Uttarakhand

उपेक्षा से उपजा आंदोलन

सीमांत पिथौरागढ़ जिले में विश्वविद्यालय आंदोलन तेज हो चुका है। यहां के छात्र नेता और राजनीतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता एक स्वर में ऐलान कर रहे हैं कि उच्च शिक्षा के लिहाज से अब सरकार का सौतेला व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा

 

सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में विश्वविद्यालय खोलने की मांग जोर पकड़ने लगी है। वर्तमान छात्र संघ के साथ ही तमाम राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ता पूर्व छात्र नेता भी आंदोलन में उतर आए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में लगातार हो रही उपेक्षा ने अब विश्वविद्यालय की मांग को जनआंदोलन में बदल दिया है। यहां विश्वविद्यालय स्थापित करने की मांग काफी पुरानी रही है। वर्ष 1972 में यहां के दो विद्यार्थी विश्वविद्यालय की मांग को लेकर शहादत भी दे चुके हैं। लेकिन जब वर्ष 1973 में कुमाऊं विश्वविद्यालय बना तो इस शहादत की उपेक्षा करते हुए नैनीताल में इसे स्थापित कर दिया गया। इसके बाद विगत वर्ष बना आवासीय विश्वविद्यालय भी अल्मोड़ा में स्थापित हो गया। अब जब प्रदेश सरकार ने नए विश्वविद्यालय को खोलने का निर्णय किया तो इसे अल्मोड़ा में स्थापित करने की मंशा बना इस सीमांत क्षेत्र की एक बार फिर उपेक्षा कर दी गई। लगातार हो रही उपेक्षा अब सामूहिक विरोध-प्रदर्शन के रूप में व्यक्त होने लगी है।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सीमांत जिले की किस तरह से उपेक्षा हो रही है इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि पिछले एक दशक से पिथौरागढ़ डिग्री कॉलेज को कैंपस बनाने, लॉ फैकल्टी एवं रजिस्ट्रार कार्यालय खोलने को लेकर लगातार छात्र- छात्राएं आंदोलित रहे हैं। लेकिन इनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित होती रही है। प्रदेश में जब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईएम) खुलने की बात चली तो यह जनपद प्राथमिकता में था, लेकिन बाद में इसे काशीपुर में खोल दिया गया। अब जब सरकार ने नए विश्वविद्यालय को खोलने का ऐलान किया तो इस क्षेत्र की फिर उपेक्षा कर दी गई। नया विश्वविद्यालय कहीं दूसरी जगह स्थापित हो उससे पहले ही यहां की जनता विश्वविद्यालय सोरघाटी में स्थापित करने की मांग को लेकर हस्ताक्षर अभियान के साथ ही विरोध प्रदर्शन पर उतर आई है। इसके लिए बकायदा ‘पिथौरागढ़ विश्वविद्यालय बनाओ संघर्ष समिति’ गठित की गई है। यहां के छात्र नेताओं के साथ ही सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर यहां विश्वविद्यालय स्थापित होता है तो यहां की शिक्षा व्यवस्था का स्तर सुधरेगा। यह एक एजुकेशनल हब के रूप में भी विकसित होगा। इसलिए भी विश्वविद्यालय को पिथौरागढ़ में बनाए जाने की मांग का व्यापक स्तर पर समर्थन हो रहा है। अगर सीमांत क्षेत्र में विश्वविद्यालय खुलता है तो जनपद के साथ ही पड़ोसी जनपद चंपावत के छात्र-छात्राएं भी इससे लाभांवित होंगे। प्रदेश के वित्त मंत्री प्रकाश पंत हों या फिर राज्य सभा सांसद प्रदीप टम्टा, ये भी पिथौरागढ़ में ही विश्वविद्यालय की मांग का समर्थन करते हैं। वित्त मंत्री प्रकाश पंत का कहना है कि अभी इस मामले पर मंथन हो रहा है। विश्वविद्यालय खोलने का पूरा प्रयास किया जाएगा।

