खत्म कर दिया। पहाड़ पर भाजपा के लिए मोदी फैक्टर प्रबल बनकर सामने आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से केदारनाथ धाम का कायाकल्प करने और चार धाम सड़क मार्ग को जोड़ने की योजना बनाई उससे जनता में भाजपा के प्रति विश्वास जागा। पिछले 4 साल में नरेंद्र मोदी उत्तराखण्ड में 5 बार गए। जिसका फायदा भी पार्टी को मिला।

उत्तराखण्ड में इस बार हिंदू-मुस्लिम का कार्ड भी खेला गया। हालांकि यह कार्ड कांग्रेस के ही उपाध्यक्ष रहे अकील अहमद की एक गलत बयानबाजी के चलते भाजपा के हाथ लग गया। चुनाव से ठीक पहले जिस तरह अकील अहमद ने अपने बयानों में प्रदेश में मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनवाने और उसमें हरीश रावत की सहमति को शामिल किया, उससे कांग्रेस डिफेंसिव मोड में नजर आई। यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को इस मुद्दे पर बार-बार सफाई देनी पड़ी। लेकिन तब तक भाजपा ने प्रदेश में यह संदेश देने का काम किया कि कांग्रेस पहाड़ पर टोपीधारी राजनीति का विस्तार करने के पक्ष में है। इस चुनाव में सबसे बड़ा झटका हरीश रावत को लगा। हरीश रावत के लिए यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण था। पहले वे रामनगर से कैंडिडेट घोषित हो चुके थे। लेकिन अपने ही खास रहे रणजीत रावत से अदावत के चलते इस सीट को बदलने को मजबूर हुए। बाद में वे लालकुआं विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े। लेकिन यहां भाजपा ने पिछले डेढ़ दशक से मजबूत पकड़ बना चुके डॉ मोहन सिंह बिष्ट को उनके सामने चुनाव लड़ा दिया। हरीश रावत ने हर तरह से अपना चुनावी समीकरण बनाया।

लेकिन वे सीट नहीं निकाल सके। 2017 के विधानसभा चुनाव में हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा से चुनाव हारने के बाद हरीश रावत 2019 में नैनीताल लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं। यह हार उनके लिए राजनीतिक समीकरण बिगाड़ सकती है। पहले से ही कांग्रेस में हरीश रावत के खिलाफ पार्टी का एक गुट सामने आता रहा है। एक बार फिर विरोधी गुट को हरीश रावत पर राजनीतिक प्रहार करने का मौका मिल सकता है। हालांकि उनकी पुत्री अनुपमा रावत हरिद्वार ग्रामीण से चुनाव जीत गई हैं। जिस तरह अनुपमा रावत ने हरिद्वार ग्रामीण से चुनाव जीतकर अपने पिता हरीश रावत की जीत का बदला लिया, उसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी की पुत्री ऋतु खण्डूरी ने भी अपने पिता की कोटद्वार में हुई हार का बदला ले लिया। उन्होंने कांग्रेस के कैबिनेट मंत्री रहे सुरेंद्र सिंह नेगी को चुनाव में हराया। कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रणजीत रावत सल्ट विधानसभा चुनाव से तीसरी बार चुनाव हारे तो वही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल भी अपनी सीट नहीं बचा पाए। पौड़ी जिले की श्रीनगर विधानसभा सीट से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष को भाजपा के धन सिंह रावत ने चुनावी शिकस्त दे दी। पूर्व में भाजपा के कैबिनेट मंत्री रहे हरक सिंह रावत की पुत्रवधू अनुकृति गुसाईं भी अपना पहला चुनाव लैंसडाउन से चुनाव हार गई।

हरक सिंह रावत को यह दूसरा बड़ा झटका लगा है। पहला झटका उन्हें चुनाव से पहले लगा था जब भाजपा ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया था। इसके बाद वे कांग्रेस के दरवाजे पर कई दिन तक अपने आप को शामिल करने की गुहार करते रहे। बाद में कांग्रेस ने एक शर्त पर शामिल किया कि उन्हें सिर्फ एक टिकट मिलेगा। वह टिकट उन्होंने अपनी पुत्रवधू अनुकृति देसाई को दिलवाया। अनुकृति देसाई को लैंसडाउन से भाजपा के महंत दिलीप सिंह रावत को चुनाव में हरा दिया। हालांकि राजनीति के दिग्गज हरक सिंह रावत अपने राजनीतिक जीवन में कभी चुनाव नहीं हारे हैं। लेकिन पिछले दिनों उन्होंने यह कहकर कि पहाड़ों में मोदी मैजिक चला संकेत दे दिए थे कि उनकी पुत्रवधू चुनाव हार सकती हैं। इस हार के तुरंत बाद यह चर्चा शुरू हो गई है कि हरक सिंह रावत की पुत्रवधू के चुनाव हारने का सबसे बड़ा झटका हरक सिंह को लगा है और उनका सियासी सफर अब समाप्ति की ओर बढ़ चला है।

