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राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत उत्तराखण्ड के परंपरागत मोटे अनाजों को प्रोत्साहित कर पलायन रोका जा सकता है। लेकिन पौष्टिकता से भरपूर इन अनाजों को उगाने वाले काश्तकार निरंतर घट रहे हैं

प्रदेश में पोषक तत्वों से भरपूर मोटे अनाजों का रकबा लगातार घटता जा रहा है। हिमालय में ऊर्जा के स्रोत माने जाने वाले इन अनाजांं को गरीबों की सेहत के लिए भी मुफीद माना जाता है। आज मंडुवा, रामदाना, रंयास, लोबिया, तिल, तोर, मादिरा, कौंणी, जौ, ज्वार, सिंघाडा आदि पहाड़ी मोटे अनाजों की मांग तो राज्य व प्रदेश से बाहर बहुत है, लेकिन आपूर्ति करने वाले उत्पादक अब गांवों में नहीं रह गए हैं। स्वास्थ्य व स्वाद का पर्याय रहे ये अनाज प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस व अन्य पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। लेकिन अब ये विलुप्ति की तरफ हैं। यह तब हो रहा है जब केंद्र सरकार द्वारा मोटे अनाज को लोकप्रिय बनाने के लिए वर्ष 2018 को पौष्टिक धान्य वर्ष के रूप में भी मनाया जा चुका है। लेकिन प्रदेश में पलायन आयोग की रिपोर्ट कहती है कि 5.61 प्रतिशत लोगों ने वन्यजीवों द्वारा फसल क्षति एवं 5.44 प्रतिशत ने कृषि पैदावार में कमी के चलते गांवों से पलायन किया है। पलायन करने वाले ये वही पहाड़ी काश्तकार रहे हैं जो किसी समय मोटे अनाजों के उत्पादक रह चुके हैं। हालांकि समस्या के निदान के लिए प्रदेश की त्रिवेंद्र रावत सरकार द्वारा परंपरागत पसलों का समर्थन मूल्य घोषित करने के साथ ही विपणन की कारगर व्यवस्था के तहत छोटी-बड़ी मंडियां विकसित करने, मोटे एवं नकदी अनाजों का क्रय करने, इनकी खरीदारी के लिए स्वयं सहायता समूहों को बोनस देने की पहल तो की जा रही है, लेकिन असल सवाल यह है कि जब मोटे अनाजों के उत्पादक ही नहीं रहे तो फिर हिमालय के इन ऊर्जा स्रोतों को उजड़ने से कैसे बचाया जा सकता है?

केंद्र व राज्य सरकारें भले ही पौष्टिक तत्वों से भरपूर इन फसलों की खेती को भरपूर समर्थन दे रही हों, लेकिन इनका उत्पादन लगातार घटता जा रहा है। सरकार द्वारा वर्ष 2019-20 के बजट में पहाड़ी फसलों को फसल बीमा योजना के दायरे में लाने के बाद से इन मोटे अनाजों के उत्पादन में वृद्धि की उम्मीद की जा रही है। प्रदेश के गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्व विद्यालय पंतनगर ने मोटे अनाज की खेती के लिए राष्ट्रीय बीज निगम की मदद से सीड प्रोसेसिंग प्लांट की शुरुआत की है जो मोटे अनाजों के विकास के लिए काम करेगी और किसानों को अच्छी उपज के लिए बीज भी उपलब्ध कराएगी। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि बीज प्रोसेसिंग संयंत्र घटते मोटे अनाज की खेती को पुनर्जीवित करने में सहायक होगा। ऐसा नहीं है कि मोटे अनाजों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए पहली बार काम किया जा रहा है। प्रदेश की पूर्ववर्ती हरीश रावत सरकार ने पांरपरिक उत्पादों को बाजार देने की पहल भी अपने कार्यकाल में शुरू की थी। इसमें पहाड़ी जनपदों में पैदा होने वाले कोदा, झंगोरा, फाफर, रामदाना को यूरोपीय बाजार में बिकवाने के साथ ही गदुवा, गडेरी, गहत को भी पहचान दिलाने की तरफ कदम बढ़ाये थे, लेकिन ये धरातलीय रूपधारण नहीं कर पाए। वहीं मौसम की बेरुखी, जंगली जानवरों का आतंक एवं बिखरी जोत के साथ ही गांव से लोगों की निकासी भी इसमें बाधक बन रही है, जिसके चलते पर्वतीय क्षेत्र में कøषि जोत लगातार घटती जा रही है। कुमाऊं में खेती की स्थिति को देखें तो राज्य गठन से पहले 8.15 हेक्टेयर जमीन में खेती होती थी जो अब 7.01 लाख हेक्टेयर में आ गई है। यानी इन वर्षों में एक लाख से अधिक हेक्टेयर जमीन बंजर हो गई है। इसमें से 3.28 लाख हेक्टेयर में ही सिंचाई की सुविधा है ज्यादा आसमान भरोसे है। अकेले सीमांत जनपद पिथौरागढ़ जो मोटे अनाजों की पैदावार के लिए जाना जाता रहा है, एक समय यहां 80 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में खेती होती थी जो अब घटकर 42655 हेक्टेयर में पहुंच चुकी है। आपदा से कøषि भूमि लगातार प्रभावित हो रही है। सैकड़ों नाली भूमि भूस्खलित हो चुकी है। 2013 की आपदा में जनपद के मदकोट, दुम्मर, बंगापानी, छोरीबगड़, मोरी, लुम्ती, बरम, सोबला, न्यू सुवा, झूलाघट एवं तल्लाबगड़ में सैकड़ों हेक्टेयर भूमि आपदा की भेंट चढ़ गई। बस्तड़ी में आई आपदा में तो 1000 नाली जमीन बह गई। यही हाल प्रदेश के अन्य जनपदों का भी है। ऐसे में पहाड़ों में मोटे अनाज का उत्पादन बढ़े तो कैसे?

