Uttarakhand

उपयोग केंद्र का दुरुपयोग

सरकार के मुंह लगे अधिकारी राज्य में तानाशाही कर रहे हैं। उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र इसका बेहतर उदाहरण है। यहां के निदेशक महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट ने बड़ी निर्ममता से आउट सोर्सिंग कर्मचारियों को हटाया। निष्कासित कर्मचारी निरंतर आंदोलनरत हैं। एक कर्मचारी की पत्नी तो अपने दो मासूम बच्चों के साथ आत्महत्या भी कर चुकी है। लेकिन न तो सरकार का दिल पिघला और न उसके चहेते निदेशक का। भाजपा के बड़े नेताओं और मुख्यमंत्री के करीबी समझे जा रहे निदेशक ने अपने राजनीतिक रसूख के दंभ में यह तक ध्यान नहीं रखा कि पुत्तु बनाम भारत सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि कॉन्ट्रेक्ट बदलने या निरस्त होने पर कर्मचारी को नहीं हटाया जा सकता। दिलचस्प यह भी है कि निदेशक कर्मचारियों को हटाने की वजह विभाग में बजट की कमी बता रहे हैं, लेकिन खुद अपने लिए नब्बे हजार रुपए का मोबाइल फोन खरीदते हैं। राज्य में न सिर्फ निदेशक की योग्यता को लेकर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि लोग हैरान हैं कि जो अधिकारी कर्मचारियों को अपने घरेलू काम के लिए विवश कर नौकरी से निकाल रहा है, आखिर उसके कारनामों पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत क्यों आंख मूंदकर बैठे हुए हैं
राज्य का अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) अब दुरुपयोग केंद्र बनता जा रहा है। यहां के निदेशक भाजपा और संघ के चहेते बनाए जाते है। निदेशक महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट की हठधर्मिता और तानाशाही रवेये के चलते आधा दर्जन आउट सोर्सिंग कर्मचारी बेरोजगार कर दिए गये हैं। ऐसे ही एक कर्मचारी की नौकरी चले जाने के दुख में उसकी पत्नी अपने दो मासूम बच्चां के साथ नदी में कूद कर आत्महत्या कर चुकी है। हालांकि विज्ञान एवं प्रौद्योगिक सचिव आउट सोर्स कर्मियों को निकाले जाने के आदेश को निरस्त कर चुके हैं। लेकिन निदेशक द्वारा सचिव के आदेश को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया है।
हैरत की बात यह है कि निदेशक महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट अंतरिक्ष उपयोग केंद्र में धन की कमी के चलते आउट सोर्सिंग कर्मचारियों की सेवा समाप्त करने की बात कह रहे हैं। लेकिन स्वंय अपने लिए सरकारी बजट से 90 हजार का मंहगा विदेशी मोबाइल फोन खरीद चुके हैं। ऊपर से वह बड़ी शान से अपनी इस खरीद को जायज भी बता रहे हैं।
निदेशक बिष्ट पर यूसैक के आउट सोर्सिंग कर्मियों ने अपने आवास में घरेलू काम कराने के आरोप लगाए हैं। इन कामों में पालतू जानवर को घुमाना और शौचालय की सफाई करवाना शामिल है। बताया जाता है कि काम के लिए कर्मियों पर बड़ा दबाब बनाया  जाता है। जो कर्मचारी उनके घर में काम करने से मना कर देता है उसे यूसैक से बाहर कर दिया जाता है। इस तरह का एक वीडियो सोशल मीडिया में छाया हुआ है। लेकिन जीरो टॉलरेंस का दंभ भरने वाली सरकार इस मामले में चुप्पी साधे हुए है, जबकि निदेशक पर आत्महत्या को उकसाने तक के आरोप आउट सोर्सिंग कर्मचारी लगा रहे हैं।