आज भी जनपद में स्थापित डिग्री कालेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को मार्कशीट खराब होने, गलत नम्बर चढ़ने, डिग्री निकालने छोटी-मोटी समस्याओं को लेकर 100 किमी. की दूरी तय कर नैनीताल पहुंचना पड़ता है। कई बार तो विद्यार्थी मार्कशीट ले लेते हैं, लेकिन डिग्री प्राप्त नहीं कर पाते। यही नहीं जनपद में चल रहे डिग्री कॉलेजों में प्राध्यापकों के आधे से अधिक पद खाली चल रहे हैं। छात्र-छात्राओं को पुस्तकें तक महाविद्यालय से प्राप्त नहीं हो पाती। जनपद में स्थापित विभिन्न डिग्री कॉलेजों में सात हजार से अधिक छात्र-छात्राएं कई तरह की दिक्कतों से दो चार हो रहे हैं। सरकार के नए विश्वविद्यालय को अल्मोड़ा में खोलने का विरोध इसलिए भी हो रहा है कि वहां पहले से ही आवासीय विद्यालय और कुमाऊं विश्वविद्यालय के परिसर भी स्थापित है। इसके साथ ही विश्वविद्यालय मुख्यालय नैनीताल की दूरी भी कम है। जनपद में पिथौरागढ़, बेरीनाग, गंगोलीहाट, बलुवाकोट, नारायणनगर, मुनस्यारी, मुवानी, गणाई में डिग्री कॉलेज हैं। लेकिन अधिकांश कॉलेजों की स्थिति बदतर चल रही है। पिथौरागढ़ जिले में नए खुले महाविद्यालयों की स्थिति को देखें तो गंगोलीहाट महाविद्यालय का भवन वर्षों से निर्माणाधीन है और वर्तमान में टिन शेड में इसकी कक्षाएं संचालित हो रही हैं। मुनस्यारी का भवन भी निर्माणाधीन है। यह जीआईसी के छात्रावास में चल रहा है। गणाई गंगोली कॉलेज का भवन भी निर्माणाधीन है, वर्तमान में यह टिन शेड में चल रहा है। मुवानी महाविद्यालय अभी भूमि का चयन तक ही सीमित है। बलुवाकोट महाविद्यालय की भी यही स्थिति है। यही हाल चंपावत जनपद के पीजी कॉलेज लोहाघाट का भी है। 1979 में खुला यह विद्यालय प्रवक्ताओं की कमी झेल रहा है। 2100 से अधिक छात्र संख्या वाले इस कालेज में शिक्षकों के 33 पद स्वीकøत हैं। लेकिन 18 से उपर पद कभी भरे ही नहीं गए। यहां अक्टूबर 2013 में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने विधि संकाय खोलने घोषणा की थी, लेकिन आज तक निदेशालय और शासन स्तर पर इस पर कोई पहल नहीं हो पाई। जनपद के अमोड़ी डिग्री कॉलेज जीआईसी के दो कमरों में संचालित हो रहा है। बजट की कमी भवन के निर्माण में बाधक बनी हुई है। वर्तमान में कुमाऊं विश्वविद्यालय में तीन परिसर व 36 महाविद्यालय संचालित हैं। तीनों परिसर अल्मोड़ा व नैनीताल जिले में स्थित हैं। पिथौरागढ़, चंपावत व बागेश्वर इससे वंचित हैं।

