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देहरादून के शीशमबाड़ा में लगा कूड़ा निस्तारण संयंत्र आस-पास के हजारों लोगों के लिए मुसीबतों का पहाड़ साबित हो रहा है। इसने हवा में इस कदर जहर घोल डाला है कि लोग सांस की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। कैंसर होने का डर उन्हें अलग से सता रहा है। सर्वेक्षणों के मुताबिक प्लांट से निकलने वाली गंदगी ने भूमिगत जल और आसन नदी को भी बुरी तरह प्रदूषित कर दिया है। इससे स्थानीय लोगों के साथ ही वन्य जीव जंतुओं के लिए भी बड़ा खतरा पैदा हो गया है। खास बात यह है कि संयंत्र के संचालन की जिम्मेदारी जिस कंपनी को दी गई है वह पूर्व में ब्लैक लिस्टेड रही। कंपनी तय क्षमता के अनुरूप न तो कूड़े का निस्तारण कर पा रही है और न ही प्रदूषण को रोकने के उपाय। विधानसभा अध्यक्ष के निर्देश पर गठित प्राकलन समिति ने भी माना कि कूड़ा निस्तारण संयंत्र में मानकों का घोर उल्लंघन हो रहा है। प्रदूषण की मार झेल रहे लोग अनशन के रास्ते पर हैं। इसके बावजूद सरकार को इस बात का मलाल नहीं कि आखिर कंपनी को कूड़ा निस्तारण के लिए हर माह 92 लाख रुपए क्यों दिए जा रहे हैं

 

भूमिकाः देहरादून में प्रतिदिन निकलने वाले सैकड़ों टन कूड़े-कचरे के निस्तारण के लिए नगर से तकरीबन 20 किमी दूर शीशमबाड़ा में संयंत्र लगाया गया है। इस सयंत्र के आस-पास दो किमी के परिक्षेत्र में तकरीबन 60 हजार की आबादी एक तरह से नरक भोगने को मजबूर है। संयंत्र से उठती भंयकर बदबू लोगों का जीना दूभर कर देती है। यही नहीं संयंत्र की गंदगी से भूमिगत जल प्रदूषित हो रहा है। वन्यजीवों और सदानीरा आसन नदी को भी जबर्दस्त प्रदूषण की मार झेलनी पड़ी रही है। दर्जनों ग्रामसभाओं की बड़ी आबादी बदबू से इस कदर त्रस्त हो चुकी है कि लोग अब इस क्षेत्र से पलायन को मजबूर हैं। लेकिन उनके घरों और संपतियों के कोई खरीददार नहीं मिल रहे हैं। सरकार से लगातार कूड़ा संयंत्र को हटाए जाने या उसको सही तरीके से चलाए जाने की मांग करते-करते स्थानीय निवासियों में इस कदर निराशा और हताशा है कि अब एक पत्रकार को आमरण- अनशन पर बैठना पड़ रहा है। हैरानी की बात यह है कि 7 अक्टूबर से पत्रकार सतपाल धईया भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं, लेकिन उनकी बात को न तो नगर निगम और न ही जिला प्रशासन सुनने को तैयार है। यहां तक कि समस्या के निवारण के लिए रटा-रटाया जबाब ही दिया जा रहा है।

प्रभावित गांवः शेरपुर, बायाखाला, सेलाकुई, शीशमबाड़ा, सिंघनीवाला, हसनपुर कल्याणपुर ओैर नया गांव इस कूड़ा निस्तारण संयत्र के परिक्षेत्र में आते हैं। इन गांवां में तकरीबन दो लाख की आबादी निवास करती है। जिनमें तकरबीन 60 हजार की आबादी सीधे तौर पर इस कूड़ा निस्तारण संयंत्र के दो किमी के आस-पास ही निवास करती है।

कूड़ा निस्तारण संयंत्रः कहने को तो कूड़ा निस्तारण संयंत्र की क्षमता 400 टन है, लेकिन आज तक यह कभी भी अपनी क्षमता के अनुरूप काम नहीं कर पाया। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि आज तकरीबन 25 से तीस फुट ऊंचा कूड़े का पहाड़ इस संयंत्र में खड़ा हो चुका है, जबकि कंपनी के साथ अनुबंध में यह तय किया गया था कि कूड़ा डम्प नहीं किया जाएगा। कंपनी कहती है कि उसकी कूड़ा निस्तारण की क्षमता 400 टन प्रतिदिन है जिसमें कंपनी 10 प्रतिशत को खाद बनाती है तथा 20 प्रतिशत को प्लाटिक आदी छांटकर हटाती है। शेष कूड़े का कंपनी क्या करती है। इसका पता नहीं है।

