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Uttarakhand

पिरुल से बनेगी बिजली

चीड़ की पत्तियां यानी पिरुल को जंगलों में लगने वाली आग का प्रमुख कारण माना जाता है। मगर अब पिरुल से आग नहीं धधकेगी, बल्कि खुशबू महकेगी और बिजली भी चमकेगी। युवाओं को रोजगार का नया अवसर मिलेगा

प्रदेश के जंगल धू-धू कर जल रहे हैं। इसकी बड़ी वजह चीड़ की पत्तियां मानी जाती रही हैं। साथ ही यह बरसाती जल को जमीन के अंदर पहुंचने से भी रोकता है। इससे पानी के प्राकृतिक सो्रत भी प्रभावित होते रहे हैं। इसके नीचे अन्य वनस्पतियां भी नहीं उग पाती हैं। यह जैव विविधता के लिए भी बड़ा खतरा रहा है। वनाग्नि के चलते जंगली जानवर भी अकाल मौत मरते हैं। लेकिन अब आने वाले समय में पिरुल इन सबकी वजह नहीं बनेगा, बल्कि इससे कोयला, बिजली एवं परफ्यूम बनेंगी। साथ ही यह स्थानीय लोगों के रोजगार और आजीविका का बड़ा माध्यम भी बनेगा। उरेडा, वन अनुसंधान संस्थान, बांस एवं रेशा विकास बोर्ड और सेंचुरी पेपर मिल अब इस काम में जुट चुकी हैं। इसमें कुछ काम धरातल पर दिखना भी शुरू हो गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि ‘प्रदेश में 23 लाख मीट्रिक टन सालाना पिरुल उत्पादन होता है, जिसमें लगभग 200 मेगावाट बिजली उत्पादित की जा सकती है।

चीड़ की पत्तियां बेहद ज्वलनशील मानी जाती हैं। प्रदेश में करीब 18 प्रतिशत क्षेत्र में चीड़ के वन फैले हैं। इनसे प्रतिवर्ष करीब 23.66 लाख टन पत्तियां गिरती हैं। अब प्रदेश में चीड़ की इन्हीं पत्तियों से बिजली बनाने की 38 ईकाइयां स्थापित हो रही हैं जिसमें से पिथौरागढ़ जिले में चार ईकाइयां स्थापित भी हो चुकी हैं। यह पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का ड्रीम प्रोजेक्ट भी रहा है। चीड़ की पत्तियों से बिजली बनाने की परियेाजना के तहत जो संयत्र स्थापित किए जा रहे हैं वह 25 किलोवाॅट के हैं, जिसमें 25 लाख का खर्च आता है। अब उरेडा के माध्यम से जनपद के डीडीहाट क्षेत्र में चैबाटी एवं मिर्थी, कनालीछीना विकासखंड के डांगटी और बेरीनाग जिले के हजेती में पिरूल से बिजली पैदा होने वाले संयत्र लग चुके हैं। उरेडा के अनुसार पिरुल से ऊर्जा उत्पादन के लिए 1060 किलोवाट क्षमता की परियोजनाएं 36 लोगों को आवंटित की गई है। उरेडा की मानंे तो प्रदेश के सभी जिलों में एक-एक गांव ऊर्जा दक्ष बनाया जा रहा है। प्रदेश मंे अभी तक 272 मेगावाट के संयंत्र स्थापित हो चुके हैं। जनपद पिथौरागढ़ के डीडीहाट के चैबाटी में पिरूल से बिजली बनाने वाले उद्यमी दीवान सिंह देउपा ने प्लांट स्थापित कर न सिर्फ 14 युवाओं को रोजगार दिया है, बल्कि वह 7.54 प्रति यूनिट के हिसाब से यूपीसीएल को बिजली बेच भी रहे हैं। उद्यमी दीवान सिंह के अनुसार डेढ़ किलो पिरुल से एक यूनिट बिजली पैदा हो पाती है।

