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  • हरीश रावत
राष्ट्रीय महासचिव, कांग्रेस
आजकल का बड़ा समाचार है, गैरसैंण में उत्तराखण्ड के विधायकों को ठंड लग जाती है। यह सूत्र वाक्य माननीय मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत जी के श्रीमुख से उद्भाषित हुआ है। कुछ पत्रकारों ने त्रिवेन्द्र रावत जी से पूछा कि क्या आप गैरसैंण में कोई सत्र नहीं करवायेंगे? उन्होंने बड़ी सहजता से कहा कि हमारे विधायकों को गैरसैंण में ठंड लग जाती है। उत्तराखण्ड का 75 प्रतिशत से अधिक भू-भाग गैरसैंण जैसा या गैरसैंण से भी अधिक ठंडा व कठिन है। सारे उत्तराखण्डी प्रबुद्धजन यूं ही पलायन-पलायन कह रहे हैं, कारणों को खोजने में मगज पच्चिसी कर रहे हैं। विद्वतजनों का आयोग बनाकर पलायन के कारण व समाधान ढूंढ़े जा रहे हैं। करोड़ों रुपया इस महान दायित्व के निर्वहन में खर्च हो रहा है। उत्तराखण्ड के यशस्वी पुत्र रैबार के आयोजन में जुट रहे हैं। सबकी वाणी पलायन के दर्द से कराह रही है। धन्य हैं, हमारे मुख्यमंत्री जी आपने एक सूत्र वाक्य में बता दिया कि विधायकों को गैरसैंण मंे ठंड लगती है। निदान, देहरादून पलायन है। यदि यहां भी ठंड बढ़ गई, तो फिर दिल्ली के उत्तराखण्ड भवन में उत्तराखण्ड की विधानसभा का सत्र आयोजित किया जायेगा। हमारी समस्याओं का एक ही समाधान है, हम ठंड मंे उत्तराखण्ड के गांवों व नगरों में रह रहे लोगों को छः माह के लिए देहरादून ले आयें और उनके लिए यहां एक टैंट कालोनी बना दें। टी गार्डन एरिया, डोईवाला, वीरभद्र में जगह उपलब्ध है। हम पर मतदाताओं की उपेक्षा का आरोप भी नहीं लगेगा।
गैरसैंण-गैरसैंण कहते-कहते इतना नाचा कि जगरियारूपी उत्तराखण्ड की जनता का गला ही बैठ गया। डंगरिये की टंागें टूट गई। अब पता चला कि जोश में होश गंवाने का नतीजा क्या होता है। कत्यूरी जागर में तो कद्दू फूट जाता है, मेरी जागर में तो ठण्ड के मारे गैरसैणियां ढोल ही फट गया। नासमझ था, सोचा मेरे मां-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी ने इसी ढंग से जीवन का ढोल बजाया, मैं भी बजाने लगा। कुछ और मेरे जैसे नौताड़ भी गैरसैंण का ढोल बजाने लगे। धन्य हो, मुख्यमंत्री जी मेरा फूटा ढोल देखकर आपको अक्ल आ गई। आपने गैरसैंण की ठण्ड में अपना ढोल फटने से बचा लिया, नहीं तो मेरी तरह बांगड़-बिल्ले आपका ढोल भी फोड़ डालते व टांग तोड़ डालते। आपने गैरसैंण को गैर ही रहने दिया, देहरादून ही अपणुसैंण है, यह सिद्ध कर दिया
गैरसैंण-गैरसैंण भी खत्म हो जायेगी। कभी-कभार गैरसैंण घूम लेंगे, विधान भवन में रैबार होगा, शेष भवनों मंे अतिथि आवास बनाया जा सकता है। ठण्ड का यही स्थायी समाधान है।  यूं श्री मोदी जी हैं, तो सब कुछ मुमकिन है। हमारे मुख्यमंत्री जी उनके प्रिय पात्र हैं। जितनी कमी है, वह माननीय अमित शाह जी पूरी कर देते हैं। माननीय मुख्यमंत्री जी आदरणीय मोदी जी से मांग करें कि उत्तराखण्ड के लिए जलवायु चक्र को ही बदल दें। हिन्दू कलैण्डर से मंगसीर, माघ, पूस आदि ठण्डे महीने हटाने भर हैं। न बांस रहेगा, न बांसुरी बजानी पडे़गी, सारा ठण्ड का भूत भाग जायेगा। विधायक जी खुश, अधिकारी जी खुश, शेष कार्य के लिए पलायन आयोग पहले से गठित है, ज्यादा-ज्यादा 20-25 रैबार और आयोजित कर दिये जायेंगे। इसे कहते हैं आम के आम गुठलियों के दाम। विधायकों का खुश रहना आवश्यक है, लोकतंत्र के साधक स्तम्भ हैं। मैं, विधायकों को खुश नहीं रख पाया, तो विधायकों ने दल-बदल कर डाला, सरकार चित हो गई। भुवन चन्द्र खण्डूरी जी भी विधायकों को खुश नहीं रख पाये, नेतृत्व परिवर्तन हो गया। भैय्या त्रिवेन्द्र जी सावधान रहना, आपको दल-बदल का खतरा तो नहीं है, आप सौभाग्यशाली हैं। 