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महाराष्ट्र का राज्यपाल बनने के बाद भगत सिंह कोश्यारी ने जिस तरह उत्तराखण्ड के तीन दौरे किए, उसे नेतृत्व परिवर्तन की हलचल के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसा लगता है कि भगदा के इन दौरों के गंभीर राजनीतिक मायने हैं। समझा जा रहा है कि भाजपा आलाकमान उनके माध्यम से राज्य सरकार और संगठन की फीडबैक लेना चाहता है। यही वजह है कि भगतदा प्रोटोकॉल के विपरीत मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से उनके निवास पर जाकर मिले। हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावी नतीजों ने उत्तराखण्ड में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं को बल दिया है

 

उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ‘भगदा’ को राजनीति में एक बड़ा चेहरा माना जाता है। कहा जाता है कि कोश्यारी का कोई भी कदम या बयान बगैर किसी राजनीतिक निहितार्थ के नहीं होता। कुछ न कुछ ऐसा खास अवश्य है जो इस खांटी पहाड़ी नेता को महाराष्ट्र का राज्यपाल बनने के बाद लगातार तीन दौरे उत्तराखण्ड के करने पड़े। यह माना जा रहा हे कि भाजपा का केन्द्रीय आलाकमान प्रदेश सरकार के कामकाज और प्रदेश भाजपा संगठन के भीतर की राजनीति के कई तरह से फीडबैक ले रहा है। कोश्यारी के दौरों की भी यही वजह है। हालांकि कोश्यारी का इस बार का दौरा पूरी तरह से व्यक्तिगत बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि वे अपनी बीमार बहन से भैया-दूज पर्व पर मिलने पिथोरागढ़ आए थे। लेकिन जिस तरह से देहरादून में कोश्यारी के इस दौरे को एक अलग ही तौर पर प्रस्तुत किया गया वह अपने आप में कई सवाल खड़े कर रहा है। इसमें एक राज्यपाल के प्रोटोकॉल को दरकिनार किया गया। निजी दौरे को एक कार्यक्रम तथा मुख्यमंत्री से मुलाकात में जिस तरह शामिल किया गया वह भी कई चचाओं को बल दे रहा है।

अगर कोश्यारी का देहरादून यह तीसरा दौरा केवल निजी था तो वे आसानी से देहादून के बजाय पिथौरागढ़ जा सकते थे। लेकिन उन्हें देहरादून में एक बड़े कार्यक्रम में शामिल किया गया जिसमें उनके साथ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट भी थे। साथ ही प्रोटोकॉल के विपरीत कोश्यारी मुख्यमंत्री से मुलाकात करने उनके आवास पर गए। यह बात भी अपने आप में कई चर्चाओं को जन्म दे रही है।

अगर राज्यपाल के प्रोटोकॉल को देखें को राज्यपाल संवैधानिक पद है और राष्ट्रपति का प्रतिनिधि माना जाता है। अगर कोई राज्यपाल किसी राज्य में चाहे व्यक्तिगत भ्रमण या प्रवास पर आता है, तो प्रोटोकॉल के अनुसार उसका कार्यक्रम निर्धारित होता है। मुख्यमंत्री स्वयं राज्यपाल से मिलने के लिए जाते हैं, न कि राज्यपाल मुख्यमंत्री से मिलने जाते हैं। लेकिन इस बार यह सब नहीं देखा गया। कोश्यारी के इस प्रकार से देहरादून में आने को एक बड़े परिवर्तन के तौर पर देखा जा रहा है। दरअसल, भगतदा को आज भी खांटी पहाड़ी नेता के तौर पर देखा जाता है। गाहे-बगाहे कोश्यारी प्रदेश खासतौर पर पर्वतीय क्षेत्रों में विकास को लेकर अपनी बेबाक राय रखते रहे हैं। यहां तक कि भाजपा गैरसैंण में राजधानी बनाए जाने के सवाल पर हमेशा गोलमोल जबाब देती रही है, लेकिन कोश्यारी ही एक मात्र भाजपा के ऐसे बड़े नेता रहे हैं जो गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने की वकालत करते रहे हैं।