कुमाऊं विश्वविद्यालय के आधारभूत ढांचे व प्रशासनिक कामकाज पर नजर डालें तो यहां घोर अंधेरनगरी नजर आती है। नैनीताल में दोषापानी, बागेश्वर में कपकोट, गरूड़, कांडा, अल्मोड़ा में जैंती, चौखुटिया, गरूड़बाज, सामेश्वर, भिकियासैंण, पिथारागढ़ में धारचूला, गंगोलीहाट, मुनस्यारी, मुवानी, गणाई एवं चंपावत जनपद में टनकपुर के पास अपने भवन नहीं है। स्थितियां यह हैं कि कभी भूमि मिलती है तो ग्रांट नहीं मिल पाती। पीजी की मान्यता के लिए पहले पद सृजित करने होते हैं, फिर वित्त में फाइल जाती है। कॉलेजों की स्वायत्तता की फाइलों पर भी काम नहीं हो पाया है। घोषणाएं तो खूब हुई, लेकिन स्टाफ और संसाधन बढ़ाने पर ध्यान नहीं दिया गया। यह भी देखने में आता है कि न तो आपत्ति लगाई जाती है न ही फाइलें लौटकर आ पाती हैं। दो कमरों या फिर टिन शैडों पर कॉलेज चल रहे हैं। जमीन खोजने का काम बेहद सुस्त रफ्तार से चल रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग कॉलेज के विकास के लिए बजट उपलबध कराता है बशर्ते प्राचार्य प्रस्ताव भेजें जिसके लिए प्राचार्यों को यूजीसी 2(एफ) व 12 (बी) फार्म भरना होता है लेकिन इसके समय पर न भरने से ग्रेडिंग नहीं मिल पाती और अनुदान पाने से कॉलेज रह जाते हैं। महाविद्यालयों को ऑटोनोमस की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ पा रही है। सेमेस्टर सिस्टम लागू तो किया गया, लेकिन इसमें खानापूर्ति ज्यादा हो रही है। इसकी वजह एक तो प्राचार्यों व शिक्षकों की कमी तो दूसरा छात्र नेताओं की दखलअंदाजी के चलते इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। उच्च शिक्षा निदेशालाय भी प्रॉपर मॉनीटरिंग नहीं कर पाता है। प्रदेश के 40 राजकीय डिग्री कॉलेज अभी मुखियाविहीन चल रहे हैं। 30 प्रतिशत शिक्षकों के पद खाली चल रहे हैं। कहने को उच्च शिक्षा में सुधार के लिए केंद्र सरकार की रूसा के तहत जिन एक दर्जन कॉलेजों में भवन निर्माण चल रहा है, उनकी भी गति धीमी है।

