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मित्र पुलिस का दागदार चेहरा समय-समय पर उजागर होता रहा है। अब तो लोग हैरान हैं कि पुलिस किस सुनियोजित तरीके से फिल्मी अंदाज में लूटकांड को अंजाम देती है। जब प्रदेश में चुनाव आचार संहिता लगी हुई थी तब पुलिस ने एक कारोबारी से करोड़ रुपए लूट लिए। कारोबारी को चुनाव आचार संहिता की धौंस दिखाई गई, तो वह चुप रहा। लेकिन जब तीन दिन तक उसे समाचार पत्रों में कहीं भी पुलिस द्वारा रकम जब्त किए जाने की खबर नहीं मिली तो उसे संदेह हुआ कि वह लूट लिया गया है। इस पर उसने खुद थाने जाकर शिकायत दर्ज की। जागरूक लोगों के दबाव में पुलिस हरकत में आई और कार्रवाई शुरू की। लेकिन इसके बाद जांच एसटीएफ को सौंप दी गई। एसटीएफ दो माह बाद भी मामले में कोई सबूत नहीं जुटा पाई है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पुलिस के लूटकांड को दबाने के लिए एसटीएफ को मामला सौंपा गया? कारोबारी से लूटी गई रकम चुनाव में भाग ले रहे एक कांग्रेसी नेता की बताई जा रही है
उत्तराखण्ड की ‘मित्र पुलिस’ का ‘कुरुप चेहरा’ समय-समय पर सामने आता रहा है। अब तो पुलिस द्वारा सुनियोजित तरीके से लूट करने के मामले तक सामने आ रहे हैं। इसके चलते पुलिस व्यवस्था से जनता का मोहभंग हो रहा है। पुलिस के इकबाल पर सवाल खड़े हो रहे हैं। लगातार पुलिसकर्मियों पर हमला और मारपीट की घटनाएं साफ बताती हैं कि राज्य की पुलिस व्यवस्था अब खोखली हो चली है।
लोकसभा चुनाव की गहमागहमी के दौरान प्रदेश की पुलिस द्वारा षड्यंत्र रचकर एक प्रोपर्टी करोबारी से करोड़ रुपए लूटे लिए गए। मामला सामने आने पर जांच और कार्यवाही तक सब कुछ की गई, लेकिन अब लगता है कि जैसे पहले भी मामले दबाए जाते रहे हैं, वैसा ही हश्र इस मामले का भी होना तय है। दो माह की जांच पड़ताल में पुलिस यह साबित नहीं कर पाई है कि इस मामले में कोई लूट भी हुई थी। प्रमाण भी एकत्र नहीं किए गए जिसके चलते सभी आरोपी जमानत पाने में सफल हुए।
पुलिसकर्मियों द्वारा की गई इस लूट के मामले को समझना आसान नहीं है। सतही तौर पर देखा जाए तो यह मामला एक तरह से सामान्य दिखाई दे रहा है, जबकि इसमें बहुत ही सुनियोजित तरीके से लूट को अंजाम दिया गया। इस लूट कांड को लेकर पुलिसकर्मी इतने आश्वस्त थे कि उनका यह कारनामा किसी के पकड़ में आएगा ही नहीं। पूरे मामले को समझने के लिए इसके पूरे घटनाक्रम को समझना होगा। ‘दि संडे पोस्ट’ अपने सुधी पाठकों के लिए पूरे मामले को उसी ढंग से सामने रख रहा है जिस नाटकीय या फिल्मी तरीके से पुलिस ने लूट को अंजाम दिया।
पटकथा