कूड़ा निस्तारण संयंत्र के बाद जिस तरह से क्षेत्र में प्रदूषण फैला है उससे स्थानीय निवासियों में बड़ा आक्रोश है। इस पर सरकार द्वारा कंपनी को मानकों का पालन करने के लिए आदेश भी जारी किए गए हैं। यहां तक कि विधानसभा में भी यह मामला उठा। जिस पर विधानसभा अध्यक्ष ने एक प्राकलन समिति का गठन विधायक मुन्ना सिंह चौहान की अध्यक्षता में किया। मुन्ना सिंह चौहान ने प्लांट का निरीक्षण किया जिसमें उन्होंने साफ पाया कि मानकों का उल्लंघन किया जा रहा है। जाहिर है कि सरकार को भी पूरी तरह से ज्ञात है कि कूड़ा निस्तारण संयंत्र में मानकां का घोर उल्लंघन किया जा रहा है। हैरानी इस बात की है कि विधानसभा प्राकलन समिति द्वारा दी गई रिपोर्ट के बावजूद सरकार कंपनी पर लगाम नहीं लगा पा रही है, जबकि सरकार कंपनी को कूड़ा संयंत्र के लिए नगर निगम के माध्यम से प्रति माह 92 लाख रुपया दे रही है।

कूड़ा निस्तारण संयंत्रः वर्ष 2009 में जवाहरलाल नेहरू अर्बन, रूरल मिशन के तहत देहरादून के लिए सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट की कवायद आरंभ हुई जिसका कुल बजट 24 करोड़ रखा गया। लेकिन तत्कालीन समय में सरकार की दृढ इच्छाशक्ति की कमी और सराकारी तंत्र की उदसीनता के साथ-साथ कई कानूनी पेंचों के चलते योजना आरंभ नहीं हो पाई और प्लांट का निर्माण लटक गया। इसी बीच देहरादून के सहस्रधारा रोड स्थित ट्रंचिंग ग्राउंड को हटाए जाने के लिए स्थानीय निवासियों द्वारा हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई जिस पर सुप्रीमकोर्ट ने वर्ष 2014 में सरकार को सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट लगाए जाने की मंजूरी प्रदान कर दी। गौर करने वाली बात यह हे कि आज जिस शीशमबाड़ा में यह प्लांट बना हुआ है उसको लेकर स्थानीय निवासियों और शिक्षण संस्थाओं ने सुप्रीम कोर्ट ओैर एनजीटी में अपना विरोध दर्ज किया था। जिसमें शिवालिक इंजीनियरिंग कॉलेज और जी हिमगिरी विश्वविद्यालय प्रमुख थे। इन लोगों का कहना है कि पलांट के लिए जिस स्थान का चयन किया गया वह उचित नहीं है। लेकिन 2014 में सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी ने सभी तर्कों को खारिज करते हुए सरकार को सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट लगाए जाने की मंजूरी दे दी।