57 विधायकों वाले मुख्यमंत्री हैं, फिर भी बड़े भाई के बतौर मेरी एक सलाह याद रखना, वह सलाह है, बांगड़ बिल्लों से सावधान रहने की। कुछ अनुभवी, करिश्माई बांगड़-बिल्ले आपने इम्पोर्ट भी किये हैं, कुछ इंडियंस हैं।
मैं, यह मुफ्त की सलाह रावत वाद में नहीं दे रहा हंू। मैं तो रावतों का ही मारा हुआ हूं। रावतों से तो ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। मैं गाफील रहा, अपने को बड़ा भाई समझ बैठा, फल भुगत रहा हूं। ऐसा धोबी पाठ मारा कि, अभी तक बदन दुःख रहा है। कई प्रकार के तेलों से मालिस करवा ली है, दर्द है कि जाता ही नहीं। आपको तो घन्याल देवता ने बचा दिया। दांव तो ऐसा चला था कि आपके पुरखे भी चीख उठते। मंत्र-तंत्र से लेकर स्टिंग तंत्र पर अपने भाइयों का कब्जा है। मेरी चिन्ता उत्तराखण्ड की राजनीतिक अस्थिरता है। 19 वर्ष बीत गये, उत्तराखण्ड किसे अपना दुखड़ा सुनाये, वह समझ नहीं पा रहा है। हर उस्ताद जिसे मौका मिला वह हाथ झाड़े बैठा है। ज्यों ही उत्तराखण्ड अपनी गाथा सुनाने लगता है, उस्ताद चुप करा देते हैं। एक ही सूत्र वाक्य है, मुझे अपना काम करने का पूरा मौका ही नहीं मिला। उस्ताद इस अंदाज में कहते हैं, मानो जैसा कि पांच साल मिल जाते तो पहाड़ को भी मैदान बना डालते और उत्तराखण्ड आसमां की बुलिन्दियांे को छू रहा होता। उत्तराखण्डी दोस्तांे की समझ में अब आ गया होगा कि मैं क्यों एक ही राग विरहा गाता हूं, रावत पूरे पांच साल। उत्तराखण्ड बनेगा खुशहाल-त्रिवेन्द्र रावत पूरे पांच साल। मेरे कई दोस्तों को, बुद्धिजीवियों को, मेरा राग-विरहा राग कर्कस लगता है। मैं उन सबसे क्षमा चाहता हूं। क्या करूं, मैं तो सपने में भी उत्तराखण्ड रहे खुशहाल-रावत पूरे पांच साल, गाते धड़ाम हो गया। दो जगह से चुनाव लड़ा, विधायक भी नहीं बन पाया, अब इस राग-विरहा को गाते-गाते अपने मन को समझा लेता हूं कि, शायद चुनाव के समय ग्वेल देवता को झपकी आ गई और घन्याल देवता का आर्शिवाद काम कर गया, ग्वेल हों या नरसिंग या घन्याल हों या हों कचड़ू देवता या हरूहित देवता, त्रिवेन्द्र रावत पूरे पांच साल याद रखना। कम से कम उत्तराखण्डी भाई-बैंणी, अपने अरमानों का हिसाब-किताब तो ठीक-ठाक तौर पर त्रिवेन्द्र जी से ले सकें। त्रिवेन्द्र सिंह जी को यह अवसर नहीं मिलना चाहिये कि वह भी मेरी तरह हाथ झाड़कर कहें कि क्या करूं, मुझे तो पूरे पांच साल का वक्त काम करने को नहीं मिला। इस समय तो उत्तराखण्ड में विकास कत्यूरों की जागर बनकर रह गया है। कत्यूर रघुवंशी शासक मेरे ईष्ट देव हैं, कत्यूरी जागर में जब तक भक्त एक नर देवता को अपना दुःखड़ा सुनाता है और देवता पर्चा (समाधान) रूपी आर्शिवाद देने लगता है, तब तक दूसरा देवता नाचने लगता है और वह हांक लगाने लगता है। हां शौकार बता, तवे क्य दुःख छा और बेचारा दुःखड़ा बता भी नहीं पाता है, तब तक तीसरा देवता हुंकारता है, गुरू चाल दे। एक कहावत छोड़ जाती है कि कत्यूरी जागर में गदू (कद्दू) घुरिगो (कद्दू लुढ़क गया)।
