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उत्तराखण्ड राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए सूबे के मुखिया पुष्कर सिंह धामी द्वारा ‘भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखण्ड एप’ प्रारंभ किया गया है। जिससे प्रदेश की जनता को भ्रष्ट अधिकारियों पर एक्शन लिए जाने की उम्मीद जगी है। फिलहाल इस उम्मीद पर मुख्यमंत्री धामी खरा उतरते भी नजर आ रहे हैं। उन्होंने पिछले एक माह में कई भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई भी की है। अगला नंबर शिक्षा विभाग में तीन दशक से कुंडली मारे बैठे मुकुल कुमार सती का है। सती राज्य के अपर शिक्षा परियोजना निदेशक के साथ ही देहरादून के मुख्य शिक्षा अधिकारी (सीईओ) भी हैं। सती पर जालसाजी और धोखाधड़ी कर बीएड की डिग्री हासिल कर सरकारी नौकरी पाने के आरोप हैं। अपने रसूख के बल पर वह आज तक उच्च न्यायालय, गृह विभाग, शिक्षा विभाग और एसआईटी जांच की कार्रवाई को रफा-दफा कराते रहे हैं लेकिन इस बार धामी सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ मिशन के चलते उनका बचना मुश्किल है

क्या कोई व्यक्ति एक ही समय में दो दो स्थानों पर उपस्थित हो सकता है और वह भी जब दोनों स्थानों के बीच 100 किलोमीटर का फासला हो। लेकिन इसे संभव कर दिखाया है हल्द्वानी के एक व्यक्ति ने। इसका नाम है डॉक्टर मुकुल कुमार सती। इस शख्स ने हल्द्वानी के हरिदत्त नित्यानंद (एचएन) इंटर कॉलेज में अध्यापक रहते हुए अल्मोड़ा के डीएसबी कॉलेज से बीएड कर लिया। स्कूल के जिन दिनों में उनकी उपस्थिति दर्ज है उन्हीं दिनों में वह अल्मोड़ा में बीएड करके नया इतिहास रच रहे थे। यही नहीं इस बीएड और अध्यापन कार्य के अनुभव की बदौलत वे अब राज्य के अपर शिक्षा परियोजना निदेशक बन गए है। जबकि पहुंच की बदौलत वह देहरादून के मुख्य शिक्षा अधिकारी बन बैठे हैं।

 

 

तत्कालीन सीएत त्रिवेंद्र रावत की ओर से जारी आदेश 
  

ऐसा नहीं है कि अब से पूर्व मुन्ना भाई सीईओ की पोल न खुली हो। प्रदेश के पूर्व और वर्तमान शिक्षा मंत्री बकायदा जांच के आदेश दिए गए। लेकिन जांच होना तो दूर अभी तक किसी ने पूछताछ भी नहीं की। अपने संबंधों की बदौलत शासन-प्रशासन और मंत्रिमंडल में एक विशेष स्थान बना चुके इस शिक्षा अधिकारी पर कोई भी हाथ डालने से कतरा रहा है। किसी भी अधिकारी या मंत्री की हिम्मत नहीं है कि वह मुकुल कुमार सती के बीएड की डिग्री पर सवाल उठा सके। हालांकि इस मामले में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा मुख्य सचिव से लेकर सचिव विद्यालय शिक्षा को मुकुल कुमार सती के फर्जीवाड़े की एसआईटी जांच कराने के संदर्भ में आदेशित किया जा चुका है। जिसके चलते विजिलेंस विभाग द्वारा मुकुल कुमार सती के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई करने की संस्तुति की गई है। 23 मई 2022 को मुकुल कुमार सती की जालसाजी और धोखाधड़ी के मामले की विजिलेंस मुख्यालय द्वारा की गई विभागीय कार्रवाई की संस्तुति को सचिव विद्यालय को अग्रसारित करते हुए सती के विरुद्ध कार्रवाई करने हेतु निर्देशित किया गया है।

