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राज्य में कई ऐसे अवसर आए जब मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठे। मुख्यमंत्री के पार्टी संगठन और मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ ताल-मेल न बिठा पाने के कारण नेतृत्व परिवर्तन की गूंज भी सुनाई दी

नेतृत्व क्षमता के लिहाज से मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की सरकार के लिए वर्ष 2018 कोई खास नहीं कहा जा सकता है। साल भर सरकार के भीतर आपसी अंतर्द्वंद देखने को मिले तो वहीं भाजपा संगठन और सरकार के बीच भी कई मामलों में अंतर्विरोध सामने आए। शायद यह पहली बार हुआ कि सरकार औेर संगठन के बीच बयानों को लेकर प्रदेश की राजनीति गरमाती रही। इसके अलावा राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की गूंज पूरे साल सुनने को मिली। दरअसल, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की नेतृत्व क्षमता पर सवाल तभी से उठने लगे थे जब उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का दावा तो किया, लेकिन इस पर टिके नहीं रह सके।

सत्ता संभालते ही सरकार ने सदन में एनएच 74 के भूमि मुआवजे घोटाले पर सीबीआई जांच करवाये जाने का दावा किया। लेकिन केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के एक पत्र के सामने आने के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई। हालांकि सरकार ने इस पूरे प्रकरण में एसआईटी की जांच करवाने के आदेश दिये और इसके बाद तकरीबन दो दर्जन अधिकारियों और कर्मचारियां के साथ- साथ कई किसानों को जेल की हवा तक खानी पड़ी। इस मामले में भी पहली बार राज्य में दो आईएएस अधिकारियों पंकज पांडे ओैर चंद्रेश यादव को निलंबित होना पड़ा। इनमें चंद्रेश यादव का भारतीय प्रशासनिक सर्विस के नियमों के तहत निलंबन वापस लेना पड़ा, लेकिन पंकज पांडे अभी तक निलम्बित ही हैं। एनएच-74 भूमि घोटाले ही नहीं, बल्कि कई अन्य मसलों पर भी मुख्यमंत्री की क्षमता को लेकर सवाल उठते रहे हैं।


वर्ष 2018 में उत्तराखण्ड की राजनीति में स्टिंग का जिन्न भी खूब उछला। समाचार प्लस चैनल के सीईओ उमेश कुमार पर ब्लैकमेंलिंग के आरोप में हुई त्वरित कार्यवाही से सरकार और प्रशासन की ताकत तो देखने को मिली, लेकिन इस मामले में न्यायालयों में सरकार की जो भद्द पिटी उससे सरकार के होमवर्क पर सवाल उठे। उमेश कुमार को हर बार न्यायालय से राहत मिलती रही और सरकार को झटका ही मिला। आखिरकार सरकार को उमेश कुमार के खिलाफ कार्यवाही से हाथ पीछे करने पड़े, जबकि अभी राज्य में स्टिंग का प्रकरण खत्म नहीं हुआ है।

