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Uttarakhand

‘लोकतंत्र के लिए खतरा है मोदी फैक्टर’

मिलिए अपने जनप्रतिनिधि की इस कड़ी में हल्द्वानी के विधायक सुमित हृदयेश के विचारों से पाठकों को अवगत करा रहे हैं हमारे कुमाऊं के मुख्य संवाददाता संजय स्वार

तेईस बरस के उत्तराखण्ड का मूल्यांकन किस रूप में करते हैं?
राज्य की स्थिति का मूल्यांकन सरल रूप में किया जाए तो बहुत चुनौतियां हैं। जब राज्य बना था तो उस वक्त की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां और आज की सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों में जमीन आसमान का अंतर आ चुका है। राज्य की पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री पंडित नारायण दत्त तिवारी थे। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। हालांकि राज्य में कांग्रेस और केंद्र में भारतीय जनता पार्टी या कहें एनडीए की सरकार थी लेकिन समन्वय अच्छा बैठा और राज्य के हित के लिए बेहतर योजनाओं का क्रियान्वयन किया गया। विकसित राज्य के लिए जैसी नींव रखी जानी थी, वह सब किया गया। बाद की जो सरकारें आईं उसमें प्रयास तो बहुत हुए। लेकिन राज्य के मूलभूत ढांचे और कनेक्टिवेटी में सुधार के लिए जितना किया जाना था उतना हुआ नहीं। पलायन एक बड़ी समस्या है। पलायन पर सरकारों ने बोला तो बहुत कुछ लेकिन पलायन रोकने के लिए ठोस पहल नहीं की गई। पर्वतीय क्षेत्रों में घटती बसावट चिंता का विषय है।

क्या उत्तराखण्ड राज्य अपने उन मूलभूत उद्देश्यों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ा है जिनकी परिकल्पना पृथक राज्य के लिए लड़ने वाली जनता ने की थी?
देखिए कुछ कदम आगे तो बढ़ा ही है। पंडित नारायण दत्त तिवारी की सिडकुल की परिकल्पना अनूठी थी। सिडकुल जैसे औद्योगिक आस्थानों की स्थापना से कई लाख लोगों को रोजी-रोटी मुहैया कराई गई। बेरोजगार युवाओं को रोजगार मिला। सिडकुल से न सिर्फ रोजगार मिला, बल्कि उसके आस-पास के लोगों- व्यापारियों को भी आर्थिक समृद्धि मिली। पूरे प्रदेश में सड़कों का जाल बिछाया गया। लेकिन आने वाली सरकारें उससे सीख नहीं पाई कि कार्य किस गति और दिशा में होना चाहिए। राज्य बनने के समय एक पर्वतीय राज्य की परिकल्पना की गई थी इसलिए पर्वतीय क्षेत्रों में ऐसी योजनाएं आनी चाहिए थी जिससे पहाड़ के गांव खाली न हों, पहाड़ों में हम लघु उद्योग लगा सकें, पर्यटन उद्योग का कैसे विस्तार हो और की दिशा में हम कितना आगे बढ़ पाए, कैसे रोजगार बढ़ाने की दिशा में कैसे कदम बढ़ाए जाएं। इस दिशा में अभी हम निश्चित तौर पर खरे नहीं उतर पाए हैं।

कांग्रेस के राज में अफसरशाही हमेशा लगाम में रही, क्योंकि विकेंद्रित शासन हमेशा जनमानस की भलाई के लिए होता है। कांग्रेस के समय स्थानीय विधायक और मंत्री से सलाह मशवरा कर अच्छे अधिकारी तैनात किए जाते थे। जो स्थानीय नेताओं और जनता की सुनते थे। लेकिन भाजपा के शासन में जो केंद्रीकरण का चलन बढ़ा है उसमें अधिकारियों की नियुक्ति देहरादून में बैठे लोग अपनी सुविधानुसार कर रहे हैं। जो जनता की सुनने वाला अधिकारी भले ही न हो, लेकिन देहरादून में बैठे लोगों की सुनने वाला जरूर होना चाहिए। ये एक ऐसा समूह है जो सरकार बदलने के साथ निष्ठा बदलता है। मनचाही पोस्टिंग पाने के लिए चाटुकारिता करता है। भाजपा शासनकाल में यही सब चल रहा है। अधिकारी भाजपा के विधायकों तक की नहीं सुन रहे हैं