वर्ष 1989 की बात है जब मुकुल कुमार सती को हल्द्वानी स्थित हरिदत्त नित्यानंद इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य ने 11वीं कक्षा में पढ़ाने के लिए प्रति विषय 500 रुपए मानदेय पर रखने की अनुमति प्रदान की थी। सती ने एक अगस्त 1989 को एक लिखित पत्र के जरिए कबूल किया था कि उसने स्कूल से मानदेय प्राप्त किया। इसके बाद सती ने लगातार स्कूल में आकर अध्यापन कार्य किया। स्कूल की अध्यापक उपस्थिति पंजिका में सती की प्रतिदिन की उपस्थिति दर्ज है। स्कूल की उपस्थिति पंजिका एवं वेतन वितरण पंजिका में बकायदा सती के हस्ताक्षर मौजूद है। जब सती हल्द्वानी के एचएन इंटर कॉलेज में अध्यापन कार्य कर रहे थे उसी दौरान उन्होंने अल्मोड़ा के कॉलेज से बीएड भी कर लिया। यहां पर भी उल्लेखनीय है कि अल्मोड़ा स्थित कॉलेज में बीएड का नियमित कोर्स है। जिसके लिए छात्र का प्रतिदिन कॉलेज में आकर शिक्षा ग्रहण करना जरूरी है।

वर्तमान सीएम धामी की ओर से जांच के जारी आदेश

26 मार्च 2005 को मुकुल कुमार सती ने कुमाऊं मंडल के संयुक्त शिक्षा निदेशक को एक पत्र में यह बात स्वीकारी है की ‘ेमैंने बीएड शिक्षा सत्र 1989-90 में उत्तीर्ण किया है। मेरा अनुक्रमांक 11180 था। बीएड की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरांत ही मैंने बीएड में प्रवेश पाया है। हरिदत्त नित्यानंद इंटर कॉलेज हल्द्वानी में प्रवक्ता पद पर 5 जुलाई 1990 को मेरी नियुक्ति हुई थी। नियुक्ति प्रबंधक एचएन इंटर कॉलेज के पत्रांक -23-24/ 1990-90 दिनांक 06-07-1990 के द्वारा हुई है। जबकि मैंने बीएड 1989-90 सत्र में किया है।’ ‘दि संडे पोस्ट’ के पास मौजूद दस्तावेजों में सती की एचएन इंटर कॉलेज में नियुक्ति के आदेश 1989 में ही दे दिए गए थे। यही नहीं प्रधानाचार्य ने अपनी उपस्थिति पंजिका में उनकी हाजिरी 19 जुलाई 1989 से लगानी शुरू कर दी थी। इस दौरान कॉलेज प्रबंधन ने सती को 13 दिन का मानदेय 419 रुपए भी दिया। इसी तरह हर माह का पूरा वेतन सती लेते रहे जो इस बात की पुष्टि करता है कि हर दिन वे स्कूल में अध्यापन कार्य करते रहे। उनकी यह नियुक्ति स्थाई हो या तदर्थ वह 1989 में यहां अध्यापन कर चुके थे। इसी सत्र में उन्होंने अल्मोड़ा स्थित डीएसबी कॉलेज से बीएड कोर्स में प्रवेश लिया और नियमित छात्र की तरह डिग्री भी ली।

इसी के साथ विश्वविद्यालय के बाइलॉज 1- 8 (ख) में भी स्पष्ट है कि ‘यदि कोई अभ्यर्थी विश्वविद्यालय की किसी कक्षा में धोखाधड़ी से प्रवेश लेता है तो उसका प्रवेश संबंधित संकायाध्यक्ष-प्राचार्य द्वारा निरस्त कर दिया जाएगा। ऐसे छात्र- छात्रा को विश्वविद्यालय/महाविद्यालय में अगले 3 वर्षों तक नियमित प्रवेश नहीं दिया जाएगा और न­­­ ही विश्वविद्यालय की किसी व्यक्तिगत परीक्षा में सम्मिलित होने की अनुमति दी जाएगी। विश्वविद्यालय के बायलॉज नं 1- 24 में यह भी स्पष्ट उल्लेखित है कि प्रत्येक छात्र की संबंधित विषयों की कक्षाओं में नियमानुसार 75 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य होगी। विशेष परिस्थितियों में संकायाध्यक्ष-प्राचार्य की ओर से 05 प्रतिशत तक तथा संकायाध्यक्ष-प्राचार्य की संस्तुति पर कुलपति द्वारा 10 प्रतिशत तक की छूट प्रदान की जा सकती है। लेकिन यहां मुकुल सती को  किसी छूट का फायदा नहीं मिला। सती ने देखा जाए तो उन्होंने इस मामले में दोहरा फायदा लिया। वह हल्द्वानी के एचएन इंटर कॉलेज में वेतन भी प्राप्त करते रहे और अल्मोड़ा के डीएसबी कॉलेज से बीएड की शिक्षा भी ग्रहण करते रहे।

