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कांग्रेस-भाजपा दोनों पार्टियां रूठे हुए नेताओं को मना रही हैं। बागियों के लिए भी घर वापसी के दरवाजे खोल दिए गए हैं। भाजपा राष्ट्रवाद के मुद्दे को उठा रही है, तो कांग्रेस उसकी काट में इस बात पर जोर दे रही है कि बीसी खण्डूड़ी को रक्षा समिति से हटाकर अपमानित किया गया। जोर- आजमाइश के इस सियासी खेल में सांगठनिक क्षमता और अनुभव के हिसाब से भाजपा प्रत्याशी भारी पड़ रहे हैं
पौड़ी लोकसभा सीट का चुनाव बेहद खास बन चुका है। भाजपा के तीरथ सिंह रावत और कांग्रेस के मनीष खण्डूड़ी के बीच पूरा चुनाव सिमटा हुआ दिखाई दे रहा है। जहां भाजपा के तीरथ सिंह रावत मोदी मैजिक और पार्टी के मजबूत संगठन के बदौलत चुनाव में अपनी जीत के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं, तो वहीं कांग्रेस के मनीष खण्डूड़ी महज पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी के नाम पर चुनाव में जुटे हुए हैं। सैनिक बाहुल्य सीट के चलते भाजपा राष्ट्रवाद को अपने मुख्य चुनावी मुद्दे में शामिल करके जनता के बीच अपनी पकड़ बनाने का प्रयास कर रही है ओैर कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी को मोदी सरकार द्वारा रक्षा समिति से हटाए जाने को सेना का अपमान बताकर भाजपा के मुद्दे को काटने का प्रयास कर रही है।
भाजपा इस सीट पर जीत के लिए पूरी तरह से कमर कस चुकी है। पुलवामा हमले का बदला एयर स्ट्राइक से लिए जाने के बाद से ही भाजपा ने इस पूरे प्रकरण को जिस तरह से राष्ट्रवाद से जोड़कर अपना बड़ा मुद्दा बनाया है उसकी काट कांग्रेस नहीं कर पा रही है। हालांकि कांग्रेस के बड़े नेता सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक पर सवाल खड़े तो कर रहे हैं, मतदाताओं के बीच सैनिकों के सम्मान की बात तो कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के पास ऐसा कोई बड़ा मुद्दा नहीं है जो भाजपा के राष्ट्रवाद की चुनाव में बड़ी काट कर पाए।
संभवतः इसी के चलते कांग्रेस के तरकश में केवल बीसी खण्डूड़ी को रक्षा समिति से हटाए जाने का ही बड़ा तीर है। इसके बूते वह भाजपा के आरोपों का जबाब देने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस  दावा किया जा रहा है कि बीसी खण्डूड़ी ने जब देश की रक्षा तैयारियों की हकीकत सामने रखी तो मोदी सरकार ने नाराज होकर उन्हें रक्षा समिति से हटा दिया। हालांकि इस दावे के अभी तक कोई प्रमाण कांग्रेस प्रस्तुत नहीं कर पाई है। लेकिन जिस तरह से सोशल मीडिया में इस आरोप को धार दी जा रही है उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस राष्ट्रवाद के मुद्दे की हवा निकालने का प्रयास कर रही है।

यह भी दिलचस्प है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों  पार्टियां  उत्तराखण्ड में सैनिकों के सम्मान की बात तो कर रही हैं, लेकिन दोनों ही दलों ने एक भी सीट पर पूर्व सैनिकों को टिकट नहीं दिया है। कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी के पुत्र मनीष खण्डूड़ी को अपना उम्मीदवार बनाकर भाजपा के सामने पहले ही एक बड़ी समस्या खड़ी कर चुकी है जिसके चलते भाजपा को खण्डूड़ी के राजनीतिक शिष्य तीरथ सिंह रावत को टिकट देने पर मजबूर होना पड़ा। जिसका असर चुनाव में