लोकसभा चुनाव के चलते पूरे प्रदेश में आदर्श आचार संहिता का कड़ाई से पालन किया जा रहा था। इस दौरान प्रदेश में कई स्थानों पर शराब और रुपए की बरामदगी निर्वाचन आयोग के आदेश पर की जा रही थी। जिसके चलते नकद करोबारियों में हड़कंप मचा हुआ था। नकद कारोबार पर एक तरह से रोक लग चुकी थी। पुलिस और इन्कम टेक्स की कार्यवाही से बचने के लिए जब्त धन की शिकायत करने से परहेज किया जा रहा था। नकद करोबार करने वालों के भय को भांपते हुए ही इस लूट को अंजाम दिया गया। माना जा रहा था कि चुनाव की गहमागहमी के दौरान इतनी बड़ी मात्रा में धन जब्त होने पर शायद ही कोई शिकायत की जाएगी और आसानी से जब्त धनराशि को लूटा जा सकता है। हैरानी इस बात की है कि जो पटकथा इस लूटकांड की लिखी गई वह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। फर्क इतना है कि फिल्मों में खलनायक द्वारा इस तरह के काम किए जाते हैं और इस लूट कांड की योजना उत्तराखण्ड पुलिस के एक दरोगा, दो सिपाही और एक नेता द्वारा मिलकर रची गई।
पात्र-परिचय
इस लूट कांड के कई पात्र हैं जिन्होंने अपने-अपने पात्रों और चरित्र का पूरा उपयोग कर इस पटकथा को नाटकीय रूप दिया।
 अनुरोध पंवार : प्रोपर्टी के करोबारी इस व्यक्ति के साथ तीन पुलिसकर्मियों द्वारा सुनियोजित तरीके से लूट की गई। अनुरोध पंवार का कहना है कि उक्त रकम से भरा बैग अनुपम शर्मा द्वारा उसको दिया गया था। हालांकि बाद में अनुरोध शर्मा का कहना है कि उनको नहीं पता था कि उक्त बैग में क्या था। रुपए होने की जानकारी उनको नहीं थी। यह भी हैरानी वाली बात है कि अनुरोध पंवार द्वारा पुलिस को बताया गया कि पुलिस द्वारा रुपए जब्त किए गए हैं जिसके आधार पर पुलिस ने जांच की थी।
अनुपम शर्मा : अनुपम शर्मा के बारे में कहा जाता है कि ये व्यक्ति कांग्रेस पार्टी से जुड़ा हुआ है। चर्चाएं यह भी हैं कि अनुपम शर्मा प्रोपर्टी का बड़ा करोबारी भी है। माना जा रहा है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे बहुत बड़ी प्रोपर्टी का कारोबार भी है जिसके चलते अनुरोध से लूट की गई। अनुपम शर्मा उपर आरोप है कि दरोगा दिनेश नेगी के साथ मिलकर अनुरोध पंवार से लूट की पूरी पटकथा लिखी गई थी।
दिनेश नेगी : खेल कोटे से पुलिस में भर्ती हुए दिनेश नेगी पुलिस विभाग में सब इंस्पेक्टर के पद पर तैनात हैं। चर्चा है कि पुलिस के कई आला अधिकारियों के चहेते रहे दिनेश नेगी ऊंचे रसूख के बल पर अपना स्थानांतरण नहीं होने देते। आरोप है कि अनुरोध पंवार के साथ लूट में दिनेश नेगी ने शासन का बड़ा अधिकारी बनकर घटना को अंजाम दिया था। लूटकांड के मास्टर माइंड कांग्रेसी नेता अनुपम शर्मा के साथ दरोगा दिनेश नेगी के बेहद खास रिश्ते बताए जाते हैं। सीसीटीवी फुटेज में दिनेश नेगी और अनुपम शर्मा को एक साथ देखा गया है। इसके कुछ ही घंटां बाद लूट को अंजाम दिया गया।
मनोज अधिकारी : पुलिस में सिपाही के पद पर तेनात मनोज अधिकारी लूट कांड में पुलिस विभाग के दूसरे पात्र हैं।
हिमांशु उपाध्याय : लूटकांड के तीसरे पात्र सिपाही और आईजी अजय रौतेला के सरकारी वाहन चालक हिमांशु उपाध्याय है। वे दरोगा दिनेश नेगी और मनोज अधिकारी के साथ पूरे मामले में शामिल रहे हैं।
