[gtranslate]
Uttarakhand

ऐसे थे हमारे पुरुषोत्तम जोशी जी

यादों का सिलसिला-पदयात्राएं-1

हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड

गांव में रामलीला थी, जिस रामलीला के नाम पर पुरुषोत्तम जोशी ब्लॉक प्रमुख, ने हमको बुलाया था। उस समय तामली में एक जूनियर हाईस्कूल था। सड़क तामली तक पहुंची नहीं थी। बहरहाल, हमने सोच विचार करके ही पैदल रास्ता चुना था, क्योंकि हम तामली वालों को इंप्रेस करना चाहते थे। यह असर उन पर डालना चाहता था कि मैं पहला सांसद हूं जो यहां तक पैदल आया है। पुरुषोत्तम जोशी जी के निमंत्रण में आए थे। उनसे बड़ी उम्मीद थी कि वो रास्ते तक हमको लेने आएंगे, मगर वो रास्ते तक आए ही नहीं। हम जैसे-तैसे जूनियर हाई स्कूल में पहुंच गए। हमने ­पूछा पुरुषोत्तम जोशी जी कहां हैं? पुरुषोत्तम जोशी जी ने उधर से ही कहा मैं इधर बैठा हुआ हूं। आइए आप लोग भी बैठ जाइए। हमें पुरुषोत्तम जोशी जी से ऐसे रुखे व्यवहार की उम्मीद नहीं थी। हम तो कहां यह सोचकर गए थे कि पहली बार कोई सांसद इतनी दूर पहुंच रहा है, न जाने हमारा कितना बड़ा स्वागत होगा