इन 19 वर्षों में भी विकास का गदूवा (कद्दू) लुढ़क ही रहा है। उत्तराखण्डी विकास की जागर तो इतनी अद्भुत है कि हर कोने से देवता नाचते-2 आ रहा है। गुरू चाल दे, ढोल पर जगरिया थाप भी दे रहा है, डंगरिया नाच रहा है, पर पर्चा (समाधान) कोई नहीं बता रहा है। एकाध उस्ताद तो सारे उत्तराखण्डी ढोलों को एक ही जगह, एक साथ बजाकर विकास के देवता को नचाना चाहता है। कुछ हम जैसे हैं, जिन्होंने देव डोलियांे को हर की पैड़ी व त्रिवेणी घाट में नहलाया है। कुछ डबल मंत्री हैं, जन्मजात मंत्री हैं, नामचीय मंत्री हैं, वे बाबा विश्वनाथ की डोली लिये, नंगे पांव उत्तराखण्ड की परिक्रमा कर डाल रहे हैं। सेम मुखेम से लेकर चम्पावत के गोरिया तक देवता आर्शिवाद दे रहे हैं, मगर हम नाचने में इतने तल्लीन हैं कि उनके हाथ को ठीक से अपने सर पर रखने ही नहीं दे रहे हैं। कुछ नर देवताओं ने नाचते-नाचते कहा, गुरू गैरसैंण की चाल लगा, कुछ देवताओं ने बिना कुछ किये, गैरसैंण उत्तराखण्ड की राजधानी घोषित कर दी। 2013 में बाबा केदार रुष्ठ हुये, हिमालयी सुनामी आ गई। कई बड़े-2 उस्ताद देवता जागर लगाने भराड़ीसैंण पहुंच गये। अहा जब ये देवता नाच रहे थे, तो कितना आनन्द आ रहा था, मुठ्ठी में एक दाना चावल नहीं, देवता सारे उत्तराखण्डियों को मोतिंग मार-मार कर कह रहे थे, गुरू चाल दे। भाई-बन्धुओं 2014 में गलती से मेरे में भी देवता आ गया। न्यौताड़ देवता था, अनुभव नहीं था, मैं भूल गया कि, मुझे खाली यूं ही कहना है, गुरू चाल दे और नाचने का स्वांग भर करना है। मैं, सच्ची-सच्ची नाच गया। गलती कर दी रिकाॅर्ड समय में शानदार विधानसभा भवन बना दिया। सचिवालय भवन के लिए धन आवंटित कर निर्माण एजेन्सी को काम सौंप दिया और जमीन उपलब्ध करवा दी।
सभी देवता लोगों के रहने के वास्ते भवन बना दिये। छोटे देवताओं के लिये भी आवसीय कालोनी बनवा दी, बिजली-पानी की योजनायें बनवा दी, सड़कें, हैलीपैड व चारों तरफ गेस्ट हाउस बना दिये। भराड़ीसैंण टाउनशिप बनाने की योजना बनाकर यूहुडा नाम की संस्था को यह काम सौंप दिया, जमीन भी नोटीफाईड कर दी। राजधानी बनाने की तैयारी के लिए गैरसैंण व चखुटिया विकास परिषद गठित कर दिया। गैरसैंण से जुड़ने के लिए राज्य के अलग-2 हिस्सों में सड़क निर्माण हेतु काम प्रारम्भ कर दिया तथा गैरसैंण अवस्थापना विकास एवं निर्माण निगम गठित कर दिया। इस क्षेत्र के भावी विकास के लिये डांग गांव (चैखुटिया) में बड़ा हवाई अड्डा बनाने के लिए सेना से वार्ता शुरू कर दी और गौचर में ट्रायल पर हवाई सेवा प्रारम्भ कर दी। नौताड़ देवता था, गैरसैंण-गैरसैंण कहते-कहते इतना नाचा कि जगरियारूपी उत्तराखण्ड की जनता का गला ही बैठ गया। डंगरिये की टंागें टूट गई। अब पता चला कि जोश में होश गंवाने का नतीजा क्या होता है। कत्यूरी जागर में तो कद्दू फूट जाता है, मेरी जागर में तो ठण्ड के मारे गैरसैणियां ढोल ही फट गया। नासमझ था, सोचा मेरे माॅ-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी ने इसी ढंग से जीवन का ढोल बजाया, मैं भी बजाने लगा। कुछ और मेरे जैसे नौताड़ भी गैरसैंण का ढोल बजाने लगे। धन्य हो, मुख्यमंत्री जी मेरा फूटा ढोल देखकर आपको अक्ल आ गई। आपने गैरसैंण की ठण्ड में अपना ढोल फटने से बचा लिया, नहीं तो मेरी तरह बांगड़-बिल्ले आपका ढोल भी फोड़ डालते व टांग तोड़ डालते। आपने गैरसैंण को गैर ही रहने दिया, देहरादून ही अपणुसैंण है, यह सिद्ध कर दिया।

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