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Uttarakhand

श्राइन बोर्ड पर उठे सवाल

जसपाल नेगी
इस साल नवम्बर माह के अंत में गढ़वाल मंडल स्थित सभी चारधामों के कपाट ‘निर्विवाद’ ढंग से बंद हुए तो हर किसी को संतोष हुआ। ‘निर्विवाद’ इसलिए की विगत कई वर्षों से चार धाम यात्रा में किसी न किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न होना, आम बात सी हो गई थी, जिससे इन यात्राओं को लेकर देशव्यापी आलोचनाओं का दौर शुरू होता रहा है। यह व्यवधान चाहे प्राकृतिक आपदाओं को लेकर रहा हो, अथवा सरकारी बदइंतजामियों को लेकर रहा हो, एक तरह से कहा जाए तो सरकारें किसी बड़ी ‘घटना’ की ताक में बैठकर ‘मरहम’ लगाने की तत्परता को लेकर खूब ‘राजनीतिक’ रोटियां सेंकने का काम करती हंै। लेकिन यह शुक्र है कि बरसात से ठीक पहले शुरू होने वाली इन यात्राओं में इस साल कोई बड़ा ‘झमेला’ सामने नहीं आया। हालांकि यात्राकाल के दौरान काफी लोग काल- कलवित भी हुए, जिसका अफसोस हमेशा रहेगा। इन घटनाओं को रोकने के लिए सरकारी प्रयास भी नदारद होना कष्टप्रद है। आकड़ों के मुताबिक यात्रा के दौरान 91 यात्रियों को विभिन्न कारणों से काल का ग्रास बनना पड़ा। इन सभी मौतों के पीछे ‘हार्टअटैक’ बड़ा कारण बताया जा रहा है। जिसमें 55 यात्री केदारनाथ, 17 यात्री यमुनोत्री, बद्रीनाथ और गंगोत्री में 6-6 यात्री तथा हेमकुंड में 7 यात्रियों की असामयिक मौत हो गई, अच्छी मेडिकल सुविधाओं का रोना हमेशा रोया जाता है। अगर विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती हुई होती, तो ये आंकड़ा गुणात्मक रूप से कम भी हो सकता था। फिर भी ईश्वर का धन्यवाद है कि यह आंकड़ा यहीं तक सीमित रहा है।
उत्तराखण्ड सरकार वैष्णो देवी की तर्ज पर श्राइन बोर्ड की बात तो
कर रही है, लेकिन चारधाम में श्रद्धालुओं की सुविधाओं के प्रति
ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है। इस साल चारधाम में 91 तीर्थयात्री
असमय काल-कवलित हुए। ज्यादातर की मृत्यु का कारण हार्ट अटैक
होना बताया गया। एक तरफ तीर्थ स्थलों पर सुविधाओं का अभाव है,
तो दूसरी तरफ श्राइन बोर्ड से स्थानीय लोगों के हक-हकूक छीने जाने और
परंपराओं को ठेस पहुंचने की आशंका के बीच जन आक्रोश भड़क उठा है
मध्य हिमालय में स्थित उत्तराखण्ड की भौगोलिक बनावट से शायद ही कोई अपरिचित होगा, फिर इन पौराणिक तीर्थस्थलों की स्थिति कितनी संवेदनशील है, जहां शंख ध्वनि पर भी प्रतिबंध है। थोड़ी हलचल होने से भी बड़ी-बड़ी प्राकृतिक आपदा का कहर ढह सकता है। फिर भी इनके लिए राज्य सरकार के पास अभी तक कोई ‘विजन’ है ही नहीं। सरकार में बैठे लोगों में ऐसे स्थानों पर भारी मशीनों की इजाजत देने की जल्दीबाजी दिखती है। आमतौर जितने भी हाइड्रो पावर-प्रोजेक्ट संचालित किए जा रहे हैं, वे इन्हीं तीर्थस्थलों के निकटवर्ती क्षेत्रों में हैं। जिससे यहां खतरे की स्थिति किसी भी समय उत्पन्न हो सकती है। कई बार घटनाएं घटने के बाद भी सरकार नहीं चेतती।
इस बार मौसम की अनुकूलताओं ने हौसला बढ़ाया जरूर जिसका सुखद अहसास यात्रियों में भी दिखा। इस समय रिकाॅर्ड तोड़ यात्रियों नें चारों धामों के दर्शन किए। इस बार 37,64,185 यात्री चारधामों में पहुंचे। बदरीनाथ में 12,42,546, केदारनाथ 10,00821, यमुनोत्री 9,93,692 तथा गंगोत्री के दर्शनार्थ 5,27,926 भक्तगण पहुंचे। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केदारनाथ में बिताए गए क्षणों को मिली मीडिया कवरेज ने 2013 में आई प्राकृतिक आपदा की गहरी चोट पर महरम लगाने का काम किया। प्रधानमंत्री जिस आत्मविश्वास के साथ केदारनाथ में विचरण और अपनी आध्यात्मिक क्रियाओं का संपादन कर रहे थे उससे बाबा केदारनाथ और आस-पास के तीर्थस्थलों के दर्शन की लालसा को जगाने में मदद मिली। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री की इस आध्यात्मिक यात्रा का असर पूरे देश पर सकारात्मक रूप से पड़ा है, जिससे यात्रियों की संख्या में भी गुणोत्तर वृद्वि हुई है। उत्तराखण्ड की राज्यपाल महामहिम बेबी रानी मौर्या, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, मंत्रिमंडल के सदस्यों के आवागमन से निश्चित रूप से आमलोगों में बदरी-केदार के दर्शनों की लालसा और विश्वास जगा। महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी, थल सेना प्रमुख बिपिन रावत, उद्योगपति मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी जैसे महानुभावों के आगमन से चारधाम गुलजार रहा, जिससे आमलोगों में चारधाम यात्रा की सहजता के प्रति विश्वास बढ़ा। निश्चित रूप से श्रृद्धालुओं की उमड.ी भीड. इस बात का प्रमाण प्रस्तुत कर रही थी।
17 नवंबर को भगवान बदरी विशाल के कपाट बंद होने के समय लगभग 10,000 से अधिक लोगों की भीड़ रही जो कि अपने आप में बड़ा रिकाॅर्ड है। सुबह 3ः30 बजे से बदरीनाथ के कपाट बंद होने की प्रक्रिया शुरू हो गई। भगवान का अभिषेक कर प्रातः 7ः00 बजे का पुष्प  शृंगार किया गया। सुबह 8 बजे से भक्तों ने बदरी विशाल के दर्शन किए। 9ः30 पर भगवान को बाल भोग लगाया गया। 12 बजे बदरीनाथ मंदिर के सिंह द्वार पर बदरी-केदार मंदिर समिति द्वारा भगवान की स्तुति की गई। दोपहर 3ः30 बजे स्त्री वेष धारित रावल ईश्वरी नम्बूदरी ने मां लक्ष्मी को भगवान के सानिध्य में रखा। चार बजे कुबेर, गरुड, और उद्धव की विग्रह डोली को शीतकाल की पूजा  के लिए बदरीश पंचायत से निवेदन कर सजाया गया। 4ः30 बजे पर भारत के अंतिम गांव माणा में अविवाहित कन्याओं द्वारा एक दिन में बुनी ऊन की कंबल को भगवान को भेंट किया गया। इसे रावल ईश्वरी प्रसाद नम्बूरदरी द्वारा घी में लपेटकर भगवान को ओढ़ाया गया।
14 नवम्बर को यमुनोत्री धाम के कपाट बंद कर दिए गए, यमुनोत्री धाम, चारधाम यात्रा का पहला पड़ाव है। यमुना के शीतकालीन प्रवास खरसाली में शीतकालीन यात्रा का वैदिक मंत्रोच्चार एवं पूजा-अर्चना के बाद बतौर मुख्य अतिथि उत्तराखण्ड चारधाम विकास परिषद के उपाध्यक्ष शिवप्रसाद मंमगाईं ने झंडी दिखाकर शुभारंभ किया। 21 नवंबर को द्वितीय केदार भगवान मदमहेश्वर मंदिर के कपाट सुबह 8ः30 बजे वैदिक मंत्रोच्चार व विधि-विधान के साथ बंद कर दिए गए। परम्परा के अनुसार रीति-रिवाज और मंत्रोच्चार के साथ सुबह साढे़ तीन बजे पूजा-अर्चना के बाद भगवान का रुद्राभिषेक किया गया। अब भगवान की छह महीने ऊखीमठ के ओंकेश्वर मंदिर में पूजा की जाएगी। राज्य की सबसे प्रसिद्ध यात्राओं में चारधाम यात्रा देश- विदेश के करोड़ों हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। हर साल तीर्थयात्री-भक्तजनों को इसका इंतजार रहता है और वे बड़ी तादात में यहां चारों धाम के दर्शन-भ्रमण का लाभ लेते हैं। किंतु उत्तराखण्ड के आम जनमानस के लिए यह महज आस्था-विश्वास तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां इसका सीधा सम्बंध स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी है। रोजगार और समृद्धि के नए अवसरों से भी है। अगर इस यात्रा के महत्व को ठीक-ठाक समझा जाता तो इससे आमलोगोें के साथ-साथ राज्य सरकार को भी इससे सीधा फायदा मिलता। इस दिशा में सरकार का कोई ‘विजन’ न होने के कारण इस महत्वपूर्ण यात्रा का लाभ न