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Uttarakhand

प्रियंका का अनूठा प्रतिरोध

त्रिवेंद्र रावत सरकार पहाड़ में पलायन रोकने के जो खोखले दावे कर रही है उसकी पोल प्रियंका असवाल ने खोल दी है। प्रियंका एक साल से राज्य के मंत्रियों और मुख्यमंत्री के चक्कर काट रही हैं कि उन्हें पहाड़ में मसाला उद्योग लगाने के लिए ऋण दिलवाएं। लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं सुनी। तंग आकर अब प्रतिरोध में प्रियंका ने स्वतत्रंता दिवस पर अपने गांव में स्वरोजगार के लिए शराब की भट्टी खोलने का फैसला किया है। इसके उद्घाटन समारोह में उन्होंने तमाम राजनेताओं से लेकर राज्यपाल तक को आमंत्रित किया है। प्रियंका के इस प्रतिरोध को जनसमर्थन मिलने लगा है

राज्य में पलायन रोकने और स्वरोजगार के लिए उद्यमिता विकास के सरकारी दावों की हकीकत यह है कि पर्वतीय क्षेत्र की एक महिला प्रियंका असवाल ने पिछले एक साल से लगातार सरकार व बैंकों के चक्कर काटने के बाद मजबूर होकर राज्यपाल को एक पत्र भेजा है। इस पत्र में उन्होंने बिंदुवार अपनी समस्या लिखी हुई है। पहले बिंदु पर प्रियंका ने लिखा है कि पिछले एक साल से अपने गांव में मसाला उद्योग स्थापित करने के लिए वह कई बैंकों और नेताओं के चक्कर काट चुकी हैं, परंतु इसमें उन्हें कहीं से भी सकारात्मक जवाब नहीं मिला। दूसरे बिन्दु में प्रियंका ने लिखा है कि वह एक अनुभवी महिला है। पिछले 12 साल से देहरादून के सेलाकुई में अपना छोटा सा बिजनेस करती थी जिसका सिविल रिकॉर्ड 786 है। लोन रिकॉर्ड भी सुंदर है। इसके बावजूद उसे लोन नहीं मिल पा रहा है।

प्रियंका पौड़ी जिले में कांडाखाल कौड़िया की निवासी हैं। इनकी जमीन की सरकारी कीमत बाईस लाख रुपये है। इसके बावजूद पहाड़ के कोई भी बैंक प्रियंका का 25 लाख का प्रोजेक्ट मंजूर नहीं कर रहे हैं। बैंकों का कहना है, सरकारी गारंटर लाओ। यानी जिसके घर में कोई सरकारी नौकरी वाला नहीं उसे सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलेगा। सरकारी योजनाएं सारी रसूखदारों के लिए हैं जैसा कि राज्य में लगातार हो रहा है। एक तरफ सरकार कहती है कि ‘घौर आवा अपड़ा गौं का वास्ता कुछ करा।’ यानी प्रवास से घर लौटो और अपने गांव के लिए कुछ करो। लेकिन दूसरी तरफ सरकार ऐसे लोगों को प्रोत्साहन नहीं करती जो वापस अपने गांव में आकर कुछ करना चाहते हैं। प्रियंका के उद्योग से 5 से 6 गांवों को लाभ होना था। इससे कई लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलना था। पहाड़ों की बंजर खेती भी आबाद होती। पिछले 6 माह से प्रियंका मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज व प्रकाश पंत सहित मुख्य विकास अधिकारी पौड़ी से गुहार लगा चुकी हैं, परंतु कोरे आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या यही पहाड़ों में पलायन रोकने की नीति है? अब प्रतिरोध में प्रियंका बिना सरकारी सहायता के अपने गांव में 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर कच्ची शराब की भट्टी लगाने जा रही हैं। वे आक्रोश व्यक्त करती हैं कि सरकार हर साल महिलाओं के लिए कई योजनाएं बनाती है, परंतु धरातल पर इनका लाभ केवल रसूखदारों को ही मिलता है। प्रियंका ने राज्यपाल से अनुरोध किया है कि वह अपनी इस बेटी के स्वरोजगार उद्घाटन समारोह में शामिल होकर उसे आशीर्वाद देकर अनुग्रहित करें।

प्रियंका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी अनुरोध किया है कि उनकी योजना पीएमईजीपी के तहत उद्योग विभाग में उन्होंने एक साल पहले आवेदन किया था। उद्योग विभाग ने तो फाइल पास कर दी थी, लेकिन वित्तीय सेवाएं पहाड़ पर पहाड़ियों के लिए अपने दरवाजे बंद कर चुकी हैं। यही वजह है कि मजबूर होकर प्रियंका ने कच्ची शराब की भट्टी लगाकर स्वरोजगार करने की ठान ली है। जिसमें उन्होंने कई राजनेताओं और राज्यपाल उत्तराखण्ड सहित पूरे मीडिया परिवार को 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के दिन अपने गांव कांडाखाल कौड़िया में आमंत्रित किया है। गौरतलब बात यह है कि सरकार ने महिलाओं के लिए महिला सशक्तिकरण विभाग अलग खोल रखा है। यह विभाग क्या करता है, क्या नहीं करता, इसका पता प्रियंका की परेशानी से चल जाता है। उत्तराखण्ड में कई महिला संगठन एवं कई ऐसी संस्थाएं भी बनी हैं जो महिलाओं को स्वावलंबी बनाने में मदद करती हैं, लेकिन शायद प्रियंका पर किसी की नजर नहीं पड़ी।

प्रियंका के प्रतिरोध को स्थानीय जनता का भी समर्थन मिलने लगा है। जनपद पौड़ी गढ़वाल से देवभूमि क्षत्रिय राजपूत सेना के संस्थापक सुभाष चंद्र सिंह नेगी ने दो टूक शब्दों में कहा कि भाजपा के सीएम साहब और विधायकों ने अपने डेढ़ साल के शासनकाल में सिर्फ उत्तराखण्डियों को छला है। स्वरोजगार की बात करने वाली भाजपा सरकार पहाड़ों पर जीवन व्यतीत कर रहे लोगों को उनके गांव की प्रोपर्टी के अगेंस्ट लोन नहीं दिलाना चाहती। यदि स्वरोजगार के प्रति सरकार की दिलचस्पी है, तो बताए कि उसने इसके लिए क्या योजना बनाई? हमारे भाई बंधु बैंकों में लोन के लिए आवेदन करते हैं तो वे कहते हैं कि आपकी प्रोपर्टी का कोई मोल नहीं। ऐसे में पहाड़ के लोग स्वरोजगार के लिए पैसे कहां से लाएं और प्रवास से वापस उत्तराखण्ड कैसे आएं? सरकार, शासन- प्रशासन की कार्यप्रणाली से तो यही लगता है कि जो लोग पहाड़ में रह भी रहे हैं, उन्हें भी गांव छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। सरकार की बेरुखी के कारण मातृशक्ति प्रियंका असवाल जिन्होंने मसाला उद्योग के जरिए स्वरोजगार की ठानी जनता का भला नहीं कर पा रही हैं। अब देश के 71वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर विरोध स्वरूप वे पुराने जमाने की देशी शराब की भट्टी लगा रही हैं। राजपूत सेना ने कहा कि कांडाखाल में हमारा भी इस मातृशक्ति को पूर्ण समर्थन है। हम भी पूरी टीम के साथ वहां पहुंच रहे हैं।

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