[gtranslate]
Uttarakhand

ना दैन्यम्, ना पलायनम्

हरीश रावत के एक ट्वीट ने जिस प्रकार प्रदेश से लेकर केंद्र तक राजनीति को गर्मा दिया उससे साफ जाहिर होता है कि हरीश रावत की राजनीति और क्षमताओं से पार पाना उन लोगों के लिए आसान नहीं है जो उनके समानांतर नई धारा को प्रश्रय दे रावत को हाशिए में धकेलने का प्रयास कर रहे थे। चुनाव से ठीक पहले हरीश रावत के इस ट्वीट ने उन्हें वो सब दिला दिया जिसे लेने का प्रयास वो कर रहे थे। इस ट्वीट के बाद प्रियंका गांधी और राहुल गांधी का उनसे तुरंत फोन पर बात करना बताता है कि आलाकमान में उनकी जड़ें कितनी गहरी हैं। रावत जहां और मजबूत होकर उभरे वहीं देवेन्द्र यादव सहित हरीश रावत विरोधी गुट बैकफुट पर हैं। शायद हरीश रावत के व्यक्तित्व की यही खूबी है कि जब- जब उन्हें कमजोर करने की कोशिश हुई तब-तब वो और ज्यादा मजबूत होकर उभरे और निखरे हैं। चार लोकसभा चुनाव और दो विधानसभा चुनाव हारने के बाद यदि आज भी वो उत्तराखण्ड के सबसे विशाल जनाधार वाले नेता हैं तो यह उनकी जीजिविषा का ही परिणाम है वरना उत्तराखण्ड में नेता एक हार के बाद ही राजनीति के परिदृश्य से गायब हो जाने के लिए अभिशप्त रहे हैं। लेकिन क्या ये कांग्रेस के अंदरूनी संघर्ष का विराम है? शायद नहीं। अगर ये संघर्ष फिर उभरा तो फिर समय की अगली नियंत्रण रेखा क्या होगीं ये देखना दिलचस्प होगा

 

‘‘जीतता वही है जिसे पता है कि कब लड़ना है कब नहीं’’

-सुन त्जू, आर्ट ऑफ  वाॅर

न अजीब सी बात, चुनाव रूपी समुद्र को तैरना है, सहयोग के लिए संगठन का ढांचा अधिकांश स्थानों पर सहयोग का हाथ आगे बढ़ाने के बजाय या तो मुंह फेर करके खड़ा हो जा रहा है या नकारात्मक भूमिका निभा रहा है। जिस समुद्र में तैरना है, सत्ता ने वहां मगरमच्छ छोड़ रखे हैं। जिनके आदेश पर तैरना है, उनके नुमाइंदे मेरे हाथ-पैर बांध रहे हैं। मन में बहुत बार विचार आ रहा है कि हरीश रावत अब बहुत हो गया, बहुत तैर लिए, अब विश्राम का समय है। फिर चुपके से मन के कोने से आवाज उठ रही है ‘‘ना दैन्यम्, ना पलायनम्’’ बड़ी उहापोह की स्थिति में हूं, नया वर्ष शायद रास्ता दिखा दे। मुझे विश्वास है कि भगवान केदारनाथ जी इस स्थिति में मेरा मार्ग दर्शन करेंगे।’’

उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री और चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष हरीश रावत का ये ट्वीट पिछले दिनों उत्तराखण्ड कांग्रेस में चल रही कशमकश का निचोड़ था जिसका सामना उत्तराखण्ड कांग्रेस कर रही थी। पिछले दिनों हरीश रावत की नाराजगी और हरक सिंह रावत प्रकरण ने कांग्रेस और भाजपा दोनों राष्ट्रीय दलों के अंतर्विरोधों की बखिया उधेड़ दी जिसके लिए दोनों दल ऐन चुनाव पूर्व शायद मानसिक रूप से तैयार नहीं थे। खास बात ये है कि इन घटनाओं का कथानक उनकी पार्टियों के अंदर से ही लिखा जा रहा था लेकिन इनको लिखने वालों को पता नहीं रहा होगा कि फ्लाॅप फिल्मों की सी ये पटकथा उनको ही कठघरे में खड़े कर उनकी कार्यशैली और क्षमताओं पर सवालिया निशान लगा देगी। हरीश रावत के एक ट्वीट ने जिस प्रकार प्रदेश से लेकर केंद्र तक राजनीति को गर्मा दिया उससे साफ जाहिर होता है कि हरीश रावत की राजनीति और क्षमताओं से पार पाना उन लोगों के लिए आसान नहीं है जो उनके समानांतर नयी धारा को प्रश्रय दे हरीश रावत को हाशिए में धकेलने का प्रयास कर रहे थे। ऐन चुनाव के वक्त हरीश रावत के इस ट्वीट ने उन्हें वो सब दिला दिया जिसे लेने का प्रयास वो कर रहे थे।

