[gtranslate]

अल्मोड़ा लोकसभा क्षेत्र की मरचूला से लेकर सीमांत धारचूला तक फैली घाटियों में कदम-कदम पर हवा बदल जाती है। ऐसे में कांग्रेस-भाजपा दोनों पार्टियों को हवा का रुख पहचानने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ेगा। बहरहाल देनों पार्टियों ने अपने पुराने दिग्गजों पर ही दांव लगाया है

चुनाव का बिगुल बज चुका है। चुनावी सरगर्मियों की तपिस का असर अल्मोड़ा संसदीय सीट पर भी दिखाई दे रहा है। इस सीट में उम्मीदवारों के कामकाज की समीक्षा के बजाय मोदी-मोदी का शोर अधिक है। कहीं मोदी की जय-जयकार हो रही है तो कहीं उनको खूब कोसा जा रहा है। कहीं कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ होने का आश्वासन दिया जा रहा है, तो कहीं चप्पा-चप्पा भाजपा की गूंज सुनाई दे रही है। इस बार इस सीट पर कांग्रेस व भाजपा ने अपने पुराने चेहरों पर ही दांव खेलना उचित समझा।

ठाकुर-ब्राह्मण बाहुल्य इस संसदीय क्षेत्र के जातीय समीकरण पर नजर डालें तो यहां सर्वाधिक 44 प्रतिशत राजपूत व 29 प्रतिशत ब्राह्मण के साथ ही 27 प्रतिशत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व पिछड़ा वर्ग के लोग हैं। वर्ष 2009 में इस सीट के अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने के बाद से यहां कांग्रेस व भाजपा ने लगातार टम्टा बंधुओं पर ही भरोसा जताया है। अन्य दलित नेताओं की इस सीट से दावेदारी तो हुई, लेकिन वे कामयाब नहीं हुए। कांग्रेस से प्रदीप टम्टा एक बार फिर सफल रहे हैं। भाजपा प्रत्याशी अजय टम्टा संघ से नजदीकी, राज्य मंत्री के तौर पर किए कामकाज व संगठन में सक्रियता के चलते टिकट पाने में सफल रहे। लंबा राजनीतिक अनुभव व संगठन में अच्छी पकड़ एक बार फिर उन्हें टिकट दिला गई। वहीं कांग्रेस ने भी एक बार फिर प्रदीप टम्टा पर भरोसा जताया है। प्रदीप टम्टा वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हरीश रावत के नजदीकी के चलते वह टिकट पाने में सफल रहे।

अल्मोड़ा संसदीय सीट में चार जिले पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, बागेश्वर व चंपावत आते हैं। इस पूरे संसदीय क्षेत्र में 14 विधानसभा क्षेत्र हैं। जिसमें से 11 पर भाजपा काबिज है। अल्मोड़ा जनपद से कुल 6 विधायक हैं और जिसमें से 4 भाजपा तो 2 कांग्रेस के हैं। पिथौरागढ़ जनपद में 4 विधायक हैं जिसमें से 3 भाजपा तो 1 कांग्रेस से है। चंपावत जनपद में 2 विधायक हैं दोनों भाजपा से हैं। बागेश्वर जनपद से भी 2 विधायक हैं। दोनों भाजपा से हैं। इस लिहाज से यहां भाजपा मजबूत दिखती है।