 

एक धारणा ये भी बनी है कि पृथक राज्य के असली लाभार्थी तो  राजनेता और नौकरशाह रहे, जिस जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए राज्य बना था वो तो ठगी सी रह गई। कितना सहमत हैं?
मैं ये कह सकता हूं कि कांग्रेस के राज में अफसरशाही हमेशा लगाम में रही, क्योंकि विकेंद्रित शासन हमेशा जनमानस की भलाई के लिए होता है। कांग्रेस के समय स्थानीय विधायक और मंत्री से सलाह मशवरा कर अच्छे अधिकारी तैनात किए जाते थे। जो स्थानीय नेताओं और जनता की सुनते थे। लेकिन भाजपा के शासन में जो केंद्रीकरण का चलन बढ़ा है उसमें अधिकारियों की नियुक्ति देहरादून में बैठे लोग अपनी सुविधानुसार कर रहे हैं। जो जनता की सुनने वाला अधिकारी भले ही न हो लेकिन देहरादून में बैठे लोगों की सुनने वाला जरूर होना चाहिए। हम तो विपक्ष में हैं तो हमारी बात छोड़िए भाजपा के स्थानीय नेताओं की अधिकारी नहीं सुनते। जब स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच संवाद न हो तो कई जनहित के मुद्दे अनसुलझे रह जाते हैं और फिर ये एक ऐसा समूह है जो सरकार बदलने के साथ निष्ठा बदलता है। मनचाही पोस्टिंग पाने के लिए चाटुकारिता करता है। भाजपा शासनकाल में यही सब चल रहा है। अधिकारी भाजपा के विधायकों तक की नहीं सुन रहे हैं। जहां तक नेताओं का प्रश्न है उसे जनता चुनती है और 4 साल 11 महीने बाद जब आप अपना रिपोर्ट कार्ड जनता के बीच लेकर जाते हैं तो ये जनता तय करती है कि आप जीतते हैं या हरा दिए जाते हैं। ये तो महान जनता और मतदाता तय करता है कि आप उसकी कसौटी में खरे उतरे हैं या नहीं।

राज्य बनने के बाद मूलभूत ज्वलंत मुद्दे मसलन रोजगार, पलायन, मूल स्थाई निवास, भू-कानून आज विसंगतियों के शिकार हैं। क्या
राजनीतिक दलों और सरकारों के लिए इन मुद्दों के कोई मायने नहीं हैं?
बिल्कुल क्यों नहीं है। रोजगार की आपने बात की, कांग्रेस के समय पंडित नारायण दत्त तिवारी की सरकार के समय सिडकुल की स्थापना हुई। कई लोगों को रोजगार मिला। सरकारी पद सर्वाधिक कांग्रेस की सरकारों के समय ही भरे गए। लेकिन भाजपा सरकारों का जहां तक सवाल है। भाजपा को चुनावी रणनीति बनाना चुनाव जीतना अच्छा आता है लेकिन सरकार कैसे चलानी है उनकी समझ से परे है। पलायन और बेरोजगारी ये ऐसे मुद्दे हैं जो राज्य की पीड़ा को बढ़ा रही है।

राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को अगर एक बार के लिए दरकिनार कर दें तो आप उस युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो उत्तराखण्ड में बेरोजगारी से जूझ रहा है क्या उसके लिए इस समस्या से निपटने के लिए कोई रूपरेखा है आपके पास?
इस सरकार के पास पहले से ही 24 हजार से ज्यादा पद रिक्त हैं उनको भरें। उसके बाद आउटसोर्सिंग की जो नई प्रणाली आई है उसमें पारदर्शिता के साथ जवाबदेही जरूरी है। सरकार की भूमिका उसमें संदिग्ध नजर आती है। उपनल या अन्य एजेंसियों के जरिए जो नियुक्तियां की जा रही हैं उसमें अपनी स विधानुसार भर्ती करना फिर अपनी मनमर्जी कर उनको निकाल देना न्याय संगत नहीं है। वन विभाग में बिना कारण बताए लोग निकाल दिए गए कई लोग ऐसे थे जो 15 सालों से काम कर रहे थे। रोजगार बढ़ाने के लिए सरकार को व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा। लघु उद्योगों, पर्यटन को बढ़ावा देकर रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं लेकिन सरकार को अपनी दिशा का ही पता नहीं है। कोरोनाकाल को छोड़ दें तो 2024 वर्ष ऐसा है जब नववर्ष में नैनीताल सहित कुमाऊं के पर्यटन स्थलों में होटल 50 प्रतिशत तक खाली रहे। पर्यटन को बढ़ाने के लिए सरकारों को कदम उठाने होंगे। इनकी कोई नीति ही नहीं है। जिस प्रकार पर्यटन स्थलों का प्रचार सरकार को करना चाहिए वो होता नहीं। विदेशों में पर्यटन स्थलों की जानकारी बढ़ाएं तो विदेश का सैलानी भी आएगा। हिमाचल और उत्तराखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियां लगभग समान हैं। मुझे गर्व है कि हमारा प्रदेश हिमाचल से ज्यादा खूबसूरत है लेकिन पर्यटन के मामले में हम हिमाचल से पीछे हैं। यहां पर्यटन पर निवेश उत्तराखण्ड की आर्थिक ताकत बन सकता है। हमारी सरकार ‘इन्वेस्टर मीट’ पर अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन असली मुद्दों से मुंह चुरा रही है।

इन्वेस्टर समिट के जरिए आप उत्तराखण्ड में निवेश के प्रति कितने आशान्वित हैं?

‘इन्वेस्टर समिट’ सिर्फ ‘इवेंट समिट’ न बनकर रह जाए मुझे इस बात का डर है, क्योंकि भव्य तरीके से आयोजित किए गए त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्रित्वकाल में ‘इन्वेस्टर समिट’ का नतीजा तो ‘निल बट्टे सन्नाटा’ रहा। प्रदेश में निवेश बढ़ाने के लिए सरकार के प्रयासों में गंभीरता और दूरदर्शिता होनी चाहिए। पंडित नारायण दत्त तिवारी के प्रयासों से बिना शोरगुल के सिडकुल जैसे औद्योगिक आस्थान विकसित हो गए जिसमें हजारों छोटे बड़े उद्योग लग गए हालांकि तिवारी जैसी सोच का व्यक्तित्व अब मुश्किल है। एमओयू तो आप लाखों करोड़ों के कर लीजिए। असल चुनौती तो उनको धरातल पर उतारने की है। त्रिवेंद्र सरकार के समय के निवेशों के दावे धरातल पर कहीं नजर नहीं आते। सिर्फ उद्योगपतियों का जमावड़ा भर कर लेने से निवेश नहीं आएगा। विकास के लिए एक स्पष्ट दृष्टि होनी जरूरी है।

पर्वतीय राज्य की अवधारणा की बात कही जाती है लेकिन औद्योगिक निवेश में पहाड़ी क्षेत्र हमेशा उपेक्षित रहे हैं ऐसा क्यों?