राज्य की पहली निर्वाचित नारायण दत्त तिवारी सरकार के समय उत्तराखण्ड में अंतरिक्ष उपयोग केंद्र यानी यूसैक की स्थापना की गई थी। भाजपा सरकार के दौरान इस केंद्र में राजनीतिक दखल इस कदर बढ़ता चला गया कि निश्ांक सरकार के दौरान चहेतों की जमकर नियम विरुद्ध भर्तियां की गई। अधिकांश कर्मचारी भाजपा सरकार के दौरान राजनीतिक दखल के चलते आसानी से तैनाती पाते रहे। राज्य में जब से आउट सोर्सिंग के माध्यम से कर्मचारियों की भर्तियां शुरू की गई तब से इस संस्थान में अलग-अलग
प्लेसमेंट सर्विस कंपनियां के तहत आउट सोर्सिंग कर्मचारी मामूली वेतन पर काम कर रहे थे।
जनवरी माह में पूर्व निदेशक दुर्गेश पंत के त्याग पत्र देने के बाद गढ़वाल विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट को निदेशक पद के लिए सबसे योग्य माना गया। उन्हें यूसैक का नया निदेशक तैनात कर दिया गया। बिष्ट की योग्यता अंतरिक्ष विज्ञान और अंतरक्षि विभाग के लिए कितनी उपयोगी थी यह तो विभाग ही जाने या फिर मुख्यमंत्री जिन्होंने उन्हें निदेशक की कुर्सी के काबिल समझा। लेकिन आम जनता में उनकी योग्यता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों की मानें तो महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट भाजपा के एक पूर्व मुख्यमंत्री के ओएसडी रहे व्यक्ति  के बड़े भाई हैं। जिसका लाभ बिष्ट को यूसैक के
निदेशक की नियुक्ति में मिला है। भाजपा के कई अन्य बड़े नेताओं के साथ भी महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट की नजदीकियां जग जाहिर रही हैं। जिनमें सतपाल महाराज, रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, अजय भट्ट के अलावा वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत बड़े नाम हैं।
बहरहाल निदेशक की कुर्सी पर तेनात होने के एक माह के भीतर ही नव नियुक्त निदेशक ने सबसे पहले चुन-चुन कर आउट सेर्सिंग कर्मचारियों को संस्थान से बाहर का रास्ता दिखाना शुरू किया। बिष्ट से पूर्व के निदेशकां ने कभी इस तरह के कदम नहीं उठाये थे। लेकिन अपने रसूख के दंभ में महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट ने सबसे पहले यूसैक में तकरीबन 7 वर्षों से बेहतर सेवाएं दे रही शीला रावत को हटा दिया। शीला रावत ने इसका कड़ा विरोध किया और शासन-प्रशासन के अलावा मुख्यमंत्री स्तर पर अपनी आवाज पहुंचाई। लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला। कुछ माह के बाद 6 अन्य आउटसोर्सिंग कर्मचारियों को भी बिष्ट ने यूसैक से बाहर कर दिया। जिसके विरोध में कई महीनों से धरना दिया जा रहा है।
निष्कासित कर्मचारियों का आरोप है कि निदेशक महेन्द्र प्रताप सिंह बिष्ट उन पर अपने निजी आवास में घरेलू कामकाज करने के लिए दबाब बनाते थे। जो कर्मचारी उनके आवास पर झाडू-पोछा आदि काम करने से मना कर देता था, उसको संस्थान से निकालने की धमकी देते थे। इस संबध में एक कर्मचारी का महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट के आवास पर शौचालय और स्नानघर की सफाई करने का वीडियो सोशल मीडिया पर चल रहा है। हालांकि इस वीडियो की सत्यता की अभी कोई जांच नहीं हुई है। लेकिन वीडियो से साफ है कि कर्मचारी शौचालय साफ करता हुआ दिख रहा है।
