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एक समय होल्कर राजवंश की धर्म परायण महारानी अहिल्याबाई ने तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए पौराणिक कुशावर्त घाट पर जिस संपत्ति का निर्माण किया था आज भूमाफिया, नेताओं और अधिकारियों की तिकड़ी उसे खुर्द-बुर्द कर रही है। आश्चर्यजनक है कि मध्य प्रदेश के स्वामित्व वाली इस बेशकीमती संपत्ति को ठिकाने लगाने की शुरुआत वर्ष 2007 में उस समय हुई जब उत्तराखण्ड और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में भाजपा की सरकारें थीं। बीच में कांग्रेस शासन के दौरान संपत्ति के सौदागरों पर कुछ अंकुश अवश्य लगा। लेकिन वर्ष 2017 में फिर भाजपा सरकार के आते ही उनके हौसले बुलंद हो गए। प्रदेश कैबिनेट के एक मंत्री का इन्हें संरक्षण बताया जाता है। संपत्ति के अवैध सौदागरों को उच्च राजनीतिक संरक्षण का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अधिकारी उनके सामने बेबस हैं। स्थिति यह है कि हरिद्वार के जिलाधिकारी ने इनके हित में गढ़वाल मंडल के पूर्व आयुक्त की जांच रिपोर्ट की अवहेलना तक कर डाली
विश्व को सनातन धर्म और संस्कृति का सार्थक संदेश देने वाली विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक नगरी हरिद्वार पर आधुनिकता एवं बाजारीकरण का  ऐसा रंग चढ़ चुका है कि प्राचीन ऐतिहासिक महत्व की इमारतें और धर्मशालाएं भूमाफिया की भेंट चढ़ होटल और गेस्ट हाउस में तब्दील हो गई हैं। यह सिलसिला अभी भी बदस्तूर जारी है। हाल ही में मध्य प्रदेश के शाही घराने होल्कर से जुडी मध्य प्रदेश सरकार की कुशावर्त घाट एवं वहां स्थित होल्कर बाड़ा और बाड़े में मौजूद शिव मंदिर जैसी ऐतिहासिक महत्व की संपत्ति भी राजनीतिक संरक्षण प्राप्त प्रोपर्टी डीलरों की भेंट चढ गई। जिस अधिकारी ने ऐतिहासिक इमारत को खुर्द-बुर्द करने का विरोध किया उसका तबादला कर दिया गया। होल्कर भवन व पितरों की मोक्ष प्राप्ति के कर्मकांड स्थल पौराणिक कुशावर्त घाट के खरीदार प्रदेश भाजपा सरकार के एक कैबिनेट मंत्री के खास बताए जाते हैं। वैसे इस बेशकीमती ऐतिहासिक संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने की कोशिशें तो बीते 10-12 साल से चल रही थी, लेकिन 2012 से 2017 के बीच सूबे में कांग्रेस सरकार के रहते सिरे नहीं चढ़ पाईं। मगर भाजपा सरकार के पुनः सत्तासीन होने के बाद इस बार प्रोपर्टी डीलरों और सफेदपोश नेताओं सहित प्रशासनिक अधिकारियों की तिकड़ी कामयाब हो गई। बताया जाता है कि होल्कर राजवंश की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने कुशावर्त घाट के निकट यह भवन मध्य प्रदेश से हरिद्वार आने वाले तीर्थ यात्रियों और श्रद्धालुओं की सुविधार्थ अपने शासन काल में बनवाया था जो अब इस नापाक तिकड़ी के चलते हरिद्वार के मानचित्र से विलुप्त होने के कगार पर है।