कांग्रेस में ये घटनाक्रम महज चुनावी संयोग नहीं था वरन् इसके पीछे वो आंतरिक शक्तियां थीं जिनको भाजपा से ज्यादा हरीश रावत का विरोध सुहाता है और जो चुनाव में कांग्रेस का नेतृत्व कौन करेगा। चेहरा कौन होगा, चुनाव बाद मुख्यमंत्री कौन होगा, जैसे प्रश्नों को खड़ा कर पार्टी और कार्यकर्ताओं को उलझाकर चुनावी समर से पहले ही पराजित सेना की तरह पार्टी को उस हालात में ला खड़ा करना जहां स्वयं की जीत पार्टी की जीत के ऊपर दिखाई देती है। इस बार इस तुफानी घटनाक्रम में सबसे ज्यादा निशाने पर थे प्रदेश प्रभारी देवेन्द्र यादव जो चुनाव नजदीक आते-आते निष्पक्ष प्रभारी कम गुट विशेष के प्रभारी ज्यादा दिखाई देने लगे हैं। उन पर प्रीतम सिंह गुट को तवज्जो देकर हरीश रावत के समानांतर एक नया गुट खड़ा करने के आरोप लगे। इन पक्षपात के आरोपों के चलते कांग्रेस को मजबूत व सक्रिय करने वाले प्रभारी की उनकी छवि खासी प्रभावित तो हुई ही, चुनाव काल में पार्टी की आंतरिक कमजोरियां भी सामने उभर कर आ गईं।

अगर पिछले साढ़े चार सालों की कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को देखें तो उत्तराखण्ड कांग्रेस से हरीश रावत को हाशिए में धकेलने के प्रयास तभी शुरू हो गए थे जब 2017 में कांग्रेस के साथ हरीश रावत भी चुनाव हार गए थे। चुनाव सिर्फ हरीश रावत ही नहीं हारे थे कांग्रेस के 59 प्रत्याशी भी चुनाव हारे थे। लेकिन विरोधी गुट के निशाने पर सिर्फ हरीश रावत ही थे। प्रीतम सिंह के अध्यक्ष और डाॅ. इंदिरा हृदयेश के नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद उत्तराखण्ड कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के समीकरणों में बदलाव से लगा कि हरीश रावत की भूमिका उत्तराखण्ड की
राजनीति में तो कम-से-कम सीमित होती जा रही है। लेकिन हरीश रावत पर कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा भरोसा जताते हुए उन्हें महासचिव बनाना उन लोगों के लिए झटका था जिन्हें लगता था कि हरीश रावत की राजनीतिक पारी अब अस्त पर है। हरीश रावत के केंद्र की राजनीति में जाने के बाद जो स्पेस उत्तराखण्ड की राजनीति में खाली था उसे कांग्रेस का वो गुट भर नहीं पाया जो हरीश रावत को प्रदेश की राजनीति से बेदखल कर देना चाहता था। डाॅ. इंदिरा हृदयेश हों फिर वो प्रीतम सिंह हो, करन माहरा हों या अन्य नेता। प्रीतम सिंह प्रदेश अध्यक्ष रहे, आज नेता प्रतिपक्ष हैं लेकिन अपनी विधानसभा तक सीमित हैं।

पिछले दिनों के घटनाक्रम को देखें तो ये अचानक घटित हुआ हो ऐसा नहीं है। पूर्व प्रभारी अनुग्रह नारायण सिंह और वर्तमान प्रभारी देवेन्द्र यादव की कार्यशैली इन सबके लिए एक हद तक जिम्मेदार रही है। अनुग्रह नारायण सिंह तो प्रीतम सिंह और नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ कम हरीश रावत के खिलाफ मोर्चाबंदी करते ज्यादा दिखे। नये प्रभारी देवेन्द्र यादव के आने के बाद कांग्रेस सक्रिय तो हुई लेकिन वो भी एक गुट विशेष की गोद में खेलते रहेे। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण सल्ट विधानसभा उपचुनाव में दिखा जब रणजीत रावत कांग्रेस प्रत्याशी गंगा पंचोली और हरीश रावत के खिलाफ बयानबाजी करते दिखे लेकिन प्रभारी ने उसे अनुशासनहीनता की श्रेणी में नहीं माना। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा उत्तराखण्ड में बदलाव के दौरान प्रीतम को प्रदेश अध्यक्ष से हटाकर नेता प्रतिपक्ष बनाने और गणेश गोदियाल को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाने के साथ हरीश रावत को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष और चार कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के साथ जो संतुलन साधने की कोशिश की गई उसने असंतुलन को और बढ़ा दिया।

