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Uttarakhand

सम्पत्ति, संत और सियासत

हरिद्वार जिला अपने धार्मिक वजूद के साथ-साथ गंगा नदी में अवैध खनन और यहां की बेशकीमती जमीनों पर भू-माफियाओं के अवैध कब्जों को लेकर भी सुर्खियों में रहता आया है। यहां स्थापित मठों और मंदिरों की संपत्ति भी अक्सर विवादों, यहां तक कि हत्याओं का एक बड़ा कारण बन सुर्खियां बटोरती रही हैं। धर्मनगरी में हालात इतने विकट हैं कि ज्यादातर अवैध कब्जों के मामले या तो प्रकाश में नहीं आ पाते हैं या फिर उन्हें राजनीतिक हस्तक्षेप चलते दबा दिया जाता है। ऐसे ही एक मामले में न्यायालय के आदेश पर पुलिस ने सत्तारूढ़ भाजपा से जुड़े कुछ व्यक्तियों समेत 20 लोगों पर मुकदमा दर्ज किया है। यह मामला भूपतवाला स्थित गरीबदासी संत संप्रदाय से जुड़े श्री नारायण निवास आश्रम का है। जिसे फर्जी ट्रस्ट बनाकर कब्जाने में संत और सियासत की मिलीभगत सामने आई है

हरिद्वार मतलब ‘‘हरि का द्वार’’ इसका नाम सुनते ही प्रत्येक व्यक्ति के जेहन में मंदिरों की घंटियों का गुंजन और हरकी पैड़ी के तट पर मां गंगा की आरती तथा वैराग्य की शिक्षा देते मठ-मंदिर आने लगते हैं। परंतु आम आदमी को वैराग्य का पाठ पढ़ाने वाले तथा आस्था के केंद्र बिंदुु इन्हीं मठ-मंदिरों में घंटियों की आवाज के बजाए गोलियों की आवाजें सुनाई देने लगे तो इसको क्या कहेंगे? हरिद्वार में आकर कितने श्रद्धालुओं को लोक-परलोक मिला इसका तो अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, लेकिन इतना अवश्य है कि पिछले ढ़ाई दशक में दो दर्जन से अधिक साधु-संन्यासी मोहमाया की गुणा-भाग के चलते या तो बेमौत मारे गए या फिर ऐसे लापता हुए जिनको देश की तेज-तर्रार जांच एजेंसी सीबीआई भी तलाश न कर पाई। इनमें प्रमुख रूप से स्वामी रामदेव के गुरु स्वामी शंकरदेव महाराज और प्रमुख संत तथा अविभाजित अखाड़ा परिषद के तत्कालीन प्रवक्ता मोहनदास कोठारी का नाम शामिल है। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रहे नरेंद्र गिरी महाराज की संदिग्ध मौत का कारण भी संपत्ति विवाद ही माना गया। नरेंद्र गिरी के सुसाइड नोट में भी जिस विवाद का जिक्र किया गया था वह भी संपत्ति से जुड़ा हुआ सामने आया है। प्रतिष्ठा बनाए रखने के दृष्टिकोण से अखाड़े भले ही किसी भी संत की हत्या को संपत्ति के साथ न जोड़ें लेकिन वारदातों का इतिहास इसी ओर इंशारा करता है। संपत्ति विवाद में फंसे कई संतों की संपत्तियों पर लगी सरकारी सील इसकी हकीकत बयां करने के लिए काफी है। हालात इस कदर खराब हो चले हैं कि संतों की कई विवादित संपत्तियों पर रिसीवर तैनात किए गए हैं।