बताते चलें कि इंदौर राजघराने की रानी अहिल्याबाई धर्म परायण महिला थीं। 17वीं सदी के मध्य इंदौर रियासत की रानी रही अहिल्याबाई ने तीर्थयात्रियों की सुविधार्थ देशभर में 1248 धर्मशालाओं एवं अन्नदान स्थलों का निर्माण कराया था जिसमें दो कुशावर्त घाट और होल्कर बाड़ा हरिद्वार में स्थित हैं। करोड़ों रुपए वाली इस बेशकीमती पौराणिक महत्व वाली धार्मिक संपत्ति को ठिकाने लगाने में उसी पंडा समाज से जुड़े वयक्ति ने मुख्य भूमिका निभाई जिन पर इस संपत्ति की रक्षा का दारोमदार था, क्योंकि कुशावर्त घाट पर सदियों से हरिद्वार का पंडा समाज कर्मकाण्ड कराता आ रहा है। यही नहीं गौदान किए जाने को लेकर भी कुशावर्त घाट का अपना महत्व है। ऐसा नहीं है कि पूरा पंडा समाज ही भूमाफिया से मिल गया हो, बल्कि सच्चाई यह है कि अगर पंडा समाज ने इस संपत्ति के विक्रय को लेकर आवाज बुलंद भी करनी चाही तो उनको कुशावर्त घाट पर कर्मकांड के तहत कराई जाने वाली पूजा के कार्य से बेदखल करने का भय दिखा चुप करा दिया गया। यही नहीं पंडा समाज के ही वरिष्ठ व्यक्ति और विहिप के जिलाध्यक्ष रहे वीरेंद्र कीर्तिपाल ने इस खरीदारी के खिलाफ आवाज बुलंद की।तमाम विरोध और सरकारी आदेशों को दरकिनार कर होल्कर बाड़ा तथा कुशावर्त घाट की धार्मिक संपत्ति (मध्य प्रदेश सरकार के स्वामित्व वाली संपत्ति) पर नापाक तिकड़ी का कब्जा हो चुका है। यही नहीं सभी नियम-कायदे कानून को ताक पर रख होल्कर बाड़े की बेशकीमती भूमि पर चारदीवारी के भीतर होटल के निर्माण का कार्य धड़ल्ले से चल रहा है। इस खरीद के खिलाफ मुखर विजय सिंह पाल की आवाज नक्कार खने में तूती की तर्ज पर दबकर रह गई है। यही नहीं विजय सिंह पाल की आवाज दबाने की कोशिश के तहत पिछले दिनों हरिद्वार कोतवाली में उनके विरुद्ध धार्मिक भावनाएं भड़काने तक का मामला भी दर्ज कराया गया है।
‘दि संडे पोस्ट’ के पास उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार भारत की स्वतंत्रता के उपरांत जब विभिन्न रियासतों का भारत वर्ष में विलय किया जाना प्रारम्भ हुआ तब इंदौर के महाराजा यशवंत राव होल्कर जो उस समय होल्कर स्टेट के शासक थे, उनके और भारत गण राज्य के बीच मध्य भारत के नाम से जाने जाने वाले राज्य का विलय अभिलेख 22 अप्रैल 1948 को लिखा गया। इस अभिलेख के आधर पर राजा तथा तत्कालीन मध्य भारत सरकार व भारत सरकार के बीच 7 मई 1949 को एक विलेख (अनुबंध) निष्पादित किया गया। जिसमें पक्षकारों के बीच सहमति बनी कि 7 मई 1949 के पश्चात खासगी प्रोपर्टीज के रूप में अंकित समस्त संपत्ति एवं उससे होने वाली आय मध्य भारत सरकार/मध्य भारत सरकार के निहित कर दी गई थी। इस प्रकार यह सभी संपत्ति जो प्राइवेट सम्पत्ति थी 7 मई 1949 के पश्चात मध्य प्रदेश सरकार में निहित सरकारी व सार्वजनिक संपत्ति की श्रेणी में आ गई थी। मध्य भारत सरकार/मध्य भारत सरकार ने इस प्रकार की संपत्तियों की देखभाल, मेंटेनेंनस इत्यादि के लिए उस समय 291,992 रुपये की एनयूटी स्वीकøत की थी। इस धनराशि के सदुपयोग निमित खासगी ट्रस्ट का निर्माण जून 1962 को ट्रस्ट डीड से किया गया। धनराशि का प्रयोग ट्रस्टी की देखरेख में मध्य प्रदेश सरकार में निहित खासगी प्रोपर्टी की संपत्तियों के मेंटिनेंस एवं देखभाल पर भी खर्च किया जा रहा है।