सितंबर महीने के आखिरी दिन, सायं काल थोड़ी ठंड की शुरुआत और दिन में काफी गर्मी। ऐसे ही एक दिन हमने अपने पूर्व निश्चय के अनुसार चंपावत जनपद में किमतोली से पैदल भ्रमण प्रारंभ किया। रौशाल वन विभाग के डांग बंगले में थोड़ा नाश्ता किया फिर मैं, श्री कुशल सिंह धोनी, ब्लॉक प्रमुख, श्री मोहन सिंह कटियानी, पूर्व ब्लॉक प्रमुख, मूनाकोट एवं नारायण सिंह बिष्ट जी सहित 5 और लोगों के साथ मढुआ गांव होते हुए तामली के लिए प्रस्थान किया। 3 दिन का पैदल भ्रमण, किमतोली-रौशाल, मढुआ एवं तामली, दूसरे दिन तामली से मंच तक और तीसरे दिन मंच से चंपावत। मढुवा तक बड़ा उत्साह था। लोगों ने बड़ा स्वागत किया। गांव के लोगों ने खाना भी बहुत तबीयत से खिलाया। फिर दूर तक हमको छोड़ने भी आए। नीचे काली मैय्या बहती है और साल का जंगल, लोगों ने हमको 1-2 लाठी भी पकड़ाई, ज्यों-ज्यों दिन ढलने को आया, गांव के लोग भी एक-एक, दो-दो करके वापस लौट गए। अंत में हम 9 लोग रह गए। खैर काली के किनारे पहुंचने तक हम में उत्साह बरकरार था। काली से जब तामली की तरफ पैदल चले तो चढ़ाई को देखकर थोड़ा उत्साह ढीला पड़ने लगा। उस समय शरीर में ताकत भी थी। धोनी जी, मोहन दा आदि सभी लोग गपशप मारते हुए अच्छा लग रहा था। जब हम तामली और काली के बीच के आधे जंगल में पहुंचे, काली नदी से 3 किलोमीटर की चढ़ाई चढ़के, तो थोड़ा शरीर भी ढीला पड़ने लगा और उधर सूरज डूबने को हो रहा था। हमने आपस में बातचीत करके कहा, थोड़ा तेज-तेज कदम बढ़ाएं तो अंधेरा होने से पहले, हम तामली के नाप खेतों में पहुंच जाएंगे, अच्छा रहेगा। आपस की बातचीत में भालू का जिक्र भी आया। बाघ का जिक्र भी आ रहा था और उस एरिया में शेर रहता है। काली नदी के किनारे-किनारे नीचे से टनकपुर के जंगलों से चलकर आता है। यह गांव वाले हमको पहले ही बता चुके थे। भालू सीटी बजाता है और भी बहुत से किस्से-कहानियां कहते -सुनते हम आगे बढ़ ही रहे थे, तब तक कुछ सीटी जैसी आवाज आई तो हम चौकन्ना हुए कि कहीं भालू की आवाज तो नहीं है! कुछ काकड़ (पहाड़ी हिरण) दिखे हम जोर-जोर से बातचीत करने लग गए, डर कम था। संख्या में हम ज्यादा थे, लाठियां भी हमारे पास थी, मगर तब तक हम रास्ता भटक गये, जो मेन रास्ता था वह कहीं से कट गया, हमको कुछ अंदाज नहीं आ रहा था, कुछ छोटी-छोटी झाड़ियां एवं घास पकड़ करके आगे बढ़ते गए। किसी तरीके से भटकते-भटकते जब एक आबाद खेत तक पहुंचे, हमने बड़ी राहत की सांस ली, सोचा कि अब तामली आ गए। मगर हमको क्या मालूम था, अगले मोड़ पर क्या सरप्राइज होगा! खैर हम किसी तरीके से 1-2 खेत चढ़कर के ज्यों ही आगे पहुंचे, तो दो भालू आते हुए दिखाई दिए और उस समय तक लगभग अंधेरा हो चुका था। हमारे पास टॉर्च थे, हमने टॉर्च लगाया और खूब हल्ला मचाया। किसी तरीके से भालू रास्ते से हट गए। मगर हमको लगातार जब तक हम 8-10 खेत और ऊपर नहीं चढ़ गए और माइक की आवाजें सुनाई देने लगी, तब तक हम थोड़ा घबराए हुए थे। हमें ऐसा लग रहा था जैसे भालू हमारे पीछे-पीछे आ रहे हैं। हम एक-दूसरे को देखकर कवर करते हुए आगे बढ़ रहे थे। मगर हम अभी रास्ते में नहीं पहुंचे थे। गांव में रामलीला थी। जिस रामलीला के नाम पर पुरुषोत्तम जोशी ब्लॉक प्रमुख, ने हमको बुलाया था। उस समय तामली में एक जूनियर हाईस्कूल था। सड़क तामली तक पहुंची नहीं थी। बहरहाल, हमने सोच विचार करके ही पैदल रास्ता चुना था, क्योंकि हम तामली वालों को इंप्रेस करना चाहते थे, यह असर उन पर डालना चाहता था कि मैं पहला सांसद हूं जो यहां तक पैदल आया है। पुरुषोत्तम जोशी जी के निमंत्रण में आए थे। उनसे बड़ी उम्मीद थी कि वो रास्ते