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तीर्थ नगरी हरिद्वार में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार हैं। भाजपा प्रत्याशी रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहारे अपनी नैय्या पार लगाना चाहते हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस प्रत्याशी अंबरीश कुमार बाहरी और स्थानीय के मुद्दे को जोर-शोर से हवा दे रहे हैं। बसपा प्रत्याशी अंतरिक्ष सैनी अपनी पार्टी के परंपरागत वोटों को गोलबंद करने की कोशिश में हैं। कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों के सामने दिक्कत यह है कि उन्हें बाहर से ज्यादा अपनी ही पार्टी के भीतर जूझना पड़ रहा है
रा ज्य की हरिद्वार लोकसभा सीट का सांसद बनने की इच्छा हर राजनेता में होती है। तीर्थ नगरी का सांसद होने पर उसकी खुद-ब-खुद देश भर में पहचान बन जाती है। इस बार भी इस सीट से राजनीतिक दलों के कुल 20 प्रत्याशियों ने नामांकन किये हैं। भारतीय जनता पार्टी ने मौजूदा सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ पर एक बार फिर भरोसा जताया है, तो प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने तमाम कयासबाजी पर विराम लगाते हुए पूर्व विधायक अंबरीश कुमार को मैदान में उतारा है। पहले ऐसा माना जा रहा था कि कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को यहां से चुनाव लड़ाएगी। लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें नैनीताल लोकसभा सीट से उम्मीदवार घोषित किया, तो अंबरीश कुमार की राह आसान हो गई। हालांकि हार- जीत का परिणाम 23 मई को सामने आएगा, परंतु फिलहाल हरिद्वार में चल रही ‘स्थानीय’ और ‘बाहरी’ प्रत्याशी की लड़ाई में अंबरीश कुमार मौजूदा सांसद डॉ रमेश पोखरियाल निशंक को कड़ी टक्कर दे सकते हैं। दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के अलावा सपा-बसपा गठबंधन ने बसपा के डॉक्टर अंतरिक्ष सैनी को उम्मीदवार घोषित किया है। बसपा का परंपरागत वोट माने जाने वाला दलित वोट इस बार बसपा के पक्ष में लामबंद नजर आ रहा है। मुस्लिमों में कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ व्याप्त नाराजगी के कारण मुस्लिम वोट बसपा की तरफ जाने के आसार हैं। ऐसे में अंतरिक्ष सैनी मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकते हैं। कांग्रेस-भाजपा को प्रत्याशियों को दूसरी पार्टियों से ज्यादा अपने दलों के भीतर की कलह से दिक्कत हो रही है।
हरिद्वार पूर्ण रूप से मैदानी सीट मानी जाती है। यहां 60 फीसदी मतदाता ग्रामीण हैं, जबकि 40 प्रतिशत मतदाता शहरी। इस लोकसभा क्षेत्र में जनपद  देहरादून  की तीन विधानसभा सीटें धर्मपुर, डोईवाला और ऋषिकेश  आती हैं। हरिद्वार जिले की ज्वालापुर, भेल, रानीपुर, भगवानपुर, पिरान कलियर, रुड़की, खानपुर, लक्सर, हरिद्वार ग्रामीण व हरिद्वार विधानसभा सीटें शामिल हैं। 18 लाख 3950 मतदाताओं वाली इस सीट पर महिला मतदाताओं की संख्या 837240 है, तो 966576 पुरुष मतदाता हैं। हरिद्वार दलित मुस्लिम बाहुल्य सीट मानी जाती है। इस सीट का अधिकांश हिस्सा ग्रामीण है। कुल पोलिंग बूथ में से 119 अति संवेदनशील तो 180 संवेदनशील चयनित किए गए हैं।