मंजूरी के बाद भी तत्कालीन प्रदेश सरकार सुस्त ही रही और दो साल तक बजट और टेंडर की प्रक्रिया में ही बिता दिए गए। दो साल के बाद रेमकी कंपनी को इस प्लांट के निर्माण और संचालन का ठेका दिया गया। आखिरकार 3 अक्टूबर 2016 को इस सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट का शिलान्यास किया गया। उस समय स्थानीय नागरिकों ने इसका भारी विरोध किया तो पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा और कई लोगों को जेल भेजा गया। लेकिन तब तक प्लांट की लागत में बड़ा इजाफा हुआ और कुल बजट 36 करोड़ तक पहुंच गया। आठ एकड़ से भी ज्यादा भूखंड में इस सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट और रिसाइकलिंग प्लांट का निर्माण पूरा हुआ और 1 दिसंबर 2017 से प्लांट में कूड़ा डालना आरंभ हुआ। लेकिन प्लांट का प्रोसेसिंग कार्य पौने दो माह के बाद यानी 23 जनवरी 2018 को आरंभ हुआ क्यांकि इस प्रोसेसिंग प्लांट का उद्घाटन नहीं हो पाया था। यानी महज उद्घाटन के चलते प्लांट में प्रतिदिन 300 टन के करीब कूड़ा डाला जाता रहा जिससे यह सयंत्र एक तरह से कूड़ा निस्तारण केंद्र बनता चला गया। 23 जनवरी को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत द्वारा प्लांट का उद्घाटन किया गया, लेकिन तक तक प्लांट में कूडे़ का ढेर होने से इलाके में भयंकर बदबू पैदा हो चुकी थी जो कि आज तक अनवरत जारी है। उद्घाटन के दौरान बदबू को लेकर स्वयं मुख्यमंत्री ने भारी नराजगी भी जताई और इसके निस्तारण के आदेश भी दिए।

आखिरकार प्रदेश का पहला सबसे आधुनिक कहे जाने वाला सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट आरंभ हुआ, लेकिन बदबू के चलते स्थानीय निवासियों में आक्रोश फैलता ही रहा। स्वयं मुख्यमंत्री द्वारा बदबू के निस्तारण के लिए आदेश देने के बाद नगर निगम ने बदबू और वायु प्रदूषण की जांच के लिए एजेंसी को कार्य सौंपा जिसमें चर्चा है कि जानबूझ कर बदबू कम होने की रिपार्ट दी गई। इस बात को स्थानीय निवासी इसलिए सही नहीं मान रहे हैं कि आज तक निरंतर प्लांट से भंयकर बदबू आ रही है। यहां तक कि कूड़े से लिचर्ड वाटर निकल कर क्षेत्र का भूमिगत जल और प्लांट से सटकर बहती आसन नदी को प्रदूषित कर रहा है। इससे साफ है कि नगर निगम और जांच एजेंसी द्वारा इसमें बड़ा खेल किया गया।

रेमकी कंपनी ने इस प्लांट से कूड़े का निस्तारण, रिसाइक्लिंग और कम्पोस्ट खाद बनाने का अनुबंध तय किया था। वैसे यह बात गौर करने वाली है कि रेमकी कंपनी पहले ही प्रदेश में ब्लेक लिस्टेड कंपनी है। पूर्व में देहरादून में आईएसबीटी के निर्माण में रेमकी कंपनी द्वारा भारी लापरवाही बरती गई। जिसका खामियाजा आज तक आईएसबीटी भुगत रहा है। इसी लापरवाही के चलते रेमकी कंपनी को प्रदेश में ब्लैक लिस्ट किया गया था। लेकिन तत्कालीन कांग्रेस सरकार और नगर निगम प्रशासन द्वारा रेमकी कंपनी के हितों के अनुरूप शर्तों को लचीला किया गया जिससे कंपनी को आसानी से प्लांट के निर्माण और संचालन का ठेका हासिल हो पाया।

कंपनी का बड़ा षड्यंत्रः रेमकी कंपनी के बारे में चर्चा है कि कंपनी अपने काम को पूरा नहीं कर पाने की दिशा में एक बड़े खेल को अंजाम देने में लगी हुई है। माना जा रहा है कि कंपनी जानबूझ कर प्लांट से प्रदूषण को रोकने में नाकामी का वातावरण बना रही है जिससे स्थानीय निवासियों में आक्रोश फैले और सरकार इस प्लांट को बंदकर कंपनी को रिसाइक्लिंग और कम्पोस्ट निर्माण के कूड़े से बिजली बनाने का संयंत्र लगाने की इजाजत दे दे। कंपनी सरकार को अपना प्रस्ताव भेज चुकी है। स्वयं कंपनी के प्लांट सुपरवाइजर प्रभाकर इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि जल्द ही सरकार कंपनी के कूड़े से बिजली बनाने के प्रस्ताव को मंजूर कर देगी। प्रभाकर का कहना है कि प्लांट में 300 टन कूड़ा रोज आ रहा है जिसमें महज 10 फीसदी को ही कम्पोस्ट में परिवर्तित किया जा रहा है और 20 फीसदी कूड़े को छांट कर उससे अन डिग्रडेबिल कूडे़ हटाकर निस्तारण किया जा रहा है। इस तरह से तो शेष 70 प्रतिशत कूड़ा बचता है जिसको प्लांट में डम्प किया जा रहा है जिसके चलते 25 से 30 फिट ऊंचा कूड़े का पहाड़ खड़ा हो गया है। अगर प्रतिदिन ऐसा ही होता रहा तो बहुत जल्द नई दिल्ली की तरह शीशमबाड़ा में कई मीटर ऊंचे कूड़े का पहाड़ खड़ा हो जाए तो अचरज नहीं होगा, क्योंकि आज प्लांट की हालत को देखें तो रोज 20 टन कम्पोट खाद कंपनी द्वारा बनाई जा रही है, लेकिन उसकी गुणवत्ता में कमी होने के चलते खाद का खरीददार नहीं मिल रहा है। हालांकि प्लांट के सुपरवाइजर का कहना है कि प्लांट की खाद का सबसे बड़ा खरीददार कøभको है जिसे खाद बेची जा रही है, लेकिन जिस तरह से प्लांट के भीतर खाद का भी एक बड़ा पहाड़ खड़ा हो चुका है उससे तो कंपनी का दावा भी शक पैदा कर रहा है।