अर्जुन पंवार : डब्ल्यूआईसी क्लब के मैनेजर अर्जुन पंवार अनायास ही इस लूटकांड में एक पात्र की तरह बन गए। क्लब में अनुरोध पंवार को रुपयों से भरा बैग सौंपने वाले अर्जुन पंवार ही थे। कांग्रेसी नेता अनुपम शर्मा द्वारा अर्जुन पंवार को अनुरोध पंवार को बैग सोंपने को कहा गया था। पुलिस जांच में अर्जुन पंवार की बैग सौंपने से ज्यादा कोई अन्य भूमिका सामने नहीं आई है।
आईजी अजय रौतेला का सरकारी वाहन : पूरे लूट कांड में उत्तराखण्ड पुलिस के आईजी अजय रौतेला के सरकारी वाहन की बड़ी भूमिका रही है। इसी वाहन द्वारा अनुरोध पंवार से एक करोड़ लूटे गए।
स्थानीय पुलिस : इस लूट कांड की खबर सामने आते ही देहरादून पुलिस ने त्वरित जांच और कार्यवाही करके मामले को साफ कर दिया था। सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल से लगभग पूरी तरह मामले का पटाक्षेप कर दिया गया। जिससे लगता था कि जल्द ही सारे अपराधी कानून के शिकंजे में होंगे।
एसटीएफ : पूरे मामले की जांच के लिए एसटीएफ बनाई गई। एसटीएफ ने जांच आरंभ की, लेकिन दो माह बाद भी वह लूटकांड का कोई प्रमाण और सबूत नहीं ढूंढ़ पाई। नतीजा यह रहा कि एक के बाद एक सभी चारों आरोपी न्यायालय से जमानत पाने में कामयाब रहे। अब एसटीएफ अरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की अनुमति मांग रही है।
राजनीतिक पात्र : यह पात्र इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा रहस्यमयी पात्र है जिसका खुलाया शायद ही कभी हो पाए। पुलिसकर्मियों द्वारा लूट ली गई। मोटी रकम के बारे में कई तरह की चर्चाएं हो रही है। कभी एक करोड़ तो कभी तीन करोड़ लूटे जाने की चर्चाएं होती रही हैं। माना जा रहा है कि एक बड़े कांग्रेसी उम्मीदवार की यह रकम थी जो चुनाव के लिए राज्य में भेजी गई थी। इसी चुनावी रकम जिसका कोई हिसाब यानी कागजात नहीं थे, को लूटने का षडयंत्र रचा गया। क्यांकि बगैर हिसाब की इस मोटी रकम की लूट की शिकायत होने की गुंजाइश नहीं थी। इसके चलते आसानी से मोटी रकम को हजम किया जा सकता था।
लूट कांड की कहानी : बेहद दिलचस्प और पूरी तरह से फिल्मी कथानक से भरपूर इस लूट कांड की कहानी को समझते हैं। 4 अप्रैल 2019 को कांग्रेसी नेता अनुपम शर्मा ने अनुरोध पंवार को राजपुर रोड स्थित डब्ल्यूआईसी क्लब में प्रोपर्टी से संबंधित रकम लेने के लिए बुलाया। 4 अप्रैल की ही रात को अनुरोध पंवार क्लब में पहुंचा, लेकिन वहां कांग्रेसी नेता अनुपम शर्मा मौजूद नहीं थे। इसी बीच क्लब के मैनेजर अर्जुन पंवार ने एक बड़ा सा बैग अनुरोध पंवार को देते हुए कहा कि यह बैग अनुपम शर्मा द्वारा उनके लिए दिया गया था। अर्जुन पंवार ने अनुरोध पंवार की स्कॉर्पियो गाड़ी में उक्त बैग को रख दिया जिसे लेकर अनुरोध पंवार क्लब से चला गया। क्लब से बाहर निकलते ही एक स्कॉर्पियो गाड़ी अनुरोध पंवार के पीछे लग गई और कुछ ही दूर होटल मधुवन के सामने उक्त स्कॉर्पियो ने उनकी गाड़ी को ओवरटेक कर रोक दिया। गाड़ी में से पुलिस की