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Uttarakhand

निजाम का लिटमस टेस्ट निकाय चुनाव

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। निकाय चुनावों में अपने चहेते उम्मीदवारों को टिकट देना उनकी कुर्सी के लिए भारी खतरा बन सकता है। राजनीतिक पंड़ितों के मुताबिक टिकट बंटवारे में खण्डूड़ी, कोश्यारी, निशंक जैसे बड़े नेताओं की उपेक्षा भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं है। अब उम्मीदवारों को जिताने की पूरी जिम्मेदारी त्रिवेंद्र पर है। चहेतों को टिकट देकर उन्होंने अपने लिए चुनौती खड़ी कर ली है। यदि वे निगमों में अपने मेयर नहीं बना पाए तो इसका असर 2019 के लोकसभा चुनाव में भी पड़ेगा। एक दशक पहले 2009 के लोकसभा चुनाव में राज्य की सभी सीटें हारने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री खण्डूड़ी को कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। कहीं ऐसा न हो कि 2019 का लोकसभा चुनाव इतिहास दोहराए त्रिवेंद्र की विदाई का कारण बने। ऐसे में त्रिवेंद्र के सामने ‘करो या मरो’ की स्थिति है
राजनीतिक पार्टियों के लिए निकाय चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल बन चुके हैं। खासकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के लिए भाजपा की जीत और हार एक बड़ी चुनौती है। टिकट बंटवारे के बाद असंतोष की जो खबरें सामने आ रही हैं उससे भाजपा संगठन और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के लिए निकाय चुनाव अग्नि परीक्षा बन चुके हैं। मौजूदा दौर में भाजपा के अंदरूनी हालात 2009 के लोकसभा चुनाव की याद दिलाने लगे हैं। तत्कालीन समय में भाजपा प्रदेश की पांचों सीटें हार गई थी। चुनाव में करारी हार का पूरा ठीकरा तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी के सिर फोड़ा गया औेर उन्हें मुख्यमंत्री पद से चलता कर दिया गया था। ठीक इसी तरह के कयास वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत को लेकर भी लगाए जा रहे हैं कि क्या निकाय चुनाव के परिणाम त्रिवेंद्र रावत की विदाई का कारण बनेंगे? यह सवाल तब और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि त्रिवेंद्र रावत मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही अपने विरोधियों के निशाने पर रहे हैं। सरकार के इन अट्ठारह महीने के कार्यकाल में शायद ही कोई ऐसा दिन बीता हो जिस दिन मुख्यमंत्री पर सवाल न खड़े किए गए हों। खास बात यह है कि मुख्यमंत्री पर परोक्ष निशाना लगाने वाले स्वयं उनकी पार्टी भाजपा के लोग सबसे अधिक दिखाई दिए हैं। सरकार की नीतियों पर भाजपा के लोगों ने ही सवाल उठाए हैं। सदन में अपने क्षेत्रों की उपेक्षा को लेकर भाजपा विधायक विपक्ष से ज्यादा मुखर रहे।
राजनीतिक जानकारां की मानें तो प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई भाजपा की त्रिवेंद्र रावत सरकार इसी प्रंचड बहुमत के साईड इफेक्ट से जूझ रही है। मुख्यमंत्री के विरोधियों के लिए निकाय चुनाव को एक बड़े अवसर के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि टिकट बंटवारे के बाद विरोध के स्वरों को भले ही भाजपा अनुशासन के नाम पर दबा दे, लेकिन इसका एक बड़ा प्रभाव निकाय चुनाव और आने वाले लोकसभा चुनाव पर पड़ना तय माना जा रहा है। जिस तरह बीसी खण्डूड़ी की सरकार के समय 2009 में हुए लोकसभा चुनाव के वक्त माना जा रहा था कि भाजपा की हार का मतलब खण्डूड़ी की विदाई निश्चित है ठीक उसी प्रकार वर्तमान सरकार के दौरान भी यही चर्चाएं राजनीतिक गलियारां में तैर रही हैं।