 

मुकुल कुमार सती के बीएड की डिग्री की जांच के आदेश

मुकुल कुमार सती को हल्द्वानी के एचएन इंटर कॉलेज में नियुक्ति मिलने के आठ साल बाद, मई 1993 में जिला शिक्षा अधिकारी के पद का कार्यभार सौंपा गया। जिसकी संस्तुति कुमाऊं मंडल के तत्कालीन संयुक्त शिक्षा निदेशक दान सिंह रौतेला ने अपने 19 नवंबर के पत्र में की है। 1999 में जिला शिक्षा अधिकारी बनने के बाद सती को सबसे पहले पिथौरागढ़ का जिला शिक्षा अधिकारी (बेसिक) बनाया गया। उसके बाद उन्हें इसी पद पर उधम सिंह नगर जिले में स्थानांतरित कर दिया गया। वर्तमान में मुकुल कुमार सती उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून के जनपद देहरादून में कार्यरत है। जहां उन्हें सर्व शिक्षा अभियान का अपर राज्य शिक्षा परियोजना निदेशक उत्तराखण्ड एवं मुख्य शिक्षा अधिकारी, बनाया गया है।
ऐसा नहीं है कि यह प्रकरण पहली बार सामने आया है हल्द्वानी निवासी उत्तराखण्ड राज्य निर्माण आंदोलनकारी भास्कर चंद्र ने उत्तराखण्ड राज्य गठन के समय इस मुद्दे को बड़े जोर शोर से उठाया था। उन्होंने प्रदेश के तत्कालीन प्राथमिक माध्यमिक शिक्षा एवं भाषा मंत्री नरेंद्र सिंह भंडारी से मुकुल कुमार सती के फर्जीवाड़े की शिकायत की थी। भंडारी ने 29 अप्रैल 2003 को प्रदेश के शिक्षा निदेशक को पत्र लिखकर कार्रवाई करने के आदेश दिए थे। लेकिन हुआ कुछ नहीं। इसके बाद एक बार फिर प्रदेश के शिक्षा मंत्री ने 10 सितंबर 2004 को प्रदेश के अपर मुख्य सचिव से पत्र लिखकर जानकारी मांगी थी कि इस संदर्भ में अभी तक क्यों कुछ भी नहीं किया गया। इस संबंध अपर मुख्य सचिव ने 23 सितंबर 2004 को शिक्षा मंत्री श्री भंडारी को अपनी मजबूरी प्रकट करते हुए लिखा कि 29 अप्रैल 2002 को एक पत्र द्वारा यह प्रकरण शिक्षा निदेशक को संदर्भित करते हुए जांच करवा कर जांच आख्या सहित पत्रावली प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था। लेकिन वर्षों बीत जाने पर भी अभी तक जांच आख्या मेरे सम्मुख प्रस्तुत नहीं हो पाई है। इसी के साथ उन्होंने लिखा कि तथ्यों पर शासन स्तर से तत्काल जांच कराकर जांच आख्या सहित पत्रावली प्रस्तुत करवाएं। लेकिन कार्रवाई होना तो दूर तब से 20 वर्ष बाद भी जांच एक कदम आगे नहीं बढ़ी।