भाजपा के पक्ष में भी पड़ने की पूरी संभावनाएं जताई जा रही हैं। हालांकि भाजपा मोदी मैजिक के बूते चुनाव में जीत के लिए आश्वस्त तो दिख रही है, लेकिन पार्टी का मजबूत संगठन भी उसकी ताकत माना जा रहा है। भाजपा ऐसा कोई भी अवसर खोना नहीं चाहती जिससे चुनाव में भाजपा के खिलाफ असर पड़ सकता हो। इसके लिए भाजपा थोक के भाव में ऐसे नेता को भाजपा में फिर से घर वापसी तक करवा रही है जिनको पूर्व में पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते निष्कासित कर दिया गया था। प्रदेश की पांचों सीटों पर भाजपा ऐसे कई नेताओं को फिर से पार्टी में शामिल कर चुकी है।
भाजपा ने नरेंद्र नगर से विधानसभा का निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले पूर्व विधायक ओमगोपाल रावत और केदारनाथ से पूर्व विधायक आशा नौटियाल को फिर से पार्टी में शामिल करवाकर तीरथ सिंह रावत की चुनावी मुश्किलों को खासा आसान कर दिया है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा से टिकट न मिलने के बाद रावत ओैर नौटियाल ने निर्दलीय तोर पर चुनाव लड़ा था। जिसमें नरेंद्र नगर से ओमगोपाल रावत को 19 हजार से भी अधिक मत मिले थे और वे दूसरे स्थान पर आए थे। इसी तरह से आशा नौटियाल को भी केदारनाथ विधानसभा सीट पर 11 हजार 7 सौ वोट प्राप्त हुए थे। इससे पौड़ी सीट पर भाजपा को बढ़त हासिल होने की पूरी संभावनाएं बढ़ चुकी हैं।
इसी तरह से कोटद्वार नगर निगम में भाजपा के नेता धीरेंद्र रावत ने अपनी पत्नी को भाजपा से टिकट न मिलने के चलते निर्दलीय चुनाव लड़वाया था जिसके चलते भाजपा के उम्मीदवार की हार हुई। इसके चलते धीरेंद्र रावत को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। लेकिन लोकसभा चुनाव में रावत की फिर से लॉटरी निकल पड़ी और वे भाजपा में शामिल हो गए हैं।
अब कांग्रेस की बात करें तो लिए पौड़ी सीट एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। 23 वर्षों से भाजपा के कब्जे में रही इस सीट के सभी चौदह विधानसभा सीटों में महज केदारनाथ विधानसभा सीट पर कांग्रेस का कब्जा है, जबकि तेरह विधानसभा पार्टी में भाजपा के विधायक है। साथ ही इनमें से दो कैबिनेट मंत्री और एक राज्य मंत्री सरकार में हैं। जहां चौबट्टाखाल से सतपाल महाराज और नरेंद्र नगर से सुबोध उनियाल सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं, तो वहीं श्रीगनर से धनसिंह रावत राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार के तौर पर सरकार में हैं। इसके अलावा विगत वर्ष थराली विधानसभा सीट के उपचुनाव में भी भाजपा ने जीत हासिल की है। इससे इतना तो तय है कि भाजपा के लिए पौड़ी सीट पर जीत हासिल करने के लिए कांग्रेस से बढ़त हासिल है।
जबकि कांग्रेस के भीतर मनीष खण्डूड़ी को लेकर कई नेताओं में नाराजगी बनी हुई है। हालांकि यह नाराजगी खुलकर तो सामने नहीं आई है, लेकिन कभी-कभी खामोशी बोलने से भी ज्यादा बोल देती है। पहले भी मोहन काला को कांग्रेस में शामिल करवाए जाने के मामले में बड़ी नाराजगी देखने को मिल चुकी है। जिसके चलते कांग्रेस के भीतर स्थानीय स्तर पर गुटबाजी चरम पर है। माना जाता है कि पूर्व मंत्री और बदरीनाथ के विधायक रहे राजेंद्र भंडारी और बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष रहे गणेश गोदियाल लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन मनीष खण्डूड़ी को कांग्रेस का टिकट मिलने के बाद इन दोनां ही नेताओं के समर्थकों में बड़ी नाराजगी बनी हुई है। इस नाराजगी का असर मनीष खण्डूड़ी के नामांकन के दौरान भी देखने को मिल चुका है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का सहयोग जुटाना मनीष खण्डूड़ी को भारी पड़ रहा है।