वर्दी पहने दो व्यक्ति उतरे और उन्होंने अनुरोध पंवार को आचार संहिता के चलते तलाशी लेने की बात कही। अनुरोध पंवार की गाड़ी की तलाशी में उक्त वही बैग जिसे अनुरोध पंवार को क्लब में अर्जुन पंवार ने अनुपम शर्मा के कहने से दिया था, मिला। जिसे वर्दीधरियों ने ले लिया और अनुरोध पंवार को उसकी गाड़ी से उतार कर अपनी गाड़ी में बैठाकर ले गए। अनुरोध पंवार का कहना है कि वर्दीधारी उसको अपनी गाड़ी में ले गए। उसमें एक बगैर वर्दीधरी व्यक्ति भी बैठा था जिसको बड़ा आईएएस अधिकारी बताया गया। अनुरोध पंवार को उक्त तीनों व्यक्ति अपने साथ ले गए और पूरे रास्ते आतंकित करते रहे। फिर सर्वे चौक में उन तीनों ने अनुरोध पंवार को अपनी गाड़ी से उतार दिया और नोटों से भरा बैग लेकर चंपत हो गए।
अनुरोध पंवार यह सोच कर कि उसका रकम से भरा बैग चुनावी टीम द्वारा जब्त किया गया है, वापस आकर अपनी गाड़ी से घर चला गया। अगले दिन समाचार पत्रों में किसी भी तरह की रकम जब्त होने का समाचार नहीं मिलने पर अनुरोध पंवार को झटका लगा। तीन दिन तक इस बारे में जानकारी लेता रहा। फिर ठगे जाने की आशंका के चलते स्वयं अनुरोध पंवार ने पुलिस अधिकारियों को इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी तो पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया। 9 अप्रैल 2019 को अनुरोध पंवार की तरफ से डालनवाला थाने में प्राथमिकी दर्ज करवाई गई।
पुलिस ने त्वरित कार्यवाही करते हुए जांच की और पूरे घटनाक्रम को बारीकी से ख्ांगाला तो क्लब और अन्य स्थानों की सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पाया कि अनुरोध पंवार से बैग लूटने वाले पुलिस विभाग के ही उक्त दरोगा दिनेश नेगी, सिपाही मनोज अधिकारी और आईजी पुलिस के सरकारी वाहन चालक एवं सिपाही हिमांशु उपाध्याय की पहचान हो गई। अनुरोध पंवार ने भी तीनों की पहचान कर ली तो मामला साफ हो गया।
अब इस लूट कांड की कहानी में बहुत ही बड़ा दिलचस्प मोड़ आया ओैर पूरी कहानी किसी मुंबइया फिल्मी ड्रामे में तब्दील होने लगी। पुलिस की जांच में अनुपम शर्मा का नाम सामने आने पर मामले की तह ख्ुलने वाली ही थी कि अचानक ही चर्चाएं सामने आने लगी कि उक्त एक करोड़ की रकम कांग्रेस के किसी उम्मीदवार के चुनावी खर्च के लिए अनुपम शर्मा द्वारा देहरादून में लाई गई। जो अनुपम शर्मा ने अनुरोध पंवार को अर्जुन पंवार के हाथों से सौंपी थी।
डालनवाला पुलिस की जांच सही दिशा में जा रही थी। पुलिस ने सभी आरोपियों की पहचान भी कर ली थी और 11 अप्रैल को तीनां पुलिसकर्मियां को विभाग से निलंबित भी किया गया। लेकिन अचानक ही पुलिस मुख्यालय ने 12 अप्रैल को जिला पुलिस से जांच वापस लेकर इस पूरे मामले की जांच डालनवाला कोतवाली से हटाकर एसटीएफ को सौंप दी। एसटीएफ ने मामले को अपने हाथ में लेकर जांच आरंभ कर दी।
