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उत्तराखण्ड की जेलों में क्षमता से अधिक कैदी हैं। जिन्हें भोजन और इलाज की पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। पैसे के अभाव में कई जेलों का निर्माण लटका हुआ है। ऐसे में नई जेलें खोलने और जेलों को आधुनिक बनाने के लिए त्रिवेंद्र रावत सरकार की योजनाओं पर संदेह उठना स्वाभाविक है
राज्य में कैदियों की बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए प्रदेश सरकार पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत, ऊधमसिंह नगर, उत्तरकाशी व रुद्रप्रयाग में जेल खोलने की तैयारी में है। लेकिन प्रदेश में पहले ही कई जेलों का निर्माण धनाभाव के कारण लटका पड़ा है। दूसरी तरफ वर्षों पूर्व बने कारागारों की हालत भी दयनीय बनी हुई है। ऐसे में नई जेलें खोलने की योजना कितनी कारगर हो पाएगी, इस पर संदेह बना हुआ है। चूंकि जेल प्रबंधन प्राथमिक तौर पर राज्यों का मामला होता है, लेकिन राज्य की अब तक की सरकारें इसका बेहतर प्रबंध करने में विफल ही साबित हुई हैं।
वर्तमान में प्रदेश में 11 कारागार व 2 उपकारागार हैं। इनकी क्षमता 3378 बंदियों को रखने की है लेकिन इनमें 4421 बंदी अमानवीय स्थितियों में रह रहे हैं। देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार कारागारों का हाल तो और भी बुरा है। अल्मोड़ा में 102 के मुकाबले 135, नैनीताल में 71 के मुकाबले 100, देहरादून में 580 के मुकाबले 1254, हरिद्वार में 660 के मुकाबले 1025, हल्द्वानी में 250 के बदले 800 एवं रुड़की में 244 के बदले 279 कैदी रखे गए हैं। यहां ये न सिर्फ अमानवीय स्थितियों में रहने को मजबूर हैं, बल्कि इनके मानवाधिकारों का भी हनन होता रहा है। कहने को तो जेलों को बंदी सुधार गृह के रूप में जाना जाता है लेकिन आए दिन यहां मानवधिकारों का हनन होने की शिकायतें आती रही हैं। जेलों में डॉक्टरों की नियमित तैनाती नहीं है। फार्मेसिस्टों के आधे से अधिक पद खाली चल रहे हैं। जेल मैनुअल का पालन भी नहीं के बराबर हो रहा है। कुपोषण, तपेदिक, एड्स जैसी बीमारियों से कैदियों के ग्रस्त होने के साथ ही भरपेट भोजन न मिलने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने कार्यकाल में जेलों में कैदियों के भोजन में पौष्टिकता को शामिल करने के मद्देनजर मंडुए की रोटी, गहत की दाल एवं झंगोरा की खीर परोसने के आदेश जेल प्रशासन को दिए थे लेकिन प्रदेश में आदेश किसी के भी हों वह अमल में कम ही आते हैं, इस मामले में भी यही देखने मिला। विगत 16 सालों में 188 बंदी अपनी जान गंवा चुके हैं। पिछले 17 सालों से प्रदेश की जेलें बंदी रक्षकों की कमी से जूझती रही अब जाकर 187 बंदीरक्षक मिल पाए हैं।
प्रदेश में जेलों को हाईटेक बनाने की हवाई बातें तो होती रही लेकिन धरातल पर काम नहीं हो पाया। हर जेल में क्षमता से अधिक कैदियों को रखना मजबूरी बनती जा रही है। जेलों की हालत सुधारने एवं इनके आधुनिकीकरण के प्रयास गति नहीं पकड़ पा रहे हैं। नई जेलों के प्रस्ताव वर्षों से लंबित पड़े हैं। सीसीटीवी, मोबाइल फोन जैमर, मैटल डिटेक्टर, डोर फ्रेम मैटल डिटेक्टर, बायो मैट्रिक सिस्टम जैसे आधुनिक तकनीकों से जेलों को लैस करने के साथ ही अशिक्षित कैदियों को शिक्षित करने जैसी कदमों को उठाने में सरकार धनाभाव का बहाना करती रही है। सीसीटीवी के रूप में तीसरी आंख से पहरा देने की योजना भी बजट के अभाव में आगे नहीं बढ़ पा रही। विगत वर्ष जेलों में 700 सीसीटीवी कैमरे लगाने की बात हुई इसके लिए पांच करोड़ रुपए