वायु प्रदूषण की सबसे बड़ी समस्याः शीशम बाड़ा कूड़ा निस्तारण संयंत्र से क्षेत्र में वायु प्रदूषण की समस्या हो रही है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि महज एक वर्ष में क्षेत्र में सांस की बीमारियां लोगों में बढ़ी हैं। जी मिचलाना और सिरदर्द जैसी समस्याएं जो कि पहले इस क्षेत्र में कभी देखी नहीं गई थीं, वह भी अब लोगों को दुखी किए हुए हैं। लोग तो यहां तक कहते हैं कि इस प्लांट के कारण क्षेत्र में कैंसर की बीमारी भी पनपने लगी है। इस प्लांट के विरोध में आगे रहे सत्य प्रकाश जुयाल की मौत कैंसर से ही हुई है। हालांकि अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता कि सत्य प्रकाश जुयाल की मौत का करण प्लांट का प्रदूषण रहा है या नहीं, लेकिन कहा जा रहा है कि आने वाले समय में दिल्ली की तरह यहां भी कैंसर के मरीज इस क्षेत्र में दिखाई देने लगेंगे। प्लांट के सामने पूर्व से ही स्थापित जी हिमगिरी विश्वविद्यालय द्वारा प्लांट से होने वाले वायु प्रदूषण को लेकर नियमित रिसर्च की जा रही है। इसके तहत हवा के नमूनों को एकत्र कर वायु प्रदूषण की मात्रा को सरकार के साथ-साथ सभी सक्षम संस्थाओं को नियमित भेजा जा रहा है। विश्वविद्यालय द्वारा एकत्र किए गए हवा के नमूनां में प्रदूषण की मात्रा बहुत गंभीर स्थिति में पाई गई है।

जल प्रदूषणः प्लांट से कूड़े के निस्तारण और कूड़े को डम्प करने के लिए लिचर्ड वाटर के लिए कोई ठोस व्यवस्था कंपनी द्वारा नहीं बनाई गई है। दो बड़े-बड़े तालाब बनाए गए हैं जिनमें लिचर्ड वाटर जमा होता है। इन तालाबां की सतह पर तीन लेयर में प्लास्टिक बिछाया गया है जिससे प्रदूषित पानी भूमिगत जल से न मिल पाए, लेकिन यह प्रयास पूरी तरह से नाकाफी है। आज साफ तौर पर देखा जा सकता है कि प्लांट के कूड़े के पहाड़ से गंदा पानी निकलता हुआ अन्य स्थानां पर जमा हो रहा है और सीधे भूमिगत जल से मिल रहा है। साथ ही जब तालाब पूरा भर जाता है तो कंपनी द्वारा तालाब से एक गुप्त पाईप लाईन डाल कर उस भयंकर प्रदूषित पानी को पम्प द्वारा प्लांट के बाहर वन क्षेत्र में डाला जा रहा है जिससे वह प्रदूषित जल सीधे आसन नदी में मिल रहा है। इसके अलावा कंपनी द्वारा प्लांट की चार दिवारी से सटा तकरीबन 30 मीटर लम्बा नाला बनाया हुआ है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह नाला बरसाती जल की निकासी के लिए बनाया गया है। यह नाला आज कम से कम पांच से छह फुट गहरा है और प्रदूषित लिचर्ड वाटर से लबालब है। यह जल सीधे भूमि में समा रहा है और भूमिगत जल को प्रदूषित कर रहा है।