तक हमको लेने आएंगे। मगर वो रास्ते तक आए ही नहीं। किसी प्रकार से हम गांव के मुख्य रास्ते में पहुंच गए और कुछ टेक लगाते, आवाज लगाते गांव की जब पहली बाखली में पहुंचे तो हमने लोगों से पूछा कि यह तामली है! हमने कहा पुरुषोत्तम जोशी जी कहां हैं, यहां उनका घर कौन-सा है! जब उन्होंने कहा घर तो उनका दूसरी तरफ है, मगर वह इस समय जूनियर हाई स्कूल में रामलीला हो रही है, वहां हैं। हमने रास्ता पूछा और फिर अंदाज भी आ गया था, माइक की आवाज भी सुनाई दे रही थी, टॉर्च हमारे पास था ही। गांव के एक-दो लोगों से फिर हमने मदद भी ली। खैर, वह हम को लेकर के किसी तरीके से तामली स्कूल में पहुंच गए। हमें बड़ी उम्मीद थी कि हमारा बड़ा स्वागत होगा। ढोल-नगाड़े बजेंगे और गले में माला भी पड़ेंगी! पुरुषोत्तम जोशी जी ने गांव वालों से कह दिया कोई स्वागत नहीं, कोई माला नहीं। हम जैसे-तैसे जूनियर हाई स्कूल में पहुंच गए। रामलीला अभी शुरू नहीं हुई थी। जूनियर हाई स्कूल की माननीय प्रधानाचार्या सरस्वती जोशी जी, वो आगे आई उन्होंने एक माला छिपाकर के रखी हुई थी वह मुझको पहना दी। हमने कहा पुरुषोत्तम जोशी जी कहां हैं, पुरुषोत्तम जोशी जी ने उधर से ही कहा मैं इधर बैठा हुआ हूं। आइए आप लोग भी बैठ जाइए। हमें पुरुषोत्तम जोशी जी से ऐसे रुखे व्यवहार की उम्मीद नहीं थी, हम तो कहां यह सोचकर गए थे कि पहली बार कोई सांसद इतनी दूर पहुंच रहा है, न जाने हमारा कितना बड़ा स्वागत होगा! और वहां स्वागत तो छोड़िए, कुछ था ही नहीं। यदि प्रधानाध्यापिका के शब्दों को ही स्वागत मान लें तो वही अनमोल वचन थे। हम आगे बढ़ कर जैसे-तैसे कुछ कुर्सियां प्रधानाध्यापिका जी ने हमारे लिए लगा दी, तो पुरुषोत्तम जी की आवाज गरजी। बोले, एमपी साहब कुर्सी में नहीं बैठेंगे, नीचे बैठेंगे। मैं फिर नीचे बैठ गया। थोड़ी देर बाद जब प्यास लगी तो पानी मांगा, तो पुरुषोत्तम जोशी जी ने कहा पानी की स्कीम बनाई है यहां! मैं बड़ा असमंजस में पड़ गया। खैर, प्रधानाध्यापिका जी ने थोड़ा पानी भी पिला दिया। अब हमको उम्मीद थी कि कुछ चाय मिलेगी, भूख लग लग रही थी, कुछ और व्यवस्था होगी। फिर चिंता सताने लग गई कि कुछ खाने को मिलेगा या नहीं मिलेगा! सोने का कहां होगा! पुरुषोत्तम जोशी जी बोले पहले चीजें स्पष्ट होंगी जनता के सामने, तब उसके बाद चाय होगी, तब उसके बाद कुछ और बातें होंगी। यह उन्होंने अपना फरमान जारी कर दिया। खैर, जब सब लोग एकत्र हो गए तो पुरुषोत्तम जोशी जी ने एक-एक करके मांगें बतानी शुरू की, जिसमें तामली तक 56 किलोमीटर सड़क, तामली में हॉस्पिटल, हाईस्कूल, बिजली, मंच में हॉस्पिटल एवं हाई स्कूल, फुंगर में हाई स्कूल सहित रियासी क्षेत्र आदि की कई मांगें उन्होंने रख दी और टनकपुर से किस तरीके से उस एरिया को जोड़ा जाए उसकी मांग भी रखी। जोशी जी बोले पहले आप हमारी बातों का उत्तर देंगे, तो मैं समझ गया कि हरीश रावत यदि खाना, खाना है, चाय पीनी है, सोने का बंदोबस्त करना है तो सारी मांगों को हां कह दे। मैंने एक-एक करके सारी मांगों को मान लिया और उन मांगों के संबंध में पहले से ही मुझे पता था। मैं क्षेत्र की समस्याओं से रू-ब-रू था, तामली बहुत दूर क्षेत्र था। बहुत अलग-थलग पड़ा हुआ था इसलिए उसको तामली या तल्ला देश कहते थे। मैंने माइक पकड़ा और अपनी बात कही और सब चीजें हां कह दी। वहां के लोग गोरखनाथ जी की बड़ी प्रतिष्ठा करते हैं। मंच से 3 किलोमीटर ऊपर गुरु गोरखनाथ जी की धुनी है, जो गुरु गोरखनाथ जी ने वहां पर लगाई थी। मैंने गुरु गोरखनाथ जी का नाम लिया। मैंने कहा भगवन इन सब कामों को मैं कर सकूं इसकी शक्ति देना।

