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Uttarakhand

निशंक का गिरता ग्राफ

बतौर मानव संसाधन मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की परफॉरमेंस पर सवाल उठने लगे हैं। मामला चाहे जेएनयू, बीएचयू विवाद का हो, राष्ट्रीय शिक्षा नीति का हो या फिर सीबीएससी बोर्ड द्वारा परीक्षा शुल्क में की गई बढ़ोतरी का, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की भूमिका मूकदर्शक समान रही है। विवादों से गहरा नाता रखने वाले निशंक की डॉक्टरेट उपाधियां भी शंका के घेरे में हैं। इस सबके बीच नैनीताल के सांसद अजय भट्ट का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। जिस गर्मजोशी से उनके एक प्राइवेट मेंबर बिल ने राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बटोरी, उससे कयास लगाए जा रहे हैं कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल होने पर भट्ट का ‘इन’ और निशंक का ‘आउट’ होना तय है

 

कें द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ.  रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का विवादों संग गहरा नाता रहा है। वर्ष 2009 में भाजपा आलाकमान ने उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवनचंद्र खण्डूड़ी को हटाकर निशंक की ताजपोशी की थी, लेकिन मात्र 27 महीनों के भीतर ही उसे दोबारा जनरल खण्डूड़ी की वापसी करनी पड़ी। कारण था निशंक पर लगे नाना प्रकार के भ्रष्टाचार के आरोप। इसके बाद आठ बरस तक निशंक मुख्यधारा की राजनीति से अलग कर दिए गए। हालांकि इस दौरान 2014 में हरिद्वार से वे सांसद चुने गए लेकिन मोदी कैबिनेट में उन्हें नहीं लिया गया। 2019 में एक बार फिर हरिद्वार से संसद सदस्य बने निशंक को वर्तमान भाजपा नेतृत्व ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी दे उनकी मुख्यधारा में जबरदस्त रि-एंट्री करा डाली। उन्हें मंत्री बने अभी मात्र नौ माह ही हुए हैं लेकिन दिल्ली के सत्ता गलियारों में अफवाहों का बाजार गर्म हो चला है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी प्रमुख अमित शाह उनकी कार्यशैली से खास प्रसन्न नहीं हैं। कारण है राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर उठ रहे बवाल से लेकर जेएनयू, बीएचयू, समेत देशभर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पनप रहा छात्र असंतोष। निशंक विरोधियों का मानना है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय इन सभी मामलों में सार्थक भूमिका निभाता नजर नहीं आ रहा है।

सबसे पहले बात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की जहां कुछ समय से छात्र आंदोलन कर रहे हैं, क्योंकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने हॉस्टल समेत कई अन्य मदों में भारी फीस वृद्धि कर डाली है। आमतौर पर वापमंथी विचारधारा का गढ़ माना जाने वाला जेएनयू लंबे अर्से से दक्षिणपंथी ताकतों के निशाने पर रहा है। छात्रों का आरोप है कि एकमुश्त बढ़ाई गई दरों के पीछे दक्षिणपंथी सोच का हाथ है, जो किसी भी कीमत पर जेएनयू पर अपना कब्जा चाहती है। हालांकि फीस वृद्धि विश्वविद्यालय का आंतरिक मसला है लेकिन केंद्रीय विश्वविद्यालय होने के चलते वहां का प्रशासन सीधे मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन है। ऐसे में वर्तमान छात्र आंदोलन को समाप्त न करा पाने के पीछे एक बड़ा कारण निशंक की निष्क्रिय कार्यशैली बताई जा रही है।

ख्याति प्राप्त बनारस हिंदू विश्वविद्यालय भी पिछले कुछ अर्से से गलत कारणों के चलते सुर्खियां बटोर रहा है। यहां एक मुस्लिम की नियुक्ति संस्कøत विभाग में किए जाने को लेकर भारी हंगामा मचा। प्रोफेसर फिरोज खान को विभाग में काम करने देने की बात उठाने वालों को विश्वविद्यालय प्रशासन के एक बड़े वर्ग का समर्थन होने की बात भी सामने आई। हालात इतने बिगड़े कि प्रोफेसर फिरोज खान ने ज्वाइन न करने में ही अपनी भलाई समझी। प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर में ख्याति प्राप्त बीएचयू की छवि पर इस प्रकरण से गहरा धक्का पहुंचा है। पूरे मामले में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की भूमिका एक मूकदर्शक की रही है।

सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंड्री एज्युकेशन (सीबीएसई) ने भी कक्षा दस और कक्षा बारह का परीक्षा शुल्क 750 रुपए से बढ़ाकर 9500 रुपया कर दिया है। बोर्ड ने लैबोरेटरी फीस भी बढ़ा डाली है। सीबीएसई पाठ्यक्रम के अंतर्गत आने वाले स्कूलों ने फीस वृद्धि को अभिभावकों के मत्थे डाल दिया है। चौतरफा विरोध के बावजूद केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सीधे हस्तक्षेप नहीं करने का निर्णय लिया जिसके चलते मोदी सरकार की खासी किरकिरी हो रही है। मामले का राजनीतिक लाभ लेते हुए दिल्ली सरकार ने बढ़ी हुई फीस का खर्च छात्रों पर न डाल सरकार के स्तर से दिए जाने की घोषणा कर दी है। उत्तराखण्ड में भी इस फीस वृद्धि को लेकर खासा रोष है। राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में सीबीएसई बोर्ड ही परीक्षा कराता है इसलिए यहां फीस वृद्धि का बड़ा असर देखने को मिल रहा है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर भी केंद्र सरकार बैकफुट पर है। हालांकि निशंक दावा कर चुके हैं कि इस नीति का मसौदा तैयार है लेकिन जिस तरीके से हिंदी को अनिवार्य भाषा बना इस नीति के जरिए परोसा गया उससे उठा बवाल केंद्र सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है। हालांकि बाद में शिक्षा नीति के मसौदे में बदलाव कर हिंदी की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है लेकिन जानकारों का दावा है कि मंत्रालय के ढुलमुल रवैये और मंत्री निशंक की कार्यशैली से पीएमओ खासा नाराज है।

डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ पर संकट का एक बड़ा कारण आने वाले समय में उनके खिलाफ दर्ज एक शिकायत पर हो रही जांच हो सकती है। हरिद्वार संसदीय सीट पर हुए चुनाव के दौरान जो शपथ पत्र अपनी संपत्तियों की बाबत निशंक ने निर्वाचन आयोग को सौंपा था, उसमें कई महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाने का आरोप सामाजिक कार्यकर्ता मनीष वर्मा द्वारा लगाया गया है। वर्मा इस पूरे मामले में चुनाव आयोग और राष्ट्रपति तक अपनी शिकायत दर्ज करा चुके हैं। जाहिर है यदि इन आरोपों में तनिक भी सत्यता पाई जाती है तो डॉ निशंक की सदस्यता खतरे में पड़ जाएगी। हालांकि चुनाव अधिकारी हरिद्वार एवं उच्च न्यायालय नैनीताल ने मनीष वर्मा की इस संदर्भ दायर याचिमाएं खारिज कर दी है।

श्रीलंका की गुमनाम यूनिवर्सिटी से डिग्री लेते डॉ. निशंक

मई, 2019 में निशंक के मंत्री बनने के साथ ही एक पुराने विवाद ने सिर उठा लिया था। निशंक पर आरोप है कि उन्होंने 90 के दशक में श्रीलंका के एक ऐेसे विश्वविद्यालय ‘ओपेन इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी’ से डीलिट की उपाधि ली जिसे श्रीलंका सरकार की मान्यता ही नहीं है। इतना ही नहीं इस डिग्री के कुछ समय पश्चात ही उन्होंने इसी कथित विश्वविद्यालय से विज्ञान के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए एक और डिग्री प्राप्त कर ली। विवादों से निशंक का नाता उनकी जन्मतिथि को लेकर भी है। सूचना के अधिकार से मिली जानकारी बताती है कि उनके बायोडाटा में उनकी जन्मतिथि 15 अगस्त, 1959 है, जबकि पासपोर्ट में जुलाई 15, 1959। डॉ निशंक का कहना है कि यह उनके स्कूल सर्टिफिकेट और हिंदू पद्धति के हिसाब से बनी जन्मकुंडली के चलते है जिसे उन्होंने सामान्य करार दिया है।

‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ के प्रथम पृष्ठ में अजय भट्ट

दिल्ली के सत्ता गलियारों में इन दिनों खासी चर्चा है कि नैनीताल से सांसद अजय भट्ट का ग्राफ केंद्रीय नेतृत्व की निगाहों में तेजी से बढ़ रहा है। गत् पखवाड़े 22 नवंबर को भट्ट द्वारा लोकसभा में पेश किए गए एक प्राइवेट मेंबर बिल की खासी चर्चा राष्ट्रीय मीडिया में हुई। भट्ट ने जनसंख्या नियंत्रण बिल जिस दिन सदन में पेश किया था ठीक उसी दिन 27 अन्य प्राइवेट मेंबर बिल पेश हुए थे लेकिन चर्चा केवल भट्ट के बिल की हुई। ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ ने तो इसे फ्रंट पेज की खबर बना डाला। जानकारों का मानना है कि राष्ट्रीय मीडिया का इस बिल को विशेष महत्व देने के पीछे भाजपा मीडिया सेल का हाथ है। 2017 का उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव भाजपा ने भट्ट के नेतृत्व में ही लड़ा और दो तिहाई की जीत हासिल की थी। हालांकि स्वयं भट्ट भीतरघात का शिकार हो अपनी सीट हार गए लेकिन भाजपा आलाकमान ने उन पर भरोसा कायम रख उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा। इतना ही नहीं 2019 में उन्हें नैनीताल संसदीय सीट से मैदान में भी उतार दिया। माना जा रहा है कि झारखंड और दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल हो सकता है। इस फेरबदल की जद में जिन नॉन परफॉरमिंग मंत्रियों को हटाए जाने की चर्चा है उनमें रमेश पोखरियाल का नाम भी शामिल है। कुल मिलाकर उत्तराखण्ड से केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल एकमात्र चेहरा अपनी चमक खोता जा रहा है।

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