का बजट भी स्वीकृत हुआ। आशा थी कि अपराधियों से मिलने आने वाले संदिग्ध लोगां व बंदी रक्षकों द्वारा ली जाने वाली तलाशी में पारदर्शिता आएगी। पूर्व में जेल में बंद कुख्यात अपराधी सुनील राठी के इशारे पर रुड़की के चीनू पंडित पर हमला हो या फिर अपराधी अमित भूरा के पेशी के दौरान फरार होने की साजिश, यह सब साजिशें जेल में रची गई होनी बताई जाती हैं। इस तरह की घटनाओं से बचने के लिए तीसरी आंख कुख्यात अपराधियों एवं बंदी रक्षकों की मिलीभगत पर रोक लगा सकती है लेकिन समय रहते यह काम नहीं हो पा रहा है। जिन जेलों में पूर्व में कैमरे लगे भी हैं तो वहां पर नियमित मॉनिटरिंग नहीं हो पा रही। जेलों के निर्माण के लिए सरकारों के पास वित्त की व्यवस्था नहीं है। हल्द्वानी जेल ट्रांसफर करने की बात हुई लेकिन जेल कहां बनेगी, इस पर वर्षों बाद भी फैसला नहीं हो पाया है। यह जेल रिहायशी इलाके में होने से इसको हटाने की मांग लंबे समय से हो रही है। ऊधमसिंह नगर जिले की जेल के लिए अभी तक जमीन की खोज ही पूरी नहीं हो पाई है। वहीं संपूर्णानंद शिविर की खुली जेल बंद होने की चर्चाएं होती रही हैं। इस जेल को बंद कर यहां की 600 एकड़ जमीन औद्योगिक विकास विभाग को देने तैयारी होती रही है जबकि पूर्व में इस खुली जेल की 1093 एकड़ जमीन पर सिडकुल की स्थापना हो चुकी है।
जनपद पिथौरागढ़ में एक दशक बाद भी जिला जेल का निर्माण नहीं हो पाया। अब तक इसके आधारभूत ढांचे के निर्माण में 4.07 करोड़ रुपए खर्च चुके हैं। 22 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली इस जेल का निर्माण वर्ष 2006 से चल रहा है। अभी तक जेल की बाउंड्री के साथ ही टाइप टू कमरों का निर्माण ही हो पाया है।  2007 के बाद इसके लिए कोई धनराशि नहीं मिली है। जबकि यहां पुरुष व महिला बैरकों के साथ ही जुवेनाइल वार्ड भी बनाया जाना है। जिले के कैदियों को 120 किमी दूर अल्मोड़ा जेल ले जाना पड़ता है। यही हाल जनपद बागेश्वर में बनने वाली जेल का भी है। यह भी बजट के अभाव में नहीं बन पा रही है। जनपद चंपावत में बनने वाली जेल भी इससे परे नहीं है। यहां करीब एक दशक पूर्व शासन ने गोरलचोड़ मैदान में जेल निर्माण की स्वीकृति दी थी। इसमें अब तक एक करोड़ रुपया खर्च हो चुका है। लेकिन लोगों के दबाव में इसे हटाने की मांग पर शासन जेल शिफ्ट करने के लिए पुरानी लीसा फैक्ट्री सहित अन्य जगहों पर चिÐीकरण की कार्यवाही तक ही सीमित है। हालत यह है कि जनपद में जेल न होने से लोहाघाट के एक छोटे कमरे में न्यायिक बंदीगृह चल रहा है जिससे कैदियों को कई तरह की दिक्कत होती है। लोहाघाट में जो बंदीगृह है उसकी क्षमता 20 कैदियों की है लेकिन यहां मानकों से अधिक कैदी रखे गए हैं। जिसकी वजह से न तो कैदी सही से रह पाते हैं न ही उन्हें समय पर भोजन मुहैया हो पाता है। कई बार तो कैदियों को अल्मोड़ा जेल में शिफ्ट करना पड़ता है। शिफ्टिंग के दौरान कैदियों के भागने का खतरा बना रहता है।
 अब त्रिवेंद्र सरकार कैदियों की सहूलियत व दैनिक उपयोग की खाने-पीने की चीजों के लिए कैंटीन खोलने के साथ ही प्रदेश की जेलों में ई-प्रिजन योजना शुरू करने की बात तो कर रही है लेकिन आधे अधूरी बन रही जेलों के निर्माण के लिए उसके पास वित्त का अभाव बना हुआ है तो वहीं जेलों के आधुनीकीकरण के प्रयास दो गज भी आगे नहीं बढ़ पाए हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि सरकार का गृह विभाग व जेल प्रशासन जेलों की सुरक्षा को लेकर हाल फिलहाल तो गंभीर नहीं दिखता।

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