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Uttarakhand

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की अनुकंपा के मायने

पुलवामा के शहीद सैनिकों के परिजनों के लिए मिली करोड़ों की धनराशि मुख्यमंत्री राहत कोष में ही पड़ी हुई है। कारगिल शहीदों के परिजनों के लिए की गई घोषणाएं अधूरी हैं। तमाम पूर्व सैनिकों के आश्रित नौकरियों के लिए भटक रहे हैं। लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की अनुकंपा सिर्फ किसी खास पर होती है। बीएसएफ के एक पूर्व डिप्टी कमांडेंट स्वर्गीय भगवती प्रसाद भट्ट की पत्नी स्वाति भट्ट को बीएसएफ खुद नौकरी दे रहा था। लेकिन मुख्यमंत्री की स्वाति भट्ट को नियुक्ति देने में कुछ इस कदर दरियादिली रही कि इसके लिए कायदे-कानूनों को ताक पर रखा गया। स्वाति भट्ट को नियम विरुद्ध ‘उपनल’ के जरिए स्थानिक आयुक्त कार्यालय दिल्ली में नौकरी दी गई। यहां उनके स्थाई होने की संभावना नहीं रही तो फिर मुख्यमंत्री ने उन्हें जिलाधिकारी कार्यालय देहरादून में अपने कर कमलों से नियुक्ति पत्र सौंपा

देहरादून की रहने वाली स्वाति भट्ट आज प्रदेश की महिलाओं के लिए एक बड़ा उदाहरण बनकर उभरी हैं। लेकिन रुकिये, कहीं आप ऐसा न समझ लें कि स्वाति भट्ट ने कोई ऐसा बड़ा काम कर दिया हो जो कि राज्य की महिलाओं के लिए मील का पत्थर समझा जाए, बल्कि वे तो इसलिए चर्चित हुई हैं कि प्रदेश के मुख्यमंत्री जी ने उनको दो-दो बार सरकारी नोकरी से नवाजा है। यह ठीक है कि किसी सैनिक या अर्द्धसैनिक बल के परिजनों पर अनुकंपा दिखाई जाए, लेकिन बीएसएफ के डिप्टी कमांडेट स्वर्गीय भगवती प्रसाद भट्ट की धर्म पत्नी स्वाति भट्ट को मुख्यमंत्री ने अपनी विशेष अनुकम्पा के आधार पर मृतक आश्रित कोटे के तहत दिल्ली स्थित स्थानिक आयुक्त कार्यालाय में सीधे लेखाकार के पद पर तैनात कर दिया, जबकि यह पद एक राजपत्रित अधिकारी का होता है और इसके लिए लंबा अनुभव जरूरी है।

इसके बाद पहले तो एक वर्ष के लिए तैनात स्वाति भट्ट की अस्थाई सेवा को स्थाई करने के प्रयास किए गए, लेकिन जब ऐसा संभव नहीं हो पाया तो इस एक वर्ष की सेवा को बढ़ाये जाने के प्रयास किए गए। इसके लिए बकायदा शासन स्तर पर बड़ी तेजी से पत्रावली दौड़ी, पंरतु नियमों के चलते ऐसा नहीं हो पाया। लिहाजा मुख्यमंत्री ने देहरादून में सैनिक सम्मेलन में स्वयं पधारकर स्वाति भट्ट को फिर से जिलाधिकारी देहरादून के कार्यालय में कार्यालय सहायक के पद पर नियुक्ति पत्र सांपा। इसे उन्होंने राज्य सरकार के द्वारा प्रदेश के सैनिकों के सम्मान का एक बहुत बड़ा मील का पत्थर बताया।

एक ही महिला आश्रित कोटे से दो-दो बार सरकारी नौकरी पा गई तो स्वाभाविक है कि सवाल भी खड़े हो गए। आखिर ऐसा क्या हुआ कि किसी महिला को मृतक आश्रित कोटे से नौकरी दिलवाने के लिए मुख्यमंत्री को इस कदर मेहनत करनी पड़ी। जबकि राज्य में हजारों ऐसे मामले हैं जिनमें मृतक सरकारी कर्मचारियों के आश्रित बरसों से नौकरी की आस लगाए बैठे हैं। दरअसल, बीएसएफ के डिप्टी कमांडेट भगवती प्रसाद भट्ट वर्ष 2016 में एक हवाई दुर्घटना में मारे गए।