ताजा मामला भी गरीबदासी संत संप्रदाय से जुड़े स्वामी रामेश्वरानंद महाराज के करोड़ों रुपए की कीमत वाले श्री नारायण निवास आश्रम के विवाद से जुड़ा हुआ है। जिसमें कुछ संतों द्वारा फर्जी ट्रस्ट बनाकर आश्रम की संपत्ति हड़पने का षड्यंत्र रचा गया। जिसके चलते न्यायालय के आदेश पर दर्जनभर संतों व सत्तारूढ़ दल से जुड़े कुछ स्थानीय नेताओं सहित 20 आरोपियों के खिलाफ गत् दिनों नगर कोतवाली में मुकदमा दर्ज हुआ है।

जानकारी के अनुसार नारायण निवास आश्रम के संत स्वामी रामेश्वरानंद महाराज के ब्रह्मालीन होने के बाद खुद को शिष्य दर्शाकर फर्जी ट्रस्ट बना लेने के मामले में कोर्ट के आदेश पर पुलिस ने 20 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है जिसमें संत और भाजपा के साथ ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े कुछ नेता भी शामिल हैं। पुलिस ने भारत माता मंदिर के महंत महामंडलेश्वर सहित दर्जनों लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी सहित कई धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जांच पड़ताल शुरू कर दी है। नारायण निवास आश्रम ट्रस्ट भूपतवाला के महासचिव दीपक कुमार ने सिविल कोर्ट में एक प्रार्थना पत्र दिया जिसमें उन्होंने बताया कि आश्रम के प्रमुख स्वामी महंत रामेश्वरानंद शिष्य माता प्रेमकौर थे। आरोप है कि आश्रम में कार्यरत एक संत स्वामी अवधेशानंद सरस्वती ने संत रामेश्वरानंद की बीमारी का लाभ उठाकर एक रजिस्टर्ड वसीयत वर्ष 2019 में अपने हक में करा ली। उसके बाद स्वामी रामेशवरानंद को अवधेशानंद की नीयत पर संदेह हुआ तो उन्होंने दो माह बाद वसीयत निरस्त करा दी।

यही नहीं बल्कि संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने से बचाने के उद्देश्य से स्वामी रामेश्वरानंद ने नारायण निवास आश्रम धर्मार्थ ट्रस्ट का भी निर्माण किया। जिसे अगस्त 2019 में सब रजिस्ट्रार के यहां रजिस्टर्ड करा लिया गया। ट्रस्ट के अध्यक्ष स्वामी स्वंय थे जबकि अन्य लोग पदाधिकारी भी बनाए गए। कुछ दिनों बाद ही उनकी मृत्यु हो गई तो स्वामी अवधेशानंद ने खुद को स्वामी रामेश्वरानंद का शिष्य बताते हुए दिसंबर 2019 में एक नए ट्रस्ट का गठन कर लिया। जबकि स्वामी रामेश्वरानंद अपने जीवन काल में ही ट्रस्ट बना चुके थे। उन्होंने ट्रस्ट को भंग भी नहीं किया था। स्वामी अवधेशानंद को आश्रम का महंत भी घोषित नहीं किया गया और न ही उनके द्वारा गठित ट्रस्ट का कोई चुनाव ही कराया गया था। ऐसे में जिन संतों की मौजूदगी में अवधेशानंद स्वयं भू अध्यक्ष बने तो उनका गरीबदासी परम्परा से कोई लेना-देना नहीं है। आरोप है कि संपत्ति कब्जाने की नीयत से बनाए गए फर्जी ट्रस्ट के इस खेल में भू माफिया भी शामिल हैं।