नगरीय निकायों व पंचायतों में कांग्रेस प्रतिनिधित्व के मामले में थोड़ा आगे दिखती है। अल्मोड़ा जनपद के 10 ब्लॉक प्रमुखों में से कांग्रेस के 7 तो भाजपा के 2 प्रमुख हैं। 1 निर्दलीय है। इस लिहाज से यहां कांग्रेस आगे है। जनपद पिथौरागढ़ में दोनों बराबरी पर हैं। यहां 8 ब्लॉक प्रमुखों में भाजपा व कांग्रेस के पास 3-3 तो दो निर्दलीय हैं। वहीं 3 नगरपालिकाओं में भाजपा का कब्जा है तो नगर पंचायत की दो सीटों में से 1 में भाजपा व 1 में निर्दलीय काबिज है। चंपावत जनपद में 4 ब्लॉक प्रमुख हैं । चारों में भाजपा काबिज है। जिला पंचायत व नगरपालिका में कांग्रेस काबिज है। बागेश्वर जनपद में 03 ब्लॉक प्रमुखों में से 02 में कांगेस व 1 में भाजपा काबिज है। जिला पंचायत कांग्रेस के पास व नगरपालिका में निर्दलीय का कब्जा है। यह सियासी गणित भाजपा को मजबूती प्रदान करते दिखता है।

अल्मोड़ा संसदीय सीट के राजनीतिक इतिहास में जाएं तो यहां से पहले सांसद देवीदत्त पंत चुने गए। वर्ष 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के देवीदत्त पंत ने सोशलिस्ट पार्टी के पूर्णानन्द उपाध्याय को हराया। 1957 के उपचुनाव में कांग्रेस के जंगबहादुर बिष्ट ने जनसंघ के शोबन सिंह जीना को पराजित किया। वर्ष 1962 के चुनाव में कांग्रेस के जंगबहादुर बिष्ट ने जनसंघ के प्रताप सिंह को पराजित किया। 1967 के चुनाव में कांग्रेस के ही जंगबहादुर बिष्ट ने जनसंघ के गोविन्द सिंह बिष्ट को पराजित किया। वर्ष 1971 के चुनाव में कांग्रेस के नरेन्द्र सिंह बिष्ट ने जनसंघ के शोबन सिंह जीना को हराया। वर्ष 1952 से 1971 तक इस लोकसभा सीट में कांग्रेस का एकछत्र राज्य रहा। वर्ष 1977 के आम चुनाव में जनता पार्टी के मुरली मनोहर जोशी ने कांग्रेस के नरेन्द्र सिंह बिष्ट को पराजित किया। लेकिन 1980 में कांग्रेस ने वापसी की और युवा कांग्रेसी नेता हरीश रावत ने जनता पार्टी के मुरली मनोहर जोशी को पराजित किया। इस चुनाव में वे मुरली मनोहर पर भारी पड़े। वर्ष 1984 के चुनाव में फिर से कांग्रेस के हरीश रावत विजयी रहे। वर्ष 1989 में भी कांग्रेस के हरीश रावत का जलवा बरकरार रहा जिसमें उन्होंने उत्तराखण्ड क्रांति दल के काशी सिंह ऐरी को पराजित किया।

वर्ष 1991 के चुनावों में फिर से बाजी पलटी। इसमें रामलहर के चलते भारतीय जनता पार्टी ने इस सीट से अनजान प्रत्याशी जीवन शर्मा को उतारा और उन्होंने कांग्रेस के हरीश रावत के विजयी रथ पर विराम लगा दिया। इसके बाद इस सीट से वर्ष 1996, 1998, 1999 व 2004 में भाजपा के बची सिंह रावत लगातार चार लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज करते रहे। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के बची सिंह रावत ने कांग्रेस की रेणुका रावत को हराया। वर्ष 2009 में कांग्रेस के प्रदीप टम्टा ने भाजपा के अजय टम्टा को पराजित किया था। जबकि वर्ष 2014 में भारतीय जनता पार्टी के अजय टम्टा ने कांग्रेस के प्रदीप टम्टा को शिकस्त दी।

 