मध्य प्रदेश सरकार के स्वामित्व वाली इस बेशकीमती भूमि को ठिकाने लगाने की शुरुआत अगस्त 2007 में प्रदेश में भाजपा सरकार गठन होने के पश्चात हुई। उस दौरान मध्य प्रदेश में भी अंगद का पांव माने जाने वाली शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार थी। मध्य प्रदेश सरकार की संपत्ति को ठिकाने लगाने के लिए खासगी ट्रस्ट से जुड़े लोगों अन्य ट्रस्टियों द्वारा पंडा समाज के जुड़े एक व्यक्ति के साथ मिलीभगत करते हुए 5 जून 2008 को सरकुलेशन के माध्यम से रेज्योल्यूलेशन (प्रस्ताव) पास किया गया। इसमें एससी मल्होत्रा को संपत्ति के विक्रय हस्तांतरण को अंतिम रूप देने हेतु अधिकøत किया गया। जबकि खासगी ट्रस्ट सिर्फ होल्कर राजवंश की इन संपत्तियों की देखभाल के लिए गठित किया गया था, वर्ना खासगी ट्रस्ट से जुड़ी तमाम संपत्तियां मई 1949 में ही मध्य प्रदेश सरकार के अधीन आ गई थीं। 5 जून 2008 को जारी सरकुलेशन के माध्यम से रेज्योल्यूलेशन के पास होने के पश्चात एक ऐसे व्यक्ति जो ट्रस्टी भी नहीं थे यानी कमल जीत सिंह राठौर द्वारा होल्कर बाड़ा और कुशावर्त घाट की संपत्ति के संबंध में हरिद्वार में पंडा समाज के व्यक्ति राघवेंद्र सिखौला के पक्ष में 5 जून 2009 को जरनल पावर ऑफ ऑटर्नी की गई। जबकि केएस राठौर को खासगी ट्रस्ट में इडियन ट्रस्ट एक्ट 1882 की धारा 47 के अनुसार प्रशासनिक कार्य के अतिरिक्त अन्य कार्य नहीं सौंपा जा सकता था। बावजूद इसके केएस राठौर ने राघवेंद्र सिखौला को पावर ऑफ ऑटर्नी कर डाली। एक दूसरी पावर ऑफ ऑटर्नी सतीश चंद्र मल्होत्रा ने राघवेंद्र सिखौला के पक्ष में की। यहीं नहीं मध्य प्रदेश सरकार की इस बेशकीमती धार्मिक पौराणिक महत्व वाली संपत्ति को ठिकाने लगाने के लिए नई-नई इबारतें तैयार की गई। कमल जीत सिंह राठौर व सतीश चंद्र मल्होत्रा द्वारा राघवेंद्र सिखौला के पक्ष में की गई पावर ऑफ आटर्नी के बल पर राघवेंद्र सिखौला ने चार रजिस्ट्री के माध्यम से अरबों रुपये की संपत्ति अनिरूद्ध कुमार के पक्ष में 2 सितंबर 2009 को कर डाली। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार केएस राठौर और सतीश चंद्र मल्होत्रा द्वारा योजना बनाकर राघवेंद्र सिखौला के पक्ष में इसलिए पावर ऑफ अटार्नी की गई ताकि अगर इसकी रजिस्ट्री की जाती तो वह विधि विरुद्ध की श्रेणी में आती। बावजूद इसके तत्कालीन मंडल आयुक्त गढ़वाल कुणाल शर्मा की जांच में राघवेंद्र सिखौला द्वारा किए गए रजिस्ट्री बैनामे को विधिक दृष्टि से शून्य बताते हुए इन विक्रय पत्रों के आधार पर किसी भी क्रेता को किसी भी प्रकार का विधिक अधिकार प्राप्त न होने के संबंध में स्पष्ट उल्लेख किया गया। यही नहीं मंडल आयुक्त गढ़वाल कुणाल शर्मा ने शासन के पत्रांक 307/5(1)2012-01(13)2010 टीसी दिनांक 11 अप्रैल 2012 के क्रम में प्रस्तुत जांच रिपोर्ट 24 मई 2012 के परीक्षण में स्पष्ट उल्लेख किया कि खासगी प्रोपर्टी 7 मई 1949 के पश्चात ट्रस्ट की संपत्ति नहीं रही। वह मध्य प्रदेश सरकार की संपत्ति है और सरकारी/सार्वजनिक संपत्ति की श्रेणी में आ गई थी। ट्रस्टीज को इन संपत्तियों के हस्तांतरण अथवा विक्रय का कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं था। 