रहस्यमय परिस्थिति में गायब हुई उपस्थिति पंजिका

कुमाऊं विश्वविद्यालय के अल्मोड़ा परिसर में शिक्षा सत्र 1989-90 की मूल उपस्थिति पंजिका रहस्यमय परिस्थिति में गायब हो चुकी है। उत्तराखण्ड सूचना आयोग के आदेश के बाद कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल ने विभागाध्यक्ष शिक्षा संकाय अल्मोड़ा परिसर को बीएड की उपस्थिति पंजिका शिक्षा सत्र 1989-90 के गायब होने पर पुलिस स्टेशन अल्मोड़ा में 29 सितंबर 2020 को अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी गई हैं। उत्तराखण्ड सूचना आयोग में भास्कर चंद्र द्वारा अपील दायर करके कहा गया था कि शिक्षा सत्र 1989-90 में अगर मुकुल कुमार सती द्वारा बीएड की पढ़ाई की गई है तो वर्ष 1989-90 की बीएड की उपस्थिति पंजिका उपलब्ध कराई जाए। उनकी उपस्थिति पंजिका दी जाए। लेकिन कुमाऊं विश्वविद्यालय ने उपस्थिति पंजिका गायब होने की सूचना आयोग में दी और आयोग के निर्देश के बाद इस प्रकरण पर पुलिस थाना अल्मोड़ा में एफआईआर दर्ज हुई। इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चले गया। जांच का विषय यह है कि अगर 1989-90 को बीएड की उपस्थिति पंजिका कुमाऊं विश्वविद्यालय से गायब हो चुकी थी तो विश्वविद्यालय प्रशासन 1989 से लेकर 2020 तक क्या कर रहा था?

मजेदार बात यह है कि दूसरी और मुकुल कुमार सती की वर्ष 1989-90 की एचएन इंटर कॉलेज हल्द्वानी में अध्यापन कार्य करने संबंधित उपस्थिति पंजिका वर्तमान समय तक उपलब्ध है। जिसमें मुकुल कुमार सती के जुलाई 1989 से लेकर 1990 तक के प्रतिदिन के हस्ताक्षर दर्ज है। पुलिस थाना हल्द्वानी द्वारा पुलिस क्षेत्राधिकारी हल्द्वानी के माध्यम से प्रेषित जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि मुकुल कुमार सती शिक्षा सत्र 1989-90 में हल्द्वानी के एचएन इंटर कॉलेज में नौकरी कर रहे थे और इनकी नियुक्ति के सभी दस्तावेज एच एन इंटर कॉलेज हल्द्वानी में उपलब्ध है। चर्चा है कि मुकुल कुमार सती शिक्षा सत्र 1989-90 में अल्मोड़ा बीएड कॉलेज में बीएड की पढ़ाई करने उपस्थिति नहीं हुए थे। शायद यही वजह है कि इस फर्जीवाड़े को छुपाने के लिए कुमाऊं विश्वविद्यालय प्रशासन ने मुकुल कुमार सती की वर्ष 1989-90 की उपस्थिति पंजिका गायब होने की रिपोर्ट पुलिस स्टेशन अल्मोड़ा में दर्ज कराकर सारे प्रकरण पर पर्दा डालने का काम किया।