कोश्यारी के इस पहाड़ प्रेम की वजह से ही उनके कई एसे बयान भी सामने आए हैं जिनसे भाजपा को परेशानी तक उठानी पड़ी है। राज्यपाल बनने के बाद अपने दूसरे दौरे के दौरान कोश्यारी एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री को पहाड़ से चुनाव लड़ने की सलाह तक दे चुके हैं। साथ ही 19 वर्ष में पहाड़ पर मसूरी और नैनीताल जेसे शहर न बसाये जाने पर भी कोश्यारी ने कई सवाल उठाए थे। तब उनके इस बयान को सरकार के कामकाज पर सवाल उठाया जाना माना गया था। हालांकि भाजपा ने इसे एक वरिष्ठ और उत्तराखण्ड के हितैषी नेता की सलाह बताकर चर्चाओं को हल्का करने का प्रयास किया था।

अब कोश्यारी के तीसरे दौरे के चलते कई चचाएं फिर से होने लगी हैं। माना जा रहा है कि भाजपा अब राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की कवायद में जुट गई है और अगर राज्य में नेतृत्व परिवर्तन करना पड़े तो इसके बाद के परिणाम और चुनावी समीकरणों को किस तरह से साधा जाए इसके लिए केंद्रीय भाजपा एक बड़ी रणनीति पर जुट गई है। देखा जा रहा है कि राज्य में अगर नेतृत्व परिवर्तन होता है, तो उसके बाद भाजपा के भीतर क्या-क्या नए समीकरण बन और बिगड़ सकते हैं। कहीं इनका असर 2022 के राज्य विधानसभा चुनाव पर तो नहीं पड़ जाएगा। समझा जा रहा हे कि भाजपा हाईकमान इसके लिए अभी से तैयारी में जुट गया है और आगामी नवम्बर माह में भाजपा संगठन में बड़ा फेरबदल होना है। 20 नवंबर तक भाजपा की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी वजूद में आ जाएगी। उत्तराखण्ड में अजय भट्ट अभी एक वर्ष के अतिरिक्त कार्यकाल में चल रहे हैं और 20 नवंबर तक प्रदेश भाजपा का नया संगठन पूरी तरह से वजूद में आ जाएगा। इसी को देखते हुए 20 नवंबर के बाद के हालात पर ही प्रदेश की राजनीति का दारोमदार ठहरा हुआ है। राज्य में चाहे वह नया नेतृत्व भाजपा संगठन में हो या भाजपा सरकार में, दोनों की डेडलाईन 20 नवंबर मानी जा रही है। अगर जानकारों की मानें तो उत्तराखण्ड में परिवर्तन दोनों ही जगह पर होना निश्चित है।

बताया जाता है कि भाजपा हाईकामन के सामने राज्य में सरकार का नेतृत्व करने के लिए कई चेहरे हैं जिनमें खास तौर पर प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निश्ांक’ का नाम सबसे आगे है। भाजपा के सूत्रों की मानें तो यह संभावना है कि राज्य में संगठन के साथ सरकार में भी बड़ा फेरबदल हो सकता है और इसके लिए पहले से ही भाजपा फीडबैक लेने का काम कर रही है। अगर राज्य में नेतृत्व परिवर्तन होता है तो अजय भट्ट और निशंक के साथ ही अनिल बलूनी का नाम भी आगे होगा। लेकिन फैसला प्रदेश के कुमाऊं और गढ़वाल समीकरणों के अनुसार ही हो सकता है। अगर अजय भट्ट, निशंक या बलूनी को नया मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो किसी नये ठाकुर चेहरे को प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व दिया जा सकता है। अगर कोई बड़ा ठाकुर चेहरा नहीं मिलता है, तो तब दलित वर्ग से सांसद अजय टम्टा के नाम प्रदेश अध्यक्ष की लॉटरी लग सकती है। अजय टम्टा अभी किसी पद पर नहीं हैं। जिस तरह से हरियाणा में दलित वर्ग की भारी नाराजगी भाजपा को विधानसभा चुनाव में देखने को मिली है उसे देखते हुए अजय टम्टा को प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर नवाजा जा सकता है।