 यूसैक के निष्कासित कर्मचारियों के निरंतर चल रहे धरने  के बावजूद निदेशक ने उनकी सेवायें बहाल नहीं की हैं, जबकि इसके लिए शासन द्वारा 27 अप्रैल 2018 को जारी शासनादेश में साफ किया गया है कि आउट सोर्सिंग कर्मचारियों को नहीं हटाया जाए। इस शासनादेश का उल्लेख स्वयं सचिव विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी रविनाथ रमन ने भी अपनी 01 अगस्त 2018 की टिप्पणी में स्पष्ट किया है कि उक्त शासनादेश का पालन किया जाए। सचिव की टिप्पणी में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुत्तु बनाम भारत सरकार के मामले में दिये गये निर्णय का भी उल्लेख किया गया है। जिसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश में स्पष्ट है कि कॉन्ट्रेक्ट बदलने या निरस्त होने पर भी कर्मचारियों को नहीं हटाया जा सकता। ऐसे में अब सवाल उठता है कि आउट सोर्सिंग एजेन्सी के साथ कॉन्ट्रेक्ट समाप्त होने के बाद यूसैक के निदेशक महेन्द्र प्रताप सिंह बिष्ट ने 7 आउट सेर्सिंग कर्मचारियों को किस आधार पर हटाया? इससे एक बात तो साफ हो जाती है कि महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट का रसूख शासन और सरकार में इतना बड़ा है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में दिए गए निर्णय के खिलाफ जाकर उन्होंने आउट सोर्सिंग कर्मचारियों को नौकरी से निकाला फिर भी शासन उन पर कोई कार्यवाही नहीं कर पा रहा है।
 निदेशक की ओर से कहा गया कि यूसैक में बजट की कमी के चलते कर्मचारियों को हटाया गया है। लेकिन खुद निदेशक ने यूसैक के बजट से अपने लिए 90 हजार का एप्पल कंपनी का विदेशी मोबाइल फोन खरीदा, जबकि नियमानुसार मुख्यमंत्री भी 20 हजार से अधिक का मोबाइल फोन खरीदने के पात्र नहीं हैं। यही नहीं 2015 में यूसैक द्वारा विदेशी कम्पनी एप्पल का आई पैड खरीदा गया। 65 हजार रुपए का यह पैड वर्तमान सचिव विज्ञान और प्रौद्योगिकी को तोहफे के तौर पर दे दिया गया। जबकि यूसैक के बजट से इस तरह का कोई तोहफा देने का प्रावधान नहीं है। इसके अलावा वित्त अधिकारी राम सिंह मेहता के लिए भी 15 हजार का सैम्संग गैलेक्सी मोबाइल फोन खरीदा गया है। कायदे से वित्त अधिकारी राम सिंह मेहता को इस तरह की खरीद पर आपत्ति लगाने का काम करना था। साफ है कि निदेशक और वित्त अधिकारी दोनों ही यूसैक के बजट को अपने हितों के लिए चपत लगाने का काम कर रहे हैं।
महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट की भाजपा और संघ में गहरी पैठ बताई जाती है। इसे उनके गलत कामों की प्रमुख वजह माना जा रहा है। अभी हाल ही में यूसैक द्वारा 1 लाख 8 सौ रुपये के भगवा रंग के जूट बैग खरीदे गए हैं। बताया जा रहा है कि इन बैगों का उपयोग जल्द ही भाजपा और संघ से जुडे़ कार्यक्रमों में किया जाने वाला है। इससे साफ है कि निदेशक अपने कारनामों को छिपाने, सत्ताधारी पार्टी में पैठ बनाने के लिए सरकारी खजाने का दुरुपयोग कर रहे हैं।