देखिए जब स्पष्ट विजन का अभाव हो तो ऐसा ही होता है। भीमताल में नारायण दत्त तिवारी जी ने औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना की थी। वो तो पहाड़ी क्षेत्र में ही है। उत्तराखण्ड में हमें समग्र विकास की दृष्टि से देखना होगा। प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार योजनाएं बननी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्र के लिए योजनाएं वहां की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार बननी चाहिए। पता नहीं क्यों हमारे नीति नियंता हिमाचल प्रदेश से क्यों नहीं सीखना चाहते। पर्वतीय क्षेत्रों में क्या किया जाना चाहिए यह हमें हिमाचल से सीखना चाहिए। पिछले वर्ष हिमाचल प्रदेश के विट्टाानसभा चुनावों के दौरान मैंने हिमाचल को बारीकी से देखा। वहां पहाड़ों में बसावट है। वहां लघु उद्योग लगे हैं। स्थानीय उत्पादों और उद्यानिकी ने वहां रोजगार के संसाधन पैदा किए हैं। वहां स्थानीय उत्पादों की बेहतर तरीके से मार्केटिंग की जाती है। पर्यटन का ही क्षेत्र लीजिए वहां पर्यटन में सबसे बड़ा निवेश हुआ है। उन्होंने नए पर्यटन क्षेत्र विकसित कर उसकी पूरे विश्व में मार्केटिंग कर पर्यटकों को आकर्षित किया है। मुझे ये कहने में कोई गुरेज नहीं है कि पर्वतीय क्षेत्रों की हमारी सरकारों ने पर्यटन की दृष्टि से घोर उपेक्षा की है। कृषकों को प्रोत्साहित कर उन्हें स्थानीय उत्पादों के साथ जड़ी-बूटी की खेती के लिए संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए। पहाड़ की काश्तकारी में सुधार आएगा तो पलायन अपने आप कम होगा। सरकार जब तक पहाड़ में काश्तकारांे की कृषि को संरक्षण नहीं देगी समस्याएं बनी रहेगी। इसी प्रकार लघु उद्योगों व पर्यटन के मामले में जितना काम हो सकता था वो नहीं हुआ। उस पर स्पष्ट नीति बनाने की जरूरत है।

भू-कानून में बदलाव की मांग उठ रही है, त्रिवेंद्र सरकार के समय इसे शिथिल किया गया था। भू-कानून के संबंध में आपकी क्या राय है?

भू-कानून के बारे में आपको ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। पड़ोसी राज्य हिमाचल का भू-कानून सबसे सख्त है। सवा नाली जमीन बाहरी व्यक्ति खरीद सकता लेकिन उत्तराखण्ड के लोगों की चिंता है कि बाहरी लोगों की अत्याधिक बसावट यहां की संस्कृति, बोली भाषा और उत्तराखण्डियों का जो आपसी व्यवहार है उस पर असर डालेगी, ये चिंता स्वाभाविक भी है। सरकार सशक्त भू-कानून लाने की बात कर तो रही है लेकिन दृष्टि तो चाहिए न उसके लिए जो इस सरकार में नहीं है। जब हिमाचल में सशक्त भू-कानून के चलते कृषि, उद्योग, पर्यटन सब प्रगति कर सकता है तो उत्तराखण्ड में क्यों नहीं?

पूर्व में नारायण दत्त तिवारी और इंदिरा हृदयेश और वर्तमान में हरीश रावत और यशपाल आर्या को छोड़ दें तो कांग्रेस में कोई व्यापक जनाधार वाला नेता नजर नहीं आता क्या कारण है?

ये आप कैसे कह सकते हैं? प्रीतम सिंह जी हमारे छह बार के विधायक हैं। वह प्रदेश अध्यक्ष, मंत्री और नेता प्रतिपक्ष रहे हैं। अपनी सूची में प्रीतम सिंह जी को भी आपको शुमार करना चाहिए। हरीश धामी, मयूख महर, मनोज तिवारी, प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा सहित कई वर्तमान और पूर्व विधायकों की लंबी पांत है जिनका विधानसभा और उसके बाहर व्यापक प्रभाव है।

करन माहरा, भुचन कापड़ी और आपके सहित कई युवा विधायक कांग्रेस का भविष्य हैं। भविष्य में कांग्रेस के अंदर आप अपनी क्या भूमिका देखते हैं?