27 जून 1962 की ट्रस्ट डीड में जो संपत्तियां वर्णित हैं वह संपूर्ण भारत वर्ष में फैली हुई हैं। इनकी कीमत कई हजारों करोड़ रुपये होगी। इसलिए मामले का विधिक परीक्षण कराए जाने का उल्लेख करते हुए कुणाल शर्मा ने अपनी जांच रिपोर्ट में साफ-साफ लिखा कि इस प्रकरण में सीबीसीआईडी अथवा सीबीआई जैसी संस्था द्वारा उच्च स्तरीय जांच कराई जानी आवश्यक होगी। इसके साथ ही तत्कालिक कार्यवाही के तौर पर अनियमित रूप से किए गए चारों बैनामों को जिलाधिकारी हरिद्वार द्वारा इंडियन रजिस्ट्रेशन एक्ट के अंतर्गत निरस्त करने तथा सही तथ्यों का उल्लेख न कर नगर निगम में कराई गई नामांतरण की प्रक्रिया को निरस्त किए जाने के लिए संस्तुति की। मध्य प्रदेश सरकार की करोड़ों रुपए की संपत्ति की खरीद-फरोख्त को लेकर गढ़वाल आयुक्त कुणाल शर्मा द्वारा विस्तृत रूप से की गई जांच रिपोर्ट आज भी शासन की अल्मारियों में धूल फांक रही है। जबकि 2 नवंबर 2012 को प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री मध्य प्रदेश मनोज कुमार श्रीवास्तव ने अपने पत्रांक, क्रमांक 181/मुमंका/प्रस/ 2012 द्वारा हेराफेरी करने वालों के विरुद्ध क्रिमनल एक्शन, देशभर में फैली समस्त खासगी संपत्ति को राज्य के नाम दर्ज करने, उन पर कब्जा लेने, हरिद्वार में हुई अवैध खरीद-फरोख्त को निरस्त करने के लिए आगे बढ़कर स्वयं कार्यवाही करने, खासगी की समस्त आय राज्य सरकार के खजाने में जमा करने की व्यवस्था करने और खासगी संपत्तियों के प्रबंधन की ट्रस्ट से स्वतंत्र शासकीय व्यवस्था करने की बात कही है। प्रमुख सचिव मध्य प्रदेश शासन के अलावा शेष ट्रस्टियों की नियुक्ति की वैधता की जांच करने, समस्त सौदों में हुए नुकसान की भरपाई संबंधित ट्रस्टी से किए जाने और उत्तराखण्ड शासन के जांच अधिकारी कुणाल शर्मा (तत्कालीन आयुक्त गढ़वाल मंडल) को मध्य प्रदेश शासन की ओर से एक धन्यवाद पत्र भी भेजे जाने की घोषणा करते हुए शासन का पत्रांक जारी किया। लेकिन यह भी रहस्य ही है कि प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री के आदेश-निर्देश के बावजूद मध्य प्रदेश सरकार में हरिद्वार में हुई खरीद-फरोख्त के विरुद्ध कोई हलचल नहीं हुई। 2012 में निबंधन कार्यालय में हुई तमाम कार्यवाहियों के पश्चात भूमाफिया शांत होकर बैठ गए। उस दौरान प्रदेश में कांग्रेस की बहुगुणा सरकार थी। अचानक हुए राजनीतिक घटना क्रम में बहुगुणा को हटाकर हरीश रावत को उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बनाया गया। हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनते ही भू-माफियाओं की बांछें खिल गई। बताया जाता है कि हरीश सरकार के दौरान ही हरकी पैड़ी और कुशावर्त घाट के किनारे से होकर बहने वाली पतित पावनी गंगा के संबंध में शासनादेश जारी कर उसको नहर घोषित किया गया। जिसके चलते गंगा से 200 मीटर की दूरी पर किए जाने वाला निर्माण वैध हो गया। शासनादेश के जारी होते ही इस संपत्ति को औने-पौने दामों में ठिकाने लगाने में लगे भूमाफिया ने एचआरडीए से नक्शा पास कराने की जुगत लगानी शुरू कर दी। 