अब भाजपा और कांग्रेस के मत प्रतिशत पर नजर डालें तो भाजपा सभी चौदह विधानसभा सीटों के चुनाव में कांग्रेस से ज्यादा रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते भाजपा ने सभी चौदह विधानसभा सीटों में 50 फीसदी से ज्यादा मत प्राप्त किए हैं। भाजपा के मत प्रतिशत की बात करें तों भाजपा का सबसे कम मत प्रतिशत बदरीनाथ विधानसभा में ही रहा जो कि 52 प्रतिशत रहा और सबसे अधिकतम मत प्रतिशत नरेंद्र नगर विधानसभा क्षेत्र में 67-75 प्रतिशत रहा। जबकि कांग्रेस का 2014 के लेकसभा चुनाव में मत प्रतिशत 35 ही रहा है। जिसमें सबसे कम देवप्रयाग में 23-78 प्रतिशत रहा तो सबसे ज्यादा पौड़ी विधानसभा सीट में 38-67 फीसदी रहा। इस तरह से कहा जा सकता है कि कांग्रेस के लिए वर्तमान चुनाव में मतों का प्रतिशत बढ़ाना एक बड़ी भारी चुनौती बना हुआ है। इसी तरह से 2009 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा के पांचों सीट पर चुनाव हारने के बावजूद सबसे कम मत प्रतिशत बदरीनाथ विधानसभा क्षेत्र में रहा जो कि 37 फीसदी था। सबसे अधिक 50 फीसदी से ज्यादा लैंसडॉन विधानसभा सीट में रहा है। कांग्रेस पांचों सीटों पर चुनाव जीतने के बावजूद 37 से 50 फीसदी ही मत प्राप्त कर पाई थी।
2017 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा 46-41 से 56 प्रतिशत मत पाकर 13 सीटों पर जीत हासिल कर चुकी है, जबकि कांग्रेस को मिले मतों की बात करें तो कांग्रेस  8-23 से लेकर 40-13 फीसदी ही मतों को अपने पक्ष में कर पाई है। जातीय समीकरणां के हिसाब से देखें तो पौड़ी सीट पर जहां राजपूत 61 फीसदी है तो वहीं ब्राह्मण महज 21 फीसदी ही हैं। एससीएसटी का मत प्रतिशत 12 तथा अन्य वर्ग महज 6 फीसदी ही है। इससे भाजपा के तीरथ सिंह रावत के पक्ष में ठाकुर वोटों का भी बड़ा प्रभाव पड़ सकता है जबकि कांग्रेस के मनीष खण्डूड़ी ब्राह्मण हैं और उनके लिए ब्राहमणां के मतों को अपने पक्ष में करने की भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
राजनीतिक समीकरणों में भी भाजपा कांग्रेस से बढ़त बनाए हुए है। भाजपा के तीरथ सिंह रावत एक लंबे राजनीतिक अनुभव का फायदा लेकर आगे दिख रहे हैं, जबकि मनीष खण्डूड़ी पहली बार राजनीति के मैदान में उतरे हैं। उनको अपने पिता बीसी खण्डूड़ी के प्रति पौड़ी की जनता की संवेदनाओं का बड़ा सहारा है। बीसी खण्डूड़ी आज भी प्रदेश की राजनीति में सर्वमान्य नेता के तौर पर जाने जाते हैं। इसी के चलते कांग्रेस ने मनीष खण्डूड़ी को अपना उम्मीदवार बनाया है। अब खण्डूड़ी का मतदाताओं पर अभी तक स्थापित प्रभाव मनीष खण्डूड़ी को कितना फायदा देगा यह तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इतना तो तय है कि राजनीतिक, सांगठानिक और अनुभव पर तीरथ सिंह रावत मनीष खण्डूड़ी से बढ़त बनाए हुए दिखाई दे रहे हैं।

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