इन सब के बीच कर्मचारियों का भविष्य चौराहे पर आ चुका है। कई वर्षों तक कम वेतन पर काम कर चुके कर्मचारी अपनी उम्र के इस पड़ाव में बेरोजगार हो चुके हैं। इसी बेरोजगारी के चलते 20 अगस्त को यूसैक से निकाले गए कर्मचारी देवेंद्र रावत की पत्नी ने दुखी होकर अपने दो बच्चों के साथ अपने मूल गांव पैठाणी में नयार नदी में कूदकर आत्म हत्या कर ली है। अब देवेन्द्र रावत का परिवार ही समाप्त हो गया है। कहीं न कहीं इसके लिए यूसैक के निदेशक महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट जिम्मेदार हैं। जिनके द्वारा तमाम नियमों और शासनादेशां के खिलाफ कर्मचारियां को नौकरी से बाहर कर दिया गया।
निष्कासित कर्मचारियों से बातचीत
मुझे भी कई बार निदेशक साहब ने अपने घर में काम करने को कहा था। मैंने मना किया तो मुझे कहा गया कि जब आप हमारे किसी काम नहीं आ सकती तो आपकी यूसैक को जरूरत नहीं है। मुझे यूसैक से निकाले हुए छह माह हो चुके हैं। मुझे नियम विरुद्ध निकाला गया है। सचिव साहब के आदेश के बाद भी निदेशक हमारी सेवाएं बहाल करने को तैयार नहीं हैं। सरकार और प्रशासन के साथ निदेशक एमपीएस बिष्ट जी का रसूख है जिसके कारण हमारा उत्पीड़न किया जा रहा है।
-शीला रावत
हमें बगैर किसी सूचना के अचानक ही बाहर निकाले जाने का आदेश कर दिया। कई सालों से हम काम कर रहे थे और वह भी कम तन्खाह पर ही कर रहे थे। लेकिन अपने परिवार का पालन-पोषण करने का एक सहारा तो था। अब डायरेक्टर साहब ने हमसे हमारे परिवार का सहारा भी छीन लिया। हमारे एक साथी की पत्नी ने अपने पति की नौकरी चले जाने के गम में अपने दो बच्चों के साथ आत्महत्या तक कर ली है। लेकिन न तो सरकार और न ही डायरेक्टर हमारी नौकरी बहाल कर रहे हैं।
-मोहन दास
डायरेक्टर साहब का सीधा आदेश होता था कि उनके घर में जो संविदाकर्मी काम करेगा वही यूसैक में काम कर सकता है। मैं ग्रेज्युएट हूं लेकिन मैं डायरेक्टर साहब के शौचालय की साफ-सफाई का काम करता रहा हूं, जबकि मेरी नौकरी यूसैक में थी। जब मैंने विरोध किया तो निकाले जाने की धमकी दी गई। इसलिए मैंने वीडियो बनाया है। इसके बाद मुझे अचानक से नौकरी से निकाल दिया गया। हम धरने पर बैठे हैं और जब तक हमें न्याय नहीं मिलेगा हम आंदोलन करते ही रहेंगे।
-सोनु कुमार
हमने जो भी निर्णय लिए या आदेश दिए हैं, वे सभी राज्य सरकार के निर्देश पर ही हैं। हमने सचिव और सरकार दोनों को ही इस बारे में जानकारी दे दी थी। सरकार की तरफ से मुझे जो सुविधाएं दी जा रही हैं, मैं वही ले रहा हूं। टेलीफोन की सुविधा मिली है तो ली है। अब आप कम्प्यूटर को ही ले लें। कोई दो लाख का होता है तो कोई पैंतीस हजार का। सचिव को मैंने कोई तोहफा नहीं दिया। पहले के अधिकारियां ने दिया होगा। फिर भी मैं अब ऐसे सामान को रिकवर करवा रहा हूं। मेरे घर में कोई कर्मचारी काम नहीं करता है और न ही मैंने कभी किसी को ऐसा करने को कहा है। वह वीडियो एक साजिश है। अपने आप कैम्प कार्यालय में वीडियो बनाकर मेरी छवि  खराब करने का काम किया जा रहा है।
महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट, निदेशक यूसैक
Caption
यूसैक से निकाले गए कर्मचारियों के संबंध में सचिव का पत्र
 
निदेश के खिलाफ कर्मचारियों का विरोध प्रदर्शन
 
धरने पर बैठे देवेन्द्र रावत (लाल कमीज में) एवं अन्य

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