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प्रदेश कांग्रेस में हरीश रावत समर्थकों को जिस तरह चुन-चुन कर दरकिनार किया गया उससे कांग्रेस के सामने निकाय चुनाव जीतने की चुनौती खड़ी हो गई है। पार्टी के दमदार और निष्ठावान कार्यकर्ता प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह के इस भेदभावपूर्ण रवैये से खफा होकर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने का ऐलान कर चुके हैं। उनकी बगावत से कांग्रेस को भारी नुकसान होगा। हालांकि टिकट वितरण को लेकर भाजपा के भीतर भी कार्यकर्ताओं में रोष है। लेकिन भाजपा के मुकाबले कांग्रेस के भीतर का आक्रोश ज्यादा खतरनाक दिखाई देता है। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हरीश रावत के समर्थकों को ठिकाने लगाना प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है
‘दिनेश पुंडीर को हमने हरीश रावत के खिलाफ यूज किया है। वह रावत का विरोधी है। टिकट उसी को मिलना चाहिए।’ यह कहना है संजय पालीवाल और अंबरीश कुमार का। ये दोनों हरिद्वार में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। अभी कुछ दिन पहले जब इनका एक ऑडियो वायरल हुआ तो उसमें ये नेता इस तरह की बातें कर रहे हैं। दोनों नेता प्रदेश कांग्रेस मुखिया प्रीतम सिंह के गुट के हैं। दरअसल, प्रीतम सिंह को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने के बाद से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ पार्टी में एक नया गुट बन गया है। यह गुट प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश का है। पिछले दिनों जब प्रदेश में कांग्रेस कार्यकारिणी की घोषणा की गई तो तब हरीश रावत गुट के नेताओं को जिस तरह दरकिनार किया गया वह जग जाहिर है। अब यही पुनरावृत्ति इस बार नगर निकाय चुनावों में हुई है। हरिद्वार में पूर्व दर्जाधारी मंत्री संजय पालीवाल और पूर्व सांसद अंबरीश कुमार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के खास सिपहसालारों में माने जाते हैं।
प्रदेश अध्यक्ष ने हरिद्वार में पार्टी प्रत्याशियों के चयन की जिम्मेदारी इन दोनों के सर पर डाली थी। इसके अलावा प्रदीप चौधरी और विकास चौधरी भी टिकट आवंटन में थे। दोनों चौधरी बंधु भी प्रीतम सिंह गुट के ही बताए जा रहे हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनावों में हरीश रावत को हाशिए पर डालकर प्रीतम सिंह गुट के समर्थकों को ही टिकट आवंटन में प्राथमिकता दी जा रही है, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया पर सवालिया निशान उठ रहे हैं। सवाल यह है कि ऐसे में प्रदेश में सत्तासीन भाजपा को टक्कर कैसे दी जा सकती है। कांग्रेस में कमजोर प्रत्याशियों को टिकट देने से पार्टी मजबूत होने के बजाय कमजोर तो होगी। साथ ही पार्टी के विद्रोही कार्यकर्ता दूसरी पार्टी के लिए मुनाफे का सौदा होंगे। अकेले कुमाऊं मंडल की ही बात करें तो यहां अल्मोड़ा से लेकर बागेश्वर, चंपावत और रुद्रपुर के साथ ही काशीपुर में पार्टी के नाराज कार्यकर्ताओं ने घोषित प्रत्याशियों के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया है। कई नेता निर्दलीय चुनावी मैदान में उतरने की घोषणा कर चुके हैं।