आज कई वर्षों बाद जब मैं उस यात्रा को स्मरण कर रहा हूं तो बदन में कंपन-सी उठ रही है। जोशी जी की मूछें बड़ी-बड़ी थी। अब तो दिवंगत हो गए हैं। उनकी आंखें भी बड़ी-बड़ी थी। टोपी पहनते थे और बड़े अच्छे व्यक्ति थे और गांव वाले उन्हीं की कमांड पर चलते थे। जैसे ही मैंने सड़क की घोषणा की ताली बजाने लगे। जोशी जी बोले कोई ताली नहीं, तालियां बंद हो गई। खैर, जब सब चीजें उनकी मैंने मान ली तो उन्होंने कहा लिख करके देंगे कि कितने दिन में यह सब काम हो जाएंगे! मैंने कहा इस कार्यकाल में ये सब चीजें हो जाएंगी और भगवान गुरु गोरखनाथ जी की कृपा से वह सारी चीजें हो भी गई। इतनी लंबी ऐतिहासिक पहली सड़क राज्य सरकार ने मंजूर की थी। खैर, आज तो वह इलाका सर्वांगीण विकास का प्रतीक बन गया है। तामली में इंटर कॉलेज है। अच्छा हॉस्पिटल है। तहसील भी है। हमने तहसील खोल दी थी वहां और अब तो तल्ला देश जगमग करता हुआ एरिया है। बड़ा स्नेह था जोशी जी मेरे साथ। उस दिन गांव वालों को वो जताना चाहते थे लो मैं ले आया हूं और अब यह करेंगे, और लोगों को विश्वास दिलाना चाहते थे कि तुम्हारे लिए यह सब किया जा रहा है। उन्होंने हमेशा उस इलाके को कांग्रेस के साथ बांध करके रखा। खैर, जैसे-तैसे जब भाषण समाप्त हुआ तो सब्जी-रोटी भी आ गई। हमने भगवान को धन्यवाद दिया। उसके बाद उन्होंने हमको दूध भी पिला दिया। दही भी खिलाया। बहुत अच्छा था। यदि उस दही को चाकू से काटा जाए तो पनीर की तरह कट जाता था, इतना अच्छा दही था। क्योंकि बांझ के पेड़ों से घिरा हुआ वह एरिया जंगल के बीच में अच्छा पशुपालन एरिया था। खैर, रात वहीं रहे और दूसरे दिन नहाने का इंतजाम भी हुआ। चाय भी उन्होंने पिलाई। नाश्ता भी करवाया और मंच की ओर पैदल चलते-चलते 2 बजे पहुंचे। तामली से मंच और फिर मंच से चंपावत तक सही पद यात्रा रही, 100 से अधिक लोग हमारे साथ लगातार चल रहे थे। बाजे भी बज रहे थे। मंच में टूटा-फूटा डाक बंगला था उसमें हमने रात बिताई और गोरखनाथ जी की धूनी के लिए लकड़ियां भिजवाई और तीसरे दिन सुबह मंच में स्नान व नाश्ता करके आगे के लिए चल पड़े। फुंगर पहुंचने पर वहां के लोगों ने अच्छा स्वागत किया। अच्छा खाना खिलाया। फिर हम पैदल चलते हुए 4 बजे चंपावत पहुंचे। चंपावत में हमारा भव्य स्वागत हुआ। सारे कांग्रेसजन, वहां के लोग बहुत उत्साहित होकर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे, वहां भाषण में हमने अपनी घोषणाओं को दोहराया और मैं बहुत आभारी हूं बलदेव सिंह आर्य जी का, उन्हें याद करना चाहूंगा। वो उस समय राज्य सरकार में लोक निर्माण विभाग मंत्री थे। तामली की व्यथा उनको सुनाई। उन्होंने 56 पूरी सड़क मंजूर की। आज तो तामली एरिया अपने विकास के मॉडल के रूप में आगे बढ़ रहा है। टनकपुर से जौलजीबी को जोड़ने वाली सड़क सरयू के किनारे-किनारे भी, उधर रौशाल-मढुवा वाली सड़क भी बन गई है। इधर यह पूरी सड़क बनकर के, अब पक्की सड़क के रूप में बांज और बुरांश के जंगल के बीच में इस सड़क से गुजरना अपने आप में एक बहुत स्मरणीय यादगार के रूप में रहता है। इस समय जब मैं उस यात्रा को स्मरण कर रहा हूं और अपने यात्रा के साथियों के दीर्घ जीवन की कामना करता हूं। पुरुषोत्तम जी तो नहीं रहे और नारायण लाल शाह जी जो ब्लॉक प्रमुख थे उनसे पहले के वह भी नहीं रहे। सुरेंद्र प्रहरी भी नहीं रहे, लेकिन और हमारे साथी अभी हमारे बीच में हैं। मैं समझता हूं उस यात्रा का स्मरण, उनके मन में आज भी स्फूर्ति पैदा करता होगा और मैं भी अपने को बड़ा स्फूर्तिवान महसूस कर रहा हूं। उस यात्रा का वर्णन करते हुए और लगता है कि एक दिन ऐसा भी था जब इतनी लंबी 2-3 दिन की पैदल यात्रा और इतनी दुर्घर्षपूर्ण यात्रा हमने पूरी की और जो कालांतर में तामली क्षेत्र तल्ला देश के विकास यात्रा में परिवर्तित हो गई। आज भी मेरे स्मरण में, मेरी यादों में अपनी वह यात्रा बार-बार आती है और विशेष तौर पर वह दृश्य जब हमने भालूओं को देखा और लगातार सहमे रहे, डरते रहे कि कहीं भालू पीछे तो नहीं आ रहा है और श्री जोशी जी की फर्राती हुई मूछें याद आ रही हैं। ऐसे थे हमारे पुरषोत्तम जोशी जी, क्षेत्रीय विकास के अग्रदूत, श्रद्धांजलि।

 

You may also like

MERA DDDD DDD DD