सरकार के मुखिया के लिए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का का नाम जिस तरह आगे आ रहा है। इसके एक नहीं कई कारण हें। सबसे बड़ा कारण निश्ांक के पक्ष में यह माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में उनके द्वारा निर्वाचन आयोग में दिए गए शपथ पत्र पर कई सवाल खड़े हो चुके हैं। यह मामला निर्वाचन आयोग से लेकर हाईकोर्ट की दहलीज तक पहुंच चुका है। हरिद्वार से निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले मनीष वर्मा ने निश्ांक के निर्वाचन आयोग में दिए गए नामांकन पत्र पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जिसमें आरोप है कि निंशक द्वारा शपथ पत्र में कई जानकारियां छुपाई गई हैं। मनीष वर्मा इस मामले में राष्ट्रपति को पूरे प्रमाण के साथ शिकायती पत्र भेज चुके हैं। राष्ट्रपति कार्यालय द्वारा इसकी पावती मनीष वर्मा को दी जा चुकी है। यह मामला अभी लंबित है, लेकिन माना जा रहा है कि नामांकन पत्र में कई ऐसी जानकारियां हैं जिनका उल्लेख नहीं किया गया है। इस पर निर्वाचान आयोग कार्यवाही कर सकता है। जिसमें चुनाव अयोग्य भी घोषित हो सकता है। इस कारण केन्द्र सरकार की फजीहत हो सकती है। इसी फजीहत से बचने के लिए सबसे आसान रास्ता यह माना जा रहा है कि निश्ांक को केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटाकर राज्य का नया मुख्यमंत्री बनाकर 2022 के विधानसभा चुनाव में इसका फायदा उठाया जाए।

हालांकि यह अभी तय नहीं है कि निश्ांक के नामांकन पर उठ रहे आरोपों में कितनी सच्चाई है, लेकिन कई ऐसे तथ्य हैं जिनका वास्तव में उल्लेख नहीं किया गया है। जिसमें सरकारी देनदारी के मामले में काननी विवाद और संपति के विवरण का उल्लेख बताया जा रहा है। इसी के चलते यह माना जा रहा हे कि जल्द ही निश्ांक को उत्तराखण्ड सरकार की कमान सौंपी जा सकती है और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत को हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़वाकर केंद्र की राजनीति में समाहित किया जा सकता है। निंशक को डोईवाला सीट से उपचुनाव लड़वाया जा सकता है, क्योंकि डोईवाला से निश्ांक पहले भी विधानसभा का चुनाव जीत चुके हैं। साथ ही डोईवाला विधानसभा सीट हरिद्वार संसदीय क्षेत्र का ही हिस्सा है।­

 

दौड़ में शामिल चेहरे

क्र.सं.             नाम                                                                                                 पॉजीटिव                                                                                                                                           निगेटिव

1.             अजय भट्ट                                पार्टी को विगत विधानसभा  चुनावों में बंपर जीत दिलाने का               गत विधानसभा चुनावों में स्वयं की हार।  संगठन में बढ़ रही अनुशासनहीनता को
श्रेय। खांटी और अनुभवी रोक पाने में विफल।                                        राजनेता। गैर विवादित छवि

2.          अनिल बलूनी                           प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के बेहद करीबी। ईमानदार                       प्रशासनिक अनुभव की कमी। जमीनी स्तर पर राज्य की राजनीति का खास अनुभव
छवि।  उत्तराखण्ड के लिए कई केंद्रीय योजनाओं को लाने                     नहीं

3.         रमेश पोखरियाल ‘निशंक’        पूर्व मुख्यमंत्री। तेज-तर्रार  कार्यशैली। बेहतर प्रशासनिक क्षमता            विवादित छवि। मुख्यमंत्री रहते भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप। वर्तमान में चुनाव आयोग
को दिए शपथ पत्र पर विवाद

4.      अजय टम्टा
                                गैर विवादित छवि। बतौर केंद्रीय मंत्री बेहतर कार्य। एकमात्र                    प्रदेश संगठन में कमतर प्रभाव। अपने  संसदीय क्षेत्र तक सीमित रहने का आरोप
बड़ा दलित चेहरा। युवाकाल से ही राजनीति में सक्रिय

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