देखिए, जहां पार्टनरशिप होगी और मजबूत पार्टनशिप होगी वहां टीम अवश्य जीतेगी। एक चीज जो हमें समझनी होगी कि अब वो समय नहीं है कि कोई व्यक्तिगत लक्ष्य लेकर चले। सामूहिक लक्ष्य लेकर चलना होगा। मजबूती से मिलकर एक लक्ष्य लेकर चलना होगा कि 2024 के लोकसभा और 2027 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस कैसे जीते। मेरी यही सोच है कि प्रतिस्पर्धा न रहे पार्टनरशिप विकसित हो। वरिष्ठ नेताओं और युवाओं का सामंजस्य से ही कांग्रेस का भविष्य सुधारेगा।

कांग्रेस नेतृत्व ने उत्तराखण्ड में पीढ़ीगत बदलाव का प्रयास किया लेकिन अपेक्षित परिणाम दिख नहीं रहे। भाजपा से लड़ाई धरातल पर लड़नी होगी देहरादून या हल्द्वानी में प्रेस काफ्रेंस कर देने से तो काम नहीं चलेगा। कांग्रेस जमीन पर लड़ती दिखती नहीं फिर जनता कैसे भरोसा करे कांग्रेस पर?
आप गलत कह रहे हैं कि कांग्रेस जमीन पर लड़ती नजर नहीं आ रहीं। मेरी अपनी विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण दूं तो अग्निवीर योजना, महंगाई, खनन के निजीकरण की कोशिश, अतिक्रमण हटाने विरोट्टा में हम सड़क से लेकर सदन तक मुद्दे उठा रहे हैं। अंकिता भंडारी प्रकरण पर सरकार को हमने कठघरे में खड़ा किया है। आप देखेंगे कि प्रदेश में लगातार कार्यक्रम हो रहे हैं। जनता ने जो हमें किरदार निभाने का जनादेश दिया है उसे तो हम बखूबी निभा रहे हैं। जहां तक जनता के भरोसे की बात है दो बार कांग्रेस की सरकार जनता ने ही बनवाई। हां राज्य बनने के बाद से आज तक राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं। जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है उसने देश व प्रदेश में धार्मिक उन्माद को सत्ता पाने का जरिया बना दिया है। नफरत बांटो और राज करो की उनकी नीति ने विभाजन का माहौल बना दिया है। उत्तराखण्ड ही नहीं पूरे देश की राजनीति का यह संक्रमण काल है। इसका हल भी जनता के बीच से ही निकल कर आएगा और जनता एक दिन अवश्य महसूस करेगी कि कांग्रेस की सरकारों में ही देश-प्रदेश व जनता के हित सुरक्षित है। हां कांग्रेस के समाने चुनौती बड़ी है।

विधानसभा सत्र निरंतर कम व छोटे होते जा रहे हैं इस पर क्या कहेंगे?

सरकारें जब जवाबदेही से बचना चाहती हैं तो ऐसा ही होता है। केंद्र व राज्यों में भाजपा विधायिका की उपेक्षा कर रही है, क्योंकि वे जवाब देने से बचना चाहते हैं। मुझे भी सत्र में कई मुद्दों को उठाने का मौका मिला। विपक्ष के पास सवाल तो बहुत होते हैं, मगर सरकार के पास जवाब नहीं होते। लंबा सत्र चला कर सरकार देखें तो पता चलेगा कि विपक्ष कितनी मजबूती से सवाल उठाता है। लचर व्यवस्था है सरकार में मैंने पहले भी कहा भाजपा चुनाव जीतने की सफल मशीन तो है मगर सरकार चलाने में ये असफल है।

क्या आपको लगता है कि कांग्रेस 2022 का विधानसभा चुनाव बड़े नेताओं के अहंकार के कारण हार गई जबकि आमधारणा थी कि सरकार कांग्रेस बनाएगी?