एसटीएफ ने 14 अपैल को डब्ल्यूआईसी क्लब के कर्मचारियां और मैनेजर अर्जुन पंवार से पूछताछ की और मामले के प्रमाण एकत्र करना आरंभ कर दिया। 15 अप्रैल को तीनों पुलिसकर्मियों और कांग्रेसी नेता अनुपम शर्मा से पूछताछ की। 16 अप्रैल को तीनों पुलिसकर्मियों और कांग्रेसी नेता अनुपम शर्मा को हिरासत में ले लिया गया। एसटीएफ के हाथों में जांच आते ही मामले ने बेहद दिलचस्प मोड़ ले लिया। मामले के मास्टर माइंड होने के आरोपी अनुपम शर्मा द्वारा देहरादून के एक दैनिक समाचार पत्र को दिए गए बयान ने खासी हलचल मचा दी। अनुपम शर्मा ने समाचार पत्र को दिए बयान में साफ कहा कि उक्त रकम एक कांग्रेसी उम्मीदवार की है जिसे देहरादून लाया गया है। लेकिन फिर कुछ दिनों के बाद अनुपम शर्मा अपनी ही बात से पलटी मारता हुआ कहने लगा कि उसे इस बारे में कुछ नहीं पता। जो बैग उसने अनुरोध पंवार को दिया था उस बैग में कोई रकम नहीं थी। उस बैग में कुछ शराब की बोतलें और कपड़े ही थे जिसको पुलिस ने जब्त किया था। अचानक ही अनुरोध पंवार भी इस मामले में पलटते हुए कहने लगा कि उसे नहीं पता था कि बैग में क्या था। उसने तो बैग खोलकर नहीं देखा था। उक्त बैग को क्लब के मैनेजर अर्जुन पंवार ने ही उसकी गाड़ी में रखा था जिसके चलते वह देख नहीं पाया कि बैग में क्या है, जबकि डालनवाला पुलिस को अनुरोध पंवार ने बताया था कि उक्त बैग में बड़ी रकम थी और उस बैग को अर्जुन पंवार ने ही उसकी गाड़ी में रखा था जिस कारण वह रकम को नहीं गिन पाया।
अब मामला खासा दिलचस्प हो गया है। दो माह होने को है, लेकिन अभी तक न तो एसटीएफ उक्त बैग को बरामद कर पाई है और न ही यह साबित कर पाई कि बैग में रकम थी या फिर कपड़े थे। इसी लचर जांच के चलते चारां आरोपियों को जिला न्यायालय से जमानत प्राप्त हो चुकी है। अब एसटीएफ विभाग से न्यायालय में चार्जशीट दाखिल करने की मांग कर रही है।
जानकारों की मानें तो यह मामला एक तरह से समाप्त हो गया है। इसे सोची-समझी रणनीति के तहत समाप्त करने की कगार पर पहुंचा दिया गया है। जिस राजनीतिक उम्मीदवार के चुनावी खर्च की रकम होने की बात पहले अनुपम शर्मा द्वारा कही गई थी उस पर भी एसटीएफ ने कोई जांच नहीं की, जबकि जानकारों की मानें तो इसका खुलासा टेलीफोन कॉल से हो सकता है।
बहरहाल इस पूरे प्रकरण में जांच के नाम पर बड़ा खेल खेले जाने की बात को लेकर पूर्व दायित्वधारी और भाजपा नेता रविन्द्र जुगराण ने राज्यपाल से शिकायत की है। इस मामले की सीबीआई जांच करवाए जाने की भी मांग की है। जुगराण ने राज्यपाल को दिए गए शिकायती पत्र में एक-एक तथ्य के अनुसार मामले को संदिग्ध बताया है। कहा है कि इस मामले में पुलिस की संलिप्तता के चलते मामले को दर्ज करने में ही जानबूझकर देरी की गई। जब स्थानीय पुलिस मामले में कार्यवाही करने जा रही थी तो अचानक ही जांच स्थानीय पुलिस से हटाकर एसटीएफ को क्यों सौंप दी गई? यह मामले को रफा-दफा करने का प्रयास है। अब देखना है कि राजभवन इस पर क्या कार्रवाई करता है। एसटीएफ की चार्जशीट न्यायालय में कितने ठोस तरीके से टिक पाती है। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि क्या पुलिस अपने विभाग पर उठ रहे सवालों से अपना दामन पाक-साफ कर पाती है या नहीं।
