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Uttarakhand

पावर सेंटर के हमेशा प्रकाश रहे ओम प्रकाश

उत्तराखण्ड के 16वें मुख्य सचिव और वरिष्ठ नौकरशाह ओम प्रकाश की नई राह बहुत कठिन मानी जा रहा है। अब तक अपनी कार्यशैली के चलते शासन में पावर सेंटर के तौर पर उभर चुके ओम प्रकाश को एक साथ कई चुनौतियों से भी पार पाना होगा। हालांकि यह भी माना जा रहा है कि जिस तरह से ओम प्रकाश मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के सबसे चहेते और नजदीकी नौकरशाह के तौर पर पहचाने जाते रहे हैं उससे उनके लिए नई पारी खेलने में कोई खास परेशानियां तो नहीं होंगी लेकिन जिस तरह उनकी कार्यशैली को देखी जाती रही है उससे कई आशंकाएं भी जताई जा रही है।

1987 बैच के ओम प्रकाश के शासकीय अनुभव की बात करें तो उत्तराखण्ड बनने के बाद से ही प्रदेश के शासन-प्रशासन में अपनी पैठ बनाने में सफल रहे। तब से देहरादून जिले की कमान ओम प्रकाश को मिली थी। उद्योग और वित्त विभाग को छोड़कर तकरीबन हर विभाग में बखूबी अपनी जिम्मेदारी का पालन कर चुके हैं। वर्ष 2012 में प्रमुख सचिव बनाए गए और 2017 में अपर मुख्य सचिव के पर पर तैनाती दी गई।

वर्तमान सरकार के साथ ओम प्रकाश की सबसे ज्यादा ट्यूनिंग बताई जाती रही है। मुख्यमंत्री त्रिवेद्र रावत के साथ उनका पुराना नाता रहा है। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में त्रिवेंद्र रावत कृषि मंत्री थे और ओम प्रकाश कृषि सचिव। तब से लेकर आज तक वे मुख्यमंत्री के सबसे खास नौकरशाह के तौर पर अपने आप को स्थापित कर चुके हैं।

2017 में सत्ता परिर्वतन के बाद त्रिवेंद्र रावत मुख्यमंत्री बने तब ओम प्रकाश को अपर मुख्य सचिव के पद पर तैनाती दी गई। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और शासन-सत्ता के बीच बेहतर सामंजस्य की क्षमता के चलते 2017 से अब तक अपने आपको शासन में सबसे मजबूत ताकत का केंद्र बनाने में सफल रहे। निवर्तमान मुख्य सचिव उत्पल कुमार के कार्यकाल में भी उनकी ताकत में कोई कमी नहीं आई। तमाम कयासों और चर्चा के बीच वे ताकत के केंद्र में रहे।

हालांकि यह भी देखा गया है कि त्रिवेंद्र रावत के विभागों के सचिवों और नौकरशाहों के बीच मुख्यमंत्री के खास और चहेते बनने की होड़ भी इस दौरान जमकर हुई लेकिन ओम प्रकाश की राह में बड़ी बाधा पेदा कर पाने में कोई नौकरशाह कामयाब हुआ हो ऐसा दिखाई नहीं दिया।

उत्तराखण्ड में खास तौर पर सचिवालय के भीतर विगत कई वर्षों से एक नई कार्यशैली पनप चुकी है। यह शैली शासन ओैर सत्ता के बीच एक मजबूत स्तंभ के तौर पर मानी गई है। प्रदेश की पहली निवार्चित एनडी तिवारी सरकार में ही इसके बीज सचिवालय में बोये गए थे। तिवारी सरकार के समय में वरिष्ठ नौकरशाह एस रामचंद्रन से शुरू हुआ यह सफर कर्मठ और अनुशासित माने जाने वाले बीसी खण्डूड़ी की सरकार में भी जम कर फला-फूला। निंशक सरकार के समय में तो सत्ता और शासन के कई केंद्र बन चुके थे। कांग्रेस की बहुगुणा और हरीश रावत सरकार में तो हालत यहां तक बन चुके थे कि मुख्य सचिव और अपर मुख्य सचिव के बीच ताकत का केंद्र बनने में ही पूरी क्षमता लगाई जाने लगी। बावजूद इसके सचिवालय में ताकत का केंद्र के काकस को कोई तोड़ नहीं पाया।

