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Uttarakhand

गुलनाज की बेनूर जिंदगी में आई बहार

महिला का स्वाभिमान और आत्मसम्मान प्रायः उसके चेहरे से देखा जाता है, जो उसके व्यक्तित्व का एक हिस्सा है। चेहरे अथवा शरीर को विकृत कर देना मानव शरीर के प्रति न केवल एक अपराध है, अपितु यह पीड़िता के लिए स्थायी मनोवैज्ञानिक क्षति का कारण बन जाता है। जसपुर की गुलनाज खान पिछले 9 साल से इसी पीड़ा से गुजर रही थी। गुलनाज की इस पीड़ा को हाईकोर्ट की युवा अधिवक्ता स्निग्धा तिवारी ने समझा। स्निग्धा ने गुलनाज की बेनूर हो चुकी जिंदगी में बहार लाने का बीड़ा उठा हाईकोर्ट में एसिड अटैक पीड़िता की इस जंग को न केवल जीता है बल्कि देश के लिए एक नजीर पेश कर दी है

वह महज 17 साल की थी। 29 नवंबर 2014 की सुबह-सुबह तैयार होकर घर से स्कूल के लिए निकली थी। मगर जब एक सिरफिरे का उसने शादी का प्रस्ताव ठुकरा दिया तो सिर्फ एक ‘ना’ यानी कि इंकार ने उसकी सारी जिंदगी जलाकर कर राख दी। उसके ऊपर हमला हुआ। वह भी ऐसा-वैसा हमला नहीं बल्कि वह हमला जो जिस्म के साथ-साथ आत्मा भी जला देता है। इस हमले के जख्म से रिसने वाले मवाद तो एक समय के बाद बंद हो जाते हैं मगर इसका दर्द जिंदगी भर रिसता रहता है। इससे भी चिंतनीय यह है कि पीड़िता हर पल थोड़ा-थोड़ा मरती रहती है। जसपुर निवासी गुलनाज खान भी पिछले 8 साल से इस पीड़ा से गुजर रही है।
एसिड हमले का शिकार हुई गुलनाज का चेहरा बुरी तरह झुलस गया था। उसका दाहिना कान पूरी तरह चला गया था और दूसरे कान की 50 प्रतिशत सुनने की क्षमता खत्म गई थी, उसके चेहरे, छाती और ऊपरी क्षेत्र में जिसमें हाथ भी शामिल है, उन सब में गंभीर जलन की चोटें आई थीं। उसे पहले जसपुर के सरकारी चिकित्सालय में भर्ती कराया गया, वहां डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। इसके बाद काशीपुर के एक निजी चिकित्सालय में भर्ती कराया गया। लेकिन जब वहां से भी पीड़िता को फायदा नहीं हुआ तो देहरादून के हिमालयन हॉस्पिटल में ले जाया गया।

जहां उसकी जिंदगी तो बच गई, लेकिन एसिड के दाग उसकी जिंदगी में डरावना दर्द बनकर रह गए। शरीर के जिस हिस्से पर एसिड गिरता है उस हिस्से की त्वचा के टीशू नष्ट हो जाते हैं, जिन्हें पहले जैसा होने में लंबा वक्त लगता है और कई बार तो वे इस लायक रह भी नहीं जाते कि फिर से उस अवस्था में लौट सकें। शायद यही वजह है कि ‘रूह’ को जला देने वाले इस खूंखार हमले को नवंबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान कहा था- ‘एसिड हमला, हत्या से भी बदतर है’।