मरचूला से धारचूला तक साधना होगा वोटरों को

संसदीय क्षेत्र में स्थित घाटियों में बसी जनता के वोट काफी निर्णायक होंगे। गगास, बरौरा, सेराघाट, कैडारो, कमस्यार, कत्यूर, दानपुर, पंचेश्वर, सरयू, पुंगराऊ, रामंगगा, तल्ला व मल्ला जोहार, गोरीछाल, चौदास, दारमा, व्यास आदि घाटियां अल्मोड़ा लोकसभा क्षे में हैं। यह पूरा क्षेत्र मरचूला से धरचूला के नाम से जाना जाता है। इस संसदीय क्षेत्र का पश्चिमी हिस्सा मारचूला तो पूर्वी धारचूला के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र में 26 से अधिक तहसीलें, 26 विकासखंड व कई उपतहसीलें हैं। यहां हर क्षेत्र की अलग विशेषता व रंग है। कहीं पानी की अधिकता है तो कहीं पानी की भरपूर कमी। कहते हैं कि यहां की हर घाटी की हवा बदल जाती है। यहां के मतदाताओं का रुख कब किधर हो जाए, कहा नहीं जा सकता।

मुद्दे जो डालेंगे प्रभाव : अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र में बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य व शिक्षा के साथ ही विकास के तमाम आधारभूत ढांचों के निर्माण के सवाल पर भी प्रत्याशियों को दो-चार होना पड़ेगा, लेकिन इसके अलावा कुछ ऐसे मुद्दे भी हैं जो चुनाव के दौरान उभर कर सामने आएंगे।

पलायन : इस संसदीय सीट के अल्मोड़ा जनपद के 162, पिथौरागढ़ जनपद के 98, चंपावत के 119, बागेश्वर के 150 यानी 529 गांव पूरी तरह निर्जन हो चुके हैं। इन गांवों की पहचान अब भूतवा गांवों के नाम से हो रही है। मूलभूत सुविधाओं के अभाव में लगभग हर गांव से पलायन हुआ है। पलायन की यह रफ्तार लगातार बढ़ती जा रही है। मानव विकास सूचंकाक की दृष्टि से देखें तो यह संसदीय क्षेत्र विकास के मामले में लगातार फिसड्डी साबित हो रहा है। राज्य की पहली मानव विकास रिपोर्ट इस संसदीय क्षेत्र के पिछड़ेपन पर मुहर लगाती है। इस रिपोर्ट के अनुसार पिथौरागढ़ जिले को 0.675, चंपावत जिले को 0.620, अल्मोड़ा जिले को 0.655 व बागेश्वर जिले को 0.662 अंक प्राप्त हुए हैं। पलायन व रोजगार का मुद्दा उम्मीदवारों को अवश्य ही विचलित करेगा।

विस्थापन व पुनर्वास : अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र में विस्थापन व पुर्नवास भी एक बड़ा मुद्दा साबित होगा। बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत का एक बड़ा हिस्सा आपदा से प्रभावित है। अकेले पिथौरागढ़ जनपद में 125 से अधिक गांव खतरे की जद में हैं, लेकिन पुनर्वास व आपदा के मुद्दे पर काम नहीं हो पाया है।

हवाई सेवा : नैनी सैनी से नियमित हवाई सेवाओं की शुरुआत न हो पाना भी एक बड़ा मुद्दा होगा। 08 अक्टूबर 2018 से हवाई पट्टी का उद्घाटन हुआ। 17 जनवरी 2019 को सेवा प्रारंभ हुई। मात्र 9 दिन सेवाएं चल पाई। अनियमित सेवा के चलते 17 सौ यात्रियों के टिकट की धनराशि लौटानी पड़ी। इस सेवा से लोगों को बड़ी उम्मीदें थी। विधानसभा के साथ ही लोकसभा चुनाव में यह हवाई सेवा मुद्दा बनती रही है।

आइएसबीटी : पांच साल से अल्मोड़ा में प्रस्तावित अंतरराज्यीय बस अड्डे का मुद्दा भी जोर पकड़ेगा। पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत के यात्रियों को अन्य राज्यों के लिए सफर करने के लिए हल्द्वानी से बस पकड़ने के लिए अल्मोड़ा में आईएसबीटी की योजना बनी थी। वर्ष 2007 में पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खण्डूड़ी ने इस योजना के लिए 5 करोड़ रुपए भी स्वीकøत किए थे। लेकिन यह धरातलीय रूप धारण नहीं कर पाया। जनता इस मुद्दे पर भी जबाव अवश्य मांगेगी।