आश्रम की संपत्ति कब्जाने को लेकर इतने बड़े पैमाने पर संतों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने से हरिद्वार के संत समाज में सुगबुगाहट का दौर जारी है। पूरे विवाद पर कोई भी संत खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। विवादित बताए जा रहे श्री नारायण आश्रम के द्वार पर एक सुरक्षाकर्मी की तैनानी कर दी गई है जो आरोपी संतों से किसी को मिलने नहीं दे रहा है।
संपत्ति, संत और सियासत की बात करें तो धर्मनगरी में अधर्म का यह पहला मामला नहीं है। पिछले ढ़ाई दशक के दौरान इस तरह की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। संतों के बीच चलने वाले संपत्ति विवाद में राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों के गठजोड़ के चलते स्थिति भयावह हो चली है। परिणाम स्वरूप धार्मिक संपत्तियों का स्थान कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स और गगनचुम्बी इमारतें ले रही हैं। पूरे धर्मनगरी में कोई स्थान ऐसा नहीं बचा है कि जहां अखाड़ों, आश्रमों के बड़े-बड़े बागों की जगह कंक्रीट के जंगल न उगा दिए गए हों। खुलेआम कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रही धार्मिक सम्पत्तियों का स्वरूप बदले जाने को लेकर सम्बंधित विभाग की चुप्पी भी सवाल खड़े कर रही है।

इन पर दर्ज हुआ मुकदमा

हरिद्वार पुलिस ने कोर्ट के आदेश पर अवधेशानंद सरस्वती निवासी नारायण निवास आश्रम भूपतवाला कलां, महामंडलेश्वर ललितानंद गिरि निवासी भारत माता मंदिर, भाजपा नेता विदित शर्मा निवासी शिव नगर भूपतवाला, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता रितेश वशिष्ठ निवासी भगीरथी नगर भूपतवाला, स्वामी कृष्णानंद, दीपतानंद निवासी अवधूत आश्रम भूपतवाला, स्वामी अवधेशरानंद निवासी भूपतवाला, महंत स्वामी सच्चीदानंद निवासी श्री विसुधानंद आश्रम बसंत गली खडखड़ी, स्वामी दिव्यानंद उर्फ दीपक निवासी दिप्तानंद गोपाल भवन रानी गली भूपतवाला, स्वामी अनुजदास उर्फ अनुज चौहान निवासी बलजीत साधना केंद्र रानी गली भूपतवाला, स्वामी हरिशानंद निवासी ज्ञान ज्योति आश्रम भगीरथी नगर भूपतवाला, स्वामी संजय ब्रह्माचारी निवासी सोनीपत हरियाणा, बेघराज निवासी बेघराज एसोसियेटस सप्त ऋषि रोड भूपतवाला, स्वामी प्रकाशानंद निवासी श्री भगवानधाम कबीर आश्रम धर्मशाला ट्रस्ट भूपतवाला, स्वामी सदानंद निवासी ज्वाला माता डेरा सिंह हरियाणा, धर्मेंद्र कुमार निवासी मुजफ्फरनगर यूपी, पवन सिंह निवासी नियामतपुर लक्सर, महंत प्रेमदास निवासी कनखल, स्वामी अंनतानंद निवासी माता रामभजन गंगा भजन आश्रम, महंत बाबा कमलदास निवासी हरिहर पुरुषोत्तम धाम हरिपुर कलां के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।

संपत्ति विवाद में संतों की हत्या
धर्मनगरी में संपत्ति को लेकर संतों की हत्या किए जाने की शुरुआत दशकों पुरानी रही है। 90 के दशक की बात करें तो साल 1991 में एक संत की हत्या से धर्मनगरी में सनसनी फैली थी। 25 अक्टूबर, 1991 को रामायण सत्संग भवन के संत राघवाचार्य आश्रम के बाहर टहल रहे थे, तभी स्कूटर सवार लोगों ने उन्हें घेर लिया। उनको गोली मारी गई और फिर चाकू से गोदकर बेरहमी से कत्ल कर दिया गया। संतों के कत्ल का यह सिलसिला यहीं से शुरू हुआ जो अभी तक बदस्तूर जारी है। 9 दिसंबर, 1993 को संत राघवाचार्य के साथी रंगाचार्य की भी ज्वालापुर में हत्या कर दी गई थी। बात करें अभी तक धर्मनगरी में हुई संतों की हत्याओं की तो चेतनदास कुटिया आश्रम में अमेरिकी साध्वी प्रेमानंद की दिसंबर 2000 में लूटपाट के बाद हत्या कर दी गई। 5 अप्रैल 2001 को बाबा सुतेंद्र बंगाली की हत्या की गई थी, वहीं 6 जून, 2001 को हरकी पैड़ी के सामने टापू में बाबा विष्णुगिरि समेत चार साधुओं की हत्या हुई। 26 जून 2001 को एक अन्य बाबा ब्रह्माानंद की हत्या हुई और इसी साल पानप देव कुटिया के बाबा ब्रह्मादास को दिनदहाड़े गोली से उड़ा दिया गया। 17 अगस्त 2002 बाबा हरियानंद, उनके शिष्य और एक अन्य संत नरेंद्र दास की भी हत्या की गई।

