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निकाय चुनाव के बाद एनआईटी को ऋषिकेश शिफ्ट किए जाने की बात पर श्रीनगर के लोगों में आक्रोश भड़क रहा है। लोग इसे पहाड़ की अस्मिता से जोड़ते हुए बेहद खफा हैं। जनता के बीच सुलगती आक्रोश की यह चिंगारी पूरे पर्वतीय क्षेत्र में एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकती है
एनआईटी उत्तराखण्ड के सभी छात्रों का संस्थान छोड़ घर जाने का दबाव सरकार पर साफ दिख रहा है। मगर इस दबाव से जो परिणाम सामने आ रहे हैं, वह पर्वतीय राज्य के हित में नहीं हैं। सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि एनआईटी उत्तराखण्ड अपने वर्तमान अस्थाई कैंपस श्रीनगर से ऋषिकेश शिफ्ट होने जा रहा है। बताया यह भी जा रहा है कि एनआईटी मुख्यालय से इसे स्वीकृति भी मिल गई है। एचआरडी से इसको लेकर एक पत्र भी एनआईटी उत्तराखण्ड को भेजा गया है। संस्थान के सूत्रों के मुताबिक निकाय चुनाव के बाद यह शिफ्टिंग हो सकती है। संस्थान के कुछ अधिकारी ऋषिकेश के आईडीपीएल स्थित परिसर का दौरा भी कर चुके हैं। ऋषिकेश का परिसर भी अस्थाई ही होगा।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) उत्तराखंड ने अस्थायी कैंपस के लिए पहाड़ के बजाय मैदानी क्षेत्र में वैकल्पिक स्थान तलाश लिया है। ऋषिकेश के आईडीपीएल में एक शिक्षण संस्थान को चिह्नित किया है।
उत्तराखंड का एकमात्र एनआईटी संस्थान श्रीनगर में आईटीआई और पॉलिटेक्निक के भवनों में अस्थायी तौर पर संचालित हो रहा है। एनआईटी उत्तराखंड में पीएचडी, एमटेक एवं बीटेक के 980 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। स्थायी कैंपस का निर्माण होने तक सुविधाजनक स्थान में अस्थायी कैंपस शिफ्टिंग और सुविधाओं की मांग को लेकर एनआईटी के छात्र पिछले एक महीने से आंदोलन पर हैं। कुछ समय पहले एनआईटी के सभी छात्र अपनी इस मांग को लेकर कैंपस छोड़कर अपने घरों को चले गये थे। छात्र अभी तक संस्थान में वापस नहीं आए हैं। एनआईटी के जनसंपर्क अधिकारी जगदीप कुमार का कहना है कि एनआईटी प्रशासन की ओर से एक कमेटी का गठन किया गया था। जिसने विकल्प के तौर पर ऋषिकेश में छात्रों को पढ़ने के लिए जगह देखी है। अभी इस पर कमेटी की ओर से कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) उत्तराखंड के श्रीनगर स्थित अस्थाई कैंपस को ऋषिकेश शिफ्ट करने की खबर फैलते ही श्रीनगर की स्थानीय जनता आक्रोशित हो गई है। लोगों ने इसका कड़ा विरोध करना शुरू कर दिया है। स्थानीय लोगों ने इसे पहाड़ विरोधी हरकत बताया है। लंबे समय से एनआईटी के स्थायी परिसर निर्माण की मांग कर रहे प्रगतिशील जनमंच (प्रजम) और शहर की कांग्रेस कमेटी ने 13 नवंबर को विरोधस्वरूप अलग-अलग जगहों पर केंद्र एवं प्रदेश सरकार के पुतले दहन किए।