हरीश रावत सरकार में तो स्थिति इस कदर हो चली थी कि कभी सचिवालय में पावर सेंटर की धुरी रहे राकेश शर्मा के मुख्य सचिव पद से सेवानिवृत्ति के बाद भी हरीश रावत ने मुख्य सचिव पद सृजित कर उनको तैनाती दी। हालांकि यह तैनाती निसंवर्गीय ही थी लेकिन इससे एक बात तो साफ हो गई थी कि मुख्यमंत्री भी सचिवालय में ताकत के केंद्र को बनाए रखने में ही ज्यादा रुचि रखते रहे।

त्रिवेंद्र रावत मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सबसे चाहेते और नजदीकी नौकरशाह ओम प्रकाश को अपर मुख्य सचिव के पद पर तैनात किया। यहीं से ओम प्रकाश के हाथ सत्ता और शासन की बागडोर संभालने में बेहतर सामंजस्य बनाया कि वे इस सरकार में एक बड़े ताकत का केन्द्र बन कर उभरते चले गए और आज वे मुख्य सचिव के पद पर पहुंच गए।

ओम प्रकाश के मुख्य सचिव बनने के बाद अब सचिवालय और शासन में मुख्य सचिव के अलावा कोई अन्य ताकत का केंद्र बनने पर लगाम लगती दिखाई दे रही है। मौजूदा हालात में अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी दूसरी सबसे वरिष्ठ नौकरशाह है लेकिन जिस तरह से उनकी कार्यशैली रही है वे सत्ता-शासन में पावर सेंटर से परहेज करती रही है। फिलहाल राज्य की नौकरशाही में ऐसा कोई नौकरशाह नहीं है जो अब मुख्य सचिव से इतर कोई अन्य ताकत के केंद्र के तौर पर उभर सके। हालांकि पीसीएस और आईएएस लॉबी के बीच मतभेद और कार्य के बंटवारे को लेकर मैदानी ओर पर्वतीय मूल के नौकरशाहों के बीच जरूर कुछ न कुछ मतभेद रहा है जिसका असर अब ओम प्रकाश के मुख्य साचिव बनने के बाद हो सकता है। चर्चा है कि इनकी कार्यशैली अधिकारियों में क्षेत्रवाद को देखने की रही है उसका असर एक बार फिर सचिवालय और शासन में देखने को मिल सकता है। अगर ऐसा हुआ तो फिर कोई न कोई पावर के केंद्र का उदय भी हो सकता है।

हालांकि यह भी देखा गया है कि ओम प्रकाश अपनी क्षमता के चलते अपर मुख्य सचिव पद से पूर्व भी शासन में अपनी गहरी पैठ इस कदर बना चुके थे कि इनको किनारे लगाने का प्रयास कभी सफल नहीं हुआ। इसका असर यह देखा गया कि ओम प्रकाश के पीछे अनेक विवाद सामने आते चले गए। लेकिन उन विवादों से ओम प्रकाश पर कोई फर्क पड़ा हो यह कभी देखने में नहीं आया।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के अपर मुख्य सचिव पद के अलावा ओम प्रकाश के पास खनन, प्रशिक्षण एवं तकनीकी शिक्षा, लोक निर्माण, राज्य संपत्ति और कोशल विकास विभाग जैसे अहम पद रहे हैं। जबकि इन विभागों में ही सबसे ज्यादा विवाद समाने आ चुके हैं। प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट कौशल विकास विभाग में फर्जी प्रशिक्षण केंद्रों का मामला तक समाने आ चुका है और प्रदेश में सड़कों की दुर्शशा और लोक निर्माण विभाग की लचर कार्यप्रणाली से भी तमाम तरह के विवाद सामने आ चुके हैं। इनमें कई विवाद ऐसे भी हुए हैं कि घोषित और स्वीकृत सड़कों के निर्माण को समय पर पूरा न होना या निर्माण की कार्यवाही को लटकाना आदी जैसे विवाद है जिनमें विधायकों की नाराजगी के विवाद सामने आ चुके हैं।