निकाय चुनाव में प्रत्याशियों के चयन में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की राय को ही सर्वोपरि माना गया है। जिसके चलते कई अच्छे नेताओं को टिकट से महरूम होना पड़ा है। इससे प्रदेश भर में भाजपा के भीतर अंसतोष का माहौल पनप चुका है। इसी जद में स्वंय भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और विधानसभा अध्यक्ष भी आ चुके हैं। दोनों नेताओं के बीच उम्मीदवार के चयन को लेकर जबर्दस्त कहासुनी और नोक-झोंक तक सामने आ चुकी है। इससे साफ हो गया है कि भाजपा नेताओं के बीच भी मतभेद और मनभेद गहरा गया है।
उम्मीदवारां के चयन की बात करें तो सबसे बड़ी चुनौती मुख्यमंत्री के लिए देहरादून मेयर की सीट बन चुकी है। भाजपा उम्मीदवार सुनील उनियाल गामा मुख्यमंत्री के सबसे नजदीकी और चहेते नेताओं में माने जाते हैं। तमाम बड़े बड़े दावेदारों को पछाड़कर गामा आसानी से मेयर का टिकट पाने में सफल रहे। इसके चलते देहरादून में भाजपा के भीतर अंसतोष बना हुआ है। हालांकि अभी यह असंतोष सार्वजनिक नहीं दिखाई दिया है। लेकिन भाजपा और मुख्यमंत्री की पूरी टीम इस दबे हुए अंसतोष को दूर करने के लिए कमर कस चुकी है। गामा के मुकाबले कांग्रेस ने तीन बार के विधायक और पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे दिनेश अग्रवाल को अपना उम्मीदवार बनाया है। जबकि गामा के पास इस तरह का राजनीतिक अनुभव नहीं है। सुनील उनियाल गामा भाजपा में वार्ड अध्यक्ष से लेकर वर्तमान प्रदेश संगठन मंत्री के पद पर अपनी राजनीतिक पारी का अनुभव रखते हैं। लेकिन दिनेश अग्रवाल राजनीति के बड़े अनुभव के सहारे चुनाव में गामा के विरोध में खड़े हैं। इससे मुकाबला खासा दिलचस्प बन गया है।
अब भाजपा की अंदरूनी राजनीति की बात करें तो आज भी भाजपा में खण्डूड़ी कोश्यारी और निश्ांक की तिकड़ी प्रदेश की राजनीति में इस कदर हावी है कि भाजपा के तमाम कार्यकर्ता इन तीनां ही नेताओं के इर्द-गिर्द सिमटे हुए हैं। हालांकि त्रिवेंद्र रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद स्वयं त्रिवेंद्र रावत एक नए गुट के तौर पर उभर कर सामने आए हैं। साथ ही उनको सत्ता का भरपूर लाभ मिल रहा है जिसके कारण आज प्रदेश में त्रिवेंद्र रावत भाजपा की अंदरूनी राजनीति में बड़ी ताकत रखते हैं। संभवतः इसी का असर रहा है कि निकाय चुनाव में उम्मीदवारों के चयन में मुख्यमंत्री की राय ही सबसे अधिक मानी गई जबकि सरकार के मंत्रियों को भी इसमें कुछ हद तक उनकी पंसद के उम्मीदवारों को टिकट दिए गए हैं। जबकि खण्डूड़ी, कोश्यारी और निशंक गुट के नेताओं को निकाय चुनाव में टिकट तक नहीं मिल पाया है। इससे पूरे प्रदेश में भाजपा के भीतर खासा विरोध ओैर असंतोष का माहौल दिखाई देने लगा है।