प्रगतिशील जनमंच (प्रजम) से जुड़े लोगों ने शहर में जुलूस निकालकर एनआईटी कैंपस गेट के सामने प्रशासन का पुतला दहन किया। इस अवसर पर प्रजम के अध्यक्ष अनिल स्वामी ने कहा कि एक सोची समझी रणनीति के तहत एनआईटी को पहाड़ों से मैदान की ओर शिफ्ट करने की योजना तैयार हो रही है। इसके अलावा गोला बाजार स्थित गोला पार्क में कांग्रेस के लोगों ने भी केंद्र और प्रदेश सरकार का पुतला दहन किया। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता प्रदीप तिवाड़ी ने कहा कि केन्द्र एवं प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के बाद भी जनता को गुमराह किया जा रहा है। शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भूपेन्द्र पुंडीर ने कहा कि यह एनआईटी किसी पार्टी विशेष का मुद्दा नहीं है यह पहाड़ की अस्मिता से जुड़ा हुआ सवाल है। अगर एनआईटी पहाड़ से शिफ्ट होता है तो प्रदेश सरकार को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
देश के इतिहास में शायद ये पहला उदाहरण ही होगा, जिसमें देश के एक संस्थान को पहाड़ों में स्थापित करने के लिए ग्रामीणों ने अपनी भूमि दान की। लेकिन पहाड़ों से नफरत पाले, मैदान पसंद इसे पूरा नहीं होने दे रहे। एनआईटी के लिए सुमाड़ी, चडीगांव और कांडा के ग्रामीणों ने बिना तिजारत के 155 हेक्टयर भूमि दान में दे कर अपने  त्याग का उदाहरण पेश किया था। इस पूरी भूमि पर 5900 पेड़ थे, जिनमें से 2000 से अधिक पेड़ों को काटकर 45 लाख 60 हजार रु अपने खजाने में जमा कर दिये गये। 3 करोड़ खर्च कर भूमि की फेंसिंग भी कर दी गई। इसके बावजूद अभी भी पहाड़ पर एनआईटी के स्थाई परिसर का काम शुरू नहीं हो पाया है। एनआईटी के तत्कालीन प्राचार्य थोराल्ड ने पहाड़ में बन रहे इस संस्थान को नफरत भरी निगाहों से देखा और अपनी पूरी ताकत इस भूमि को गैर माफिक करार करने पर लगा दी। बताया जाता है कि इस आला अधिकारी ने भूमि की जांच के लिए तयशुदा महकमे आईआईटी रुड़की को प्रभावित करने की भी कोशिश की। पर वहां के वैज्ञानिकों ने कुल 5 हेक्टयर भूमि को ही माफिक नहीं पाया। शेष जमीन को निर्माण के लिए उपयुक्त ठहराया। पहाड़ों से नफरत का आलम ये रहा कि इस अधिकारी ने अपने रसूक का इस्तेमाल कर सीपीडब्लूडी के मुख्य अभियंता से पूरी जमीन ही एनआईटी के लिए गैर उपयोगी ठहरवा दी।
स्थानीय लोगों के विरोध की वजह से अभी तक मैदान पसंद लोग एनआईटी को पहाड़ से मैदान शिफ्ट कराने में कामयाब नहीं हो सके हैं। एनआईटी उत्तराखण्ड के छोटे से इतिहास में स्थानीय लोगों को शिफ्टिंग पर तीन बार बड़े आंदोलन करने पड़े हैं। आंदोलन के बाद ही नेताओं पर दबाव बनता रहा और वे संस्थान को अभी तक पहाड़ से मैदान में ले जाने में नाकामयाब रहे। इसके अलावा स्थानीय लोग जिलाधिकारी से लेकर मुख्यमंत्री तक को संस्थान का स्थाई कैंपस जल्द से जल्द बनाने की मांग कर चुके हैं। इसके बावजूद सरकार स्थाई कैंपस नहीं बना सका है।