 उत्तराखण्ड में नगर निकाय चुनावों को आगामी 2019 के लोकसभा चुनावों का ट्रेलर माना जा रहा है, ऐसे में यह चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण हो गए हैं। नगर निकाय के यह चुनाव आगामी 2019 में लोकसभा चुनावों का भविष्य तय करेंगे। उत्तराखण्ड स्थापना से लेकर अब तक देखा जाए तो लोकसभा चुनाव में एक बार भाजपा तो दूसरी बार कांग्रेस उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे हैं। इस लिहाज से देखें तो आगामी 2019 का चुनाव कांग्रेस के लिए पासा पलटने वाला साबित हो सकता है। लेकिन जिस तरह से पार्टी में गुटबाजी दिनों दिन चरम पर होती जा रही है। 2019 की संभावनाएं भी क्षीण होती नजर आने लगी हैं। जब से हरीश रावत पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सीडब्ल्यूसी के सदस्य बने हैं तभी से पार्टी का एक वर्ग उन्हें राज्य के बजाय देश के नेता का ताज पहनाकर प्रदेश की राजनीति से दूर करने का प्रयास कर रहा है। स्थानीय नगर निकाय चुनावों में हरीश रावत समर्थकों को टिकटों में वरीयता न देना इसका एक उदाहरण मात्र है। हल्द्वानी से नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश अपने पुत्र सुमित हृदयेश को जिस तरह से नगर निगम में पार्टी का प्रत्याशी बनाने में सफल रही हैं, इससे वह यह दिखाने में भी सफल रही हैं कि प्रदेश नेतृत्व में उनका डंका बजता है। हालांकि इसके लिए पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की तरफ से विरोध की कोई सुगबुगाहट नहीं है। लेकिन कहा जा रहा है कि अंदर खाने पार्टी में भीतरघात ज्वालामुखी की तरह लावा बन चुका है। अब तक नैनीताल लोकसभा सीट के टिकट को लेकर हरीश रावत और इंदिरा हृदयेश में जुबानी जंग चल रही थी। यह जंग बूथ लेवल तक कितना गुल खिलाएगी यह तो आने वाले 20 नवंबर को ही तब पता चलेगा जब वोटों की गिनती होगी। कांग्रेस हल्द्वानी नगर निगम चुनाव को हल्के में ले रही है। वह भाजपा के मेयर डॉ ़ जोगेंद्र रौतेला को जितना कमजोर मानकर चल रही है इतने वह हैं नहीं। पिछले वर्ष विधानसभा चुनाव में इंदिरा हृदयेश के सामने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े डॉ जोगेंद्र रौतेला ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी। रौतेला एक बार फिर इंदिरा हृदयेश के पुत्र सुमित हृदयेश के सामने कमर कस चुके हैं। बताया जा रहा है कि गत विधानसभा चुनाव में रौतेला इलेक्शन मैनेजमेंट में मार खा गए थे। इसको लेकर वह काफी अध्ययन कर चुके हैं। इस बार उनका पूरा ध्यान मैनेजमेंट पर रहेगा। हालांकि युवाओं के बीच लोकप्रिय सुमित हृदयेश पूरी ताकत संग पार्टी के भीतर और बाहर अपने विरोधियों को मनाने में जुटे हैं। पुत्र को जिताने की बागड़ोर मां इंदिरा हृदयेश के कंधों पर है। जो फिलहाल हरीश रावत गुट से तालमेल बिठाने की जुगत में जुटी हैं।
हरिद्वार की ही अगर बात करें तो यहां मेयर का टिकट अनिता शर्मा को दिया गया है। यह प्रीतम सिंह गुट की हैं। इसी के साथ टिकट पाने का कारण इनके पति का धनबलि होना है। हरिद्वार से जारी हुए ऑडियो क्लिपिंग में भी इस बात का जिक्र किया गया है। टिकट तय करने वाले लोग यह कहते हुए स्पष्ट सुने जा सकते हैं कि यह पैसे वाली पार्टी है। पति प्रोपर्टी डीलर हैं। वायरल हुए इस ऑडियो क्लिपिंग ने कांग्रेस की राजनीति में भूचाल ला दिया है। इसमें पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रीमत सिंह के खास सिपहसालारों की भी पोल खुलती दिख रही है।
