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Uttarakhand

मुख्यमंत्री के विभाग की गम्भीर लापरवाही

देहरादून। राज्य में कोरोना संक्रमितों की तादात 2344 तक पहुंच चुकी है। हालांकि कोरोना से स्वस्थ होने वाले मरीजों की तादात में भी तेजी से इजाफा हो रहा है जिसमें 15 सौ कोरोना के मरीज स्वास्थ होकर डिस्चार्ज भी हुए हैं। अब प्रदेश में कोरोना से संक्रमितों की संख्या कल तक 817 रह गए हैं जबकि मृतकों की संख्या कल देर रात यानी 21 जून तक जारी आंकड़ों के अनुसार 27 लोगों की मौत हो चुकी है।

जिस तरह से प्रति दिन कोरोना संक्रमितों की संख्या सामने आ रही है उससे राज्य के स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही के चलते टिहरी के सामान्य मरीजों की दुश्वारियां और बढ़ गई है। साथ ही सामन्य मरीजों के लिए देहरादून नगर का कोरोनेशन अस्पताल में दून अस्पताल द्वारा कोरोना संक्रमित मरीज को भेजकर पूरे अस्पताल के चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ को ही कोरोना संक्रमण के कगार पर पहुंचा दिया। हैरानी की बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग स्वयं मुख्यमंत्री के पास है, वाबजूद इसके राज्य का स्वास्थ्य विभाग और अधिकारी लापरवाह बने हुए हैं।

कोरोना संक्रमण में लापरवाही की बात करें तो एक के बाद एक कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जिसमें स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर ही सवाल उठने लगे हैं। सबसे पहले राजधानी देहरादून की बात करें तो कोरोनेशन अस्पताल के एक साथ 17 कर्मियों में कोरोना संक्रमण की खबर तेजी से सामने आई। इसमें चार डॉक्टर और 17 स्वास्थ्य कर्मियों की जांच रिपोर्ट में कोरोना संक्रमण पाए जाने की जानकारी दी गई।

दरअसल, यह मामला प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के लचर कार्यप्रणाली से ही सामने आया जिसके चलते कोरोनेशन अस्पताल में कोरोना की दस्तक हुई। कुछ दिन पूर्व दून अस्पताल में अपने बीमार भाई की देखभाल करने वाली एक बालिका की तबीयत खराब होने के चलते दून अस्पताल में उसका उपचार किया गया लेकिन दून अस्पताल में सिर्फ कोरोना संक्रमितों के लिए ही सुरक्षित रखने के चलते उक्त बालिका को दून अस्पताल प्रशासन ने डिस्चार्ज कर उसे कोरोनेशन अस्पताल में उपचार के लिए भेज दिया, पंरतु बालिका की कोई कोरोना जांच तक नहीं की गई।
वह बालिका कोरोनेशन अस्पताल में अपने उपचार के लिए पुहंच गई तब जाकर मामला खुला और कोरोनेशन प्रशासन में हड़कम्प मच गया। यह मामला बहुत उछला तो उक्त बालिका को फिर से दून अस्पताल में भेजा गया। लेकिन कोरोनेशन अस्पताल प्रशासन में सावधानी के चलते अपने स्टाफ की जांच करवाई और सैंपल चंडीगढ़ लैब में भेज दिया। चंडीगढ़ लैब से आई जांच रिपोर्ट के अनुसार कोरोनेशन अस्पताल के 17 लोग जिसमें चार डॉक्टर और 13 नर्सिंग स्टाफ में कोरोना संक्रमण पाया गया। इसमें मुख्यमंत्री के नियमित चिकित्सक का नाम भी था।

यह मामला बेहद गम्भीर हो गया, क्यांकि जिन चार डॉक्टरों में कोरोना संक्रमण पाया गया उनमें एक डॉक्टर मुख्यमंत्री के नियमित चिकित्सक भी है। इसके चलते राज्य में स्थिति बेहद हलचल वाली रही। चर्चाएं तो यहां तक उठी कि मख्यमंत्री ने स्वयं को अपने घर में ही क्वारंटीन कर लिया लेकिन शासन स्तर से ऐसी कोई जानकारी नहीं दी गई। लेकिन स्वास्थ्य विभाग के कारण पूरे राज्य में अनिश्चितता का माहौन बना रहा।

एक साथ 17 स्वास्थ्यकर्मियों में कोरोना संक्रमण पाए जाने पर खास बवाल भी हुआ तो स्वास्थ्य विभाग ने इन सभी 17 स्वास्थ्य कर्मियों की कोरोना जांच राज्य की लैब में करवाई तो सभी की जांच निगेटिव पाई गई। अब मामला और भी दिलचस्प हो गया है कि चंडीगढ़ लैब से कोरोना पॉजीटिव और उत्तराखण्ड राज्य लैब से निगेटिव जांच रिपोर्ट मिलने से फिर से अनिश्चय की स्थिति बन गई है। किस रिपोर्ट को सही माने और किसे गलत। इस पर कोई ठोस निर्ण्ाय नहीं हो पा रहा है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग की देहरादून लैब से जारी जांच रिपोर्ट को ही सही मानकर मामले को साफ कर चुका है। और सभी स्वास्थ्यकर्मियों और चिकित्सकों को काम पर वापस बुला चुका है।

