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कुमाऊं और गढ़वाल मंडल विकास निगम के होटलों को पीपीपी मोड़ पर निजी हाथों में दिए जाने के निर्णय से कर्मचारियों में जबर्दस्त आक्रोश है। अपने भविष्य के लिए चिंतित दोनों निगमों के कर्मचारी राज्य सरकार के खिलाफ आंदोलन की राह पर हैं

कुमाऊं और गढ़वाल मंडल विकास निगम के होटलों को पीपीपी मोड में दिए जाने के निर्णय का विरोध शुरू हो गया है। राज्य सरकार के इस निर्णय से चिंतित दोनों निगमों के कर्मचारी अब ‘निगम बचाओ’ के नारे के साथ आंदोलित हो चुके हैं। कर्मचारी आवास गृहों के निजीकरण के कतई खिलाफ हैं। दूसरी तरफ प्रदेश सरकार का तर्क है कि प्रदेश में प्राइवेट होटलों की तरह जीएमवीएन-केएमवीएन के होटल कमाई नहीं कर पा रहे हैं। इन्हें लाभप्रद स्थिति में लाने के लिए सरकार 20 होटलों को पीपीपी मोड पर देने जा रही है। पर्यटन विभाग ने इसके लिए बकायदा प्लान भी तैयार कर लिया है। होटलों के मूल्यांकन के लिए ट्रांजक्शन एडवाइजरी को निविदा भी आमंत्रित कर दी गई हैं, लेकिन कुमाऊं-गढ़वाल मंडल विकास निगम का संयुक्त कर्मचारी महासंघ इसके विरोध में उतर आया है।

दोनों निगमों के प्रबंध निदेशक को भेजे गए पत्र में यह साफ कर दिया गया है कि अगर 20 अगस्त से पूर्व सरकार अपने इस निर्णय को वापस नहीं लेती तो महासंघ आंदोलन शुरू कर देगा। विरोध की शुरुआत 20 अगस्त को जनपद पिथौरागढ़ एवं रुद्रप्रयाग में 2 घंटे का कार्य बहिष्कार और धरने के साथ शुरू होगी जो क्रमशः 23 जुलाई को जनपद चंपावत एवं चमोली, 27 अगस्त को बागेश्वर एवं टिहरी जनपद, 30 अगस्त को अल्मोड़ा, उत्तरकाशी, 3 सितंबर को ऊधमसिंह नगर एवं हरिद्वार, 6 सितंबर को पौड़ी जनपद और 10 सितंबर को देहरादून जिले में जारी रहेगी। कर्मचारी महासंघ की मांग है कि पीपीपी मोड के तहत आवास गृहों को निजी क्षेत्र में नहीं दिया जाए। इसके लिए जारी किए गए निविदाओं को निरस्त किया जाए। कर्मचारी अन्य मांगों को लेकर भी आंदोलित होंगे जिनमें दोनों निगमों का एकीकरण करने के बजाय इसे उत्तराखण्ड पर्यटन विकास परिषद में समायोजित करने, हाल में गढ़वाल मंडल विकास निगम के जिन 23 कर्मचारियों को अनिवार्य सेवा निवृत्ति दी गई है, उस आदेश को निरस्त कर सीजनल कर्मचारियों को बहाल करने, दोनों निगमों में कार्यरत कर्मचारियों का नियमितिकरण करने के साथ ही केएमवीएन के संविदा कर्मचारियों को जेएमवीएन कर्मचारियों की तरह वेतन देने, विभागीय प्रमोशन की विसंगतियों को दूर करने, नौ माह से रुके वेतन को शीघ्र प्रदान करने, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का प्रमोशन एवं ग्रेड पे आदि की विसंगतियों को दूर करने की मांग भी इस आंदोलन का हिस्सा रहेगा।

दोनों मंडलों ने पर्यटकों को सुविधा प्रदान करने के तहत पर्यटक आवास गृह खोले और इनमें डीलक्स, सुपर डीलक्स, एक्जयूटिव श्रेणी के कमरे बनाए गए। टेलीफोन के साथ ही इंटरकाम सुविधा, भोजन और नाश्ते की सुविधा प्रदान की गई। लेकिन समय के साथ यह पर्यटक गृह घाटे में जाते रहे और इनका आधारभूत ढांचा भी कमजोर होता गया। निगम कर्मचारी इसके लिए राजनेताओं-अधिकारियों को जिम्मेदार मानते हैं। वजह कि पर्यटन स्थलों में ठहरने वाले अधिक से अधिक अतिथि पर्यटक प्रशासनिक अधिकारियों, मंत्रियों, सांसदों एवं विधायकों के होते हैं जो या तो भुगतान नहीं करते या फिर आधा ही भुगतान करते हैं। ऐसा नहीं है कि निगम के होटलों एवं आवास गृहों को पीपीपी मोड पर पहली बार दिया जा रहा है। पूर्व में नैनीताल का सूखाताल, तल्लीताल, नानकमत्ता, रानीखेत एवं गढ़वाल मंडल के 18 आवासगृहों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी हुई थी, लेकिन कर्मचारियों के विरोध के चलते सरकारों ने इससे अपने हाथ खींच लिए थे। सच यह भी है कि पर्यटक आवास गृह ही निगम की आय के बड़े साधन होते हैं। इन्हें निगम की आय की रीढ़ माना जाता है। पर्यटन स्थलों पर ही इन होटलों एवं आवास गृहों का निर्माण किया गया ताकि एक ओर पर्यटकों को रुकने के लिए दर-दर न भटकना पड़े और दूसरा कम कीमत पर बेहतर सुविधाएं भी उन्हें मिल जाएं। साथ ही निगम की आय में इजाफा होता रहे। सवाल यह है कि जहां भी ये होटल और आवास गृह बने हैं वहां पर वर्षभर पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है, ऐसे में इससे आय न होने का सवाल ही नहीं उठता है।