हवा-हवाई हुए जांच के आदेश

2018 में कुमाऊं विश्वविद्यालय के सीनेट सदस्य हुकुम सिंह कुंवर की शिकायत के पश्चात मामले की जांच के आदेश गृह विभाग के माध्यम से पुलिस मुख्यालय को दिए गए। तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नैनीताल द्वारा प्रभारी निरीक्षक पुलिस कोतवाली मल्लीताल (नैनीताल) से प्रकरण की जांच करवाकर इस तथ्य को प्रमाणित किया गया कि मुकुल कुमार सती द्वारा वर्ष 1989-90 में हल्द्वानी में नौकरी करते हुए हल्द्वानी से 100 किलोमीटर दूर अल्मोड़ा कॉलेज से बीएड की संस्थागत डिग्री हासिल की गई है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा अपनी जांच रिपोर्ट 31 मार्च 2019 को पुलिस मुख्यालय के माध्यम से शासन को प्रेषित करते हुए इस प्रकरण में शिक्षा विभाग से जांच कराने की संस्तुति की थी। शासन के गृह विभाग द्वारा भी सचिव विद्यालयी शिक्षा को कार्रवाई के आदेश दिए गए। लेकिन आज तक कोई भी कार्यवाही नहीं हुई।इस दौरान भी शासन के माध्यमिक शिक्षा अनुभाग 2 द्वारा मुकुल कुमार सती के फर्जीवाड़े को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
सामाजिक कार्यकर्ता जफर खान द्वारा इस मामले की एसआईटी जांच कराने के लिए उच्च न्यायालय नैनीताल में याचिका दायर की थी। उच्च न्यायालय द्वारा इस मामले में सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रत्यावेदन प्रस्तुत करने के निर्देश याचिकाकर्ता को दिए। हाईकोर्ट के आदेश के क्रम में याचिकाकर्ता जफर खान द्वारा प्रमुख सचिव गृह विभाग उत्तराखण्ड शासन को मुकुल कुमार सती के फर्जीवाड़े के एसआईटी जांच कराने हेतु प्रत्यावेदन दिया गया। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय नैनीताल के आदेश के पश्चात गृह अनुभाग उत्तराखण्ड शासन द्वारा सचिव विद्यालयी शिक्षा को मुकुल कुमार सती द्वारा नौकरी के साथ-साथ बीएड की डिग्री हासिल करने के फर्जीवाड़े की एसआईटी जांच कराने के लिए निर्देशित किया गया। सीबीसीआईडी मुख्यालय उत्तराखण्ड की इस संदर्भ में महानिदेशक विद्यालयी शिक्षा को कार्रवाई करने के लिए एक पत्र प्रेषित किया था। महानिदेशक विद्यालयी शिक्षा द्वारा कहा गया कि मुकुल कुमार सती प्रथम श्रेणी के शिक्षा अधिकारी है और इनके विरुद्ध शासन स्तर से ही कार्रवाई हो सकती है। इस आदेश के साथ ही महानिदेशक विद्यालयी शिक्षा द्वारा इस प्रकरण को शासन को संदर्भित कर दिया गया। लेकिन उत्तराखण्ड शासन के माध्यमिक शिक्षा अनुभाग 2 में सकी की गहरी पैठ होने के कारण इस फर्जीवाड़े की जांच की कार्रवाई अभी तक जसकी तस है।

कैसे मिला यूपी से उत्तराखण्ड कैडर

मुकुल कुमार सती उत्तर प्रदेश कैडर के शिक्षा अधिकारी है। उनकी नियुक्ति उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में हुई थी। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद सती को उत्तराखण्ड कैडर प्राप्त हो गया। उत्तराखण्ड में ही सती की बेसिक शिक्षा अधिकारी नैनीताल के पद से लेकर मुख्य शिक्षा अधिकारी देहरादून के पद तक शासन की डीपीसी (डिपार्टमेंटल प्रमोशन कमेटी) कमेटी द्वारा समय-समय पर पदोन्नति की गई। इतना सब होने के बाद उत्तराखण्ड शासन के माध्यमिक शिक्षा अनुभाग 2, माध्यमिक शिक्षा निदेशक तथा महानिदेशक विद्यालयी शिक्षा उत्तराखण्ड मुख्यालय में मुकुल कुमार सती की प्रथम नियुक्ति की मूल पत्रावली वर्तमान समय में गायब हो चुकी है इसी मूल नियुक्ति पत्रावली में मुकुल कुमार सती का तथाकथित अनुभव प्रमाण पत्र जो उनके द्वारा नौकरी पाने के लिए प्रस्तुत किया गया तथा उत्तर प्रदेश शासन का नोटिफिकेशन और नियुक्ति के समय प्रस्तुत किए गए सभी दस्तावेज थे। जिसके आधार पर सती की नियुक्ति हुई। वर्तमान समय में उत्तराखण्ड राज्य के शिक्षा विभाग के शासन और निदेशालय स्तर के अधिकारियों द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि मुकुल कुमार सती की नियुक्ति की मूल पत्रावली उत्तर प्रदेश शासन से ही नहीं आई है और उत्तर प्रदेश शासन और शिक्षा निदेशालय में उनकी नियुक्ति की मूल पत्रावली उपलब्ध नहीं है। जो संदेह उत्पन्न करता है सवाल यह है कि अगर मुकुल कुमार सती की प्रथम नियुक्ति की मूल पत्रावली उत्तर प्रदेश से उत्तराखण्ड राज्य में आई ही नहीं तो उन्हें उत्तराखण्ड कैडर कैसे प्राप्त हुआ? मुकुल कुमार सती की मुख्य शिक्षा अधिकारी देहरादून के पद पर पदोन्नति शासन की डीपीसी कमेटी द्वारा कैसे की गई? फिलहाल इन प्रश्नों के उत्तर किसी के पास नहीं है।

