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राज्य में एक लाख 20 हजार करोड़ के निवेश प्रस्तावों पर समझौते के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत फिलहाल राजनीतिक रूप से मजबूत हुए हैं। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने जिस तरह उनकी पीठ थपथपाई उसे देखते हुए पार्टी के भीतर उनके विरोध में उठते स्वर अभी शांत पड़ जाएंगे। आगामी निकाय चुनावों और लोकसभा चुनाव की दृष्टि से भी यह निवेश भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। लेकिन चुनौती बरकरार है कि निवेश धरातल पर उतर पाता है या नहीं? 
ती न माह के प्रयास के बाद अखिरकार उत्तराखण्ड सरकार की मेहनत रंग लाती दिखाई दे रही है। राज्य में संपन्न ‘इन्वेस्टर्स समिट’ में 1 लाख 20 हजार करोड़ रुपए के निवेश के 601 प्रस्तावों पर समझौते हुए हैं। ऊर्जा क्षेत्र में सबसे अधिक 31 हजार 543 करोड़ के 19 समझौते हुए। इसके बाद इन्फ्रास्ट्रक्चर (आधारभूत ढांचा) के क्षेत्र में 26 हजार 909 करोड़ के निवेश के लिए 19 एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए हैं। तीसरा सबसे बड़ा क्षेत्र हेल्थ केयर रहा जिसमें 18 हजार 64 करोड़ के 71 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। पर्यटन क्षेत्र में 14 हजार 183 करोड़ निवेश के 119 समझौते हुए हैं।
इसी प्रकार से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 11 हजार 626 करोड़ के 223 एमओयू हस्ताक्षर हुए। खेती-किसानी व फूडप्रोसेसिंग के क्षेत्र में पहली बार उत्तराखण्ड ने लंबी छलांग लगाते हुए 7 हजार 654 करोड़ निवेश के 91 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इससे राज्य ने गिरती हुई खेती- किसानी के मोर्चे पर एक बड़ी आशा की ओर कदम रखा है। शिक्षा और कौशल विकास क्षेत्र में भी 6 हजार 91 करोड़ निवेश के 9 प्रस्तावां पर मुहर लगी है। अल्मोड़ा में 228 करोड़ के वोकेशनल विश्वविद्यालय की स्थापना पर समझौता हुआ है। कहा जा रहा है कि 2020 में इस विश्वविद्यालय में प्रवेश आरंभ हो जाएंगे। सूचना और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में 5 हजार 25 करोड़ निवेश के 19 प्रस्तावों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इसी तरह से आयुष और वेलनेस क्षेत्र में 3 हजार 270 करोड़ निवेश के 32 एमओयू साईन हुए हैं।
कई ऐसे क्षेत्र भी हैं जिनमें देश के जाने-माने उद्योगपतियों ने उत्तराखण्ड में काम करने में खास रुचि दिखाई है। महिंद्रा कंपनी ने इलेक्ट्रिक वाहनों का निर्माण करने, अमूल कंपनी ने डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने का प्रस्ताव सरकार को दिया है। इसी तरह आनंदा डेयरी की ओर से भी राज्य में ऑर्गेनिक पशु आहार और ऑर्गेनिक मिल्क प्रोडेक्ट पर काम करने का प्रस्ताव दिया गया है। जिसमें 200 करोड़ के निवेश समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं।
राज्य में 1 लाख 20 हजार करोड़ के निवेश पर मुहर लगना कोई सामन्य बात नहीं है। देश -विदेश के बड़े-बड़े नामी औद्योगिक घरानों ने जिस तरह से उत्तराखण्ड में निवेश के लिए अपनी स्वीकृतियां दी हैं उससे इतना तो कहा ही जा सकता है कि आने वाला समय प्रदेश की बेहतरी और तरक्की के लिए एक बड़े राजपथ की तरह काम करने वाला साबित होगा। हालांकि इसमें कई खामियां भी जताई जा रही हैं। जिसमें जमीन को लेकर सबसे बड़ी बाधा बताई जा रही है। लेकिन यह भी माना जा रहा है कि इससे राज्य को एक नई दिशा और दशा मिलने की भरपूर संभावनाएं हैं। 1 लाख 20 हजार करोड़ में से अगर 25 प्रतिशत निवेश भी राज्य में छोटे -छोटे पैमाने पर हो पाया तो भी प्रदेश के विकास के लिए बहुत बड़ी छलांग साबित हो सकती है।
निवेश के लिए चुनौतियां की बात करें तो  राज्य में नियमों और कानूनों की कितनी बड़ी बाधा है, यह इस बात से साफ हो जाता है कि राज्य में जो पूर्व में स्थापित औद्योगिक निवेश है उनमें प्रदूषण और पर्यावरण की मार सबसे अधिक पड़ रही है। यह भी एक बड़ी विडंबना कही जा सकती है कि दो दिवसीय इन्वेस्टर समिट के दौरान ही हरिद्वार जिले की 36 औद्योगिक ईकाइयों को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा बंद करने के आदेश जारी किए गए हैं। इन सभी कंपनियां को प्रदूषण नियंत्रण के लिए समय दिया गया था लेकिन वे मानकों का पालन नहीं कर पा रही थी जिसके चलते इनको बंद करने का आदेश जारी किया गया।
