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Uttarakhand

सरहद को मजबूत बनाती सड़कें

भारत अपनी सरहदों की मजबूती के लिए तेजी से सड़कों का निर्माण कर रहा है। इन सड़कों के निर्माण से जहां सरहदों में रहने वाली जनता को यातायात सुविधा उपलब्ध हुई है, वहीं सुरक्षा बलों को भी मजबूती मिली है। विगत दिनों रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तराखण्ड के सीमावर्ती जनपद पिथौरागढ़ के जौलजीवी-मिलम सड़क में जौनाली गाड़, किरकुटिया, लास्पा के साथ ही तवाघाट-घटियाबगड़ सड़क में जुंतीगाड़ में बने पुलों का वर्चुअल शुभारंभ किया। इससे पहले रक्षा मंत्री ने अरुणाचल के किमीन में 12 सामरिक सड़कों को राष्ट्र को समर्पित किया। साथ ही सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के दो उत्कृष्टता केंद्रों का भी उद्घाटन किया। पूरे देश के सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों का जाल बिछने से सामरिक दृष्टि से भारत की स्थिति मजबूत हुई है। जनपद पिथौरागढ़ के सीमावर्ती क्षेत्र में सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाने वाली जौलजीवी-मिलम, तवाघाट-घटियाबाड़, मुनस्यारी-मिलम मार्ग का निर्माण हो रहा है। ये सड़कें जहां सुरक्षा के लिहाज में महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं तो वहीं यह उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाली जनता के लिए किसी बड़े सौगात से कम नहीं हैं।

इससे जहां आम लोगों का जीवन आसान होगा वहीं आदि कैलाश व मानसरोवर यात्रा और भी सुगम हो जायेगी। सीमा सड़क संगठन सरहद की मजबूती के लिए पिथौरागढ़ से कालापानी तक 10 पुलों का निर्माण कर रहा है। धारचूला के तवाघाट-गर्बाधार-लिपुलेख सड़क के बनने में मानसरोवर यात्रा के साथ ही सामरिक रूप से भारत की स्थिति पहले ही मजबूत हो चुकी है। 17 हजार फीट की ऊंचाई पर 80 किमी ़ बनी इस सड़क से अब भारतीय सेना गर्बाधार से महज तीन घंटे में चीन सीमा में पहुंच सकती है। कैलाश मानसरोवर यात्रा भी सात दिनों में संपन्न हो जाएगी। पहले पिथौरागढ़ से गर्बाधार तक ही सड़क थी लेकिन चीन सीमा वाले लिपुलेख तक कोई सड़क न होने से सेना को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। धारचुला में चीन सीमा तक पहुंचने में चार दिन का समय लगता था अब सड़क के निर्माण के बाद सेना एक दिन में यहां से सीमा तक पहुंच सकती है। कैलाश मानसरोवर यात्रा भी सात दिनों में संपन्न हो जाएगी। अब अंतिम चैकियों तक रसद की निर्यात आपूर्ति आसानी से हो रही है।

हालांकि इस सड़क को बनने में 12 वर्ष का समय लगा लेकिन स्थितियां अब भारतीय सेना के अनुकूल हो चुकी है। यह सड़क पर्यटन को भी बढ़ावा देने में सहायक हो रही है। स्थानीय लोगों को अपने उत्पादों को बाजारों  तक पहुंचाने में भी सरलता हो रही है जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में भी इजाफा हो रहा है। पर्यटन की दृष्टि से होम स्टे योजना को भी बल मिला है। इधर मुनस्यारी विकासखण्ड में सामरिक दृष्टि से धापा-मिलम सड़क का निर्माण कार्य कठोर चट्टानों के बीच तीव्र गति से जारी है। इस सड़क के बनाने से चीन सीमा तक पहुंच व गोरी नदी का उद्गम स्थल मिलम ग्लेशियर का दीदार भी पर्वतारोही आसानी से कर सकेंगे। कठोर चट्टानों को काटने के लिए मालवाहक हेलीकाप्टर से हैवी मशीनरी पहुंच चुकी है। तहसील मुख्यालय मुनस्यारी से मिलम तक बनने वाली इस सड़क की दूरी 86 किमी ़ है। मिलम चीन सीमा पर अंतिम भारतीय गांव है। अभी तक यहां पहुंचने के लिए पैदल मार्ग से होकर जाना पड़ता था। मिलम में आईटीबीपी की चैकी भी है। यहां दो दर्जन से अधिक आईटीबीपी के जवान रहते हैं। यहां पर हर समय 15 फीट से अधिक बर्फ जमी रहती है।

इस सड़क के बनने से तवाघाट, पांगला, मांगती, जिप्ती, गर्वा, कुरीला, तांकुल, बंगबुंग के साथ ही व्यास घाटी के बूंदी, गव्र्यांग, गुंजी, नाबी, रोंगकोंग, नपलच्यु एवं कुटी गांव भी विकास की मुख्यधारा से जुड़ जाएंगे। पंचेश्वर से कालापानी तक नेपाल सीमा पर अब सड़क बन चुकी है। अब यहां एसएसबी को गश्त लगाने में भी आसानी हो रही है। उत्तराखण्ड की सीमा के अलावा पूर्वी लद्दाख में रणनीतिक रूप से दारबुक-श्योक-दौलतबेग ओल्डी रोड पर भी तेजी से काम हो रहा है। 255 किलोमीटर इस सड़क पर आठ पुलों का निर्माण हो रहा है अगर यह सड़क बन जाती है तो सुरक्षा बल 6 घंटे में लेह से दौलत बेग ओल्डी पहुंच सकते हैं। देश में चीन की सीमा लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश से जुड़ी हुई है। लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम एवं अरुणाचल प्रदेश की सीमाएं सीधे तौर पर सड़क मार्ग से जुड़ी हुई हैं। उत्तराखण्ड की सीमा लंबे समय से सड़क से अछूती रही थी लेकिन अब यहां सड़कें बनने से सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा मजबूत हो चुकी है।

उल्लेखनीय है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क बनाने वाली बीआरओ की स्थापना सड़कों, पुलों व सुरंगों के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए की गई थी, जो अपने उद्देश्य पर खरी उतर रही है। अभी तक बीआरओ देश के पूर्वी व पश्चिमांतर हिस्सों में लगभग 80 हजार किलोमीटर सड़कों, 56 हजार मीटर पुलों एवं 19 हवाई पट्टियों के साथ ही चार सुरंगों का निर्माण कर चुका है। सीमावर्ती क्षेत्र में नजर डालें तो लद्दाख में भारत एवं चीन की सीमा 1597 किमी ़ अरुणाचल प्रदेश में 1126, उत्तराखण्ड में 345, सिक्किम में 220, हिमाचल प्रदेश में 200 किमी  है।

बीआरओ ने दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में हाड़तोड़ मेहनत की है। सड़कों व पुलों के निर्माण से सीमांत के लोगों की आवाजाही आसान होगी व चीन सीमा तक भारतीय सेना की पहुंच भी आसान हो जाएगी। पहाड़ी व दुर्गम इलाकों में चुनौतियों के बावजूद विश्वस्तरीय सड़कों के निर्माण में सीमा सड़क संगठन की क्षमता आत्मनिर्भर भारत के मंत्र को दर्शाती है।
राजनाथ सिंह, रक्षामंत्री

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