2017 में प्रदेश में हुए सत्ता परिवर्तन के पश्चात त्रिवेंद्र रावत के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने कामकाज संभाला। बताया जाता है कि इसी दौरान भूमाफिया ने अपने आका एक कैबिनेट मंत्री के बल पर एचआरडीए से नक्शा पास कराने में कामयाबी पा ली। जबकि नक्शा पास कराने के लिए एनओसी जरूरी होती है। नगर निगम की एनओसी न मिलने पर भी हरिद्वार के जिलाधिकारी दीपक रावत जो कि एचआरडीए में अतिरिक्त प्रभार के तौर पर वीसी थे, उन्होंने तमाम आपत्तियों एवं अपने वरिष्ठ अधिकारी पूर्व मंडल आयुक्त गढ़वाल मंडल कुणाल शर्मा की जांच रिपोर्ट तथा मध्य प्रदेश सरकार के सचिव मुख्यमंत्री मनोज कुमार श्रीवास्तव और 5 नवंबर 2012 को कलेक्ट्रेट इंदौर द्वारा जारी पंत्राक 584/ लोकन्यास/ 2012 सहित अन्य तमाम जांच रिपोर्टों की अनदेखी कर एक तरफा होल्कर बाड़े का नक्शा स्वीकøत कर दिया। एक पीसीएस अधिकारी ने जब इस नक्शे को निरस्त किए जाने के संबंध में कार्यवाही करते हुए नोटिस देने की हिमाकत की तो उसे एचआरडीए से हटा दिया गया। बताया जाता है कि कैबिनेट मंत्री के खास माने जाने वाले कुछ लोग हरिद्वार में बिचौलिये की भूमिका निभा रहे हैं। इनमें से एक को तो मंत्री ने कुशावर्त घाट और होल्कर बाडे को ठिकाने लगाने का जिम्मा सौंपा हुआ है। बताया जाता है कि वर्तमान एचआरडीए सचिव केके मिश्रा ने इस संपत्ति पर स्वीकृत मानचित्र संबंधी पंत्रावली को अपने कब्जे में ले रखा है। वहां चल रहे अवैध निर्माण को लेकर केके मिश्रा और एचआरडीए के वीसी का अतिरिक्त कार्यभार संभाल रहे जिलाधिकारी दीपक रावत आर्श्चयजनक रूप से मौन धारण किए हुए हैं। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार होल्कर समाज से जुड़ी मध्य प्रदेश सरकार की इस संपत्ति के अवैध विक्रय एवं अनाधिकøत निर्माण को लेकर वर्षों से आवाज बुलंद करने वाले अखिल भारतीय होल्कर महासंघ के अध्यक्ष विजय सिंह पाल के विरुद्ध भी यह नापाक तिकड़ी विभिन्न तरह के हथकंडे आजमाती रही है। पिछले दिनों रानीपुर मोड़ पर इस संपत्ति की खरीद-फरोख्त के विरुद्ध धरना दिए जाने पर हरिद्वार कोतवाली में विजय सिंह पाल के खिलाफ धार्मिक भावनाएं भड़काने जैसे आरोप लगा मुकदमा दर्ज कराया गया है। इस संबंध में विजय सिंह पाल का कहना है कि होल्कर बाड़े के भीतर स्थित शिव मंदिर को भी भूमाफिया द्वारा ध्वस्त कर दिया गया है। मध्य प्रदेश सरकार और उत्तराखण्ड सरकार के समक्ष दर्ज कराई गई तमाम शिकायतों के बावजूद भूमाफिया सत्ता और प्रशासनिक अधिकारियों के संरक्षण में अपने मकसद में कामयाब हो रहा है। लेकिन साथ ही विजय सिंह पाल को उम्मीद है कि मध्य प्रदेश में हुए सत्ता परिवर्तन के पश्चात कमलनाथ के नेतृत्व में बनी कांग्रेस सरकार जरूर इस मुद्दे पर कोई कठोर कदम उठाएगी।

कुशावर्त घाट का महत्व

हरिद्वारे ‘कुशावर्ते’ नील्के विल्व पर्वते : स्नात्वा कनखले तीर्थे पुनर्जन्म ना विद्यते !
