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निकाय चुनावों में दावों और आश्वासनों की भरमार है। लेकिन नगरीय नियोजन के प्लान पर कोई बात नहीं करना चाहता

निकाय चुनावों की राजनीति के बीच नगरीय नियोजन का सबसे महत्वपूर्ण सवाल दबकर रह गया है। कमजोर निकायों को राजनीति ने अपनी प्रयोगशाला तो बना दिया, लेकिन इनके सशक्तिकरण की तरफ से मुंह मोड़ लिया। निकाय चुनावों में उतरे उम्मीदवार भले ही वादों एवं घोषणाओं की बौछार कर रहे हों, लेकिन इन सवालों का जवाब इनके पास भी नहीं कि नगरीय विकास में नगर निकायों का कितना योगदान रहा है? निकाय खुद कितने सशक्त हो पाए हैं? क्या नगरीय सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण हो पाया है? आखिर तीन दशक से अधिक समय बाद भी लोकल सेल्फ गवर्नमेंट अधिकारविहीन क्यों है? आर्थिक रूप से कमजोर निकाय मजबूत क्यों नहीं हो पाए? क्या कारण है कि राज्य सरकार 74वें संविधान संशोधन की मूल भावना के अनुरूप नगरीय निकायों को स्थापित कर पाने में नाकाम रही?

कहने को तो निकायों को सशक्त बनाने के लिए 74 वें संविधान संशोधन के तहत कई अधिकार मिले हैं लेकिन इसके बाद भी निकायों की स्थिति कमजोर होती जा रही है। निकायों को अधिकार संपन्न बनाने की बात दशकों पहले से होती आई है। वर्ष 1960 तक इनको कई तरह के अधिकार प्राप्त थे लेकिन सन् 70 के बाद निकायों के अधिकार एक-एक कर अन्य विभागों के अधीन होते चले गए और ये अधिकार विहीनता की स्थिति में आ गए। इन्हें अधिकार संपन्न बनाने के लिए वर्ष 1993 में नरसिंह राव सरकार के समय शहरी शासन (नगरपालिका) का विधेयक अस्तित्व में आया। इसमें नगरीय शासन से संबंधित अनुच्छेदों का वर्णन संविधान की 12वीं अनुसूची के अनुच्छेद 243(पी) से लेकर 243 जेड जी तक किया गया। शहरी नियोजन को दुरुस्त करने के लिए त्रिस्तरीय निकाय व्यवस्था बनाई गई। नगर निगम, नगरपालिकाएं एवं नगर निगम अस्तित्व में आए। 18 से अधिक विषयों के अधिकार इन निकायों को सौंपे गए। तब स्थानीय स्वशासन का आशय ऐसे शासन से लगाया गया था जो अपने क्षेत्र में प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करेगा। लेकिन हकीकत यह है कि निकाय आज भी अपनी वित्तीय व्यवस्थाओं को मजबूत नहीं कर पाए लेकिन समय के साथ इनका विस्तारीकरण अवश्य हुआ। जबकि 74वें संविधान संधोशन के पीछे का मूल लक्ष्य यही था कि नगरीय सत्ता का न सिर्फ विकेंद्रीकरण होगा, बल्कि कार्यों का भी विभाजन होगा।

राज्य गठन के बाद की स्थिति को देखें तो देहरादून, हल्द्वानी, रुद्रपुर, काशीपुर, रुड़की, ऋषिकेश, कोटद्वार नगर निगम के साथ ही कई नगरपालिकाओं एवं नगर पंचायतों का गठन भी इसी आशय के साथ हुआ कि ये 74 वें संविधान संशोधन के उद्देश्यों के अनुरूप स्थानीय संसाधनों को मजबूती प्रदान करेंगे। पहले प्राथमिक विद्यालयों, पशु चिकित्सालयों, डिस्पेंसरी, सड़क सुधार, पशु वधशाला, स्ट्रीट लाईट, वाटर सप्लाई, बिजली बनाने एवं उसका वितरण करने, कचरा निस्तारण, बिल्डिंग प्लान स्वीकøत करने और इसकी जांच करने का अधिकार नगरीय निकायों के पास था। यहां तक कि चुंगी और टोल टैक्स वसूलने की जिम्मेदारी भी निकायों को सौंपी गई थी। लेकिन आज पानी का विषय जल संस्थान एवं पेयजल निगम के पास, प्राथमिक शिक्षा शिक्षा विभाग के पास, सड़कें लोक निर्माण विभाग के पास, भूमि प्रबंधन राजस्व विभाग के पास और टाउन प्लानिंग के अधिकार प्राधिकरणों के अधीन हो गए हैं। इस तरह से निकायों के आर्थिक सशक्तिकरण का रास्ता बंद कर दिया गया जिससे इन निकायों की हालत दिन प्रति दिन बदतर होती जा रही है। इनके वार्ड दर वार्ड समस्याओं से जूझ रहे हैं और ये पूरी तरह से सरकारी सहायता पर निर्भर हो चुके हैं। संसाधनविहीनता की स्थिति में जनसुविधाएं बढ़ने के बजाय सिकुड़ती जा रही हैं। नगरीय जनता जनसुविधाओं की खातिर सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर है तो निकाय प्रतिनिधि कमजोर वित्तीय हालतों का हवाला देकर जनता से किए उन वादों से बाद में मुकर जाते हैं जो इन्होंने निकाय चुनावों के समय नगरीय जनता से किए होते हैं। दूसरी तरफ राजनीतिक कारणों की खातिर सरकारें नए नगरीय निकायों का गठन कर देती हैं।

