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Uttarakhand

रणजीत का पासा कहीं माहरा के लिए गुगली न बन जाए!

उत्तराखण्ड प्रदेश कांग्रेस में आपसी रार का नया केंद्र बिंदु नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी बन चुकी है। वरिष्ठ नेता डाॅ इंदिरा हृदयेश के निधन के चलते खाली हुए इस पद पर 10 सदस्यीय विधायक दल के भीतर भारी घमासान छिड़ चुका है। प्रदेश कांग्रेस में मुख्यतः दो गुट हैं। एक गुट की कमान पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव एवं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के हाथों में है तो दूसरा गुट प्रदेश पार्टी अध्यक्ष प्रीतम सिंह का है। डाॅ  हृदयेश और प्रीतम सिंह लंबे समय से एन्टी हरीश रावत रहे है। 2017 में प्रीतम सिंह के पार्टी अध्यक्ष बनते ही डाॅ हृदयेश डिफेक्टो सुप्रीमों की भूमिका में आ गईं थीं। रावत समर्थकों को न केवल संगठन के पदों से दूर रखा गया बल्कि कईयों को पार्टी से निलंबित करने का काम भी हृदयेश-प्रीतम जोड़ी ने किया। हरीश रावत पर 2017 के विधानसभा चुनावों की हार का ठीकरा फोड़ने और 2016 में कई वरिष्ठ पार्टी नेताओं, विधायकों के भाजपा में शामिल होने के लिए रावत को जिम्मेदार ठहराने वाले इस गुट को तब भारी झटका लगा था जब पार्टी हाईकमान ने रावत को केंद्रीय महासचिव और कांग्रेस वर्किंग कमेटी का सदस्य घोषित करा था। पार्टी के हाईपाॅवर समिति में शामिल होने और राष्ट्रीय महासचिव बनने के बाद हरीश रावत ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उन्हें पहले असम राज्य का प्रभारी बनाया गया बाद में पंजाब कांग्रेस की अंतर्कलह को रोकने की नीयत से उन्हें पंजाब की जिम्मेदारी दे दी गई। रावत इन जिम्मेदारियों के मिलते ही फुलफार्म में आ गए। उन्होंने कुछ ही समय में पूरे असम का सघन दौरान कर अपने आलोचकों को चैंकाने के साथ-साथ उत्तराखण्ड में भी अपनी सक्रियता चैगुनी कर डाली। प्रदेश संगठन से अपने समर्थकों को हाशिए में डाले जाने पर रावत ने पलटवार के बजाए अपनी रणनीति जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने और इसके बाई प्रोड्क्ट के तौर पर खुद की स्थिति मजबूत करने की बनाई।

रणजीत रावत का करण माहरा की वकालत करना हरीश कैंप को खटक गया है। पार्टी सूत्रों की माने तो सल्ट उपचुनाव के लिए पार्टी प्रत्याशी चुनने के लिए बतौर आब्जर्वर करण माहरा की रिपोर्ट काफी हद तक रणजीत रावत के पुत्र विक्रम रावत पक्ष में थी। हालांकि टिकट हरीश रावत की विश्वस्त गंगा पंचोली को ही मिला लेकिन माहरा का रणजीत रावत की तरफ झुकाव हरीश रावत को खासा अखरा। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अपने जीजा के कटु आलोचक बन चुके पार्टी अध्यक्ष रणजीत रावत का सार्वजनिक बयान माहरा को राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद दिला पायेगा या फिर मात्र कुछ माह बाद होने जा रहे विधानसभा चुनावों से पूर्व गुटबाजी पर अंकुश लगाने के इरादे से सर्वमान्य नेता माने जाने वाले गोविंद कुंजवाल को यह जिम्मेदारी सौंप दी जाएगी। एक संभावना यह भी बताई जा रही है कि पार्टी किसी को भी नेता प्रतिपक्ष बनाने से परहेज कर वर्तमान विधानसभा का आखिरी सत्र यूं ही निकल जाने दे ताकि पहले से ही खेमेबाजी से ग्रस्त संगठन को एक नई उलझन से बचाया जा सके।

 