मैं ऐसा नहीं मानता। हमने अच्छा चुनाव लड़ा, सफल प्रयास था। हमारे बड़े नेता हमारे ध्वजावाहक हैं। सबको बड़ी जिम्मेदारी मिली और सबने उनका निर्वहन ईमानदारीपूर्वक किया। उन्होंने कई अवसरों पर कांग्रेस को जिताया भी है। अब जो जीत गया वो सिकंदर होता है जो पराजित होता है उसे मंथन करना होता है। हमने मंथन किया है और मंथन निरंतर जारी है। जीत और हार की जिम्मेदारी सामूहिक होती है। आप व्यक्ति विशेष को इंगित नहीं कर सकते हार के लिए।

आप अपनी माता इंदिरा हृदयेश की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। उनसे आपने राजनीति के क्या गुण सीखे?

सबसे बड़ा गुण साफ और स्पष्ट रहना। हम राजनीति में अक्सर देखते हैं कि नेतागणों को झूठ बोलने की आदत होती है। उनसे सबसे बड़ा गुण मैंने सीखा कि उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला, कभी फरेब नहीं किया किसी को बेवकूफ नहीं बनाया। झूठी लालसा किसी में नहीं लगाई जिसे वो पूर्ण नहीं कर सकती थीं। हां, उसके समाधान का वो प्रयास जरूर करती थीं। जो काम व्यक्ति का आपके माध्यम से होना संभव हो उसके के लिए हां कहिए किसी को धोखे में मत रखिए। क्योंकि हर किसी का कार्य करना कभी संभव नहीं होता।

पहले इंदिरा जी के पुत्र अब एक विधायक के रूप में कितना अंतर महसूस होता है?

उन्होंने इतने स्तम्भ और मील के पत्थर कायम किए थे कि हल्द्वानी ही नहीं आस-पास के विधायकों पर भी जनता की पैनी नजर होती थी। हल्द्वानी का विकास बिना भेदभाव किया। पूरे हल्द्वानी को एक परिवार की तरह देखा विकास के लिए राजनीतिक मतभेदों को हमेशा दरकिनार किया।

जैसी विकसित हल्द्वानी की परिकल्पना इंदिरा जी ने की थी वैसा हल्द्वानी अब नजर आता नहीं। आईएसबीटी जैसी परियोजनाएं राजनीति का शिकार हो गए ऐसा क्यों?

मैं तो मानता हूं कि हल्द्वानी भाजपा की संकीर्ण राजनीति का शिकार हो गया। इंदिरा जी ने लोक निर्माण मंत्री रहते पूरे प्रदेश में सड़कों का जाल बिछाया। किसी विधायक को शिकायत नहीं थी। हमने 1 हजार करोड़ के प्रस्ताव भेजे। 10 करोड़ के प्रस्ताव सड़कों के लिए सरकार द्वारा मांगे गए, मैंने भी भेजे। सब ठंडे बस्ते में डाल दिए गए। अंतरराष्ट्रीय बस अड्डा तो इन्होंने गायब ही कर दिया। अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम का हाल बेहाल है। इतना खूबसूरत स्टेडियम बना कर दिया लेकिन उसका उपयोग भी नहीं कर पा रहे हैं। हल्द्वानी की जनता के लिए ये घात से कम नहीं है। रेलवे बाजार की सड़क जो रेलवे स्टेशन व बस अड्डे को जोड़ती है उसकी हालत खस्ता है। हल्द्वानी विधानसभा में सारी जन कल्याणकारी योजनाएं ठंडे बस्ते में डाल दी गई हैं।

कांग्रेस को अगर दोबारा सत्ता में आना है तो उसे क्या बदलाव करने होंगे? कांग्रेस नेतृत्व के लिए कुछ सुझाव हैं क्या?

सुझाव बहुत से हैं लेकिन उनको पार्टी फोरम पर रखना ज्यादा बेहतर होगा वनिस्पत मीडिया के माध्यम से।

आगामी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के सामने क्या चुनौतियां है?