देहरादून में राहुल गांधी की सफल रैली के बाद अचानक हरीश रावत की सोशल मीडिया पर टिप्पणी ने उत्तराखण्ड की राजनीति में जो ज्वार पैदा किया उससे सतर्क हो आमतौर पर ऐसी घटनाओं पर अलसायी प्रतिक्रिया देने वाला कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व तुरंत सक्रिय हो गया। सभी नेताओं को दिल्ली बुलाकर स्थिति संभालने की कोशिश की। लेकिन समग्र स्तर पर पार्टी को जो नुकसान होना था वो हो गया। राहुल गांधी की रैली की बात करें तो उस रैली में राहुल गांधी के बाद सबसे ज्यादा नारे हरीश रावत के पक्ष में लगे। बताया जाता है कि रैली स्थल पर राहुल, सोनिया, प्रियंका के बड़े कट आउट के साथ हरीश रावत के कट आउट भी लगे थे। हरीश रावत के कट आउट को प्रभारी देवेन्द्र यादव द्वारा रैली स्थल से हटवा दिए गए। खास बात ये रही कि रैली के मंच की सारी व्यवस्थाओं से प्रदेश संगठन को अलग ही रखा गया।

मंच का संचालन कर रहे राजीव जैन द्वारा ‘हरीश रावत’ के पक्ष में नारे लगवाने के बाद मंच संचालन की जिम्मेदारी उनसे छीनकर प्रदेश प्रभारी धर्मांणी को सौंप दी। कांग्रेस की रैली में लंबे समय बाद देखने को मिला कि मंच की व्यवस्थाओं से प्रदेश कांग्रेस संगठन की भूमिका को खत्म कर दिया गया। इस व्यवस्था से प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल भी असंतुष्ट दिखे। गणेश गोदियाल अध्यक्ष बनने के बाद संगठन में गिनी-चुनी नियुक्तियां ही कर पाए हैं। आज भी वो प्रीतम सिंह द्वारा बनाई गई टीम से काम चला रहे हैं। गोदियाल ने अपनी टीम में बदलाव का प्रस्ताव केंद्रीय नेतृत्व को भेजा था जिस पर आज तक कोई अमल नहीं हुआ। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि प्रीतम सिंह और तीन कार्यकारी अध्यक्षों के साथ कई जिलों के पदाधिकारी प्रदेश अध्यक्ष गोदियाल और हरीश रावत के साथ असहयोग का रवैया अपनाए हुए हैं। जिसका जिक्र हरीश रावत ने अपने ट्वीट में भी किया है। सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी की देहरादून रैली के बाद प्रदेश प्रभारी देवेन्द्र यादव खुलकर प्रीतम गुट के पक्ष में दिखने लगे थे। देहरादून रैली के बाद एक खास बात देखने में आई कि अपनी-अपनी विधानसभाओं में ही सीमित रहने वाले प्रीतम सिंह और कार्यकारी अध्यक्ष अचानक सक्रिय हो उन स्थानों पर सभाएं करने जाने लगे जहां पहले दिन हरीश रावत सभा करके गए थे। अब ये प्रभारी की शह थी या कोई और कारण कांग्रेस के अंदर इसे बहुत संजीदा तरीके से नहीं लिया गया।

पिथौरागढ़ की रैली में प्रभारी प्रीतम सिंह को ही तवज्जो देते दिखे। नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद से ही प्रीतम सिंह ने भुवन कापड़ी, रणजीत रावत, जीत राम के साथ गुट बनाकर समानांतर चलना शुरू कर दिया था। मुख्यमंत्री के चेहरे पर हरीश रावत को चेहरा बनाने की बात को हमेशा नकार कर वो हरीश रावत के निशाने पर थे। हरीश रावत के ट्वीट से निकली असंतोष की आवाज की गूंज दिल्ली के गलियारों में गूंजने के साथ ही सक्रिय हुए आलाकमान ने कई भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास जरूर किया लेकिन सब कुछ सध गया ये कहना अभी मुश्किल है। चुनावों के बीच उभरा यह विवाद उम्मीदों पर कलह की कुल्हाड़ी के समान साबित हो गया है। आलाकमान से बातचीत के बाद हरीश रावत शक्तिशाली होकर निकले हैं। कांग्रेस हाईकमान ने स्पष्ट किया है कि चुनाव का चेहरा हरीश रावत ही होंगे और चुनाव उनके नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा।