योजनाएं तो अपनी जगह पर हैं, लेकिन खेती का मोह कैसे बढ़े, यह सोचनीय है। कøषि विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर सिंचाई के लिए पानी कम पड़ रहा है तो मोटा अनाज उगाएं। मोटे अनाजों में गिरावट के बाद भी भारत दुनिया के एक बड़ा उत्पादक देश है। केंद्र सरकार मोटे अनाज को राष्ट्रीय कøषि विकास योजना के तहत प्रोत्साहित करने पर अमल कर रही है। इसके तहत ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, सांवा, मंडुबा एवं कोटो को सुपर फूड में शामिल किया गया है। औषधीय गुणों के कारण भी इनकी मांग बढ़ी है। राष्ट्रीय कøषि विकास योजना के दूसरे चरण में मोटे अनाज वाले फसलों पर फोकस करने जा रही है। अगर देश में मोटे अनाजों की स्थिति को देखें तो देश में हरित क्रांति से पहले 3.7 करोड़ हेक्टेयर में इसकी खेती होती थी, लेकिन अब यह सिमटकर 1.47 करोड़ हेक्टेयर रह गई है। मोटे अनाजों का थाली से गायब होने का प्रभाव लोगों को प्रोटीन, विटामिन ए आयरन एवं आयोडीन जैसे पोषक तत्वों की कमी से वंचित कर रहा है। गरीब तबके से यह पौष्टिक आहार एक तरह से छिन सा गया है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत मक्का, जौ, ज्वार, बाजारा, रागी, कुटकी, कोदो, सावां, कांगनी व चीना को इसके दायरे में लाकर इसके उत्पादन बढ़ाने के साथ इन अनाजों का समर्थन मूल्य भी तय किया गया, लेकिन बावजूद इसके इसकी खेती का रकबा लगातार घटता जा रहा है।