राजनीति में बने रहने की प्रासंगिकता का हर दांव समझने वाले रावत की यह रणनीति खासी कामयाब रही। एक तरफ पहले असम फिर पंजाब में बतौर एक्टिव महासचिव वे सुर्खियों में छाए रहे तो दूसरी तरफ उत्तराखण्ड का सघन दौरा कर, समय-समय पर कभी आम पार्टी तो कभी पहाड़ी व्यंजन पार्टी का आयोजन कर वे आम उत्तराखण्डी संग लगातार संवाद करते रहे। राजनीति के माहिर खिलाड़ी ने सही समय आने पर राज्य विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सीएम चेहरा घोषित किए जाने की मांग पार्टी नेतृत्व से कर डाली। इंदिरा-प्रीतम गुट ने रावत की मांग को सिरे से नकारते हुए सामुहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने पर जोर दिया तो रावत ने पीछे हटने के बजाए इस बात को मुद्दा बना डाला। पार्टी सूत्रों की माने तो रावत की एग्रिसिव पोजिनिशिंग से घबरा हृदयेश-प्रीतम गुट ने केंद्रीय प्रभारी देवेंद्र यादव की शरण ली। यादव खुलकर कई बार सामुहिक नेतृत्व में चुनाव लड़वाए जाने की वकालत कर चुके हैं लेकिन रावत अपनी बात पर अड़ गए हैं। पार्टी की वरिष्ठ नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डाॅ  हृदयेश की अकस्मात मृत्यु बाद अब प्रदेश संगठन में समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। प्रीतम सिंह अपने मुख्य रणनीतिकार की मृत्यु बाद खासे कमजोर पड़ चुके हैं। जानकारों की माने तो अब उनके रणनीतिकार की भूमिका कभी रावत के खास सहयोगी और अब कटु आलोचक बन चुके पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष रणजीत रावत निभा रहे हैं। रणजीत रावत ने अपने राजनीतिक गुरु को घेरने की नियत से पहला पासा नेता प्रतिपक्ष की खाली हो चुकी कुर्सी पर रानीखेत से विधायक एवं विधायक दल के उपनेता करण माहरा को बनाए जाने संबंधी बयान देकर फैंक दिया है। माहरा हरीश रावत के साले हैं। माहरा ने 2017 में नेता प्रतिपक्ष बनने के लिए खासा जोर लगाया था लेकिन विधायी अनुभव कम होने एवं विधायक दल में इंदिरा हृदयेश और गोविंद सिंह कुंजवाल सरीखे अनुभवी नेताओं की उपस्थिति के चलते उनकी दावेदारी चली नहीं और इंदिरा हृदयेश नेता प्रतिपक्ष चुन ली गईं। करण माहरा को इस बात का भारी मलाल बताया जाता है कि तब हरीश रावत ने उनकी दावेदारी को समर्थन नहीं दिया। कहा यह भी जाता है कि रावत अपने करीबी एवं विश्वस्त सहयोगी गोविंद सिंह कुंजवाल को नेता प्रतिपक्ष बनाना चाहते थे लेकिन कुंजवाल तैयार नहीं हुए। इसके बाद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की मंत्रणा बाद इंदिरा हृदयेश का चयन किया गया। करण माहरा के करीबियों का मानना है कि हरीश रावत पूरे प्रकरण पर न्यूट्रल रहे। यदि वे सक्रिय रहते तो माहरा समर्थकों के अनुसार युवा नेतृत्व को विधान दल की कमान मिल सकती थी।

 

अब एक बार फिर से हरीश रावत धर्मसंकट में बताए जा रहे हैं। करण माहरा कैंप ने इंदिरा हृदयेश के स्थान पर उपनेता प्रतिपक्ष को नेता प्रतिपक्ष बनाने के लिए जोर आजमाईश शुरू कर दी है। रावत के एक विश्वस्त की माने तो इस बार भी वे न्यूट्रल भूमिका निभाने का मन बना चुके थे लेकिन रणजीत रावत का करण माहरा की वकालत करना हरीश कैंप को खटक गया है। पार्टी सूत्रों की माने तो सल्ट उपचुनाव के लिए पार्टी प्रत्याशी चुनने के लिए बतौर आब्जर्वर करण माहरा की रिपोर्ट काफी हद तक रणजीत रावत के पुत्र विक्रम रावत पक्ष में थी। हालांकि टिकट हरीश रावत की विश्वस्त गंगा पंचोली को ही मिला लेकिन माहरा का रणजीत रावत की तरफ झुकाव हरीश रावत को खासा अखरा। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अपने जीजा के कटु आलोचक बन चुके पार्टी अध्यक्ष रणजीत रावत का सार्वजनिक बयान माहरा को राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद दिला पायेगा या फिर मात्र कुछ माह बाद होने जा रहे विधानसभा चुनावों से पूर्व गुटबाजी पर अंकुश लगाने के इरादे से सर्वमान्य नेता माने जाने वाले गोविंद कुंजवाल को यह जिम्मेदारी सौंप दी जाएगी। एक संभावना यह भी बताई जा रही है कि पार्टी किसी को भी नेता प्रतिपक्ष बनाने से परहेज कर वर्तमान विधानसभा का आखिरी सत्र यूं ही निकल जाने दे ताकि पहले से ही खेमेबाजी से ग्रस्त संगठन को एक नई उलझन से बचाया जा सके।

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