वित्तमंत्री प्रकाश पंत को पीपीपी मोड के निर्णय को वापस लेने संबंधी ज्ञापन सौंपते निगमकर्मी

निगमों से जुड़े कर्मचारी नेताओं का कहना है कि पीपीपी मोड पर दिए जाने जैसे सरल फैसले के बजाय सरकार को चाहिए कि वह इन पर्यटक आवास गृहों को सुविधा संपन्न बनाकर विकसित करे और निजी हाथों में न सौंपकर पैकेज दर के माध्यम से निगम की आय को और अधिक बढ़ाए। सरकार को इनसे हाथ खींचने के बजाय इसे फायदे में लाने की सोचनी चाहिए।

सवाल सिर्फ आय बढ़ाने भर का भी नहीं है। निजीकरण से पर्यटन पर असर पड़ने के साथ ही इन आवास गृहों में काम कर रहे लोगों के बेरोजगार होने का भी है। इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि टीआरसी के माध्यम से ही निगम ने तमाम अनछुए इलाकों को पर्यटन मानचित्र में लाने का काम किया है। केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्र, कैलाश मानसरोवर, ग्लेशियर यात्राओं के साथ ही साहसिक पर्यटन को फैलाने में निगम के कर्मचारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। निगम के घाटे के पीछे आवास गृह नहीं, बल्कि यहां व्याप्त कुप्रबंधन को जिम्मेदार माना जाता है। कुप्रबंधन की स्थिति पर इशारा करते हुए कई कर्मचारी नेताओं का कहना है कि अभी भी बड़ी संख्या में विभागीय प्रतिवेदनों का निस्तारण नहीं हो पाया है। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि निगमों के खातों का ऑडिट तक नहीं हो पाया। इसी कुप्रबंधन के चलते निगम द्वारा संचालित अधिकांश फैक्ट्रियां घाटा उठाने के बाद बंद हो गई। पूर्व में शासन की लीसा आवंटन नीति व्यावहारिक न होने से कई लीसा फैक्ट्रियां बंद करनी पड़ी। जड़ी बूटी विदोहन का काम भी निगम से छीन लिया गया। कर्मचारियों के विनियमितिकरण एवं प्रमोशन पर भी ध्यान नहीं दिया गया। इधर निगमकर्मी वर्षों से कर्मचारियों की तरक्की, पेंशन की मांग करते रहे उधर अधिकारी विदेश दौरे में मस्त रहे। अकेले केएमवीएन के पास कुमाऊं में 52 से अधिक पर्यटक आवास गृह हैं। 400 से अधिक अवर एवं सहायक अभियंता यहां काम कर रहे हैं। पर्यटन, गैस उद्योग, जड़ी बूटी ट्रेकिंग, कैलाश मानसरोवर यात्रा का भी संचालन यह निगम सफलतापूर्वक करता रहा है। देश के लखनऊ, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बंगलूर, चेन्नई एवं अहमदाबाद में निगम के कार्यालय हैं। पूरे उत्तराखण्ड के पर्यटन की जिम्मेदारी कर्मचारियों ने अपने कंधों पर उठाई है, लेकिन इन कर्मचारियों को पुरस्कार के बजाय सरकार निगमकर्मियों को बेरोजगार करने पर तुली हुई है। निगम से जुड़े कर्मचारी नेताओं का कहना है कि अधिकारी तो यहां लूट खसोट एवं मौज करने के लिए आते हैं। इनकी तुगलकी नीतियों के चलते कई औद्योगिक इकाइयां बंद हो गई और सैकड़ों कर्मचारियों की रोजी रोटी प्रभावित हुई। आज भी निगम की करोड़ों रुपयों की भूमि बर्बाद पड़ी हुई है। इसका कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है। लाखों रुपयों से बने भवन जर्जर हालत में पहुंच चुके हैं। इन बंद इकाइयों पर पर्यटकों के रहने की व्यवस्थाएं सरकार कर सकती है लेकिन वह ऐसा नहीं कर रही। निगम में धन की बर्बादी किस तरह की गई इसका उदाहरण इससे बड़ा और क्या हो सकता है कि पूर्व में एक ही निगम में दर्जाधारियों की संख्या तीन तक पहुंच गई थी। पूर्ववर्ती सरकारों ने निगम की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए संसाधनों को जुटाने के बजाय दर्जा राज्य मंत्रियों की बाढ़ लगा दी। केएमवीएन में तो कई प्रबंध निदेशकों का कार्यकाल विवादित रहा। निगम से जुड़े कर्मचारी नेताओं ने तो पूर्व में निगम के प्रबंध निदेशक रहे चंद्रेश यादव के समय की जांच की मांग भी उठाई थी। उन पर आरोप था कि प्रबंध निदेशक रहते हुए उन्होंने करोड़ों रुपए के हट खरीद कर बागेश्वर पर्यटक आवास गृह में डम्प कर दिए। यही नहीं पिंडारी एवं सुंदरढूंगा मार्ग जहां पर पर्यटक कम आते हैं हट खरीदने का आरोप कर्मचारी नेताओं ने लगाया था। इसी तरह पूर्व में सूखाताल के रेस्टोरेंट एवं पार्किंग के कार्यों पर इसी कारण रोक लगा देनी पड़ी। यानी पर्यटन को आजीविका से जोड़ने के लिए जिस निगम की स्थापना की थी उसे आगे ले जाने वाले जिम्मेदार तंपपत्रा ने ही उसे चूना लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। यानी यहां तो सुरक्षा के लिए लगाई गई बाड़ ही खेत खा रही है, वाली कहावत प्रचलित हो रही है।