पंच स्नानी में ये श्लोक आता है। पांच स्थानों पर नहाने से मनुष्य दोबारा जन्म नही लेता है।
जिस कुशावर्त घाट को पण्डा समाज से जुड़े लोग ठिकाने लगाने में लगे हैं उसी कुशावर्त घाट के धार्मिक महत्व को लेकर श्री स्कंदपुराण केदारखण्ड नामक पुस्तक के अध्याय 112 के अनुसार कार्तिकेय कहते हैं कि ब्रह्म के दक्षिण में कुशवर्त नामक महातीर्थ है, तीर्थ महाभाग। उसमें स्नान करके मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता है। वहां जो स्नान दान जाप होम वेद पाठ तथा पितृ तर्पण किया जाता है वह कोटि गुना अधिक फल देता है। पूर्व काल में गंगा के आगमन के समय मौन व्रत महा तपस्वी दत्तात्रेय मुनि 10000 वर्षों तक एक पैर पर खड़े रहकर तपस्या में लीन थे तभी गंगा ने उनके कुशा वस्त्र, खंड, दंड तथा कमंडल को बहा दिया। गंगा मुनि के कुशों को अपने भंवर में धारण किए रही जिस कारण महमुनि का ध्यान टूट गया तभी मुनि ने जल से भीगे कुशों और चारों चीजों को गंगा के भंवर में देखा। क्रोधित महामुनि जब तक गंगा को भस्म करते तब तक ब्रहम्मा आदि देवता परम भक्त कार्तवीर्य (सहस्रार्जुन) के गुरु दत्तात्रेय मुनि की स्तुति करने लगे। बहुत स्तुति करने पर मुनि प्रसन्न हुए और उन देवताओं से बोले इसी श्रेष्ठ तीर्थ में आप लोगों का नित्य निवास होगा क्योंकि यहां पर गंगा ने अपने भंवर में मेरे कुशों को धारण किया इसलिए यह स्थान कुशावर्त नाम से प्रसिद्ध होगा। मानव यहां स्नान तथा पितृ तर्पण करें तो उसके पितरों तथा उनका भी पूर्व जन्म नहीं होगा। महातीर्थ कुशावर्त में दिया हुआ दान कोटि गुना अधिक होगा।

भाजपा शासन में ठिकाने लगी धार्मिक संपत्ति

इसे संयोग कहें या कुछ और कि जब हरिद्वार स्थित मध्य प्रदेश के स्वामित्व वाली करोड़ों रुपये की धार्मिक संपत्ति को ठिकाने लगाने की योजना अगस्त 2007 में शुरू हुई तो तब उत्तराखण्ड एवं मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें चल रही थीं। ऐसा भी नहीं है कि मध्य प्रदेश सरकार के स्वामित्व वाली हरिद्वार स्थित पौराणिक संपत्ति कुशावर्त घाट और होल्कर बाड़े को गलत ढंग से बेचे जाने की जानकारी मध्य प्रदेश सरकार को न हो। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के प्रमुख सचिव व कलेक्ट्रेट इंदौर द्वारा उत्तराखण्ड सरकार और जिलाधिकारी हरिद्वार को लिखे गए तमाम पत्र इस बात का खुलासा करते हैं कि मध्य प्रदेश के अधिकारियों को इस प्ररकण की बखूबी जानकारी थी। बावजूद इसके मध्य प्रदेश सरकार की यह संपत्ति ठिकाने लगा दी गई। पूरे प्रकरण पर मध्य प्रदेश में सत्तासीन रही शिवराज सिंह चौहान सरकार की चुप्पी सवाल खड़ा करने के लिए काफी है।

पहले भी हुए संपत्तियों के सौदे

तीर्थ नगरी हरिद्वार में कुशावर्त घाट और होल्कर बाड़े जैसी पौराणिक संपत्तियों को ठिकाने लगाने का यह पहला मामला नहीं है। पूर्व में शिमला हाउस, टिहरी हाउस, नागों की हवेली, कनखल स्थित सिरसा वाली धर्मशाला, जालान धर्मशाला, रुइया धर्मशाला सहित दर्जनों प्राचीन संपत्तियां और हरिद्वार की पहचान माने जाने वाले सैंकड़ां मंदिर आज आधुनिकता की भेंट चढ चुके हैं। हर की पौडी स्थित राजा मानसिंह की छतरी को गंगा मंदिर का स्वरूप देने की कोशिश को सुप्रीम कोर्ट नाकाम कर चुका है। हरिद्वार धर्म नगरी में आश्रमों, मठों आदि की संपत्तियों को कब्जाने के चक्कर में कुछ संत-महात्माओं की हत्याएं भी हो चुकी हैं।