एनआईटी का स्थाई कैंपस पहाड़ पर ही रहने देना चुनावी मुद्दा भी रहा है। चाहे लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव सभी में एनआईटी मुद्दा रहा है। विधानसभा चुनाव के दौरान श्रीनगर में एनआईटी के स्थाई कैंपस मुख्य मुद्दा रहा है। यहां से चुनाव लड़े  वर्तमान उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने भी वादा किया था। वे अपने हर चुनावी सभा में वादा करते थे कि एक साल के अंदर सुमाड़ी में एनआईटी का स्थाई कैंपस बनवा देंगे। धन सिंह रावत यहां से चुनाव जीत गए। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने पर वे उच्च शिक्षा मंत्री भी बन गए। उनको मंत्री बने डेढ़ साल से ज्यादा का समय हो गया पर सुमाड़ी में न स्थाई कैंपस बना और न ही एनआईटी वहां शिफ्ट हो पाया। उल्टे अब एक बार फिर संस्थान को पहाड़ से शिफ्ट करने की खबर सुर्खियां बनने लगी है।
सरकार इन खबरों को नाकार तो नहीं रही है। हां, संस्थान को शिफ्ट नहीं होने देने जैसे दावे जरूर कर रही है। खबर आने के बाद पत्रकारों ने मुख्यमंत्री से इस पर स्पष्टीकरण मांगा। 14 नवंबर को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पत्रकारों के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि मेरी केंद्रीय एचआरडी मंत्री प्रकाश जावेडकर से बात हुई है। उन्होंने भी स्पष्ट कहा है कि एनआईटी पहाड़ पर ही रहेगी। उसे मैदान में नहीं लाया जाएगा। इसलिए यहां यह सवाल ही गलत है। मुख्यमंत्री के स्पष्टीकरण के बाद भी स्थानीय लोग संतुष्ट नहीं हो रहे हैं। उन्हें अभी भी सरकार की मंशा पर शक है।
प्रगतिशील जनमंच के सदस्य सत्यपाल सिंह नेगी कहते हैं, ‘निकाय चुनाव के मद्देनजर मुख्यमंत्री यह बयान दे रहे हैं। श्रीनगर नगरपालिका का चुनाव अभी नहीं हो रहा मगर सरकार को लग रहा है, इससे उसे पूरे पहाड़ी क्षेत्रों में नुकसान पहुंचेगा। इसलिए सरकार इसे नाकार रही है। चुनाव के बाद सरकार पीछे हट जाएगी।’ एनआईटी परिसर को लेकर शुरू ही विवाद चल रहा है। जिस वजह से यहां के छात्रों को काफी परेशानी होती है। अस्थाई कैंपस के कारण छात्रों को सभी सुविधाएं और संसाधन नहीं मिल रहे हैं। छात्र इसको लेकर कई बार आंदोलन भी कर चुके हैं।

बात अपनी-अपनी

प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री तक को पता नहीं है कि एनआईटी श्रीनगर से शिफ्ट होकर ऋषिकेश जा रहा है। हमारी रजिस्ट्रार से बात हुई है। उन्होंने भी कहा है कि हमें जो निर्देश मिलेगा उस पर कार्यवाही करेंगे। आचार संहिता खत्म होते ही हमलोग उग्र आंदोलन करेंगे। अभी तक हमलोग इसी मुद्दे पर तीन बार उग्र आंदोलन
कर चुके हैं।
सत्यपाल सिंह नेगी, सदस्य प्रगतिशील जनमंच
हमारे पास शिफ्टिंग को लेकर कोई पत्र नहीं आया है। कुछ स्थानीय लोग एनआईटी को बदनाम करने में लगे हुए हैं। यह ठीक उसी तरह की बात है, जैसे पति-पत्नी के बीच लड़ाई होते ही लोग तलाक की बात करने लगते हैं।
कर्नल सुखपाल सिंह, रजिस्ट्रार एनआईटी उत्तराखण्ड
हम छात्रों को इससे कोई मतलब नहीं है कि एनआईटी सुमाड़ी में जाए या ऋषिकेश। एनआईटी परिसर सुरक्षित, संसाधनयुक्त हो। यहीं हम छात्रों की मांग है।
विकास कुमार, छात्र नेता एनआईटी उत्तराखण्ड

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