तो सरकार के राजस्व में बढ़ोतरी के लिए हुआ और न ही यहां के आमलोगों को ही बल्कि इसके विपरीत हजारों-लाखों यात्रियों द्वारा प्रयोग जाने वाले महंगे और लग्जरी वाहनों से निकलने वाले धुएं से ‘हिमालय’ की स्वच्छ आबोहवा को प्रदूषित किया जाता है। साथ में पाॅलीथीन जैसे तमाम अजैविक कूडे़ को हिमालय में डालकर यहां की वनस्पति को नष्ट करने के अलावा कुछ भी नहीं होता है। कुछ सम्पन्न लोग छुट्टियां  बिताने के लिए यहां की शान्त वादियों को चुनते हैं, जहां वे अपनी मौज-मस्ती के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों को क्षति पहुंचाते हैं, जिससे हिमालय की शांत वादियों को हानि ही उठानी पड़ती है। सरकार की अस्पष्ट एवं तटस्थता नीति के कारण अभी तक कोई ठोस नीति नहीं बनी है। जिससे न तो यात्रियों को ठीक ढंग की व्यवस्था मिल पाती है,न ही इसका लाभ राज्य को मिल पाता है। हालांकि यात्रा से सीधा लाभ लेने वाले मुट्ठीभर लोग सीमित और बड़े व्यवसायी ही हैं, जो इस क्षेत्र में अपने ही संसाधनों द्वारा बड़े-बड़े होटल, रेस्टोरेंट और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान विकसित किए हुए हैं, जिसका मुनाफा भी उन्ही लोगों तक सीमित है। आमलोगों के लिए अभी यह फायदे का सौदा नहीं बन पाया।
अब सरकार श्राइन बोर्ड के गठन की बात कर चुकी है। राज्य कैबिनैट ने इस पर मुहर भी लगा दी है। कहा जा रहा है कि इस संस्था का निर्माण ‘मां वैष्णों देवी’ के रख-रखाव के लिए गठित श्राइन बोर्ड की तर्ज पर होगा, किंतु ये बात समझ से परे है कि आखिर इससे क्या हासिल होने वाला है? इस हाई-प्रोफाइल कमेटी का हस्तक्षेप सीधे मंदिर से जुड़ी हुई चीजों से है, जिसके ‘प्रबंधन’ को लेकर आज तक किसी को भी कोई शिकायत नहीं रही। असल में बडा कारण सरकार की ‘नीयत’ को लेकर है। जानकारों के मुताबिक श्रद्धालुओं के विश्वास में वृद्वि के साथ-साथ दान-दक्षिणा की बढ़ी राशि को लेकर सरकार के लालच और नीयत में बदलाव आया है। लेकिन सरकार भूल गई कि इस चिर-विश्वास के निर्माण में परंपराओं का ही बड़ा योगदान है। इसीलिए सरकार ऐसा काम न करे, जिससे स्थानीय हक-हकूक धारियों व स्थानीय मान्यताओं को ठेस पहुंचे। मंदिरों के रख-रखाव एवं सौंदर्यीकरण में सरकार आमतौर से सहयोग करती रही है। इसलिए उसे चाहिए कि चारधाम यात्रा मार्गों को सुसज्जित किया जाए, सड़क, बिजली, पानी, स्वच्छता की व्यवस्था में अहम भूमिका निर्वहन करे। यात्रियों को आने वाली परेशानियों एवं उनके समाधान के लिए एक पारदर्शी ‘मैकेनिज्म’ निर्माण हो, यात्रा मार्गों के आस-पास पर्यटन स्थलों को सही से चिन्हित किया जाए जिससे कई युवाओं को रोजगार मुहैय्या किया जा सके। जैसे कि बदरीनाथ-केदारनाथ समिति में बदरीनाथ और केदारनाथ धाम को साफ सुथरा रखने के लिए अगले वित्तीय वर्ष में बजट में प्रावधान का निर्णय लिया।
बदरीनाथ में जेपी ग्रुप के सहयोग से कूड़ा निस्तारण प्लांट लगेगा तो केदारधाम को प्लास्टिक फ्री किया जाएगा। बाबा केदार धाम के दर्शनों को आकर्षक बनाने के लिए सरकार प्राचीन मूर्तियों का ओपन म्युजियम बनाने जा रही है। इस पर औपचारिक सहमति बन चुकी है। उधर केंद्रीय संस्कृति एवं संग्रहालय सचिव राघवेंद्र सिंह ने अफसरों के साथ केदारनाथ का निरीक्षण किया। केदारनाथ के आगे-पीछे ओपन म्युजियम बनाने की बात कही है। इसमें प्राचीन मूर्तियों को लगाया जाएगा। अतः चारधाम यात्राओं के महत्व को समझते हुए, उससे उनके विकास के लिए काम किए जाएं ताकि अधिक से अधिक यात्री मंदिरों में दर्शनार्थ आ सकें।

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