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Uttarakhand

त्रिवेंद्र के चुनाव न लड़ने के मायने

उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रदेश में विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का एलान कर सबको हैरत में डाल दिया है। ऐसे समय में जब चुनाव लड़ने वाले नेताओं की सूची जारी होने में कुछ ही समय बचा था, तब पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने विधानसभा क्षेत्र डोईवाला से चुनाव ना लड़ने की गुजरिश करते हुए एक पत्र भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा को लिखकर राजनीतिक सरगर्मियां पैदा कर दी है। रावत द्वारा चुनाव न लड़ने की इस घोषणा से तरह-तरह की राजनीतिक चर्चाएं चल रही है।

चर्चा है कि इस बार डोईवाला में त्रिवेंद्र सिंह रावत के सामने एंटी इंकम्बैंसी बड़ा मामला बन गया था। मुख्यमंत्री रहते त्रिवेंद्र सिंह रावत ने डोईवाला के लिए कुछ ऐसी खास उपलब्धि जारी नहीं की जिसके चलते वहां की जनता उनसे खुश नजर आती। डोईवाला विधानसभा से तीन बार चुनाव जीत चुके त्रिवेंद्र सिंह रावत का इस बार उनकी विधानसभा में विरोध हो रहा था। इसके पीछे का कारण उनके मुख्यमंत्री रहते उनके ही एक पीआरओ की शह पर हुआ अवैध खनन मुख्य रूप से शामिल था। इसी के साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत के टिकट काटने के आसार ज्यादा थे। इससे पहले कि सूचि जारी होती और उसमे त्रिवेंद्र का नाम साफ होता उन्होंने पहले ही उन्होंने चुनाव ना लड़ने को पत्र लिख दिया। हालांकि इस पत्र में रावत के मन के भावो को पढ़कर लग रहा है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में वह चुनाव लडने की बजाय चुनाव लड़ाने वाला बनना चाहते हैं।

पार्टी अध्यक्ष को लिखे पत्र में त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहां है कि ‘‘बदली राजनीतिक परिस्थितियों में मुझे विधानसभा चुनाव 2022 नहीं लड़ना चाहिए, मैं अपनी भावनाओं से पूर्व में ही अवगत करा चुका हूं।’’इस पत्र में रावत ने स्वयं को ‘भाजपा कार्यकर्ता’ बताते हुए यह भी कहा है कि उत्तराखण्ड चुनाव के मद्देनजर वह अपना पूरा समय धामी के नेतृत्व में दोबारा सरकार बनाने के लिए काम करने में लगाना चाहते हैं। उन्होंने नड्डा से कहा है कि आपसे अनुरोध है कि मेरे चुनाव नहीं लड़ने के अनुरोध को स्वीकार करें ताकि मैं अपना पूरा प्रयास सरकार बनाने में लगा सकूं।

राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के नाम त्रिवेंद्र सिंह रावत का पत्र

त्रिवेंद्र ने पत्र में अपने अनुभव का उल्लेख भी किया है और कहा है कि विभिन्न राज्यों में चुनावों के दौरान वह कई जिम्मेदारी निभा चुके हैं। उनके पत्र की भाषा से यह भी साफ होता है कि अब वे पार्टी संगठन में अपनी भूमिका चाहते हैं। यही नहीं बल्कि पत्र की भाषा से यह भी लग रहा है कि कही ना कही वह इस बात को भी महसूस कर रहे है कि अपने से कम उम्र के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में उन्हें वरीयता के हिसाब से विधानसभा में स्थान न मिले, क्योंकि पार्टी हाईकमान यह तय कर चूका है कि विधानसभा चुनाव मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में ही लड़े जाएंगे। यही नहीं बल्कि उत्तराखण्ड का अगला मुख्यमंत्री चेहरा धामी ही होंगे।

यहां यह बताना भी जरुरी है कि भाजपा सरकार के पांच साल के कार्यकाल में से चार साल मुख्यमंत्री पद पर रहे रावत बार-बार नेतृत्व परिवर्तन से नाराजगी के संकेत देते रहे हैं और अब विधानसभा में केवल विधायक के रूप में बैठने में खुद को सहज नहीं पा रहे हैं। त्रिवेंद्र सिंह रावत ऐसे पहले पूर्व मुख्यमंत्री नहीं है जिन्होंने विधानसभा चुनाव न लड़ने की घोषणा की है बल्कि इससे पहले भाजपा के ही एक मुख्यमंत्री और रहे जिन्होंने विधानसभा में ना बैठने का ऐलान किया था वह विजय बहुगुणा थे। विजय बहुगुणा ने सितारगंज से 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ने की बजाय अपने पुत्र सौरभ बहुगुणा को लड़ाया था।

कहा यह भी जा रहा है कि चारधाम सहित प्रदेश के 53 मंदिरों के प्रबंधन और रखरखाव के लिए गठित चारधाम देवस्थानम बोर्ड सहित उनके कार्यकाल के कुछ अन्य निर्णयों को वापस लिए जाने से भी वह आहत हैं। याद रहे कि पिछले साल मार्च में जब त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार चार साल का कार्यकाल पूरा करने जा रही थी ऐन वक्त पर राज्य में नेतृत्व परिवर्तन करते हुए भाजपा ने त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह तीरथ सिंह रावत को राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया था। हालांकि बाद में विधानसभा सदस्य बनने की अनिवार्यता पूरी नहीं हो पाने के कारण तीरथ सिंह को हटाकर पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया गया।

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