एसिड अटैक से पहले गुलनाज खान

लेकिन कहते हैं कि कभी किसी की दुःख भरी जिंदगी में सहायता करने कुछ लोग विभिन्न रूपों में आते हैं। स्निग्धा तिवारी भी कुछ इसी तरह पीड़िता की जिंदगी में एक अधिवक्ता के रूप में आईं। जिन्होंने हाईकोर्ट नैनीताल में पीड़िता के मामलें की लड़ाई लड़ी। गत् 16 नवंबर को इस मामले में आए आदेश ने देश में ऐसी नजीर पेश की है जो प्रतिपूर्ति में अब तक सबसे अधिक है। उच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए, एसिड अटैक पीड़िता के पक्ष में 35 लाख रुपए की मुआवजा राशि देने के आदेश दिए हैं। एकल पीठ न्यायमूर्ति संजय कुमार मिश्रा द्वारा इस प्रकरण में आदेश पारित किया गया कि पीड़िता को सरकार द्वारा 35 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाएगा और उसके अतिरिक्त उन पर जो भी हर्जा कर्जा चिकित्सा और उनकी सर्जरी पर व्यय होगा, वह सब राज्य सरकार द्वारा ही किए जाएंगे चाहे वह इलाज किसी अन्य संस्थान में उत्तराखण्ड राज्य के बाहर दिल्ली या चंडीगढ़ कही भी हो।

मामले को पूरी तरह समझने के लिए 2014 में लौटना होगा। 29 नवंबर 2014 का दिन गुलनाज के लिए कहर बनकर आया था। आरोपी फरहान पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया था। तब फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 14 मार्च 2016 को उसे दोषी करार देते हुए 10 साल की कैद और 20 हजार रुपए का जुर्माने की सजा सुनाई। इसके बाद पीड़िता को मुआवजे के लिए दर-ब-दर होना पड़ा। 2016 में फैसला आने के दो साल बाद उसको एक लाख 60 हजार रुपए का मुआवजा दिया गया। इसके एक साल बाद 24 सितंबर 2019 को एक लाख 50 हजार रुपए भी बतौर मुआवजा पीड़िता को दिए गए। इस तरह कुल तीन लाख 10 हजार रुपया भुक्तभोगी को मिला। लेकिन अपने साथ हुए इस जघन्य अपराध की प्रतिपूर्ति से उसकी सुरक्षा और इज्जत से जीने के अधिकार को बनाए रखने में वह अक्षम हो सकती है? इसी सवाल के साथ गुलनाज खान ने 2019 में उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की चौखट पर दस्तक दी थी। जिसके कानूनी पहलुओं को समझने के साथ उसकी इस राह में उच्च न्यायालय की युवा अधिवक्ता स्निग्धा तिवारी का मार्गदर्शन मिला।

मामला कोर्ट में चला तो कोर्ट में पेश हुए सरकारी वकील ने दलील दी कि ‘उनको हर चीज का प्रमाण एक अलग फोरम पर देना चाहिए माननीय उच्च न्यायालय में सीधे रिट याचिका नहीं करनी चाहिए।’ इतना ही नहीं बल्कि सरकारी पक्ष ने कोर्ट में यह कहकर कि ‘एक ऐसे प्रकरण में लाभ देने से सभी लोग ऐसी प्रतिपूर्ति चाहेंगे’ स्निग्धा तिवारी को हतोत्साहित करने की कोशिश की। लेकिन स्निग्धा तिवारी द्वारा इसके जवाब में जो कहा गया उससे सरकारी पक्ष निरुत्तर हो गया।

स्निग्धा तिवारी द्वारा उच्च न्यायालय के समक्ष बयां किया गया कि कैसे एक अटैक पीड़िता के मामले में उचित मुआवजा नहीं दिया जा रहा है, जबकि राजनीतिक मामलों में सरकार करोड़ों लुटा देती है। उनके द्वारा यह भी बताया गया कि एक पीड़िता की इज्जत और उसकी पूरी जिंदगी भर का दर्द जिसके साए में उसे रहना पड़ेगा उसकी प्रतिपूर्ति के रूप में न्यायालय को पीड़िता के पक्ष में कोई सकारात्मक आदेश पारित करना चाहिए।
बहरहाल, गुलनाज प्रकरण में 16 दिसंबर 2022 को आए नैनीताल हाईकोर्ट के इस फैसले से देशभर की एसिड अटैक जैसे जघन्य अपराध पीड़ितों को न्याय के साथ ही गरिमापूर्ण जीवन जीने की उम्मीद नजर आने लगी है।

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