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Uttarakhand

आपसी रार ने डुबाई कांग्रेस की नैय्या

मजबूत संगठन के बल पर चुनाव में उतरी भाजपा को चुनाव जिन दो व्यक्तियों ने लड़ाया उनमें प्रदेश महामंत्री सुरेश भट्ट और कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य प्रमुख थे। दोनों ने ही अपनी पार्टी को निराश नहीं किया। यशपाल आर्य को तो पार्टी ने लंबे समय पूर्व ही सल्ट चुनाव की जिम्मेदारी सौंप दी थी। हरियाणा में संगठन महामंत्री रहे सुरेश भट्ट का अनुभव सल्ट उपचुनाव में साफ दिखा। जहां तक कांग्रेस का सवाल है उसमें खटपट चुनाव से पहले ही नजर आने लगी थीं और चुनाव के दौरान भी जारी रही। प्रदेश प्रभारी देवेन्द्र यादव और प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह रणजीत रावत और विक्रम रावत को न ही गंगा पंचोली के प्रचार के लिए मना पाए, न ही चुनाव के मध्य पार्टी प्रत्याशी गंगा पंचोली के विरुद्ध बोलने से रोक पाए

 

उत्तराखण्ड में सल्ट विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश कांग्रेस के नेताओं की रार को सामने ला खड़ा किया है। सुरेंद्र सिंह जीना के निधन से खाली इस सीट पर भाजपा ने सुरेंद्र सिंह जीना के भाई महेश जीना और कांग्रेस ने 2017 के विधानसभा चुनाव में दूसरे नंबर पर रही गंगा पंचोली को अपना प्रत्याशी बनाया था। भारतीय जनता पार्टी जहां प्रत्याशी के रूप में शुरू से किसी संशय में नहीं थी लेकिन कांग्रेस के अंदर प्रत्याशी के नाम पर अंत तक उहापोह रहा। गुटों में बंटी कांग्रेस में एक गुट सल्ट के पूर्व विधायक रणजीत रावत के पुत्र विक्रम रावत के पक्ष में जो कि सल्ट के ब्लाॅक प्रमुख भी हैं वहीं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत गंगा पंचोली के पक्ष में थे। ये अप्रत्याशित ही था कि प्रत्याशी चयन के लिए बनाए गए पर्यवेक्षकों की राय को दरकिनार करते हुए कांग्रेस आलाकमान ने हरीश रावत की पसंद को तवज्जो दी। कांग्रेस प्रदेश प्रभारी देवेन्द्र यादव, प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश समेत एक बड़ा तबका विक्रम रावत के पक्ष में था। त्रिवेंद्र रावत की विदाई के बाद मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के सामने सल्ट उपचुनाव एक बड़ी चुनौती थी जिसमें वो सफल रहे। खास बात ये है कि सरकार से बड़ा ये चुनाव भाजपा के संगठन के लिए था। मजबूत संगठन के बल पर चुनाव में उतरी भाजपा को चुनाव जिन दो व्यक्तियों ने लड़ाया उनमें प्रदेश महामंत्री सुरेश भट्ट और कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य प्रमुख थे। दोनों ने ही अपनी पार्टी को निराश नहीं किया। यशपाल आर्य को तो पार्टी ने लंबे समय पूर्व ही सल्ट चुनाव की जिम्मेदारी सौंप दी थी। हरियाणा में संगठन महामंत्री रहे सुरेश भट्ट का अनुभव सल्ट उपचुनाव में साफ दिखा। शांत स्वभाव के सुरेश भट्ट का कार्य करने का तरीका भी उतना ही शांत है। उन्होंने चुनाव खत्म होने तक संगठन की गति को ढीला नहीं होने दिया।

यह आश्चर्यजनक ही था कि भाजपा ने उनकी उत्तराखण्ड में नियुक्ति को लंबे समय तक लंबित रखा था। ये सुरेश भट्ट की संगठन क्षमता का ही परिणाम था कि 2017 के मुकाबले भाजपा की जीत का अंतर 2000 बढ़ गया। हालांकि भाजपा के पक्ष में सहानुभूति लहर का दावा किया गया। लेकिन इसी सहानुभूति का दावा पिथौरागढ़ उपचुनाव में भी किया गया था। लेकिन वहां प्रकाश पंत की पत्नी चन्द्रा पंत कड़े मुकाबले में एक नई प्रत्याशी से बामुश्किल 1800 मतों से जीत पाई थीं। भाजपा के लिए महेश जीना की विजय सुकून देने वाली रही, वहीं भाजपा के अंदर अन्य दावेदारों के लिए चुनौती भी खड़ी कर गई जो 2022 के चुनाव में अपने लिए अवसर देख रहे थे।

जहां तक कांग्रेस का सवाल है उसमें खटपट चुनाव से पहले ही नजर आने लगी थीं और चुनाव के दौरान भी जारी रही। प्रदेश प्रभारी देवेन्द्र यादव और प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह रणजीत रावत और विक्रम रावत को न ही गंगा पंचोली के प्रचार के लिए मना पाए, न ही चुनाव के मध्य पार्टी प्रत्याशी गंगा पंचोली के विरुद्ध बोलने से रोक पाए। देवेन्द्र यादव ने भले ही पार्टी को बूथ स्तर तक सक्रिय कर बड़े नेताओं की ड्यूटी हर क्षेत्र में लगाई हो लेकिन जमीन स्तर तक पार्टी अपना संवाद नहीं पहुंचा पाई। शायद ये पार्टी की उस सोच का नतीजा है जिसमें क्षेत्र के चैधरी अपनी पसंद के अनुरूप ही उम्मीदवार चाहते हैं, वरना आपका उम्मीदवार राम भरोसे ही है। देवेन्द्र यादव, हरीश रावत का प्रचार भी गंगा पंचोली को जीत नहीं दिला सका। ये चुनौती कांग्रेस के लिए 2022 के लिए भी है और ये अंतर्विरोध उसे 2022 में भी भारी पड़ सकते हैं, जहां कांग्रेस के नेताओं के अहं का टकराव फिर आड़े आएगा। सल्ट उपचुनाव कांगे्रस के बड़े नेताओं ने कोई सबक लिया हो ऐसा लगता नहीं है। अब ये प्रदेश प्रभारी पर निर्भर है कि इस हार से सबक लेते हुए वो पार्टी में नेताओं के बीच किस प्रकार समन्वय स्थापित कर पाते हैं। इन चुनावों ने क्षेत्रीय ताकतों को भी आइना दिखा गया, जो अपनी जमानतें बचा पाने में असफल रहीं।

कुल मिलाकर जहां उपचुनाव भाजपा के लिए 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए संजीवनी का काम कर गया, वहीं कांग्रेस के सामने सवाल खड़े कर गया कि वो इस तरह आपस में लड़कर भाजपा से मुकाबला करेगी या फिर नेताओं के अहं की लड़ाई पार्टी को ही चुनावों में धराशायी कर देगी।

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