हरिद्वार में जिन लोगों ने टिकट बांटने का काम किया उनके प्रति लोगों में आक्रोश है। यहां के कांग्रेसियों का कहना है कि पार्टी के जो पदाधिकारी तक नहीं है वह टिकट तय करने के लिए अधिकृत कैसे किए गए हैं। यहां हरीश रावत समर्थकों के टिकट काटे गए हैं जिनमें मेयर पद के अलावा शिवालिक नगर से नगर पालिका का टिकट मांग रही किरण सिंह का टिकट काटा गया। किरण सिंह की जगह महेश प्रताप राणा को टिकट दे दिया गया। हरीश रावत के खास समर्थक ब्रह्मस्वरूप ब्रह्ममचारी, पूनम भगत और वंदना गुप्ता के टिकट की पैरवी कर रहे थे। इसी के साथ अपनी दावेदारी कर रही विमला पांडे को भी टिकट नहीं दिया गया। विमला महानगर महिला कांग्रेस की अध्यक्ष हैं। उन्होंने फिलहाल टिकट वितरण में धांधली का आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दी है। इसी तरह मायापुर के ब्लॉक अध्यक्ष तरूण नैय्यर ने भी पार्टी को अलविदा कह दिया। पार्षद पति भूपेंद्र और कांग्रेस के जिला उपाध्यक्ष ने भी पार्टी छोड़ दी। कांग्रेस की महिला विंग कोर्डिनिटर वंदना गुप्ता के अनुसार पार्टी के इस फैसले से बहुत से कार्यकर्ता अचंभित हैं। ऐसे लोगों को टिकट दिए जा रहे हैं जिन्हें शहर तो क्या मोहल्ले के लोग नहीं जानते। पार्टी हम भी छोड़ सकते थे लेकिन हम पार्टी के अंदर रहकर ही विरोध करेंगे। गुप्ता यह भी कहती हैं कि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के समर्थकों के टिकट सिर्फ इस बात पर काट देना कि उनका नाम एक व्यक्ति विशेष के साथ जुड़ा हुआ है, यह कहां का न्याय है। पार्टी के द्वारा नगर निगम चुनावों को सिर्फ एक गुट तक जोड़ देना उचित नहीं है। हरीश रावत को टिकट वितरण में वरीयता देनी चाहिए थी। उनकी उपेक्षा हुई है। जो गलत है।
रुद्रपुर में कांग्रेस की स्थिति सबसे ज्यादा हास्यापद लग रही है। यह सीट अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। यहां कांग्रेस ने एक ऐसे व्यक्ति नंदलाल को मेयर का टिकट दिया जा जो सिर्फ 6 माह पहले ही कांग्रेस में शामिल हुआ। जबकि यहां पार्टी के कई संभावित उम्मीदवार ऐसे हैं जो वर्षों से चुनाव की तैयारी कर रहे थे। इनमें ममता रानी का नाम प्रमुखता से है। ममता रुद्रपुर से पिछला मेयर का चुनाव पार्टी के चुनाव चिÐ पर लड़ी थीं। भाजपा की सोनी कोली से कुछ ही वोटों से हारी ममता ने पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
फिलहाल उन्होंने निर्दलीय के तौर पर अपना नामांकन दाखिल कर दिया है। इसके अलावा रुद्रपुर नगर निगम में मेयर पद के लिए कांग्रेस के जिला महामंत्री चंद्र रोशन कोली, अजीत शाह परिमल राय आदि दावेदारी कर रहे थे। यह सभी पार्टी प्रत्याशी के विरोध में मुखर हैं। ममता रानी की मानें तो पार्टी में कुछ ऐसे लोगों की चल रही जो सिर्फ अपने समर्थकों को टिकट दिलवा रहे हैं। ऐसे में मजबूत उम्मीदवारों को दरकिनार कर दिया जा रहा है।
काशीपुर में कांग्रेस ने मुक्ता सिंह को मेयर का टिकट दिया है। जिसका पार्टी के लोग विरोध कर रहे हैं। मुक्ता सिंह को नेता प्रतिपक्ष और हल्द्वानी विधायक इंदिरा हृदयेश का खास माना जाता है। मुक्ता  कुछ दिन पहले ही एक मामले को लेकर खासा विवादास्पद रही हैं। इनकी पुत्र वधू ने उन पर दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया था। जिसको पार्टी के कुछ लोग हथियार बनाकर मुक्ता सिंह को महिला विरोधी कह रहे हैं जबकि पार्टी के कार्यकर्ताओं की पहली पसंद इंदुमान बताई जा रही हैं।