डीएम दीपक रावत की चुप्पी

जिलाधिकारी हरिद्वार दीपक रावत की गिनती तो तेज तर्रार- आईएस अधिकारियों में होती है, परंतु इस प्रकरण में दीपक रावत भी सत्ता के सामने बौने साबित हुए। न जाने दीपक रावत के सामने ऐसी क्या मजबूरी थी कि उन्होंने हरिद्वार विकास प्राधिकरण के वीसी का अतिरिक्त कार्यभार संभालते हुए मध्य प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव/कलेक्ट्रेट इंदौर के तमाम पत्रों सहित हरिद्वार के पूर्व जिलाधिकारी सचिन कुर्वे एवं गढ़वाल मंडल आयुक्त रहे कुणाल शर्मा की लंबी-चौड़ी जांच रिपोर्ट को नजर अंदाज किया। यहीं नहीं नगर निगम से आवश्यक एनओसी न होने के बावजूद मध्य प्रदेश सरकार के स्वामित्व वाली होल्कर बाड़े की संपत्ति पर मानचित्र स्वीकøत कर दिया गया।

बात अपनी-अपनी

मेरी रिश्तेदारी में किसी की मृत्यु हो गई है। मैं वहां हूं। आप अधिशासी अभियंता से पूछें।
केके मिश्रा, सचिव हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण हरिद्वार
जिस कुशावर्त घाट होल्कर बाड़ा में आप होटल निर्माण की बात कर रहे हैं वह मेरी जानकारी में नहीं है। जब आप बता रहे हैं तो आपके पास तथ्य भी होंगे। आप एक शिकायती पत्र तथ्यों सहित मुझे दीजिए मैं फाईल मंगवाकर एक टीम को वहां भेजूंगा।
श्याम मोहन शर्मा, अधिशासी अभियंता एचआरडीए हरिद्वार
इस प्रकरण की मुझे अधिक जानकारी नहीं है। कुछ वर्ष पहले सुना जरूर था। जहां तक पिछली कमेटी के कार्यकाल के दौरान कुशावर्त घाट की संपत्ति की खरीद-फरोख्त का सवाल है, वह सही नहीं है। राम कुमार मिश्रा जी वर्तमान में चार वर्ष से गंगा सभा के महामंत्री हैं। वो सही जानकारी दे सकते थे। धार्मिक संपत्तियों की खरीद-फरोख्त होना सही है या गलत, मैं यह भी नहीं बता सकता।
पुरुषोत्तम शर्मा गांधीवादी, अध्यक्ष गंगा सभा रजि. हरिद्वार
कुशावर्त घाट का सनातन धर्म में अपना महत्व है। जहां तक होल्कर बाड़ा और कुशावर्त घाट की संपत्ति की खरीद- फरोख्त का सवाल है तो यह प्रकरण मुझसे पहले गंगा सभा के महामंत्री, अध्यक्ष और सभापति के कार्यकाल के दौरान का है। इसलिए मैं कुछ ज्यादा कहने की स्थिति में नहीं हूं। जहां तक धार्मिक संपत्ति के खरीदने एवं बेचने की बात है तो मैं बिना प्रपत्र देखे कुछ नहीं कह सकता।
राम कुमार मिश्रा, महामंत्री गंगा सभा रजि. हरकी पैड़ी 
कुशावर्त घाट होल्कर बाड़ा की संपत्ति को लेकर मुझे अधिक जानकारी नहीं है। ट्रस्ट की जमीन का क्रय-विक्रय बॉयलॉज के अनुसार किया जा सकता है। जहां तक धार्मिक संपत्तियों की खरीद-फरोख्त का सवाल है तो धार्मिक संपत्तियों का संरक्षण किया जाना चाहिए। उनको बेचना गलत है।
डॉ जयपाल सिंह चौहान, जिलाध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी हरिद्वार
धार्मिक की संपत्तियों की खरीद-फरोख्त नहीं होनी चाहिए। कुशावर्त घाट की संपत्ति के संबंध में राज्य सरकार को सीबीआई जांच कराकर माफियाओं के खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए।
सुरेंद्र तेश्वर, प्रदेश अध्यक्ष सफाई मजदूर कांग्रेस उत्तराखण्ड (नगर निगम हरिद्वार)

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