ऐसे ही देहरादून में माननीय सुप्रीम कोर्ट  द्वारा दून वैली अधिसूचना के चलते फार्मा कम्पनियां पर तलवार लटकी पड़ी है, क्योंकि दून वैली में लाल और नांरगी रंग की श्रेणी में दर्ज फार्मा ईकाइयां को अनुमति नहीं दी जा सकती। जबकि राज्य में फार्मा क्षेत्र में निवेश के लिए सरकार के पास कई प्रस्ताव हैं जिन पर समिट में मुहर लगाई जा चुकी है।
एक बात इस समिट में साफ निकल कर आई कि देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में निवेश के बजाय पर्वतीय क्षेत्रां में निवेश पर अधिकतर रुचि औद्योगिक घरानों ने दिखाई है। सरकार ने भी पहाड़ी जिलां में निवेश के लिए अपनी नीति में बदलाव किया है। पहाड़ी इलाकों में निवेश के लिए सरकार के भूमि खरीद पर स्टाम्प श्ुल्क में छूट देने और निवेश के लिए भूमि खरीदने की पूरी छूट देने का निर्णय लिया है। प्रदेश के पहाड़ी जनपदों पौड़ी, चमोली, उत्तरकाशी, चंपावत, पिथौरागढ़ और हिमालयी क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा देने के लिए यह निर्णय लिया गया है।
इसके अलावा छोटे, मध्यम तथा लघु उद्यम के क्षेत्र में पांच हजार करोड़ के निवेश का खाका तैयार होने से राज्य में निवेश की राह बनती दिखाई देने लगी है। इसमें 2 हजार करोड़ का निवेश राज्य के औद्योगिक घरानों और 3 हजार करोड़ का निवेश बाहरी राज्यां के औद्योगिक घरानों द्वारा करने का निर्णय लिया गया है। यहां पर गौर करने वाली बात यह है कि राज्य में सबसे अधिक जरूरत और वातावरण सूक्षम, मध्यम तथा लघु उद्योगां के लिए पहले से ही बना हुआ है। प्रदेश सरकार भी इन उद्योगों के लिए नीतियों में परिवर्तन करके माहौल बनाने के प्रयास कर रही है। साथ ही केंद्र सरकार भी इस क्षेत्र के लिए बड़ी सब्सिडी दे रही है जिसमें उद्यम स्थापित करने के लिए 30 फीसदी की छूट जिसमें अधिकतम 5 करोड़ तक की छूट दे रही है। देश में अन्य राज्यों के मुकाबले बिजली की दरें भी कम होने से शूक्षम और लघु उद्योगों को राज्य में बेहतर माहौल दिखाई दे रहा है जिसके चलते 5 हजार करोड़ के निवेश का रास्ता इस क्षेत्र में बन पाया है।
राज्य में निवेशकों को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया दो दिवसीय आयोजन सतही तौर पर सफल कहा जा सकता है। इसके कई तरह के दूरगामी परिणाम समाने आने वाले हैं। एक तो राज्य में निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा दूसरा राजनीतिक तौर पर सरकार और खास तोर पर मुख्यमंत्री को इसका लाभ मिलना तय माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारां की मानें तो भले ही राज्य में 1 लाख 20 हजार करोड़ के निवेश को धरातल पर उतरने में बहुत लंबा समय लग सकता है। लेकिन फिलहाल त्रिवेंद्र रावत को इसका त्वरित राजनीतिक लाभ मिल सकता है।
मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही त्रिवेंद्र रावत का जिस तरह सरकार और संगठन में विरोध होता रहा है और उनकी कार्यशैली की आलोचना होती रही उससे कम से कम त्रिवेंद्र रावत को अपने आलोचकों का मुंह बंद करने का अवसर मिलता दिखाई दे रहा है। इस आयोजन में मुख्यमंत्री स्वयं मोर्चे पर डटकर तीन माह निरंतर प्रयास करते रहे। इस प्रयास का ही परिणाम रहा कि राज्य को अशा से कई गुना निवेश का वादा मिलना मुख्यमंत्री के राजनीतिक भविष्य के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह इस सफल आयोजन के लिए मुख्यमंत्री की पीठ थपथपा कर उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर उठ रही आशंकाओं पर फिलहाल विराम लगा चुके हैं। अब शायद सरकार और भाजपा में मुख्यमंत्री के प्रति विरोध के स्वर उतने मुखर नहीं हो पाएंगे जितने विगत 18 महीनों में दिखई देते थे। भाजपा के लिए भी यह इन्वेस्टर समिट एक बड़े राजनीतिक फायदे के तौर पर देखी जा रही है। राज्य में निकाय चुनाव और अगले वर्ष लोकसभा चुनाव होने हैं जिसमें भाजपा को राजनीतिक फायदा होने की संभावनाएं जताई जाने लगी हैं। यह तय माना जा रहा है कि भाजपा इस आयोजन की सफलता को चुनावां में भुनाने के लिए अभी से कमर कस चुकी है। अब राजनीतिक चुनौतियां कांग्रेस के सामने हैं कि वह किस तरह से सत्ताधारी भाजपा का मुकाबला करती है और किस तरह से सरकार और खासतौर पर मुख्यमंत्री को राजनीतिक चुनौती दे सकती है।

इन्वेस्टर्स समिट हकीकत या दिखावा!

