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उत्तराखण्ड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की परीक्षा पर ही प्रश्न खड़े हो गए हैं। सवाल पेपर लीक होने का हो, पाठ्यक्रम से बाहर के प्रश्न हो, प्रश्नों का गुगल से अनुवाद करवाने या परीक्षा के दौरान नकल कराने का सभी आयोग के अंदर पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं। आयोग अपनी जवाबदेही दूसरों पर थोप पाक-साफ होने का प्रपंच करता नजर आ रहा है। आयोग में महत्वपूर्ण पदों पर आज भी वही अधिकारी जमे हैं जो भर्ती परीक्षाओं की पवित्रता को बरकरार नहीं रख पाएं। सवाल यह है कि इन धांधलियों के पीछे सिर्फ छोटी मछलियों पर ही सरकार हाथ डालेगी या बड़े-बड़े मगरमच्छों तक भी पहुंचेगी?

 

उत्तराखण्ड इस समय गंभीर बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा है। बेरोजगार युवा नौकरी के लिए भटक रहे हैं लेकिन सरकार के दावे इसके विपरीत हैं। जहां सरकार का दावा है कि वह बेरोजगार युवाओं को रोजगार दिलाने के लिए भरपूर प्रयास कर रही है वहीं आंकड़े सरकार के इन दावों की तस्दीक करते नहीं दिखाई देते। वर्तमान में प्रदेश का बेरोजगारी दर 8. 7 फीसदी है जो राष्ट्रीय और 7 .8 से भी ज्यादा है। अप्रैल 2016 में बेरोजगारी दर 1 .3 फीसदी थी। 2016 से तुलना करें तो वर्तमान में बेरोजगारी दर लगभग 6 .5 गुना बढ़ी है। राज्य का युवा अभी भी रोजगार के नाम पर सरकारी नौकरी को ही प्राथमिकता देता रहा है। लेकिन सरकारी भर्ती एजेंसियां ही प्रदेश के युवाओं के हितों पर कुठाराघात करने पर तुली है। उत्तराखण्ड लोक सेवा आयोग जिसके कंधों पर डिप्टी कलेक्टर, पुलिस उपाधीक्षक सहित अधिकारी स्तर के पदों को भरने की जिम्मेदारी है वह अपने तय समय से काफी पीछे चल रहा है। जिसके चलते अधिकारी बनने का सपना संजोए हजारों युवा अधिकतम उम्र की सीमा पार अपने वैध अवसरों से वंचित हो गए। लोक सेवा आयोग उत्तराखण्ड के माध्यम से होने वाली भर्तियों में एक्जीक्यूटिव सेवाओं के अतिरिक्त अधीनस्थ स्तर के पदों को भी सम्मिलित किया जाता था जिसमें राज्य के स्थानीय युवाओं को नुकसान होता था जिसमें दूसरे राज्यों से आने वाले अभ्यर्थियों के चलते राज्य के युवाओं के लिए अवसर सीमित हो जाते थे। इसी समस्या के निदान के लिए 2014 में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग का गठन किया गया था। उत्तराखण्ड अधीनस्थ चयन आयोग अपने गठन के समय से ही अपनी कार्यशैली के चलते हमेशा विवादों में रहा है। उत्तराखण्ड अधीनस्थ चयन आयोग द्वारा आयोजित शायद ही कोई परीक्षा रही है जो विवादों के साए में न रही हो। अपने गठन के बाद से ही इसका और विवादों का चोली-दामन का साथ रहा है। ग्राम्य विकास अधिकारी परीक्षा या लेखा परीक्षा, वन दरोगा की परीक्षा सभी विवादों के साए में रहीं जिनके चलते या तो इनके परिणाम रोक दिए गए या फिर अभ्यर्थी उच्च न्यायालय की शरण में चले गए। इसी बीच अधीनस्थ सेवा चयन आयोग द्वारा दिसंबर 2021 में स्नातक स्तर की आयोजित परीक्षा में कथित धांधली के खुलासे ने आयोग की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।