 

दो मुख्यमंत्री दे चुके जांच के आदेश

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के सचिवालय से 4 फरवरी 2021 को इस मामले की जांच के आदेश किए गए। रावत के तत्कालीन अनु सचिव सुधीर सिंह नेगी ने बकायदा पत्र जारी किया। इसके बाद वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सचिवालय से भी 1 सितंबर 2021 को एसआईटी जांच कराने के आदेश दिए गए। मुख्यमंत्री के अनु सचिव देवेंद्र सिंह चौहान द्वारा जारी पत्र के अनुसार विद्यालयी शिक्षा विभाग के सचिव को इसे प्रेषित किया गया। यही नहीं बल्कि राज्यपाल सचिववालय ने भी इस संबंध में विद्यालयी शिक्षा सचिव को एक पत्र प्रेषित किया था जिसमें इस प्रकरण की जांच एसआईटी से कराने को कहा गया।

केंद्र से मिला सर्वश्रेष्ठ शिक्षा अधिकारी का पुरस्कार

भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय मुकुल कुमार सती को पुरस्कृत कर चुका है। मंत्रालय ने कोरोनाकाल में उत्तराखण्ड में प्रतिकूल हालातों के बावजूद प्रधानाचार्य एवं शिक्षकों की ओर से छात्र-छात्राओं को ऑनलाइन पढ़ाई से जोड़ने के मामले में सती की प्रशंसा की थी। तब केंद्र सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में नए प्रयोग और बगैर किसी खर्च के तकनीकी प्रयोग के लिए माध्यमिक शिक्षा कुमाऊं मंडल के तत्कालीन अपर निदेशक डॉ मुकुल कुमार सती को उत्तराखण्ड राज्य का सर्वश्रेष्ठ शिक्षा अधिकारी के पुरस्कार से नवाजा था। यह पुरस्कार तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने सती को ऑनलाइन दिया था। 

 

बात अपनी-अपनी

यह प्रकरण हमारे संज्ञान में आ चुका है। इस मामले को शिक्षा विभाग को भेज दिया गया है। जल्दी ही जांच पूरी हो जाएंगी। उसके बाद कार्यवाही की जाएगी।
धन सिंह रावत, शिक्षा मंत्री उत्तराखण्ड

इस मामले में मुझे अभी पूरी जानकारी नहीं है। जानकारी लेने के बाद ही कुछ कह पाऊंगा।
बंशीधर तिवारी, महानिदेशक, विद्यालयी शिक्षा उत्तराखण्ड

इस प्रकरण में पत्र शासन को भेजा गया है। जहां शिक्षा विभाग से पूरी जानकारी ली जा रही है। इसके बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जाएगा।
धीरेंद्र गुंज्याल, एसपी विजिलेंस, देहरादून

छह जुलाई 1990 को मैंने हल्द्वानी के हरिदत्त नित्यानंद इंटर कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया था। जबकि इससे पहले ही मैं बीएड की पढ़ाई पूरी कर चुका था। इससे ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा।
डॉ. मुकुल कुमार सती, मुख्य शिक्षा अधिकारी, देहरादून

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