पूर्व में केंद्र सरकार ने एक गाइडलाइन बनाई थी जिसमें राज्य, निकाय एवं वैकल्पिक सुधारों का त्रिस्तरीय फार्मूला तय किया गया था लेकिन यह फार्मूला भी काम नहीं कर पा रहा है। निकाय स्तरीय सुधारों में जहां सभी निकायों को ई-गवर्नेंस लागू करना था वहीं राज्य स्तरीय सुधारों के तहत जिला योजना समिति के गठन के साथ ही किराया नियंत्रण कानून में सुधार करना था। इसके साथ ही स्टांप ड्यूटी का भी सरलीयकरण करना था। वहीं वैकल्पिक सुधारों के तहत जमीन जायदाद की रजिस्ट्री ऑन लाइन करने, शहरी विकास विभाग का पुनर्गठन करने, पब्लिक प्राइवेट पार्टनशिप को बढ़ावा देने, भवन निर्माण के दौरान रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य करने, भवन उपनियमों का रिवीजन करना आदि था लेकिन इसमें जिस गति से काम होना चाहिए था वह नहीं हो पाया। इसके अलावा 74वें संविधान संशोधन के तहत शहरी योजना का खाका खींचने के साथ ही सड़क, पुल निर्माण, वनीकरण, सामाजिक एवं आर्थिक योजनाएं, अग्निशमन योजनाएं, गरीब तबके की सामाजिक सुरक्षा की योजनाएं, स्वास्थ्य आदि से संबंधी कार्य भी शहरी निकायों को मिलने थे लेकिन अभी भी काम पुरानी व्यवस्था के तहत ही हो रहे हैं। मोहल्ला समितियां भी सक्रिय नहीं हो पा रही हैं। पालिकाओं के प्रस्ताव भी विवादों में रहे हैं। नगरों के कई प्लान लंबित चल रहे हैं। केंद्र से वित्तीय सहायता न मिलने से कई योजनाएं या तो बंद पड़ी हैं या फिर शुरू ही नहीं हो पा रही हैं। निकायों के नेतृत्व और प्रबंधन क्षमता पर भी जनता अब सवाल उठाने लगी है। बिजली, पानी, सड़क, जल निकासी, पेयजल सुविधा, यातायात, अतिक्रमण आदि कई ऐसी समस्याएं हैं जिनका जाल निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। शहरों के ऊपर रोजगार के अवसरों, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर चिकित्सा और मनोजरंजन की सुविधाओं का दबाव भी लगातार बढ़ रहा है। शहरी विकास मंत्रालय और अर्बन सेक्टर डेवलपमेंट इन्वेस्टमेंट प्रोगोम भी शहरी निकायों के लिए मददगार नहीं बन पाया।