इतने गम्भीर मामले में एक बार फिर स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही सामने आ चुकी है। चंडीगढ़ लैब में जांच सैंपल भेजे जाने के बाद जांच रिपोर्ट आने से पहले ही कोरोनेशन अस्पताल के कई चिकित्सकों की जांच रिपोर्ट निगेटिव आने की बात कहकर काम पर बुलाए जाने के लिए आदेश तक जारी कर दिए गए लेकिन जब चंडीगढ़ लैब से कोरोना पाजिटिव रिपोर्ट आई तो स्वास्थ्य विभाग के हाथ-पांव फूल गए और सभी को तत्काल आइसोलेट रहने के आदेश जारी करने पड़े। हालांकि 20 जून तक देहरादून लैब से सभी की जांच रिर्पोट निगेटिव आने से राहत मिली।

दूसरा मामला भी देहरादून का ही है। कांवली रोड स्थित एक हाउसिंग कॉलोनी में एक बालिका की 12 जून को देहरादून के इंद्रेश अस्पताल में उपचार के दौरान मोत हो गई। कोरोना नियम के अनुसार अस्पताल ने बालिका के शव को मॉर्चरी में रखवा दिया और उसकी कोरोना जांच के लिए सैम्पल लिया। 18 जून को बालिका की जांच रिपोर्ट में कोरोना संक्रमण होने की पुष्टि हो गई। लेकिन हैरानी की बात यह है कि बालिका का शवदाह पुलिस-प्रशासन की निगरानी में किया गया लेकिन बालिका की मां की कोई जांच अभी तक नहीं की गई। जबकि बालिका की मां अपनी बेटी के साथ उसकी बीमारी के दौरान रही। यहां तक कि बालिका को अस्पताल में ले जाने के लिए जिस ई-रिक्शे का उपयोग किया गया उसकी खोज भी अभी तक नहीं की गई। यह साफ हो गया कि मरने वाली बालिका कोरोना संक्रमित थी और उसके साथ उसकी मां और अज्ञात ई-रिक्शा चालक के भी संक्रमित होने की पूरी संभावना है। बावजूद इसके कार्यवाही करना तो दूर महिला को क्वारंटीन किए जाने की कार्यवाही तक नहीं की जा रही है। इसके चलते पूरी कॉलोनी में डर का माहौल बना हुआ है। ऐसा नहीं है कि स्वास्थ्य विभाग को इसकी जानकारी नहीं है। इसके बावजूद अभी तक उक्त महिला का कोरोना जांच नहीं की गई है। कॉलोनी के सोसायटी द्वारा जिलाधिकारी और एसडीएम देहरादून को पूरी जानकारी दे दी गई है। यहां तक कि नगर निगम पार्षद द्वारा इस मामले की जानकारी स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन को कई बार दी जा चुकी है।

दरअसल, टिहरी जिला स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही सामने आया है। एक ग्रामीण महिला अपनी स्वास्थ्य समस्या के लिए जिला अस्पताल में उपचार के लिए आई। यह महिला कुछ दिनों पूर्व गुरूग्राम से टिहरी लौटी थी और लौटने के बाद उसकी तबियत खराब हो गई। जिला अस्पताल ने उसकी यात्रा इतिहास को जानने के बावजूद उसका उपचार किया और उसके घर भेज दिया। कुछ दिनों बाद उस महिला की मौत हो गई और उसकी जांच में पाया गया कि वह महिला कोरोना पॉजीटिव थी। इसके बाद जिला अस्पताल में हड़कम्प मच गया।

इस मामले में सीधे तौर पर स्वास्थ्य विभाग कोई बात करने को तैयार नहीं है जबकि साफ तौर पर यह मामला स्वास्थ्य विभाग की गम्भीर लापरवाही के चलते ही हुआ है। ईएमआरसी की गाइड लाइन के अनुसार बाहरी राज्यों से आने वाले मरीजों की सबसे पहले कोरोना जांच होनी आवश्यक है लेकिन इसमें ऐसा नहीं किया गया।

पर्वतीय क्षेत्रों में पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बद से बदतर बनी हुई है। टिहरी जिला अस्पताल सैकड़ों गांवों के लोगों के लिए एक मात्र स्वास्थ्य का सहारा था अब वह भी स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही के चलते सवालों के घेरे में है। इसके चलते सामान्य मरीजों को अपने इलाज के लिए कई किमी दूर ऋषिकेश नरेंद्र नगर और देहरादून आना पड़ सकता है।

हैरानी इस बात की है कि जब स्वास्थ्य विभाग मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के पास है बावजूद इसके राज्य में कोरोना संकट के दौरान स्वयं स्वास्थ्य विभाग द्वारा लगातार गम्भीर लापरवाही बरती जा रही है। इसका एक ही मतलब है कि या तो स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी पूरी तरह से निरंकुश हो चुके हैं या फिर स्वास्थ्य विभाग की यही कार्यशैली बन चुकी है। आखिरकार इसका खामियाजा तो जनता को ही भुगतना पड़ रहा है।

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