कांग्रेस के दिग्गजों में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष रहे प्रीतम सिंह ने राहत दी है। वह चकराता विधानसभा सीट से लगातार पांचवीं बार चुनाव जीत गए हैं। प्रीतम सिंह के लिए यह सीट जीतना जरूरी इसलिए भी था कि कांग्रेस में हरीश रावत के बाद वही एकमात्र मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। चुनावी परिणाम आने से 1 दिन पहले ही वह पार्टी की जीत से निश्चिंत थे और अपनी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को पुख्ता करने के उद्देश्य से पार्टी के प्रत्याशियों के साथ देहरादून में बैठक करते नजर आए थे। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे किशोर उपाध्याय ने हारी बाजी जीत ली। वह कांग्रेस से भाजपा में आए और चुनाव से कुछ दिन पहले ही टिकट पा गए। किशोर उपाध्याय पिछला विधानसभा चुनाव हार चुके थे। किशोर उपाध्याय के बहाने भाजपा ने ब्राह्मण कार्ड भी खेला था। भाजपा ने जब किशोर उपाध्याय को पार्टी में शामिल किया तो यह कहकर प्रचारित किया था कि कांग्रेस में ब्राह्मण राजनीति हाशिए पर है।

हरिद्वार की खानपुर सीट पर इस बार चौंकाने वाले परिणाम सामने आए। प्रदेश में दो निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव जीते जिनमें एक पत्रकार उमेश कुमार शामिल हैं। उमेश कुमार खानपुर से निर्दलीय चुनाव लड़े। यही नहीं बल्कि उन्होंने इस सीट पर दिग्गज नेता कुंवर प्रणव सिंह चैम्पियन को चारों खाने चित कर दिया। हालांकि भाजपा ने इस बार चैम्पियन को टिकट न देकर उनकी पत्नी कुवरानी देवयानी को टिकट दिया था। लेकिन उमेश कुमार ने शुरू से ही चैम्पियन को अपने निशाने पर लिया। जिसका नतीजा यह निकला कि चैम्पियन की पत्नी कुवरानी देवयानी तीसरे नंबर पर जा पहुंची। उत्तराखण्ड में इस बार न केवल कांग्रेस और भाजपा के मुख्यमंत्री पद के दावेदार चुनाव हारे बल्कि आम आदमी पार्टी का सीएम चेहरा कर्नल अजय कोठियाल गंगोत्री विधानसभा चुनाव से हार गए। कर्नल कोठियाल को लेकर आम आदमी पार्टी बहुत उत्साहित थी। लेकिन पार्टी का उत्साह उस समय ठंडा पड़ गया जब कर्नल कोठियाल गंगोत्री से तीसरे नंबर पर रहें।

उत्तराखण्ड में टूटे कई मिथक

उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री रहते चुनाव लड़ने वाले नेता के बारे में मिथक है कि वह चुनाव नहीं जीत पाते हैं। यह मिथक इस बार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर सटीक बैठता दिखाई दिया, जबकि पूर्व में शिक्षा मंत्री रहते चुनाव हारने का मिथक इस बार गदरपुर से भाजपा प्रत्याशी अरविंद पांडे ने तोड़ दिया। यही नहीं बल्कि रानीखेत और गंगोत्री का मिथक यह था कि यहां से जो भी चुनाव जीतता है उसकी पार्टी की सरकार नहीं बनती। लेकिन इस बार रानीखेत से भाजपा के प्रमोद नैनवाल चुनाव जीते और सरकार भाजपा की बनी, जबकि गंगोत्री विधानसभा सीट को लेकर भी ऐसा ही मिथक था। गंगोत्री से भी बीजेपी का प्रत्याशी चुनाव जीत गया।

मुख्यमंत्रियों की बात करें तो 2007 के चुनाव में कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने चुनाव ही नहीं लड़ा था। 2012 के चुनाव में तत्कालीन सरकार के मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद खंड़ूड़ी चुनाव तो लड़े लेकिन उन्हें कोटद्वार सीट से हार का सामना करना पड़ा था। 2017 के चुनाव में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के मुखिया रहे हरीश रावत दो सीट हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा सीट से चुनाव लड़ा। लेकिन दोनों ही सीटों से उन्हें चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।

इस मिथक के बाद से ही मौजूदा सीएम पुष्कर सिंह धामी की खटीमा सीट पर सबकी नजरें थी। सब की चर्चाओं में यह था कि क्या इस बार मिथक टूटेगा। लेकिन नतीजा सामने आया। मुख्यमंत्री धामी को इस सीट से हार का सामना करना पड़ा।
हालांकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के खटीमा से विधानसभा चुनाव हार जाने के बाद भाजपा में सीएम चेहरे को लेकर रार छिड़ने के आसार है। चर्चा है कि भाजपा के कई ऐसे नेता हैं जो पहले से ही पुष्कर सिंह धामी को कम अनुभवी बता कर सीएम बनाने पर ही सवाल खड़ा कर रहे थे। अब उन्हें पुष्कर सिंह धामी के हारने पर फिर से मौका मिल गया है। ऐसे में पुष्कर सिंह धामी के विरोधी लॉबी दूसरे गुट के विधायक को मुख्यमंत्री पद के लिए लॉबिंग कर सकती हैं।

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