उत्तराखण्ड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की भर्ती परीक्षा में कथित फर्जीवाड़े का खुलासा करते हुए उत्तराखण्ड एसटीएफ ने 6 लोगों को गिरफ्तार किया है जिनसे 37 लाख बरामद किए गए हैं। बताया जाता है कि इस धांधली को अंजाम परीक्षा आयोजित कराने वाली कम्पनी के टेक्निकल स्टाफ, आयोग के एक पूर्व कर्मचारी कोचिंग संचालक और कुछ अभ्यर्थियों ने दिया था। अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की स्नातक स्तर परीक्षा में पेपर लीक होने के साथ जहां आयोग की साख और गिरी है वहीं नौकरी की बाट जोह रहे बेरोजगार युवाओं को बड़ा झटका लगा है। उत्तराखण्ड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने राज्य के 13 विभागों के 916 पदों के लिए परीक्षा दिसंबर 2021 में करवाई थी। परीक्षा के परिणाम घोषित होने के बाद आयोग चयनित उम्मीदवारों के दस्तावेजों के वेरिफिकेशन कर उम्मीदवारों की सूची बनाने की तैयारी में था। इस बीच कुछ बेरोजगार संगठनों के लोगों ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से परीक्षा में धांधली की शिकायत की थी। मुख्यमंत्री धामी ने इसकी जांच एसटीएफ को सौंपी थी। डीआईजी, एसटीएफ द्वारा जांच एसपी, एसटीएफ को सौंपी थी। एसटीएफ उत्तराखण्ड ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अनियमितताओं की गोपनीय जांच कर 6 अभियुक्तों को गिरफ्तार कर एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश किया। एसटीएफ द्वारा गिरफ्तार अभियुक्तों से जो जानकारी मिली है उससे पता चलता है कि अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के अंदर तक आरोपियों की पहुंच कितनी गहरी थी। मनोज जोशी जो कि पीआरडी का जवान था और अधीनस्थ सेवा चयन आयोग में तैनात था। संदिग्ध गतिविधियों के चलते उसे 2018 में बर्खास्त कर दिया गया था लेकिन अपने संपर्कों के जरिए वह आयोग में अभी भी गहरी पैठ रखता था। जिन लोगों को एसटीएफ ने गिरफ्तार किया है उनसे पूछताछ के बाद कितनी सच्चाई सामने आ पाएगी यह आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन सवाल है कि इतनी गंभीर गड़बड़ी के पीछे सिर्फ ये गिरफ्तार व्यक्ति ही हैं या फिर उनके पीछे राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र का वरद्हस्त भी है? सवाल उठने इसलिए भी लाजमी हैं कि बिना संरक्षण के आयोग के अंदर से प्रश्न पत्रों का लीक हो जाना और पैसे लेकर रामनगर के एक रिसॉर्ट में उन अभ्यर्थियों को पेपर की प्रेक्टिस करा कर उनका चयन हो जाना कोई साधारण घटना नहीं है। जिस प्रकार अब परतें उधड़ कर सामने आ रही हैं वे और भी चौंकाने वाली हैं। स्नातक स्तरीय परीक्षा में सर्वोच्च स्थान पाने वाला अभ्यर्थी एक माह पूर्व हुई इंटरमीडिएट स्तर की भर्ती परीक्षा में महज 33 प्रतिशत अंक लाया था लेकिन एक माह बाद हुई स्नातक स्तर की भर्ती परीक्षा में 89 प्रतिशत अंक लाकर परीक्षा का टॉपर बन गया। अभी तो रामनगर केंद्र का मामला प्रकाश में आया है। अगर गहराई से जांच होती है तो निश्चित है कि ऐसे कई मामलों का खुलासा हो सकता है। हालांकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मामले में सख्त रुख अपनाया है। सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री के पास अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के अलावा अन्य भर्तियों में भी धांधली की शिकायत आई है तथा मुख्यमंत्री धामी इस पर सख्त कार्रवाई कर दोषियों को बख्शने के मूड में नहीं हैं।


उत्तराखण्ड में सरकारी भर्तियों में धांधली के आरोप नए नहीं हैं। उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय में हुई नियुक्तियां हों या फिर सहकारी बैंकों में हुई चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों और ड्राइवरों की नियुक्ति सब में अपनों-अपनों को खपाने के लिए किस प्रकार नियमों को तोड़ा-मरोड़ा गया और अपने रिश्तेदारों को नियुक्तियां दे दी गई ये सर्वविदित है। सहकारी बैंकों की नियुक्ति की जांच ने स्पष्ट कर दिया है कि यह खेल कितने बड़े पैमाने पर हुआ था। जहां तक उत्तराखण्ड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग का प्रश्न है यह अपने गठन के समय से ही विवादों में रहा है। यह राजनीतिज्ञों के हितों का पोषण करने वाला आयोग ज्यादा बना रहा। 2016 में आयोजित ग्राम पंचायत विकास अधिकारी के 196 पदों के लिए आयोग ने परीक्षा कराई थी। इसमें आरोप था कि परीक्षा की ओएमआर थीट को कुछ खास अभ्यर्थियों के लिए दो सप्ताह तक एक जगह रख ओएमआर थीट में छेड़छाड़ की गई थी। इसमें पौड़ी, पिथौरागढ़ में सगे भाइयों के चयनित होने तथा ऊधमसिंह नगर के महुआडाबर से 20 से ज्यादा युवक इस परीक्षा में चुने गए थे। उस वक्त हरीश रावत सरकार में कांग्रेस के एक ताकतवार नेता की भूमिका की इस मामले में काफी चर्चा थी। हरीश रावत सरकार को उस वक्त फजीहत के चलते इसकी उच्चस्तरीय जांच के आदेश देने पड़े थे और उस वक्त आयोग के अध्यक्ष आरवीएस रावत को अपने पद से त्याग पत्र देना पड़ा था। त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस परीक्षा को ही रद्द कर दिया था। 2018 में अपर अभियंता (विद्युत) के लिए हुई भर्ती परीक्षा भी धांधली के आरोपों के चलते रद्द करनी पड़ी थी इस परीक्षा के परिणामों में खास बात यह थी कि इसमें चुने गए अधिकांश अभ्यर्थी एक ही कोचिंग संस्थान के थे। उस वक्त पेपर लीक की आशंका के चलते यह परीक्षा रद्द कर पुनः आयोजित की गई थी। आयोग द्वारा आयोजित फॉरेस्ट गार्ड भर्ती परीक्षा में भी नकल के आरोप लगे थे। आयोग द्वारा आयोजित अधिकांश भर्ती परीक्षा किसी न किसी रूप में जांच के दायरे में चल रही है।

 

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