पुलिस के इकबाल पर ही सवाल
एक तरफ पुलिस द्वारा सुनियोजित लूट का मामला पुलिस विभाग की बदनामी का करण बना हुआ है, तो दूसरी ओर पुलिस के इकबाल पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं।
राजधानी में पुलिस पर दो बड़े हमले होने से यह साफ है कि कहीं न कही अपराधियों में पुलिस का खौफ कम हो रहा है। दस दिनां के भीतर देहरादून में दो अलग-अलग घटनाओं में जिस तरह से पुलिसकर्मियों पर हमला करके बुरी तरह से मारपीट की गई है, यह कानून व्यवस्था के साथ-साथ पुलिस व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
सात जून 2019 को देहरादून के करणपुर इलाके में एक रेस्त्रां में हंगामा होने के चलते करणपुर पुलिस चौकी के सिपाहियों ने रेस्त्रां को देर रात में बंद करने को कहा तो रेस्त्रां में हंगामा कर रहे कुछ शराबी और शरारती तत्वों ने सिपाहियों पर हमला करके उनके साथ मारपीट कर दी। यही नहीं जब चौकी इंचार्ज घटनास्थल पर अपने सिपाहियों को बचाने पहुंचे तो रेस्टोरेंट के स्वामी और हंगामा कर रहे लोगों द्वारा उन पर भी हमला किया गया। उनकी वर्दियां तक फाड़ डाली। हालांकि बाद में पुलिस ने हमला करने वाले सभी आरोपियां को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया।
इससे पूर्व देहरादून में ही चीता पुलिस के दो सिपाहियों जो कि एक मामले की जांच करने घटनास्थल पर गए हुए थे, उनके साथ बुरी तरह मारपीट की गई। जिससे एक सिपाही बुरी तरह घायल हो गया और दूसरे सिपाही के पैर की हड्डी तोड़ दी गई। एक पुलिसकर्मी के साथ देहरादून में जहां कि प्रदेश का पूरा पुलिस अमला रहता हो, वहां इस तरह से मारपीट का मतलब है कि अपराधियों के हौसले बुंलद होने लगे हैं। उनके सामने पुलिस कुछ नहीं है।
ऐसा नहीं है कि ऐसे मामले पहली बार हो रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व देहरादून जिले की जौली ग्रांट पुलिस चौकी के सभी कर्मियों के साथ बुरी तरह से मारपीट की जा चुकी है। यहां तक कि प्रेमनगर में एक महिला जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह उत्तर प्रदेश में न्यायाधीश के पद पर तैनात है, ने ट्रैफिक पुलिस वालों के साथ मारपीट की है। इसका वीडियो तक सोशल मीडिया में खूब चर्चाओं में रहा। देहरादून में ट्रैफिक पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की घटना हो चुकी है। पुलिस अधिकारियों द्वारा अपराधियों को संरक्षण देने और यौन उत्पीड़न करने तक के मामले सामने आ चुके हैं। इन मामलों से पुलिस की छवि खराब हो रही है। मित्र पुलिस के स्लोगन पर बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है।
बात अपनी-अपनी
इस मामले में आप आईजी संजय गुंज्याल से बात करें।
अनिल रतूड़ी, पुलिस महानिदेशक