प्लांट में सर्वप्रथम पिरुल को कटर से काट कर छोटे-छोटे बोरों में डाला जाता है। फिर बोरों को हूपर में बने एक छोटे से बाक्स में डाला जाता है। जहां पर स्पार्किंग होती है। स्पार्क होने पर पिरुल आग पकड़ लेती है। जिससे गैस निकलती है जो साइक्लोन में जाती है, जहां कण जमा हो जाते हैं और राख नीचे एकत्र होती है। इस तरह बिजली बनती है। प्लांट में लगा जनरेटर पिरुल से उत्पादित बिजली से ही चल जाता है। जनपद पिथौरागढ़ के बेरीनाग में स्थित अवनी संस्था लंबे समय से यह काम सफलतापूर्वक करती आ रही है। पिरुल में ज्वलनशील वैक्स मौजूद होता है जो आग को भड़का देता है। अब इसी वैक्स से परफ्यूम बनाने की तैयारी हो रही है। वन अुनसंधान संस्थान का दावा है कि उन्होंने इसकी तकनीक ईजाद कर ली है। बनने बाले परफ्यूम से कस्तूरी सी खुशबू आएगी। इसको लेकर वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई), बांस एवं रेशा विकास बोर्ड के बीच एक एमओयू भी हुआ है। इसी तरह वन विभाग और सेंचुरी पेपर मिल के बीच भी एक करार हुआ है जिसके तहत सेंचुरी पेपर मिल तीन रुपए प्रति किलोग्राम की दर से पिरुल खरीदेगी।

इसमें दो रुपए सेंचुरी एवं एक रुपए का भुगतान वन विभाग करेगा। पिरुल एकत्रीकरण की जिम्मेदारी स्थानीय युवाओं-महिलाओं को सौंपी जाएगी। इसके लिए सेंचुरी ने वन विभाग से पांच साल का करार किया है। इसके लिए 50 लाख का बजट भी पास हुआ है। पिरुल प्राजेक्ट के तहत मिल पर्वतीय क्षेत्रों के ग्रामीणों से पिरुल खरीदेगी। मौके पर ही मशीन ले जाकर उसका ब्लाॅक बनाएगी। बाद में इन ब्लाॅक का इस्तेमाल ईंधन के रूप में होगा। मिल इस प्रोजक्ट से प्राप्त होने वाली धनराशि को ग्रामीण क्षेत्रों के विकास कार्यों में खर्च करेगी। उत्तराखण्ड राज्य में प्रति वर्ष लगभग 6 मि. टन पिरुल (चीड़ की पत्तियों) उपलब्ध होता हैं इसके अतिरिक्त लगभग 8 मि. टन अन्य बायोमास जैसे कृषि उपज अवशेष, लैन्टना आदि भी उपलब्ध है। इस पिरुल तथा उपलब्ध अन्य बायोमास से लगभग 150 मेगावाट विद्युत उत्पादन, 2000 मिट्रिक टन की ब्रिकेटिंग एवं बायो आयल उत्पादन की संभावना है। पिरुल आधाारित 25 किलोवाट क्षमता की एक परियोजना के निर्माण के लिए लगभग 25 लाख रुपए का व्यय आता है। जिससे प्रतिदिन लगभग 140000 यूनिट विद्युत उत्पादित हो सकती है। इस विद्युत को ग्रिड में विक्रय करने से प्रतिवर्ष लगभग 7.5 लाख रुपए की आमदनी हो सकती है। वहीं 25 किलोवाट के एक बायोमास संयत्र में प्रति वर्ष लगभग 2.30 लाख किग्रा. पिरुल का उपयोग होता है। अगर इसी पिरुल का सही ढंग से इस्तेमाल हो जाय तो आम के आम, गुठली के दाम वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी।

पिरुल एकत्रीकरण के कार्य से करीब 200 लोगों को रोजगार मिलेगा। इससे वनाग्नि तो रुकेगी ही वहीं यह कई अन्य मामलों में भी उपयोगी होगा इसके लिए सेंचुरी पेपर मिल के साथ करार किया गया है। डाॅ. तेजस्विनी अरविंद पाटिल, मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं

 

रोजगार के दरवाजे खुलेंगे: यादव

पिरुल से विद्युत उत्पादन को लेकर अल्मोड़ा में कौन-कौन से प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं और आगे क्या कुछ नई परियोजनाओं पर भी विचार हो रहा है? ये परियोजनाएं किन अनुसंधानों/ संस्थानों के साथ मिलकर शुरू की जा रही हैं? इस पर ‘दि संडे पोस्ट’ ने अल्मोड़ा के डिस्ट्रिक्ट फाॅरेस्ट आफिसर महातिम यादव से बातचीत हुई।

इस बातचीत में वन अधिकारी यादव ने बताया कि ‘चीड़ की विशेषता है कि वह सूखे क्षेत्रों में भी आसानी से उग जाता है। और इसीलिए ये पेड़ पहाड़ों में बहुतायत में पाए जाते हैं। इनमें रेजिन नामक पदार्थ पाया जाता है जो कि अत्यधिक ज्वलनशील होता है यानी कि आसानी से जल जाता है। बकौल यादव ‘‘अगर बात करें बायो एनर्जी की तो ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जिनसे कम लागत में अत्यधिक बायो ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है। जैसे विभिन्न पेड़ों के सूखे पत्ते, मूंगफली के छिलके, पिरुल आदि। उत्तराखण्ड में विशेषकर पिथौरागढ़, अल्मोड़ा या इससे सटे अन्य जिलों की बात करें तो पिरुल को लेकर कई परियोजनाओं पर काम चल रहा है।’’

श्री यादव बताते हैं कि अल्मोड़ा में पिरुल को लेकर फिलहाल दो बड़े प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं। एक अल्मोड़ा सिटी के पास बाल्टा में दूसरा द्वाराहाट के बग्वाली पोखर में। बाल्टा पावर प्लांट, जून 2020 में स्थापित किया गया था। इस परियोजना की लागत करीब 25 लाख रुपए बताई गई है। इस प्लांट को एनएमएचएस (नेशनल मिशन आॅन हिमालयन स्टडीज) फंड ग्रांट करता है। वर्तमान में यह पिरुल पावर प्लांट एक एनजीओ जिसका नाम ‘पलायन रोको समिति’ है, उसके द्वारा आॅपरेट किया जा रहा है।’

उन्होंने आगे कहा कि ‘‘इन पावर प्लांट्स से उत्पादित बिजली को यूपीसीएल (उत्तराखण्ड पावर काॅरपोरेशन लिमिटेड) करीब 7.44 रुपए की दर से खरीदता है। इतना ही नहीं पिरुल से संबंधित इन परियोजनाओं से विभिन्न स्थानीय लोगों को रोजगार भी उपलब्ध हो रहा है। खासकर जो रिमोट एरिया में रहने वाले लोग हैं, जंगल के इलाके में रहने वाले, उन्हें पिरुल के एकत्रीकरण के कार्य से जोड़ा जा रहा है। निश्चित तौर पर एक लार्ज स्केल में पिरुल से विद्युत परियोजनाएं स्थापित की जाएंगी तो जंगलों में लगने वाली आग से भी धीरे-धीरे राहत मिलने में मदद मिलेगी।’’

पिथौरागढ़ की ‘अवनी’ संस्था की तरह अल्मोड़ा में भी पिरुल से बिजली उत्पादन कार्य की सफलता पर उन्होंने बताया कि इससे अल्मोड़ा के साथ-साथ अन्य जिलों के लोगों को भी लाभ मिलेगा। यह एक अच्छी पहल है। इससे पलायन को रोका जा सके। डीएफओ अल्मोड़ा ने उम्मीद जताते हुए कहा कि बिजली उत्पादन परियोजनाओं से राज्य के युवाओं के लिए रोजगार के भी नए दरवाजे खुलेंगे। साथ ही पिरुल से फाइबर बनाकर उससे कपड़े बनाने की भी योजनाओं पर भी बात चल रही है।

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