अल्मोड़ा नगर पालिका चुनाव में पार्टी में एक बार फिर निवर्तमान चेयरमैन प्रकाश चंद्र जोशी पर दांव खेला गया है। लेकिन कांग्रेस का यह दांव उल्टा पड़ता नजर आ रहा है। यहां प्रकाश चंद जोशी के खिलाफ कई नेताओं ने शंखनाद कर दिया है। पार्टी अध्यक्ष पर आरोप लग रहे हैं कि पूर्व में जिलाध्यक्ष की तरह एक बार फिर उन्होंने अपने ही गुट के नेता को टिकट थमा दिया है। जबकि हरीश रावत के गुट से यहां पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता एवं पूर्व दर्जा राज्यमंत्री केवल सती को टिकट का दावेदार माना जा रहा था। इसी के साथ त्रिलोचन जोशी की भी पालिका अध्यक्ष टिकट के लिए मजबूत दावेदारी थी। लेकिन इन सबको दरकिनार कर दिया गया। जिसका परिणाम यह निकला कि केवल सती और त्रिलोचन जोशी दोनों ही निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने का खम ठोक चुके हैं। प्रदेश हाईकमान पर इस मामले में आम सहमति न बनाने के भी आरोप लग रहे हैं। पार्टी प्रत्याशी प्रकाश चंद जोशी का विरोध करने वालों में प्रदेश सचिव त्रिलोचन जोशी, पूर्व दर्जा राज्यमंत्री केवल सती सहित जिला उपाध्यक्ष मनोज सनवाल और प्रदेश प्रवक्ता अमित जोशी मुख्य हैं। अमित जोशी टिकट के प्रबल दावेदार थे। जोशी युवाओं में खासे लोकप्रिय बताए जाते हैं। उधर बागेश्वर में भी कांग्रेस में बगावत हो गई है। यहां की निवर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष गीता रावल का पार्टी ने टिकट काट दिया है। गीता का टिकट काटकर महेश कांडपाल को दिया गया है। महेश कांडपाल को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह का करीबी बताया जाता है, जबकि गीता रावल हरीश रावत गुट से संबंध रखती हैं। यहां भी पार्टी में गुटबाजी हावी रही। महेश कांडपाल के बारे में कहा जा रहा है कि वह बागेश्वर के बजाय देहरादून में ही ज्यादातर समय बिताते हैं। उन्हें प्रीतम परिक्रमा के रूप में देखा जा रहा है। इसकी बदौलत ही वह पार्टी का टिकट पा गए। कांग्रेस में टिकट आवंटन मामले में सिर्फ प्रीतम सिंह और इंदिरा हृदयेश के समर्थकों को ही प्राथमिकता देने के मामले पर पार्टी की महिला प्रदेश अध्यक्ष नैनीताल की पूर्व विधायक सरिता आर्य भी खास नाराज हैं। आर्य ने हाईकमान से इसकी शिकायत करने की बात कही है। वह कहती हैं कि पार्टी के गलत फैसलों की वजह से बागेश्वर की पूर्व पालिका अध्यक्ष गीता रावल ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का  मन बना लिया है। बागेश्वर से गीता रावल के अलावा कोटद्वार से रंजना रावत, शिवालिक नगर से किरण सिंह, हरिद्वार से विमला पांडे, अल्मोड़ा से प्रीति बिष्ट भवाली से खष्टी बिष्ट, काशीपुर से इंदुमान, रुद्रपुर से ममता रानी और टिहरी से विजय लक्ष्मी थलवाल की टिकट वितरण में अनदेखी की गई है। पार्टी में समर्पित कार्यकर्ताओं की कोई वेल्यू नहीं है। निकाय चुनाव में उनकी सरासर उपेक्षा हुई है। जिसे बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इसके चलते प्रदेश की कई महिला पदाधिकारियों ने न कवेल पद से इस्तीफा दिया है, बल्कि वो निर्दलीय मैदान में कूद पड़ी हैं। जो पार्टी के लिए काफी घातक है। इसकी शिकायत वह हाईकमान से बात करेगी। आर्य का कहना है कि अगर महिलाओं को इस लायक नहीं समझा जाता तो इन ईकाइयों को भंग कर दिया जाए।

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