दरअसल, हरिद्वार लोकसभा सीट 1971 में अस्तित्व में आई। 1971 के चुनाव में यहां कांग्रेस पार्टी के मुल्की राज ने परचम लहराया। 1977 में भारतीय लोकदल के प्रत्याशी भगवान दास ने इस सीट से जीत दर्ज की। 1980 के मध्यावधि चुनाव में लोकदल के जगपाल विजयी रहे। 1984 में कांग्रेस के सुंदरलाल जीते। 1987 के उपचुनाव में कांग्रेस के राम सिंह विजयी हुए। 1989 में यहां से कांग्रेस के जगपाल जीते। 1991, 1996, 1998 और 1999 में हरपाल सिंह साथी भाजपा के टिकट पर लगातार चुने गए। 2004 में उत्तराखण्ड बनने के पश्चात पहाड़ बनाम मैदान के नाम पर सपा के राजेंद्र बॉड़ी भी सांसद चुने गए। 2009 में कांग्रेस के हरीश रावत चुने गए। इसके बाद 2014 में भाजपा के रमेश पोखरियाल निशंक चुनाव जीते।
इस बार हरिद्वार लोकसभा सीट पर मुकाबला काफी रोचक होगा। जहां एक ओर डॉ रमेश पोखरियाल निशंक मोदी सरकार द्वारा किए गए विकास कार्यों के आधार पर जनता के बीच जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अंतर्कलह में फंसी भारतीय जनता पार्टी के तमाम गुट निशंक पर स्थानीय कार्यकर्ताओं की अनदेखी व सांसद निधि में स्थानीय स्तर पर की गई उपेक्षा को मुद्दा बनाकर उनकी राह में मुश्किल पैदा कर रहे हैं। यही नहीं निशंक द्वारा गोद लिए गए गोवर्धनपुर गांव की वर्तमान स्थिति पर भी सोशल नेटवर्क फेसबुक, व्हाट्सएप पर विरोधी खेमे के भाजपा कार्यकर्ता निशंक के खिलाफ अभियान चलाए हुए हैं। स्थानीय विधायक और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक व निशंक के बीच 36 का आंकड़ा भी जाग जाहिर है। फिर भाजपा कार्यकर्ताओं का एक गुट नरेश बंसल को प्रत्याशी देखना चाहता था। यह गुट निशंक के नाराज है। इस प्रकार निशंक नरेंद्र मोदी के सहारे लोकसभा पहुंचने की उम्मीद लगाकर मैदान में डटे हैं।
प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का नाम काफी चर्चा में रहा, परंतु स्थानीय स्तर पर सक्रिय प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह गुट द्वारा हरीश रावत को बाहरी प्रत्याशी बताकर उनके खिलाफ मुहिम छेड़ दी गई। हरीश रावत के अलावा हरिद्वार के एसएसपी रहे आईपीएस अधिकारी राजीव स्वरूप की पत्नी अनु स्वरूप सहित सचिन पायलट की मां रमा पायलट का नाम भी काफी चर्चा में रहा, परंतु ऐन वक्त पर पूर्व विधायक अंबरीश कुमार को टिकट थमा दिया गया। हालांकि अंबरीश पुराने नेता हैं, लेकिन उनकी राह इसलिए आसान नहीं लगती कि पार्टी में उनका भारी विरोध हो रहा है। स्थानीय कांग्रेसियों में उनको लेकर भारी रोष व्याप्त है जिसको दूर करना अंबरीश के वश से बाहर है। फिर अंबरीश कुमार को हरिद्वार की राजनीति में दलबदलू नेता के तौर पर भी जाना जाता है। कांग्रेस पार्टी के साथ अपनी राजनीतिक पारी शुरू करने वाले अंबरीश कभी भी एक दल में संतुष्ट नहीं रहे। अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौरान जब कांग्रेस ने अंबरीश को टिकट न देकर महावीर राणा को हरिद्वार से प्रत्याशी घोषित किया तो अंबरीश बगावत कर निर्दलीय मैदान में कूद गए। उस दौरान उन्हें महावीर राणा के हाथों हार का स्वाद चखना पड़ा। 1996 में हुए। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अंबरीश ने जनता दल के टिकट पर हरिद्वार सीट से जीत दर्ज की, लेकिन 2000 आते-आते उत्तराखण्ड राज्य अस्तित्व में आ गया। वर्ष 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में अंबरीश कुमार ने हरिद्वार और लाल ढांग सीट से समाजवादी पार्टी प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा, परंतु दोनों जगह से उनको हार नसीब हुई।
कांग्रेस प्रत्याशी अम्बरीश कुमार
अपने समर्थकों के साथ नामांकन भरने जाते बसपा प्रत्याशी अंतरिक्ष सैनी