चुनौतियां बहुत हैं। प्रत्याशी चयन महत्वपूर्ण है। मेरा मानना है कि प्रत्याशी का चयन समय से हो जाना चाहिए या पार्टी जिसे चुनाव लड़ाना चाहती है उसे इशारा हो जाना चाहिए ताकि वो अपना प्रबंधन समय से कर सके।

लोकसभा चुनाव कांग्रेस हमेशा की तरह खंडित होकर लड़ेगी या मिलकर लड़ेगी?

लोकसभा चुनाव में खंडित होकर लड़ने की बात ही नहीं है। प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र की निशानी है। टिकट तय होने तक कई दावेदार होते हैं। सिर्फ कांग्रेस ही नहीं भाजपा में भी होता है। भाजपा में तो स्थिति बहुत खराब है। नैनीताल लोकसभा और अल्मोड़ा लोकसभा सीट पर भाजपा के अंदर से जो खबरें आ रही हैं उससे पता चलता है कि वहां

घमासान मचा है। कांग्रेस में लोकतंत्र है इसलिए हमारे यहां घमासान आपको ज्यादा नजर आता है। भाजपा में तो कोई बोलने की हिम्मत नहीं कर पाता।

लोकसभा चुनाव में मोदी फैक्टर कितना प्रभावी होगा?
मोदी जी इवेंट मैनेजमेंट के महागुरु हैं। उन्हें इवेंट मैनेजमेंट में विश्व गुरु की उपाट्टिा लेनी चाहिए। हां ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस प्रकार उन्होंने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया सहित विभिन्न संवैधानिक संस्थानों को दबाव में लेकर भाजपा के आनुषांगिक संगठनों में तब्दील कर दिया है उससे आने वाले समय में लोकतंत्र पर खतरा है। इनके खिलाफ आवाज उठाने वालों पर ये लोग सीबीआई, ईडी से दबाव बनाते हैं। लोकतंत्र के लिए खतरा है ये दबाव का मोदी फैक्टर।

इन्वेस्टर समिट सिर्फ ‘इवेंट समिट’ न बनकर रह जाए मुझे इस बात का डर है, क्योंकि भव्य तरीके से आयोजित किए गए त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्रित्वकाल में ‘इन्वेस्टर समिट’ का नतीजा तो ‘निल बट्टे सन्नाटा’ रहा। प्रदेश में निवेश बढ़ाने के लिए सरकार के प्रयासों में गंभीरता और दूरदर्शिता होनी चाहिए। पंडित नारायण दत्त तिवारी के प्रयासों से बिना शोरगुल के सिडकुल जैसे औद्योगिक आस्थान विकसित हो गए जिसमें हजारों छोटे-बड़े उद्योग लग गए हालांकि तिवारी जैसी सोच का व्यक्तित्व अब मुश्किल है। एमओयू तो आप लाखों करोड़ों के कर लीजिए। असल चुनौती तो उनको धरातल पर उतारने की है

 

सुमित का सफर
जीवन परिचय: जन्म 06 मार्च 1978। जन्म स्थान एम्स, नई दिल्ली।
शिक्षा: सेंट जोसेफ कॉलेज नैनीताल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। 1999 में आईसीएएस मणिपाल, 2000-01 में मिसिगुन यूनिवसिर्टी यूएए से बीएस इलेक्ट्रिकल (इंजीनियरिंग) की पढ़ाई पूरी की।

राजनीतिक यात्रा: वर्ष 2017 से प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारिणी सदस्य, कांग्रेस के महत्वपूर्ण फ्रंटल संगठनों युवा कांग्रेस और एनएसयूआई के प्रदेश स्तरीय सदस्यता अभियान में महत्वपूर्ण भागीदारी कर संगठन को मजबूत करने का काम किया।
जुलाई 2012 में उत्तराखण्ड फुटबॉल एसोसिएशन के उपाध्यक्ष एवं जिला नैनीताल क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।