मिनी कॉर्बेट : जैव विविध्ता के लिए रानीखेत का दलमोठी वन क्षेत्र कॉर्बेट नेशनल पार्क की तरह विकसित होना था। इसका प्रस्ताव लंबे समय से कैबिनट में लटका पड़ा है। इस पार्क का निर्माण कर इसे पर्यटन गतिविधियों से जोड़ा जाना था।

संचार व्यवस्था : दारमा, व्यास व जोहार के संचार सुविधा से न जुड़ पाना, चीन सीमा तक सड़क निर्माण न हो पाना और उच्च हिमालयी क्षेत्रों का पिछड़ापन भी अहम मुद्दा साबित होगा।

रोशनी : अल्मोड़ा संसदीय सीट में जनपद अल्मोड़ा के 220 गांव व 309 तोक, बागेश्वर जनपद के 61 गांव व 91 तोक, चंपावत जनपद के 178 गांव व 374 तोक व पिथौरागढ़ जनपद के 204 गांव व 281 तोकों में बिजली नहीं है। अंधेरे से वंचित इन गांवों के वाशिंदों के सवालों का जबाव भी उम्मीदवारों को देना होगा।

बदहाल शिक्षा : पिथौरागढ़ जिले के 76, चंपावत के 44, बागेश्वर के 68, अल्मोड़ा के 19 पिथौरागढ़ के 747, चंपावत के 192, बागेश्वर के 135, अल्मोड़ा के 324 प्राथमिक विद्यालयों में विद्युत व्यवस्था नहीं है। इन सवालों का सामना भी जनप्रतिनिधियों को देना पड़ेगा।

मतदाताओं को रिझाना कठिन : अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र में 514406 युवा मतदाता हैं। युवा मतदाता से आशय 18 से 39 आयु वर्ग से है। पिथौरागढ़ जनपद में 185879, अल्मोड़ा जनपद में 122280, बागेश्वर जनपद में 105911 व चंपावत जनपद में 100336 युवा मतदाता हैं जो चुनाव परिणामों का रुख बदल सकते हैं। युवाओं के अपने मुद्दे हैं जो पार्टी प्रत्याशी युवाओं को लुभा पाएगा वह बाजी पलटने में सक्षम हो सकता है। युवा मतदाताओं को रिझाने के लिए शिक्षा व रोजगार के मुद्दे पर ठोस आश्वासन ही काम आएगा।

पूर्व सैनिकों के वोट अहम : अल्मोड़ा संसदीय सीट के जनपद पिथौरागढ़ में 24690, अल्मोड़ा जिले में 13979, जनपद बागेश्वर में 11440 तो चंपावत में 4669 पूर्व सैनिक व वीर नारियां वोटर हैं। यानी इस संसदीय सीट से कुल 54778 पूर्व सैनिक मतदाता हैं। अगर इन सैनिक परिवारों के एक परिवार से 4 सदस्यों के मत को भी इसमें जोड़ दिया जाय तो इन मतदाताओं की संख्या 219112 पहुंच जाती है। यह संख्या किसी भी प्रत्याशी का भाग्य बदलने के लिए काफी है। हालांकि इन सैनिक मतदाताओं को लुभाने के लिए हर राजनीतिक दल के अपने- अपने सैन्य प्रकोष्ठ भी बने हैं। इसके अलावा इस संसदीय सीट से सर्विस मतदाताओं की संख्या भी अच्छी खासी है। इस सीट से 27 हजार 954 सर्विस मतदाता हैं। जो हार-जीत का समीकरण बना व बिगाड़ सकने में सक्षम हैं।

You may also like