स्वास्थ्य और पौष्टिकता से भरपूर

मोटे अनाजों को स्वास्थ्य एवं पोषण की दृष्टि से देखें तो ये ऊर्जा की खान हैं। इसमें मडुवा कैल्शियम, आयरन व रेशा होने से अत्यधिक पौष्टिक होता है। यह मधुमेह के रोगियों के लिए अमृत समझा जाता है। इसकी चपाती, हलुवा, नमकीन, बिस्किट, केक, बेबीफूड जैसे व्यंजन तैयार किए जाते हैं। गर्भावस्था में महिला द्वारा इसका नियमित उपयोग करने से जच्चा-बच्चा दोनों को फायदा होता है। इसका चारा दुधारू गायों के लिए भी पौष्टिक माना जाता है। इसकी रोटी नियमित रूप से खाने पर पेट में कब्ज संबंधी रोग दूर हो जाते हैं, लेकिन अब इसकी खेती का रकबा लगातार घट रहा है। पौष्टिकता से भरपूर गहथ अब ढूंढ़े नहीं मिलती। पहले यह कम खाद-पानी में ही उग जाती थी। महानगरों में रहने वाले प्रवासी पहाड़ी बड़े शौक से इन्हें ले जाते थे। जोड़ों में दर्द, मूत्ररोग, सफेद प्रदर, किडनी की पथरी में यह लाभदायक मानी जाती है। इसकी पत्तियों का रस कान दर्द को रोकने में उपयोग में लाया जाता था। यही हाल भट का भी है। पहाड़ में इसकी काली एवं सफेद दो तरह की प्रजातियों की पैदावार होती है। सफेद को सोयाबीन कहा जाता था। यह कई तरह की हानिकारक बीमारियों से बचाव में सहायक है। इससे जहां शरीर में ऊर्जा उत्पन्न होती थी वहीं यह त्वचा को भी चमकदार बनाता है। कम दूध देने वाले पशुओं को भी यह खिलाया जाता है। रंयास को सतरंगी, झिलंगी, नौरंगी के नाम से जाना जाता है। इसमें सुंदर नौ रंग के दाने होते हैं। इसकी दाल वायु एवं पित्तनाशी मानी जाती है। यह पाचन और गैस में लाभकारी है, तो वहीं मांसपेशियों को भी तंदुरस्त बनाती है। काली दाल के नाम से जानी जाने जाने वाली उड़द दांतों की मजबूती एवं रक्त निर्माण में सहायक मानी जाती है। लोबिया जिसे स्थानीय भाषा में इसे सूंठ के नाम से जाना जाता है, यह पोषक तत्वों से भरा पड़ा है। इसकी फली और बीज खाने के काम आती है। यह खरपतवारों को खत्म करती है। यह अच्छी खाद के रूप में भी जानी जाती है। तोर की दाल को पहाड़ में शुभ अवसर पर बनाने का रिवाज है। पथरी में इसकी पत्तियां सहायक मानी जाती हैं। इनके फूलों के काढ़े से खांसी एवं निमोनिया में आराम मिलता है। यह प्रोटीन, खनिज, कैल्शियम, कार्बोहाइड्रेट की खान होती है। तिल के तेल को पूजा अर्चना में शुभ माना जाता है। यह औषधीय गुणों से भरपूर है। जोड़ों के दर्द में इससे मुक्ति मिलती है। इसकी मालिश से हड्डियां मजबूत होती हैं। ठंड में तिल के लड्डू खाने से लाभ मिलता है। मादिरा इसे झंगोरा के नाम से से भी जाना जाता है। यह शुगर व फैट बढ़ने से रोकने में कारगर साबित होता है। इसमें कैलोरी, फास्फोरस और कार्बोहाइड्रेट की समुचित मात्रा होती है। पीलिया रोकने में भी यह असरदार है। झंगोरा जो खीर बनाने के साथ ही पशुओं के चारे में भी प्रयुक्त होता है। कौंणी पोषक तत्वों से भरपूर है। यह पाचन शक्ति बढ़ाने, भोजन संबंधी बीमारियों को दूर रखने में फायदेजनक माना जाता है। इसके बीज शरीर को ठंडा रखते हैं। उल्टी दस्त एवं निमोनिया में इसका सेवन फायदेमंद होता है। पहाड़ों में आज भी बच्चों को ददुर (छोटी माता) पूरी तरह न निकलने पर कौंणी को छांछ में पकाकर खिलाया जाता है। चौलाई जिसे रामदाना, मरसा, चुवा इत्यादि उपनाम से जाना जाता है। यह कुपोषण से लड़ने में भी मददगार है। इसकी पत्तियों में लौह तत्व अधिक होने के कारण यह एनिमिया से बचाता है। जौ इसे जई (ओट्स) भी कहा जाता है। यह कार्बोहाइड्रेट्स का भी अच्छा स्रोत माना जाता है। इसका आटा कैल्शियम, विटामिन, मैग्निशियम, पौटेशियम से भरपूर है। यह उच्च रक्तचाप एवं हृदय संबंधी बीमारियों के खतरों को भी कम करता है। ज्वार इसे बाजरा नाम से भी जाना जाता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट होता है। कुट्टू फाइबर से भरपूर होता है और यह खराब कोलेस्ट्राल के स्तर और हृदय रोग के जोखिम को कम करने में मदद करता है। उपवास के दिन इसके आटे की काफी मांग होती है। सिंघाड़ा के बीज में विटामिन बी, स्टार्च और पौटेशियम जैसे खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसी तरह गनेरा जिसे पहाड़ों में गरीबों की पेट की आग बुझाने वाला माना जाता है, इसे खजिया और तीन पाख के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन पौष्टिकता से भरपूर पहाड़ के ये मोटे अनाज अब खतरे में हैं।

मोटा अनाज गरीबों की सेहत बनाने के लिए मुफीद है। इसकी मांग भी लगातार बढ़ रही है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत इन अनाजों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। मोटे अनाज की ज्यादातर फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जा रहा है। सरकार इनकी खरीद क्षेत्रीय जरूरतों के आधार पर भी कर रही है। कई राज्यों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली से इसका वितरण किया जा रहा है। वर्ष 2018 को पौष्टिक धन्य वर्ष के रूप में मनाया जा चुका है।
राधा मोहन सिंह, केंद्रीय कृषि मंत्री

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