चुनाव जीतने पर मुख्यमंत्री सोनिया गांधी ही तय करेंगी, जैसी कि परंपरा रही है। कांग्रेस नेताओं में इस वक्त असली लड़ाई अपने अधिक-से-अधिक समर्थकों को टिकट दिलवाने की चल रही है। कांग्रेस के एक पूर्व अध्यक्ष का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं कि हरीश रावत कांग्रेस ही नहीं उत्तराखण्ड का बड़ा चेहरा है और सरकार आने पर मुख्यमंत्री की पहली पसंद भी वही होंगे। लेकिन इस वक्त उन्हें बड़ा दिल दिखाना होगा क्योंकि उनके इर्द-गिर्द ऐसे लोगों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा है जो पैसों के बल पर अपनी ताकत दिखा रहे हैं लेकिन जमीन पर उनकी पकड़ कहीं नहीं है। अगर रावत ऐसे लोगों को तरजीह देंगे तो वो खुद को कमजोर कर रहे हैं।

हरीश रावत अपने ट्वीट प्रकरण के बाद शक्तिशाली बनकर उभरे हैं। इस ट्वीट के बाद प्रियंका गांधी और राहुल गांधी का उनसे तुरंत फोन पर बात करना बताता है कि आलाकमान में उनकी जड़ें कितनी गहरी हैं। रावत जहां और मजबूत होकर उभरे वहीं देवेन्द्र यादव सहित हरीश रावत विरोधी गुट बैकफुट पर है। शायद हरीश रावत के व्यक्तित्व की यही खूबी है कि जब-जब उन्हें कमजोर करने की कोशिश हुई वो और ज्यादा मजबूत होकर निखरे हैं। चार लोकसभा चुनाव और दो विधानसभा चुनाव हारने के बाद यदि आज भी वो उत्तराखण्ड के सबसे विशाल जनाधार वाले नेता हैं तो यह उनकी जीजिविषा का ही परिणाम है वरना उत्तराखण्ड में नेता एक हार के बाद ही राजनीति के परिदृश्य से गायब हो जाने के लिए अभिशप्त रहे हैं। लेकिन क्या ये कांग्रेस के अंदरूनी संघर्ष का विराम है? शायद नहीं। अगर ये संघर्ष फिर उभरा तो फिर समय की अगली नियंत्रण रेखा क्या होंगी ये देखना दिलचस्प होगा।

हरीश रावत के एक ट्वीट ने जिस प्रकार प्रदेश से लेकर केंद्र तक राजनीति को गर्मा दिया उससे साफ जाहिर होता है कि हरीश रावत की राजनीति और क्षमताओं से पार पाना उन लोगों के लिए आसान नहीं है जो उनके समानांतर नई धारा को प्रश्रय दे रावत को हाशिए में धकेलने का प्रयास कर रहे थे। चुनाव से ठीक पहले हरीश रावत के इस ट्वीट ने उन्हें वो सब दिला दिया जिसे लेने का प्रयास वो कर रहे थे। इस ट्वीट के बाद प्रियंका गांधी और राहुल गांधी का उनसे तुरंत फोन पर बात करना बताता है कि आलाकमान में उनकी जड़ें कितनी गहरी हैं।

रावत जहां और मजबूत होकर उभरे वहीं देवेन्द्र यादव सहित हरीश रावत विरोधी गुट बैकफुट पर हैं। शायद हरीश रावत के व्यक्तित्व की यही खूबी है कि जब- जब उन्हें कमजोर करने की कोशिश हुई तब-तब वो और ज्यादा मजबूत होकर उभरे और निखरे हैं। चार लोकसभा चुनाव और दो विधानसभा चुनाव हारने के बाद यदि आज भी वो उत्तराखण्ड के सबसे विशाल जनाधार वाले नेता हैं तो यह उनकी जीजिविषा का ही परिणाम है वरना उत्तराखण्ड में नेता एक हार के बाद ही राजनीति के परिदृश्य से गायब हो जाने के लिए अभिशप्त रहे हैं। लेकिन क्या ये कांग्रेस के अंदरूनी संघर्ष का विराम है? शायद नहीं। अगर ये संघर्ष फिर उभरा तो फिर समय की अगली नियंत्रण रेखा क्या होगीं ये देखना दिलचस्प होगा

You may also like

MERA DDDD DDD DD