इन तमाम विसंगतियों के बाद भी केएमवीएन ने कई पर्यटन गृहों का सफल संचालन किया। कैलाश मानसरोवर व आदि कैलाश यात्रा का सफल संचालन यह निगम करता आया है। साहसिक एवं ईको पर्यटन को बढ़ावा देने में भी इसका बड़ा योगदान रहा है। इसके बाद भी निगम आर्थिक मामलों में सक्षम क्यों नहीं बन पाया, यह सोचनीय प्रश्न है। जबकि खनन, शराब जैसे लाभकारी व्यवसाय भी शुरुआती दौर में इसे मिले थे। एक समय में द्रोण होटल भी जीएमवीएन की संपत्ति थी। अभी केएमवीएन की काठगोदाम, हल्द्वानी में पर्वत वायर एवं पर्वत प्लास्टिक तथा चंपावत सहित करोड़ों रुपयों की जमीन बेकार पड़ी हुई है। रुद्रपुर व नोएडा में भी कई भूखंड खाली पड़े हैं। भीमताल स्थित टेलीट्रॉनिक्स कंपनी वाली भूमि का सरकार बेहतर उपयोग कर सकती है, लेकिन इसके लिए वह मशक्कत नहीं करना चाहती। अब हालात यह हैं कि 20 करोड़ रुपए सालाना का बजट कर्मचारियों के वेतन भतों के लिए जुटाना मुश्किल हो रहा है। इन स्थितियों के लिए कर्मचारी सरकारी नीतियों को जिम्मेदार मानते हैं तो वहीं सरकारें इसके लिए कर्मचारियों की हड़ताल के साथ ही इनके नकारापन को इसके लिए दोषी मानती हैं। कारण जो भी हो लेकिन जिन उद्देश्यों को लेकर निगम की स्थापना की गई थी वह पूरी सार्थक नहीं हो पा रही है।

 

बात अपनी-अपनी

जीएमवीनएन व केएमवीएन के घाटे में जा रहे होटलों को पीपीपी मोड पर दिए जाने की योजना है। इससे जहां यह होटल लाभप्रद स्थिति में आएंगे वहीं सुविधाओं में भी इजाफा होगा। इससे प्रदेश में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
सतपाल महाराज, पर्यटन मंत्री

आवास गृहों को पीपीपी मोड़ पर निजी क्षेत्र में नहीं दिया जाए। इसके लिए जारी की गई निविदाओं को निरस्त किया जाय। गेस्ट हाउसों के घाटे में जाने के लिए सीधे तौर पर अधिकारी जिम्मेदार हैं। सरकार को चाहिए कि वह इनकी मरम्मत कर इन्हें सुधारे। गेस्ट हाउसों के निजी क्षेत्र में जाने से यहां काम करने वाले कर्मचारी बेराजगार होंगे तो इससे पलायन भी बढ़ेगा। एक तरफ सरकार अधिकारियों का सेवा विस्तार कर रही है, वहीं कर्मचारियों को बेरोजगार करने की साजिश रच रही है।
दिनेश गुरूरानी, अध्यक्ष, संयुक्त कर्मचारी महासंघ

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