आपने दो सवाल पूछे हैं- एक तो पुलिस के अपराध में संलिप्त होने का और दूसरा पुलिस के इकबाल पर। आप के पहले सवाल का जवाब यह है कि अपराधी चाहे कोई भी हो वह किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। पुलिस में होने के बावजूद वह अगर अपराधी है, तो उनके साथ अपराधियों जेसा व्यवहार होगा। जांच चल रही है। सभी अरोपी पकड़े गए उनको जेल जाना पड़ा। अब मामला कोर्ट में है। दूसरा सवाल कि पुलिस का इकबाल खत्म हो रहा है, इस पर कहना चाहूंगा कि यह सिर्फ पुलिस के इकबाल की नहीं, बल्कि कानून के इकबाल की भी बात है। जिन्होंने पुलिस पर हमला किया वे सभी पकड़े जा चुके हैं। उनको जेल भेजा जा चुका है। हम कानून का पालन करते हैं और कानून का पालन करवाते हैं। इसमें कोई और बात नहीं है। जो अपराधी है वह सजा पाएगा।
संजय गुन्जयाल, पुलिस महानिरीक्षक (पी/एम)
आदर्श आचार संहिता के दौरान एक गाड़ी को पुलिसकर्मियों द्वारा लूटा जाता है ओैर पुलिस इस मामले में सात दिनां तक कोई कार्यवाही नहीं करती तो यह अपने आप में ही गंभीर मामला बन जाता है। समाचार पत्रों से पता चला कि इस तरह की लूट की गई है। जब पुलिस कोई कार्रवाई ही नहीं कर रही थी तो हमने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पुलिस की कार्यवाही पर सवाल खड़े किए। तब जाकर पुलिस हरकत में आई। स्थानीय पुलिस कोई बड़ी कार्यवाही करने ही वाली थी, जैसा मुझे ज्ञात हुआ है। लेकिन अचानक ही जांच स्थानीय पुलिस से हटाकर एसटीएफ को दे दी गई। एसटीएफ ने कोई निष्कर्ष नहीं निकाला और केस को इतना लचर बना दिया कि सभी आरोपियों की जमानत हो गई। इससे हमको लगता है कि पुलिस मामले को दबाने का काम कर रही है। सबसे पहले आईजी गढ़वाल की गाड़ी से यह लूट हुई है, लेकिन पुलिस ने एक हफ्ते तक आईजी की गाड़ी को माल मुकदमा में जब्त ही नहीं किया। आईजी की गाड़ी उन पुलिसवालों के पास कैसे आई इस पर भी शक बना हुआ है। जब हमें लगा कि अब पुलिस विभाग और एसटीएफ इस मामले को रफा-दफा करने का प्रयास कर रही है क्यांकि आज तक एसटीएफ उस रकम को ही बरामद नहीं कर पाई है, तो हमने प्रेस में कहा था कि अब यह सामने आएगा कि बैग में अखबार की रद्दी है, हुआ भी वही। और एसटीएफ के पास जांच जाने के बाद बैग में शराब की बोतल और कपड़े होने की बात सामने आ गई। आखिर हमारा शक सही था कि पुलिस इस मामले को दबाने का काम कर रही है। सरकार भी इस मामले में कोई ठोस कार्यवाही नहीं कर रही है। तब हमने महामहिम राज्यपाल महोदया को चार पेज का एक ज्ञापन सौंपा जिसमें मांग की गई है कि इस पूरे मामले की कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच करवाई जाए। दूध का दूध ओैर पानी का पानी किया जाए। हमने ज्ञापन की प्रति मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और गृह सचिव को भी भेजी है।
रविन्द्र जुगराण, वरिष्ठ भाजपा नेता

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