शिवालिक इंजीनियरिंग कॉलेज द्वारा प्लांट की स्थापना के बाद क्षेत्र में जल प्रदूषण के मामले में एक सर्वे और अनुसंधान किया। जिसमें कृषि विज्ञान के छात्रों ने भूमिगत जल के नमूने लिये। इन नमूनां में बड़ी गंभीर समस्या मिली। जिसमें यह पाया गया कि इस क्षेत्र का पानी पीने योग्य ही नहीं है। जल में 700 एमएल प्रदूषित तत्व पाए गए जो कि मनुष्य के लिए बहुत खतरनाक हैं।  आसन नदी ओैर पक्षी विहार को बड़ा खतराः अभी कुछ समय पूर्व भारी बरसात से प्लांट से सटे हुए वन क्षेत्र में बरसात का जल इतना तेजी से आया कि उससे एक तरह की बाढ़ आ गई। बाढ़ प्लांट की चार दिवारी के एक बड़े हिस्से को तोड़ती हुई सीधे प्लांट में घुस गई। बाढ़ का पानी अपने साथ प्लांट का कूड़ा और प्रदूषित जल को लेता हुआ सीधे आसन नदी में मिल गया। कंपनी ने भविष्य में इस तरह के हालात न हां, को रोकने के बजाय प्लांट की चार दिवारी में लोहे की जाली लगा कर पाईप फिट कर दिए हैं जिससे बरसात का पानी निरंतर प्लांट में आता है और प्लांट के कूड़े और लिचर्ड वाटर को अपने साथ लेकर आसन नदी में समा जाता है।

आसन नदी प्लांट से सटकर बहती है और आगे जाकर विकास नगर, डाक पत्थर में चली जाती है। इसी आसन नदी पर प्रदेश का आसन्न बैराज स्थापित है। जिसमें प्रतिवर्ष सुदूर विदेशों से उड़कर कई प्रजातियांं के पक्षी आते हैं। इन पक्षियों के कारण उत्तराखण्ड का आसन्न बैराज एक महत्वपूर्ण स्थान बना हुआ है। इस प्लांट से निकलने वाला प्रदूषित जल आसन नदी को भी प्रदूषित कर रहा है। इससे नदी के साथ ही विदेशी पक्षियों के जीवन को भी बड़ा खतरा हो सकता है।

इसके अलावा एक बात यह भी सामने आई है कि प्लांट से निकलने वाले लिचर्ड वाटर और कूड़े को साफ करने के लिए उपयोग में लाये गये पानी को साफ करने के लिए एक संयत्र का निर्माण भी किया जाना है। लेकिन दो वर्ष से यह संयंत्र निर्माणाधीन ही है। जबकि इसके निर्माण के बाद प्रतिदिन 30 हजार लीटर पानी को साफ करके अन्य उपयोग में लाया जा सकता है। कंपनी के प्लांट सुपरवाइजर का कहना है कि जल्द ही प्लांट का निर्माण पूरा हो जाएगा और इसके बाद प्रदूषित जल को साफ करके बाहर छोड़ जाएगा या उसका अन्य काम में उपयोग लाया जाएगा।