इन्वेस्टर्स समिट के सफल आयोजन के बीच कई तरह की आशंकाएं भी समाने आ रही हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या राज्य में इतना भारी निवेश होगा जितना कि सरकार प्रचारित कर रही है या यह भी उत्तर प्रदेश के इन्वेस्टर समिट जैसे ही साबित होगी जहां लाखां करोड़ के निवेश का दावा सरकार ने किया था। इसी वर्ष फरवरी माह में उत्तर प्रदेश में भी योगी सरकार ने इन्वेस्टर समिट का भव्य आयेजन किया था। इस आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए थे। इसमें कई लाख करोड़ के निवेश ओैर एमओयू साईन किए जाने की बातें समाने आई थी। लेकिन अभी तक यूपी में निवेश धरातल पर नहीं उतर पाया है। खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश द्वारा आयोजित इन्वेस्टर समिट में वही औद्योगिक घराने और चेहरे थे जो कि उत्तराखण्ड के इन्वेस्टर समिट में भी सामने आए। फिर चाहे वह रिलायंस हो या अडानी या फिर बाबा रामदेव की पतंजलि। तकरीबन सभी जाने-माने चेहरे उत्तराखण्ड में भी शामिल रहे हैं।
सरकार के दावों पर तब आशंकाओं के बादल लगते हैं जब अडानी ग्रुप के गौतम आडानी स्वयं इन्वेस्टर समिट के आयोजन पर सवाल खडे़ कर रहे हैं। सोशल मीडिया और प्रदेश के लोकप्रिय न्यूज पोर्टल पर्वतजन में अडानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडानी का एक 42 सेकेंड का वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें अडानी इन्वेस्टर मीट को दिखावा बता रहे हैं।
मुख्यमंत्री और इन्वेस्टर समिट के आयेजन में लगे हुए नौकरशाहों के साथ मुलाकात में गौतम अडानी यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि सबको धंधा करना होता है तो इसलिए सब आ जाते हैं। अडानी यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि इन्वेस्टर आता जरूर है, लेकिन वह काम करेगा यह कहा नहीं जा सकता। अडानी ने यह भी कहा कि इन्फ्रास्टै्रक्चर के क्षेत्र में कोई भी
प्रोजेक्ट देख लो सभी में समस्याएं ही हैं।
गौतम अडानी के इस छोटे से वीडियो को देखने के बाद इतना तो कहा ही जा सकता है कि सरकारां के दबाब में औद्योगिक घराने सरकारी आयेजन में आते हैं। यह सरकार का दबाब ही है कि जिस तरह उत्तर प्रदेश के इन्वेस्टर समिट में अडानी ग्रुप मौजूद रहा, उत्तराखण्ड में भी अडानी ग्रुप की उपस्थिति महज एक रस्म अदायगी ही  थी। कहा जा सकता है कि उत्तराखण्ड सरकार के 1 लाख 20 हजार करोड़ के निवेश पर अडानी ग्रुप ने हकीकत का आईना दिखा दिया है।
अब सरकार के दावों पर सवाल और आशंकाएं उठना लाजमी है कि सरकार के पास वास्तव में इस आयोजन के दौरान कितना निवेश प्रदेश को मिलने वाला है, जबकि बाबा रामदेव की पतंजलि पहले ही उत्तर पूर्व भारत में अपना निवेश आरम्भ कर चुकी है। पतंजलि के एमडी बालकøष्ण ने उत्तराखण्ड में निवेश से पूर्व ही पतंजलि द्वारा 27 हजार करोड़ के निवेश की बात कह दी है तो पतंजलि से नए निवेश की उम्मीद ही अब समाप्त हो चली है। इसी तरह ऊर्जा क्षेत्र में 21 हजार करोड़ के निवेश पर भी सवालिया निशान लग जाता है। जब राज्य में बड़ी विद्युत जल परियोजनाओं पर ही रोक लग चुकी है तो इतना बड़ा और भारी भरकम निवेश किस ऊर्जा क्षेत्र में किया जाएगा। अगर सोलर एनर्जी के क्षेत्र में होना है तो सरकार पहले ही अडानी ग्रुप से 6 हजार करोड़ के निवेश पर समझौता कर चुकी है।

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