कहा जाता है कि स्वर्गीय भट्ट को बीएसएफ वायुयान में एक यात्री माना गया और स्वाति भट्ट को आधी पारिवारिक पेंशन जारी कर दी गई। लेकिन इसके बाद बीएसएफ ने अपनी गलती सुधारी और स्वर्गीय भट्ट को मृतक पायलट मानकर स्वाति भट्ट को पूरी पारिवारिक पेंशन जारी की जाने लगी। इसके बाद स्वाति भट् ने अपने स्वर्गीय पति के मृतक आश्रित कोटे का हवाला देकर बीएसएफ में सरकारी नौकरी दिये जाने का आवेदन किया। बीएसएफ ने उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें कांस्टेबिल के पद पर नौकरी दिए जाने की स्वीकृति प्रदान की। लेकिन स्वाति भट्ट ने अपने पति के ही समान अधिकारी वर्ग के पद पर तैनाती दिये जाने की मांग रखी। जिसे बीएसएफ ने ठुकरा दिया।

इसके बाद इस पूरे प्रकरण में उत्तराखण्ड सरकार और शासन की भूमिका शामिल हो जाती है। राज्य की पहली निर्वाचित कांग्रेस की तिवारी सरकार के समय पूर्व सैनिकों के लिए एक निगम ‘उपसुल’ बनाया गया था। जिसमें राज्य के पूर्व सैनिकों को सरकारी विभागों में संविदा के तहत रोजगार दिए जाने का निर्णय लिया गया। इसके लिए तत्कालीन मुख्य सचिव आर एस टोलिया ने शासनादेश संख्या (158-XVIIU) @09-(17) 2004 दिनांक 4 अगस्त 2004 जारी किया। इस शासनादेश में अर्धसैनिकों को शामिल नहीं किया गया।

शासनादेश में यह स्पष्ट किया गया है कि ‘उपसुल’ के जरिए सिर्फ पूर्व सैनिकों को ही रोजगार दिया जाएगा। इसमें अर्धसैनिकों की श्रेणी को सामान्य प्रशासन के द्वारा 28 अगस्त 2019 को जारी आदेश के बाद जोड़ा गया जिसके बाद से ‘उपनल’ जो कि पूर्व में उपसुल के नाम से जाना जाता था, में अर्धसैनिकां के परिजनों को भी रोजगार दिया जाना शामिल किया गया। यह तथ्य भी गौर करने वाला है कि वर्ष 2018 में स्वाति भट्ट को स्थानिक आयुक्त कार्यालय में नियुक्ति देते समय ‘उपनल’ के शासनादेश में अर्धसैनिक बलों की श्रेणी नहीं थी।

राज्य की हरीश रावत सरकार के समय जारी शासनादेश में पूर्व सैनिकां के वैधानिक आश्रितां को जो कि राज्य के स्थाई निवासी हों, को ‘उपनल’ के माध्यम से आउटसोर्सिंग के तहत रोजगार दिए जाने का आदेश जारी किया गया। इसके बाद पूर्व सैनिकों और उनके परिवारजनों को भी ‘उपनल’ के माध्यम से सरकारी विभागां में तैनाती दी जाने लगी। लेकिन इस शासनादेश में भी अर्धसैनिकों और उनके परिवारजनां को शामिल नहीं किया गया था। हरीश रावत सरकार के समय में भी स्वाति भट्ट को मृतक आश्रित कोटे से नौकरी दिए जाने की फाइल शासन में चली थी, लेकिन नियमों का हवाला देकर स्वाति भट्ट के आवेदन को निरस्त कर दिया गया था, क्यांकि तब उपनल के माध्यम से अध­र्सैनिकां के लिए कोई नियम नहीं था।

राज्य में मार्च 2017 में सत्ता परिवर्तन हुआ और भाजपा की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार सत्ता में काबिज हुई। इसके साथ ही स्वाति भट्ट को सरकारी नौकरी दिए जाने के प्रयास आरंभ होने लगे। इसके लिए न सिर्फ नियमों को ताक पर रखा गया, बल्कि मुख्यमंत्री की विशेष अनुकम्पा के दबाब में फाइलों में ही दबा दिया गया। स्वाति भट्ट को सरकारी नौकरी दिए जाने के लिए पूर्व में ‘उपनल’ के लिए जारी शासनादेश में अर्धसैनिक बल को जोड़ा गया।

सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार स्वाति भट्ट को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की विशेष अनुकम्पा के तहत नई दिल्ली स्थिति स्थानिक आयुक्त कार्यालय में 12 अप्रैल 2018 को लेखाकार के पद पर तैनाती दी गई थी। यह नियुक्ति एक वर्ष यानी 12 अप्रैल 2019 तक ही मान्य थी। इसके बाद स्वाति भट्ट को एक वर्ष की अवधि के लिए सेवा विस्तार दिए जाने की फाइल शासन में चलने लगी। जिसमें शासन की टीप में ‘टिप्पणी 10’ बहुत महत्वपूर्ण है जिसमें लिखा गया है कि ‘प्रकरण में यह भी विचारणीय है कि स्थानिक आयुक्त कार्यालय में जब लेखाकार एवं सह कोषाध्यक्ष का पद भी रिक्त चल रहा है तब अनुभाग अधिकारी के रिक्त पद को अस्थाई रखते हुए श्रीमती स्वाति भट्ट को सेवायोजित किए जाने का औचित्य ही प्रतीत नहीं होता।’