6 अगस्त, 2003 को संगमपुरी आश्रम के प्रख्यात संत प्रेमानंद उर्फ भोले बाबा गायब हो गए। 7 सितंबर 2003 को हत्या का खुलासा पुलिस ने किया और आरोपी गोपाल शर्मा को गिरफ्तार किया गया था। 28 दिसंबर 2004 को संत योगानंद के हत्यारों का आज तक पता नहीं चला। 15 मई 2006 को पीली कोठी के स्वामी अमृतानंद की हत्या कर संपत्ति पर सरकारी कब्जा कर लिया गया। 25 नवंबर 2006 को सुबह इंडिया टेम्पल के बाल स्वामी की गोली मारकर हत्या कर दी गई जिसमें तीन हत्यारों को पुलिस ने गिरफ्तार किया था, साजिश के तार अयोध्या से जुड़े बताए जा रहे थे, वहीं 8 फरवरी, 2008 को निरंजनी अखाड़े के 7 साधुओं को जहर देकर मार दिया गया था जिनके आरोपी आज तक नहीं पकड़े गए। 14 अप्रैल 2012 निर्वाणी अखाड़े के महंत सुधीर गिरि की रुड़की के बेलड़ा में हत्या हुई थी। 20 दिसंबर 2021 को महंत नरेंद्र गिरी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत का रहस्य खुलना बाकी है जिसकी सीबीआई जांच चल रही है।

बात अपनी-अपनी
इस विषय की पुलिस जांच होनी चाहिए। पूर्व में भी बड़े अखाड़े के मोहन दास जी का आज तक पता नहीं चला। उस समय भी त्रिवेंद्र सरकार से हमने इस विषय की सीबीआई जांच करने की मांग की थी परंतु आज तक कुछ नहीं हुआ।
देवानंद सरस्वती जी, राष्ट्रीय सचिव, जूना अखाड़ा, हरिद्वार

यह मामला मेरी संज्ञान में नहीं है। मैं काफी दिनों से हरिद्वार से बाहर हूं। आज आपने बताया है, मैं मामले की जांच करूंगा और पता करके आपसे बात करूंगा।
रविंद्र पुरी महाराज, निरंजरी अखाड़ा एवं अध्यक्ष, अखाड़ा परिषद, हरिद्वार

यह मामला चेतन ज्योति आश्रम वाले महाराज जी का है उन्हीं के अखाड़े से सम्बंध है, मैं इस मामले में कुछ नहीं बोल सकता।
रविंद्र पुरी महाराज, सचिव, महानिर्वाणी अखाड़ा एवं अध्यक्ष, अखाड़ा, परिषद

तीर्थ नगरी हरिद्वार का यह दुर्भाग्य कहा जाएगा कि यहां साधु-संतों की गुमशुदगी और आश्रमों में कब्जे होते आए हैं। कहीं न कहीं बड़े
राजनेताओं का भी इन सब में हाथ रहता है और प्रशासन भी कार्रवाई करने से बचता है।
स्वामी शिवानंद जी सरस्वती, परमाध्यक्ष मातृ सदन, कनखल हरिद्वार

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