प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट के समक्ष रोष प्रकट करते टिकट से वंचित कार्यकर्ता
प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और प्रेमचंद अग्रवाल के साथ हुई कहासुनी के पीछे भी उम्मीदवारों के चयन का मामला रहा है। ऋषिकेश नगर निगम में पूरा संगठन प्रदेश उपाध्यक्ष कुसुम कंडवाल जो कि खण्डूड़ी गुट की मानी जाती रही हैं, के पक्ष में खड़ा था। लेकिन अजय भट्ट के वीटो के चलते उनके गुट की अनीता ममगांई को ही टिकट दिया गया, जबकि प्रेम अगवाल के बारे में कहा जाता है कि वे नए-नए भाजपा में आए नेता की पत्नी को मेयर का टिकट दिलवाना चाहते थे जिसके लिए वे दबाब भी बना रहे थे। इसी के चलते दोनों नेताओं के बीच जबर्दस्त कहासुनी हुई। खबर तो यहां तक है कि दोनों नेताओं के बीच हाथापाई की नौबत तक आ गई थी। हालांकि दोनों ही नेताओं ने इसे एक गलतफहमी का नाम देकर मामले को शांत कर दिया। लेकिन खबर यह भी है कि इस मामले में भाजपा संगठन ने कई नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं जिनमें विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल का भी नाम बताया जा रहा है। कम से कम इस बात से यह तो साबित हो चुका है कि भाजपा में निकाय चुनाव को लेकर शीर्ष स्तर के नेताओं के बीच मतभेद के साथ साथ मनभेद का माहौल बन चुका है।
सूत्रों की मानें तो भाजपा के भीतर पनप रहे अंसतोष की जद में प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री ही नहीं प्रदेश संगठन भी आ चुका है। कई भाजपा नेताओं का ऑफ द रिकॉर्ड कहना है कि वर्तमान निकाय चुनाव एक तरह से व्यक्तिगत हो चले हैं। इसमें उम्मीदवार की अपनी छवि और उसकी अपनी राजनीतिक ताकत ही हार-जीत तय करेगी। पार्टी से कुछ उम्मीद या सहारा मिल जाए तो यह बहुत बड़ी बात होगी।
भाजपा नेताओं का इस कदर हताश होना और इस तरह के कयासों को सामान्य तौर पर नहीं देखा जा सकता। वास्तव में आज भाजपा के कार्यकर्ता अपनी ही सरकार के कामकाज से जनता के बीच उतना मुखर नहीं हो पा रहे हैं जितना एक सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं को होना चाहिए। जिस तरह से प्रदेश भर में जनता के बीच सरकार के कामकाज को लेकर नकारात्मक छवि पनन रही है उससे स्पष्ट है कि भाजपा के लिए ये निकाय चुनाव एक बड़ी चुनौती बन चुके हैं।
राजनीतिक पंडितों के मुताबिक निकाय चुनाव के परिणाम केवल प्रदेश ही राजनीति में ही में अपना बड़ा असर नहीं छोडं़ेगे। इसके दूरगामी परिणाम आने वाले लोकसभा चुनाव पर भी पड़ने तय हैं। राज्य में इस बार निकाय चुनाव ईवीएम के बजाय मतपत्रों से होने हैं। देश भर में संपूर्ण विपक्ष ईवीएम को लेकर कई तरह के सवाल खड़े कर चुका है। देश में फिर से बैलेट पेपर से मतदान करने के लिए निर्वाचन आयोग ओैर सरकार पर दबाव बना रहा है। अगर इस बार भाजपा निकाय चुनाव में बड़ी जीत हासिल नहीं कर पाती है तो विपक्ष के ईवीएम पर सवालां को फिर से नई धार मिलने की पूरी संभावनाएं हैं। इसके विपरीत अगर भाजपा निकाय चुनावों में जीत हासिल कर लेता है तो विपक्ष के आरोपों पर हमेशा के लिए पटाक्षेप हो सकता है। कांग्रेस प्रवक्ता संजय भट्ट के त्याग पत्र से इसे बखूबी समझा जा सकता है। हालांकि संजय भट्ट ने देहरादून