राज्य बनने से बाद से अब तक प्रदेश की नगरीय जनसंख्या में 40 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हो चुकी है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखण्ड की जनसंख्या 10086292 है। इसमें से नगरीय जनसंख्या 3049338 है यानी कुल जनसंख्या का यह 30.23 प्रतिशत है। जिसमें बीते सात वर्षों और बढ़ोतरी हो चुकी है। प्रदेश के नगरों की संरचना पर नजर डालें तो भौगोलिक रूप से सभी की अलग-अलग पहचान रही है। अब नए नगरीय निकाय हों या फिर पुराने सभी समस्यायों से जूझ रहे हैं। जहां देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर जैसे कई शहर दर्जनों छोटे नगरों को अपने में समेटे हैं तो वहीं नैनीताल, मसूरी, गोपेश्वर, जोशीमठ, लैंसडौन, पौड़ी, डीडीहाट, रानीखेत जैसे जटिल पहाड़ी में बसे नगर हैं जहां विकास करना किसी चुनौती से कम नहीं है। पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत जैसे घाटियों में स्थित अनियोजित नगर भी हैं। श्रीनगर, उत्तरकाशी, देवप्रयाग, कणप्रयाग, विष्णुप्रयाग, रूद्रप्रयाग जैसे संगम और नदी तटों पर बसे नगर हैं जहां जगह की कमी सुविधाओं के विस्तार में रोड़ा बनती है। वहीं हल्द्वानी, काठगोदाम, रामनगर, हरिद्वार, टनकपुर, कोटद्वार, ऋषिकेश जैसे नगर हैं जो पर्वतीय प्रवेश द्वार के नाम से जाने जाते हैं। यहां निरंतर जनसंख्या का दबाव बढ़ रहा है। इसके अलावा लैंसडौन, रानीखेत एवं चकराता जैसे छावनी क्षेत्र भी समस्याओं से ग्रस्त चल रहे हैं। अल्मोड़ा, श्रीनगर, द्वाराहाट, काशीपुर जैसे प्राचीन नगरों के नगरीय निकाय भी समस्यायों से अटे पड़े हैं। धारचूला, मुनस्यारी, गंगोलीहाट, बेरीनाग जैसे कई ऐसे छोटे नगर हैं जो पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं लेकिन आर्थिक अभाव में इनका बेहतर नियोजन नहीं हो पा रहा है। निकायों के समक्ष जो बड़ी चुनौती सामने आ रही है वह है तेजी से नगरीय जनसंख्या में हो रही बढ़ोतरी। वर्ष 2001 में नगरीय जनसंख्या 2170245 यानी 25.6 प्रतिशत थी जो 2011 की जनगणना के मुताबिक 30.56 प्रतिशत हो गई। वर्ष 2011 के आंकड़ों के अनुसार नगरीय जनसंख्या के परिदृश्य पर नजर डालें तो देहरादून की जनसंख्या 55.52 प्रतिशत, हरिद्वार की 36.66 प्रतिशत, ऊधमसिंह नगर की 35.58 प्रतिशत, नैनीताल की 38.94 प्रतिशत, पिथौरागढ़ की 14.40 प्रतिशत, अल्मोड़ा की 10.01 प्रतिशत, चंपावत की 14.77 प्रतिशत, बागेश्वर की 3.49 प्रतिशत, पौढ़ी गढ़वाल की 16.40 प्रतिशत, उत्तरकाशी की 7.36 प्रतिशत, चमोली की 15.17 प्रतिशत, टिहरी गढ़वाल की 11.33 प्रतिशत एवं रुद्रप्रयाग की 4.10 प्रतिशत है, जो लगातार बढ़ रही है।

एक बड़ा तथ्य यह भी है कि जिन नागरिक सुविधाओं की कमी के चलते लोग गांव छोड़कर शहर आ रहे हैं वह नगरों में भी उन्हें प्रदान नहीं हो पा रही हैं लेकिन बावजूद इसके नगरीकरण की प्रक्रिया तेजी से बढ़ रही है। आज कुमाऊं मंडल के पिथौरागढ़ जिले में पिथौरागढ़, धारचूला, डीडीहाट, गंगोलीहाट, बेरीनाग, बागेश्वर जिले में बागेश्वर एवं कपकोट, अल्मोडा जिले में अल्मोड़ा, रानीखेत, द्वाराहाट, चौखुटिया, भिकियासैंण, खत्याड़ी, चिलियानौला, चंपावत जनपद में लोहाघाट, टनकपुर, बनबसा, चंपावत, नैनीताल जनपद में हल्द्वानी, नैनीताल, मुखानी, दमुवाढूंगा, रामनगर, भवाली, लालकुआं, कालाढूंगी, भीमताल तो जनपद ऊधमसिंह नगर में काशीपुर, रूद्रपुर, जसपुर, किच्छा, बाजपुर, सितारगंज, नाग्ला, खटीमा, गदरपुर, शक्तिफार्म, हरिपुर, दिनेशपुर तो वहीं गढ़वाल मंडल के उत्तरकाशी जिले में बड़कोट, उत्तरकाशी, गंगोत्री, पुरोला, चिन्यालीसौड़, नौगांव एवं चमोली जिले में जोशीमठ, कर्णप्रयाग, गौचर, बद्रीनाथ, नंदप्रयाग, पोखरी, गैरसैंण, जनपद टिहरी गढ़वाल में टिहरी, नरेंद्रनगर, मुनि की रेती, देवप्रयाग, कीर्तिनगर, चंबा, ढालवाल, जनपद देहरादून में डोईवाला, हर्बर्टपुर, विकासनगर, चकराता, ऋषिकेश, मसूरी, लंढौर, रायपुर और पौड़ी गढ़वाल में श्रीनगर, लैंसडाउन, कोटद्वार, जोंक, दुगड्डा, काशीरामपुर तो रूद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ ऊखीमठ, अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग के साथ ही हरिद्वार में रूड़की, हरिद्वार, मंगलौर, शिवालिकनगर, लक्सर, झबरेड़ा, भगवानपुर, पिरान कलियर, महावतपुर, नगला इमरती, रानीपुर, बहादराबाद, जगजीतपुर सहित बीस से अधिक प्रमुख नगर हैं। इन सबके विकास की जिम्मेदारी उन नगरीय निकायों के ऊपर है जिनकी खुद की माली हालत बेहद दयनीय है। इन्हीं कमजोर निकायों पर नगरीय विकास टिका हुआ है। कुल मिलाकर निकाय चुनावों के इस महासमर में दावों एवं आश्वासनों की भरमार तो है लेकिन नगरीय नियोजन का प्लान सिरे से गायब है।

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