सरकार के भीतर आपसी मतभेद साल भर देखने को मिले हैं। मुख्यमंत्री के सहयोगी मंत्रियों के साथ मतभेद की खबरें सामने आती रहीं। सरकार के बयानों और मंत्रियों के बयानों में अंतर से साफ हो गया कि ‘सरकार के भीतर सरकार’ का माहौल बना हुआ है। यहां तक कि विधायकों द्वारा अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा तक खोला गया। खानपुर के विधायक कुंवर प्रणव चैम्पियन ने मुख्यमंत्री के खिलाफ भाजपा केंद्रीय नेतृत्व तक शिकायत की। आरएसएस द्वारा भी सरकार को प्रथमिकता तय करने के लिए सुझाव देने पड़े। मुख्यमंत्री की नेतृत्व क्षमता पर उनके सहयोगियों ने ही सवाल उठाए। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत सेंटर आवंटन एवं युवाओं को प्रशिक्षित करने के कार्य में भ्रष्टाचार का मामला सामने आया तो खुद राज्य के कद्दावर मंत्री हरक सिंह रावत ने एक तरह से इसके लिए सीएम की ओर इशारा किया। उन्होंने खुलकर कहा कि योजना में जो भी भ्रष्टाचार हुआ उस समय यह विभाग मुख्यमंत्री के पास था।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत पूरे वर्ष कई तरह के विवादों से घिरे रहे। शिक्षिका उत्तरा पंत बहुगुणा प्रकरण में मुख्यमंत्री की छवि और कार्यशैली पर तमाम सवाल खड़े हुए। यह प्रकरण राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मीडिया में खूब चर्चाओं में रहा। सहारनपुर को उत्तराखण्ड राज्य में शामिल करने पर मुख्यमंत्री के बयान की खासी आलोचना हुई। पर्यावरणविद् जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी सानंद का अनशन सरकार समय पर नहीं तुड़वा पाई। नतीजा यह हुआ कि संत की असमय मृत्यु हो गई। इस मामले में मुख्यमंत्री और सरकार पर निरंकुशता के आरोप लगे। पिछला वर्ष 2018 राज्य में नौकरशाही के बेलगाम होने के लिए भी जाना जायेगा। कई मामलां में राज्य के नौकरशाहों की कार्यशैली पर सवाल उठे हैं। मुख्यमंत्री पर नौकरशाही के आगे नतमस्तक होने के आरोप लगते रहे। हाईकोर्ट के अतिक्रमण हटाओ आदेश के बाद जिस तरह से सरकारी मशीनरी की कार्यवाही से जनता में बड़ी बेचैनी सामने आई इसके पीछे भी राज्य के नौकरशहों की कार्यशैली को ही जिम्मेदार बताया गया। तीन बड़े नौकरशाहों पर हाईकोर्ट द्वारा अवमानना के नोटिस तक जारी हुए। इससे साफ पता चलता है कि राज्य में नौकरशाही किस हद तक लापरवाह बनी हुई है। बावजूद इसके मुख्यमंत्री पर नौकरशाहों का पक्ष लेने के आरोप लगते रहे। खुद विधायकों और मंत्रियों की नाराजगी भी सामने आई कि मुख्यमंत्री नौकरशाहों का पक्ष ले रहे हैं।

गैरसैंण अवस्थापना परिषद की बैठक में राज्य के नौकरशहों ने आना उचित नहीं समझा। जबकि यह बैठक स्वयं विधानसभा अध्यक्ष द्वारा विधानसभा में बुलाई गई थी। देहरादून में बुलाई गई बैठक में भी वरिष्ठ नौकरशाहों ने आने से परहेज किया। इस पर विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल ने खासा रोष जाहिर किया और बैठक में नहीं पहुंचने वाले अधिकारियों को कारण बाताओ नोटिस देने की बात कही, जबकि मुख्यमंत्री अधिकारियों को सूचना नहीं मिलने की बात कहकर एक तरह से नौकरशाहों का पक्ष लेते दिखाई दिये।

हालांकि 2018 का साल प्रदेश में निवेश के लिए माहौल बनाने के लिए भी जाना जायेगा। सरकार द्वारा राज्य में निवेश बढ़ाने के लिए इंवेस्टर समिट का आयोजन किया गया जिसमें उम्मीद से बढ़कर डेढ़ लाख करोड़ के निवेश की बातें सामने आई। सरकार को तकरीबन 50 हजार करोड़ के निवेश के प्रस्ताव भी मिले। लेकिन इन सब के बीच सरकार का वित्तीय प्रबंधन बेहद लचर रहा। खुले बाजार से कई सौ करोड़ का कर्ज सरकार द्वारा लिया गया। सरकार के पोने दो वर्ष के कार्यकाल में ही 2 हजार करोड़ का कर्ज खुले बाजार से लिया जा चुका है जिसमें से अधिकतर कर्मचारियों को वेतन देने के लिए लिया गया है। अभी भी राज्य के कई निगमों में वेतन के लाले पड़े हुए हैं।
साल के अंत में मुख्यमंत्री ने पार्टी के कुछ नेताओं को दायित्व बांटे, लेकिन मंत्रियों के खाली दो पदों को भरने में वे अभी भी असफल हैं। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि खुद मुख्यमंत्री के क्षेत्र में डोईवाला में हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना कर धड़ल्ले से अवैध खनन हुआ।

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