जनप्रतिनिधि के रूप में:
2012 से 2018 तक हल्द्वानी मंडी समिति के अध्यक्ष। 2022 में हल्द्वानी से कांग्रेस के विधायक बने।
उपलब्धियां: मंडी समिति का अध्यक्ष रहते हुए मंडी के अंदर-बाहर 20 करोड़ के विकास कार्य कराए। हल्द्वानी प्रदेश की पहली मंडी बनी जिसमें वीडियोग्राफी द्वारा बोली संचालित कराई गई। जब-जब प्याज और अन्य सब्जियों के रेट बढ़े तब-तब मंडियों में स्टॉल लगाकर सस्ते दरों पर सब्जियां बिक्री कराई। दो जगहों पर काश्तकारों के लिए सड़क निर्माण कराया। यह सड़कें आजादी के बाद पहली बार काश्तकारों के लिए बनी।

सुमित हृदयेश द्वारा हल्द्वानी विधानसभा क्षेत्र के लिए 10 हजार करोड़ के विकास कार्यों के प्रस्ताव, जिसमें बस अड्डे से लेकर नालों तक का निर्माण के स्टीमेट सरकार के पास पहुंच चुके हैं। पारदर्शिता के साथ विधायक निधि खर्च करने में प्रदेश में हल्द्वानी विधानसभा क्षेत्र पहले नंबर पर। हल्द्वानी विधानसभा के सभी 40 वार्डों में विकास कार्यों का सम्भाव बनाए रखते हुए सभी में बराबर की निधि खर्च करना।

विजन: दिवंगत नेता पं. नारायण दत्त तिवारी जी और माताजी स्व.श्रीमती इंदिरा हृदयेश जी से जो विकास की सोच पाई उसे आगे बढ़ाना, आमजनों के लिए सरलता और सहजता से उपलब्धता, हर व्यक्ति की लड़ाई लड़ना, प्रदेश के समुचित विकास के लिए हर संभव प्रयास करना और 2027 में कांग्रेस की पुनः सत्ता की वापसी का लक्ष्य।

आप गलत कह रहे हैं कि कांग्रेस जमीन पर लड़ती नजर नहीं आ रही। मेरी अपनी विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण दूं तो अग्निवीर योजना, महंगाई, खनन के निजीकरण की कोशिश, अतिक्रमण हटाने के विरोध में हम सड़क से लेकर सदन तक मुद्दे उठा रहे हैं। अंकिता भंडारी प्रकरण पर सरकार को हमने कठघरे में खड़ा किया है। आप देखेंगे कि प्रदेश में लगातार कार्यक्रम हो रहे हैं। जनता ने जो हमें किरदार निभाने का जनादेश दिया है उसे तो हम बखूबी निभा रहे हैं। जहां तक जनता के भरोसे की बात है दो बार कांग्रेस की सरकार जनता ने ही बनवाई। हां राज्य बनने के बाद से आज तक राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं। जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है उसने देश व प्रदेश में धार्मिक उन्माद को सत्ता पाने का जरिया बना दिया है। नफरत बांटो और राज करो की उनकी नीति ने विभाजन का माहौल बना दिया है

 

मोदी जी इवेंट मैनेजमेंट के महागुरु हैं। उन्हें इवेंट मैनेजमेंट में विश्व गुरु की उपाधि लेनी चाहिए। हां, ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस प्रकार उन्होंने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया सहित विभिन्न संवैधानिक संस्थानों को दबाव में लेकर भाजपा के आनुषांगिक संगठनों में तब्दील कर दिया है उससे आने वाले समय में लोकतंत्र पर खतरा है। इनके खिलाफ आवाज उठाने वालों पर ये लोग सीबीआई, ईडी से दबाव बनाते हैं। लोकतंत्र के लिए खतरा है ये दबाव का मोदी फैक्टर

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