तकनीकी छलः शीशमबाड़ा कूड़ा निस्तारण संयंत्र के मामले में कई ऐसे पहलू भी हैं जो कि अपने आप में बड़े सवाल खड़े करते हैं। भूख हड़ताल पर बैठे हुए पत्रकार सतपाल धईया आरोप लगाते हैं कि सरकार ने प्लांट के प्रस्ताव में न तो किसी से कोई सलाह मशविरा लिया और न ही जन सुनवाई की गई। यहां तक कि ग्रामसभा भयखाला के प्रधान से भी कोई अनापत्ति प्रमाण नहीं लिया है। आरोप तो यहां तक लगाए जा रहे हैं कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस क्षेत्र में भूमिगत जल 75 मीटर नीचे बताया है, जबकि इस पूरे क्षेत्र में महज 8 से दस फुट तक भूमिगत जल उपलब्ध होता है। इसका मुख्य कारण आसन नदी और खेती की भूमि है जिसके चलते आसानी से कुछ ही फिट नीचे भूमिगत जल उपलब्ध हो रहा है। प्लांट के सुपरवाइजर प्रभाकर स्वयं मान रहे हैं कि इस क्षेत्र में भूमिगत जल सात-आठ फीट गहरा है। इससे साफ है कि कहीं न कहीं सरकार और कंपनी द्वारा जानबूझ कर जरूरी पर्यावरण के मानकों को अपने हितों के अनुसार छुपाया या बदला गया है।

 

बात अपनी-अपनी

हमने सरकार को कहा है कि इस कूड़ा संयंत्र को यहां ये स्थानांतरित करे। यह मानकां पर नहीं बना हुआ है। सरकार ने भी इस पर सहमति दे दी है। हमें जानकारी मिली है कि रुड़की के आसपास इसके लिए जगह भी देखी जा रही है। अभी प्रदेश में पंचायत चुनाव की आचार संहिता लगी हुई है इसके बाद इसकी प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
सहदेव सिंह, पुण्डीर विधायक सहसपुर

संयंत्र पर जमा कूड़े से क्षेत्र का पर्यावरण खराब हो चुका है। भूजल भी इतना प्रदूषित हो गया है कि उसे पी नहीं सकते, जबकि पहले ऐसा नहीं था। हमने इस संयंत्र के बाद हवा में प्रदूषण की नियमित जांच की और सरकार को लिखा कि इससे हवा में प्रदूषण बहुत अधिक मात्रा हो रहा है। लेकिन न तो सरकार इस पर कोई ध्यान दे रही है और न ही प्रशासन इस पर कोई काम कर रहा है। अगर सरकार इस संयंत्र को हटा नहीं सकती तो कम से कम कुछ ऐसा तो करे कि जिससे प्रदूषण न हो।
बिष्णु माथुर, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हिमगिरी विश्वविद्यालय

संयंत्र लगाए जाने के बाद हमारे कॉलेज के कृषि के छात्रां ने भूमिगत जल पर रिसर्च की और नमूने लिए। हमने पाया कि 700 एमएम पाल्यूशन के पार्टिकल वाटर में पैदा हो चुके हैं। पानी पीने योग्य नहीं है। आने वाले समय में प्रदूषण भूमिगत जल को बर्बाद कर देगा। आसन नदी को भी प्रदूषित कर रहा है।
डॉ. संदीप विजय, निदेशक शिवालिक इंजीनियरिंग कॉलेज

मैं कई वर्षों से पत्रकारिता कर रहा हूं। मेरे क्षेत्र में कूड़ा संयंत्र लगाया गया लेकिन इससे इस पूरे क्षेत्र को बहुत समस्याएं हो रही हैं। लोगों ने विरोध किया, लेकिन किसी न कोई बात सुनी नहीं मजबूरन मुझे भूख हड़ताल पर बैठना पड़ा। मुझे सरकार ने जबरन भूख हड़ताल से उठाया और मेरा आमरण अनशन तोड़ा। सरकार संयंत्र को यहां से कहीं और स्थापित करे। जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जाती तब तक हमारा आंदोलन रुकने वाला नहीं है।
सतपाल धानिया, पत्रकार

कूड़ा है तो पॉल्युशन तो होगा ही, लेकिन हम हर रोज उसकी मॉनिटरिंग कर रहे हैं। और हमलोग ब्लीचिंग और सोल्यूशन का स्प्रे भी नियमित हर रोज कर रहे हैं। जल्द ही हमारा पानी को साफ करने वाला संयंत्र का काम पूरा हो जाएगा जिससे संयंत्र का गंदा पानी पूरी तरह से प्रदूषण से मुक्त होकर उपयोग में लाया जायेगा। हम कूड़े से बिजली बनाने का प्रस्ताव सरकार को भेज चुके हैं। हमें लगता है कि जल्द ही हमारे प्रस्ताव पर सरकार की सहमति मिल जाएगी।
प्रभाकर, सुपरवाइजर कूड़ा निस्तारण संयत्र

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