2007 में भी अंबरीश कुमार विधानसभा चुनाव जीतने में असफल रहे। 2012 के  विधानसभा चुनाव से पूर्व अंबरीश ने एक बार फिर कांग्रेस में शामिल होकर अपनी दावेदारी पेश की। 2012 में अस्तित्व में आई रानीपुर भेल विधानसभा सीट से टिकट मांग रहे अंबरीश के बजाए पार्टी ने किसान नेता बलवंत सिंह चौहान को मैदान में उतारा जिससे क्रुद्ध होकर एक बार फिर अंबरीस ने कांग्रेस को अलविदा कह निर्दलीय चुनाव में उतरने का फैसला किया, परंतु आदेश चौहान के हाथों उनको करारी हार झेलनी पड़ी। 2017 के विधानसभा चुनाव से पूर्व एक बार फिर अमरीश कांग्रेस में शामिल हुए और रानीपुर बीएचएल विधानसभा सीट से कांग्रेस का टिकट पाने में कामयाब रहे, परंतु जीत इस बार भी उनसे रूठी रही। भाजपा प्रत्याशी आदेश चौहान के हाथों उन्हें करारी हार मिली अब लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने तमाम दावेदारों को नकार कर अंबरीश पर भरोसा जताया है, परंतु वे जनता के भरोसे पर कितना खरा उतरते हैं, यह देखने वाली बात होगी।

अंबरीश के लिए दिक्कत यह भी है कि पर्वतीय क्षेत्र के मतदाता हरीश रावत की तरह उन्हें वोट नहीं देते। ऐसा इसलिए कि राज्य आंदोलन के दौरान वे सपा में रहे। सपा को पहाड़ के लोग पसंद नहीं करते। वैसे स्थानीय प्रत्याशी और बाहरी प्रत्याशी के मुद्दे को हवा देकर अंबरीश कुमार मुकाबले को रोचक बनाने में जुट गए हैं। राजनीतिक जानकार भले ही अंबरीश को मौजूदा सांसद निशंक के सामने कमजोर प्रत्याशी मान रहे हों, लेकिन अगर कांग्रेस का परंपरागत माना जाने वाला मुस्लिम वोट हासिल करने के साथ- साथ अंबरीश स्थानीय प्रत्याशी के मुद्दे पर ग्रामीण क्षेत्रों में अपना प्रभाव बनाने में सफल रहे, तो कड़ी टक्कर के सकते हैं। अंबरीश के समक्ष बड़ी दिक्कत यह है कि क्षेत्र में कांग्रेस अंदरूनी कलह के भंवर में जकड़ी है। पूर्व दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री व प्रदेश प्रवक्ता फुरकान अली उनके लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। फुरकान ने अंबरीश के टिकट से क्षुब्ध होकर कांग्रेस छोड़ दी है। उन्होंने शिवपाल यादव  की प्रगतिशील  समाजवादी  पार्टी  लोहिया  से  पर्चा भरा है। वह कांग्रेस प्रत्याशी अंबरीश कुमार की राह में रोड़ा माने जा रहे हैं। फुरकान अली मुस्लिम समाज की झोझा बिरादरी से आते हैं। इस बिरादरी के काफी वोट हैं। रुड़की से पूर्व विधायक रहे सुरेश चंद जैन का कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होना भी अंबरीश के लिए शुभ संकेत नहीं है। जिस प्रकार कांग्रेस के भीतर ही अंबरीश का विरोध हो रहा है, वह इस बार एक बार फिर डॉ रमेश पोखरियाल निशंक का भाग्य चमका सकता है।
बसपा प्रत्याशी डॉक्टर अंतरिक्ष सैनी बसपा के कैडर वोट को अपने पक्ष में लामबंद करने का दावा कर चुनावी मैदान में डटे हैं। उनके लिए अच्छी बात यह है कि दोनों मुख्य दलों की तरह बसपा में अंदरूनी कलह नहीं देखी जा रही है जिसके आधार पर बसपा प्रत्याशी को भी मजबूत माना जा रहा है। यही नहीं कांग्रेस से नाराज मुस्लिम मतदाताओं का एक बहुत बड़ा तबका डॉक्टर अंतरिक्ष सैनी की पैरवी करने में जुटा है। कुल मिलाकर अभी चुनाव शुरू हुआ है, परंतु मुकाबला सीधे तौर पर त्रिकोणीय नजर आ रहा है। यह तो वक्त ही बताएगा की जीत किसके हिस्से में आती है, परंतु फिलहाल ­­डॉ रमेश पोखरियाल निशंक प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं।

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