प्रदेश में खनन विभाग सबसे चार्चित रहा है। अवैध खनन पर लगाम न लगाने में खनन विभाग नाकाम ही साबित हुआ है। इसके अलावा खनन कारोबारियों के हितों में राज्य की खनन नीति में बड़ा बदलाव करके राज्य की नदियों का प्राकृतिक और जैव विविधता को खतरा तक पेदा होने की आशंकाएं जताई जा चुकी है। इसमें सबसे बड़ा बदलाव राज्य की नदियों में कोरोना संकट की आड़ में 3 मीटर तक गहराई में खनन करने ओैर इसके लिए जेसीबी मशीनों की अनुमति देने जैसे शासनादेश चर्चित रहे हैं।

इसके अलाव ओम प्रकाश पर अपने चहेते अधिकारियों के कारनामों पर चुप्पी साधने और मैदानी मूल के अधिकारियों पर ज्यादा मेहरबान होने के भी आरोप लगते रहे हैं। चर्चित मृत्युंजय मिश्रा भ्रष्टाचार के मामले में सामने आए स्टिंग प्रकरण के चलते प्रदेश की नौकरशाही में बहुत हलचल मची थी। मृत्युंजय मिश्रा के बारे में कहा जाता है कि वे ओम प्रकाश के सबसे खास ओैर चहेते अधिकारी के तौर पर जाने जाते थे। आज मृत्युंजय मिश्रा जेल में बंद है। लेकिन उसके कारनामों की जांच का असर शासन व्यवस्था तक आज भी नहीं पहुंच पाया है।

लॉकडाउन के दौरान उत्तर प्रदेश के विधायक अमरमणि त्रिपाठी को मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के पिता के मृतक संस्कार के नाम पर बदरीनाथ और केदारनाथ यात्रा के लिए अनुमति देने के लिए ओम प्रकाश द्वारा ही जिलाधिकारी देहरादून को पत्र लिखा गया था जबकि लॉकडाउन के चलते प्रतिबंध था। यह मामला भी खूब चर्चा में रहा ओैर अब यह मामला हाईकोर्ट में चल रहा है।

इस मामले को लेकर उत्तर प्रदेश की नूतन ठाकुर द्वारा केंद्र सरकार को ओम प्रकाश ने लॉकडाउन तोड़ने और यात्रा की अनुमति देने की शिकायत तक की जिस पर भारत सरकार के अंडर सेकेट्री केसी राजू उत्तराखण्ड के मुख्य सचिव को कार्यवाही करने के लिए भी लिखा है। इसके अलावा ढैंचा बीज घोटाले और हरिद्वार की ओनिडा फैक्ट्री अग्निकांड में जांच प्रभावित करने के आरोप भी ओम प्रकाश पर लग चुके हैं, यह मामला अब भी कोर्ट में चल रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि ओम प्रकाश पर सचिवालय में नौकरशाहों की खेमेबाजी करने के आरोप लगते रहे हैं। इसका असर मीडिया में भी देखा जा रहा है। ओम प्रकाश के खिलाफ अगर कोई खबर प्रकाशित होती है तो तुरंत ही उनके पक्ष में खबरों की झड़ी लग जाती है। चर्चा यह रही है कि ओम प्रकाश मीडिया में भी गुट विशेष बनाकर मीडिया को साधने में सफल रहे हैं।

अब ओम प्रकाश प्रदेश के नए मुख्य सचिव बन चुके हैं। उनके सामने अनेक चुनौतियां बनी हुई हैेे। अपने पीछे लगे विवादों की छाया से पार पाना ओैर नौकरशाही को सरकार और जनसेवकों के बीच समन्वय रखना बड़ी चुनौती है। मुख्य सचिव उत्पल कुमार अपनी कार्यशैली और व्यवहार के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नगर में अपना बड़ा स्थान बना चुके हैं। केदारनाथ पुनर्निर्माण, ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेलवे लाइन योजना हो या ऑल बेदर रोड योजना तकरीबन सभी में उत्पल कुमार ने अपनी क्षमता साबित की है जिसका बड़ा असर प्रदेश की सरकार के कामकाज पर भी देखने को मिला है। इसके अलावा जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच तालमेल बैठाने के लिए जिस तरह से उत्पल कुमार आगे आए वह भी ओम प्रकाश के लिए करना जरूरी होगा। साथ ही कर्मचारियों की मांगें और आंदोलन के चलते सरकार से जो आश्वासन मिले हैं उनको बेहतर तालमेल के साथ पूरा करना भी नए-नवेले मुख्य सचिव के लिए एक बड़ी चुनौती है।

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