यानी स्पष्ट हो गया कि स्वाति भट्ट को आस्थानिक आयुक्त कार्यालय में पहले ही नियुक्ति देने में नियमों को तोड़ा गया है और फिर से नियमों को लचीला बनाकर स्वाति भट्ट को सेवा विस्तार दिए जाने की कार्यवाही गतिमान हो रही थी। बहरहाल स्वाति भट्ट को सेवा विस्तार तो नहीं मिल पाया, लेकिन उत्तराखण्ड राज्य की 19वीं वर्ष गांठ की पूर्व संध्या पर सैनिक सम्मान समारोह में ही मुख्यमंत्री द्वारा उनको जिलाधिकारी देहरादून कार्यालय में कार्यालय सहायक पद पर तैनाती का नियुक्ति पत्र अपने कर कमलों से सौंप दिया गया।

किसी पूर्व सैनिक की पत्नी को सरकारी सेवा दिया जाना हर प्रकार से उचित प्रतीत होता है, लेकिन इसमें कई ऐसे सवाल भी हैं जिनका जवाब मिलना बाकी है। इसमें सबसे पहला सवाल यही है कि क्या राज्य में केवल स्वाति भट्ट ही एक मात्र ऐसी महिला हैं जो कि पूर्व सैनिक की पत्नी रही हैं। आज भी कई ऐसे सैनिकों के परिजनों की बड़ी तादाद है जिनके पिता या पति देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे चुके हैं। कारगिल शहीदों के परिजनों के लिए की गई सरकारी घोषणाओं को भी अभी तक सरकार पूरा नहीं कर पाई है। पुलवामा शहीदां के परिजनों के लिए विभिन्न विभागों से मिली करोड़ों की धनराशि को सरकार सिर्फ मुख्यमंत्री राहत कोष के खाते में जाम करके बैठी हुई है, जबकि यह धनराशि शहीद सैनिकों के परिजनों और घायल हुए सैनिकों के बेहतर उपचार के लिए मिली थी।

हमें सरकार चलाती है

हम निगम हैं और निगम सरकार चलाती है। हमारे पास प्रिंसीपल सेक्रेट्री साहब का एक पत्र आया था जिसमें कहा गया था कि हमने स्वाति भट्ट को अनुकम्पा के आधार पर उपनल से नौकरी देनी है। इस पर हमने बोर्ड की मीटिंग की। बोर्ड ने फैसला किया कि ‘उपनल’ विशेष परिस्थितियों में अनुकम्पा के आधार पर नौकारी दे सकता है। सरकार ने स्वाति भट्ट को दिल्ली में किसी आयुक्त कार्यालय में नौकरी दी थी। एक वर्ष के लिए ही यह नौकरी थी। इसके बाद हमने उन्हें हटा दिया था। अब सरकार ने स्वाति भट्ट को कहां नौकरी दी है, यह मेरी जानकारी में नहीं है।

ब्रिगेडियर (रि .) पी .पी .एस .  पाहवा, प्रबंध निदेशक ‘उपनल’

मुख्यमंत्री सैनिकों का अपमान कर रहे हैं

इस सरकार ने ‘उपनल’ को बर्बाद कर दिया है। जिस ‘उपनल’ को तिवारी जी ने पूर्व सैनिकों के लिए बनाया था उसे यहां की सरकारों ने इस कदर लूटा है कि यह गैर सैनिकों को नौकरी देने का माध्यम बना दिया गया। वो तो हाईकोर्ट ने आदेश दिया तब जाकर कुछ सुधार हो रहा है। इसमें कहीं भी अर्ध सैनिक बल के लिए कोई नियम नहीं था। भारतीय सेना का सैनिक 35 वर्ष में रिटायर्ड होकर आता था तब उसके पास कोई आय के साधन नहीं होते। जबकि अर्धसैनिक बल के लोग अपनी पूरी आयु 60 साल में नौकरी करके ही रिटायर्ड होते हैं। लेकिन इस सरकार ने सभी नियमों को ताक पर रख दिया है।

अर्धसैनिकों को भी इसमें जोड़ दिया गया है। एक महिला को सरकार दो-दो बार सरकारी नौकरी दे रही है, जबकि उसे तो बीएसएफ ने ही नौकरी देनी थी। आज सैकड़ों ऐसे पूर्व सैनिकों के परिजन हैं जिनको सरकार पूछ ही नहीं रही है। हमारा तो साफ कहना है कि यह सरकार ओैर इसके मुख्यमंत्री पूरी तरह से सैनिकों का अपमान कर रहे हैं।

पीसी थपलियाल, महासचिव उत्तराखण्ड पूर्व सैनिक, अर्धसैनिक संयुक्त संगठन

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