उच्च शिक्षा में प्रदेश की स्थितियों को देखें तो फैकल्टी, संसाधनों के लिए केंद्र सरकार पर निर्भरता बनी हुई है। प्रदेश में 100 से अधिक डिग्री कॉलेज शिक्षकों की कमी झेल रहे हैं। जिसमें 600 से अधिक शिक्षकों की कमी बनी हुई है। स्थायी प्राचार्यों को भी ये कॉलेज तरस रहे हैं। रोजगारपरक कोसों के संचालन के लिए बजट की कमी है। शोध कार्य भी गुणवत्तापरक नहीं बन पा रहे हैं। कॉलेजों के पास पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। सब रूसा पर टिके हुए हैं जबकि सभी डिग्री कॉलेजों के आधुनिकीकरण की जरूरत महसूस की जा रही है। वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धा में यहां के कॉलेज टिकते नहीं दिखते। डिग्री कॉलेजों का स्तर सुधरना सबसे बड़ी चुनौती है। रूसा में 30 कॉलेज ही शामिल हैं। 35 कॉलेजों के पास अपने भवन नहीं है। 1 लाख से अधिक विद्यार्थियों तमाम महाविद्यालयों में अध्ययनरत हैं, लेकिन 34 कॉलेजों में साइंस लैब तक नहीं हैं। 27 कॉलेजों में पुस्तकालय नहीं हैं 17 डिग्री कॉलेजों में शौचालय नहीं है। कई कॉलेजों में कुर्सी मेजों का अभाव बना हुआ है। तमाम डिग्री कॉलेजों में संसाधनों की भारी कमी बनी हुई है। कस्बों तक डिग्री कॉलेज खोल देने वाले राज्य में संसाधनों का अभाव बना हुआ हैं प्रदेश में मात्र 18 प्रतिशत संस्थानों को ही राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (नैक) का प्रमाणन मिल पाया है। प्रदेश के 51 प्रतिशत कॉलेजों में प्राचार्य नहीं हैं। एसोसिएशन ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 2010 के बाद 6 साल के भीतर विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़कर 18 से 28 हो गई। वर्ष 2000 से 2016 के बीच सरकारी कॉलेजों की संख्या 34 से 99 पहुंच गई। इनमें से 78 कॉलेज बगैर संसाधनों के पर्वतीय क्षेत्रों में खोल दिए गए। प्रदेश में शिक्षकों की क्लासरूम परफार्मेंस के लिए कोई फीडबैक सिस्टम नहीं बन पाया है। गुणवत्ता के मामले में मात्र 18 प्रतिशत संस्थानों के पास ही नैक का सार्टिफिकेट है। विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में प्राचार्य के 51, शिक्षकों के 44 और नॉन टीचिंग के 29 प्रतिशत पद खाली चल रहे हें। इसके अलावा 179 सेल्फ फाइनेंस कॉलेज भी प्रदेश में मौजूद हैं। उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय का हाल भी इससे अलग नहीं है। प्रदेश में 250 से अधिक अध्ध्यन केंद्र संचालित कर रहे हैं जिसमें 77 से अधिक पाठ्यक्रम संचालित हो रहे हैं। 50 हजार से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। लेकिन संसाधन विकास के लिए वित्त की कमी बनी हुई है। ऐसे में अब नए खुले या खुलने वाले विश्वविद्यालय अपने उद्देश्यों पर खरे उतर पाएंगे, यह भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है।

बात अपनी-अपनी

राज्य सरकार ने अल्मोड़ा में विश्वविद्यालय खोलने का प्रस्ताव रखा है जबकि सीमांत जनपद पिथौरागढ़ की लगातार उपेक्षा हो रही है। अल्मोड़ा में पूर्व में ही आवासीय विद्यालय होने के साथ ही कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल की दूरी भी कम है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि सीमांत क्षेत्र में विश्वविद्यालय खुलना चाहिए। विश्वविद्यालय की मांग को लेकर हमारा प्रयास जारी रहेगा।
राकेश जोशी, अध्यक्ष छात्र संघ डिग्री कॉलेज पिथौरागढ़

इस जिले की लगातार उपेक्षा हो रही है। यहां पहले से ही उच्च शिक्षा की स्थिति बदहाल है। यहां अध्ययनरत छात्र- छात्राओं को छोटी-मोटी समस्याओं के समाधन के लिए कोसों दूर नैनीताल की दूरी तय करनी पड़ती है। इससे विद्यार्थियों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता है। लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि समय पर उनकी समस्याओं का समाधन हो सके। हमारी मांग व संघर्ष नए विश्वविद्यालय को पिथौरागढ़ में खोलने को लेकर है।
मनोज कुमार जोशी, पूर्व छात्र नेता व सामाजिक कार्यकर्ता

सीमांत जनपद चीन, तिब्बत, नेपाल की अंतराष्ट्रीय सीमा से लगा हुआ है। यहां शिक्षा व्यवस्था अच्छी न होने से यह पलायन की मार झेल रहा है। उच्च शिक्षा सहित कई आधारभूत सेवाओं की कमी यहां बनी हुई है। शिक्षा सहित तमाम आधारभूत ढाचों के निर्माण को लेकर जनपद की लगातार उपेक्षा होती रही है। अब जब विश्वविद्यालय स्थापित करने का निर्णय सरकार ने लिया तो इसे इस सीमांत जनपद में ही स्थापित करना चाहिए। हमारा संघर्ष नए विश्वविद्यालय को पिथौरागढ़ में स्थापित करने को लेकर है।
भगवान रावत, संयोजक जनमंच व पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष

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