नगर निगम में पर्वतीय मूल के नेता को टिकट न देने का आरोप लगाते हुए अपना त्याग पत्र प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह को दिया है। लेकिन उनके त्याग पत्र में इस ईवीएम पर उठाए जा रहे सवालां और आरोपों का साफ तौर पर उल्लेख किया गया है। संजय भट्ट ने साफ कहा है कि इस बार राज्य में निकाय चुनाव बैलेट पेपर से हो रहे हैं, अगर कांग्रेस उम्मीदवारां के गलत चयन के चलते निकाय चुनाव में हार गई तो कांग्रेस ईवीएम पर सवाल खड़े नहीं कर सकती।
एक कांग्रेस प्रवक्ता ने ईवीएम को लेकर चल रहे कयासां को पहली बार राज्य में नई राजनीतिक चर्चा शुरू कर दी है। वास्तव में अगर निकाय चुनाव में भाजपा आशा के अनुरूप परिणाम नहीं ला पाती है तो देश भर में ईवीएम से चुनाव करवाने के निर्णय पर बदलाव करने का भारी दबाब सरकार और निर्वाचन आयोग पर पड़ना तय है। साथ ही प्रदेश भाजपा संगठन पर भी इसका बड़ा असर पड़ सकता है।
वर्तमान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट एक वर्ष के एक्सटेंशन पर कार्यरत हैं। उनके लिए भी आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति में अपने को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत तो पहले से ही अपने विरोधियों के निशाने पर रहे हैं और इस बार निकाय चुनाव में उनके द्वारा ही उम्मीदवारां का चयन किया गया है तो इससे हार-जीत की पूरी जिम्मदारी मुख्यमंत्री के सिर पर पड़नी तय है। फिर चाहे वह बड़ी जीत का सेहरा हो या हार का सेहरा दोनों ही तरफ मुख्यमंत्री के सिर पड़ना तय माना जा रहा है।
इसके अलावा हाईकोर्ट के अतिक्रमण हटाने के आदेश की आड़ में जिस तरह से भाजपा की अंदरूनी राजनीति सामने आई है उससे खास तौर पर नगरीय क्षेत्र की जनता में भी खासा रोष बना हुआ है। प्रदेश की मलिन बस्तियों को बचाने के लिए सरकार और खास तौर पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने कैबिनेट से अध्यादेश लाकर इन मलिन बस्तियों को राहत देने का काम किया है। दूसरी तरफ स्थानीय जनता और करोबारियों के प्रतिष्ठानों को पूरी तरह से ध्वस्त किया गया औेर सरकार ने इसके लिए कोई जरूरी कदम तक नहीं उठाए, जबकि सरकार इसके लिए कानून का सहारा लेकर राहत दे सकती थी। सरकार के इसी दोहरे चरित्र के चलते नगरीय क्षेत्र की जनता में भारी रोष है जो निकाय चुनाव में अपना असर डाल सकता है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री और प्रदेश भाजपा संगठन किस तरह से निकाय चुनाव में डैमेज कंट्रोल कर पाते हैं। भाजपा के असंतुष्टों को संतुष्ट कर पाते हैं। पूर्व में प्रदेश की राजनीति में कई तरह के समीकरण सामने आ चुके हैं। बीसी खण्डूड़ी जेसे मुख्यमंत्री को चुनाव में हार के बाद पद से हटना पड़ा है। 2019 लोकसभा का चुनाव सिर पर है तो इस बार फिर से इतिहास दोहराया जाएगा या नहीं यह देखना बाकी है।
 हमारी पार्टी में कोई कलह नहीं है। कार्यकर्ता को टिकट न मिलने पर उसकी अपनी बात अध्यक्ष के सामने रखना कोई गलत बात नहीं है। बाकी अफवाहें ज्यादा फैलाई जा रही हैं।
अजय भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष भाजपा 

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