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जिस जमीन को ग्यारह साल पहले गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय ने कृषि क्षेत्र में रिसर्च इत्यादि के लिए मंडी समिति रुद्रपुर को 50 एकड़ जमीन दी थी। मंडी समिति ने उस जमीन के 20 एकड़ हिस्से को नोएडा की एक कंपनी ‘मैसर्स प्रोविज मेन सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड’ को सस्ते दामों में किराए पर दे दिया। नोएडा की इस कंपनी को सस्ती दरों पर किराए पर देने से मंडी परिषद् के तत्कालीन उच्चाधिकारी सवालों और संदेह के घेरे में हैं। आश्चर्यजनक यह है कि नोएडा की इस कंपनी ने मंडी समिति से उस जमीन को किराए पर लेकर एक बहुराष्ट्रीय वाहन निर्माता कंपनी ‘अशोक लेलैंड लिमिटेड’ को किराए पर दे दिया। किराया भी थोड़ा-बहुत नहीं बल्कि मंडी समिति द्वारा तय किए गए किराए से दोगुने से भी अधिक था। विश्वविद्यालय एम्प्लायज एसोसिएशन को जब मंडी के इस गोलमाल का पता चला तो वह अपनी जमीन की वापसी के लिए न्यायालय की शरण में चला गया। फिलहाल मंडी समिति ने जमीन को वापस विश्वविद्यालय को जाने से बचाने के लिए नोएडा की कंपनी को जमीन खाली कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

इसकी शिकायत हल्द्वानी निवासी रवि शंकर जोशी ने कृषि सचिव से की। जोशी का कहना है कि जिस जमीन को मंडी समिति ने नोएडा की कंपनी को किराए पर दिया, उस जमीन को मंडी समिति बहुराष्ट्रीय वाहन निर्माता कंपनी अशोक लेलैंड को भी दे सकती थी। जो मुनाफा नोएडा की कंपनी अशोक लेलैंड कंपनी से ले रही है, वह मंडी समिति भी ले सकती थी। लेकिन ऐसा होता तो मंडी समिति के अधिकारियों को कमीशन कैसे मिलता? यह सवाल वर्षों से उठाए जा रहे हैं। जब 2018 में नोएडा की मैसर्स प्रोविज मेन सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड नामक इस कंपनी को मंडी समिति ने यह जमीन किराए पर दी थी तब उत्तराखण्ड कृषि उत्पादन मंडी परिषद के तत्कालीन प्रबंध निदेशक धीराज सिंह गर्ब्याल थे जो वर्तमान में नैनीताल के जिलाधिकारी भी हैं। उनके आदेश पर ही रुद्रपुर-हल्द्वानी राष्ट्रीय राजमार्ग पर मौजूद मंडी समिति की 50 एकड़ जमीन में से 20 एकड़ जमीन नोएडा की कंपनी को दी गई।

सवाल इस बात को लेकर भी उठ रहे हैं कि जमीन को गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय ने जिस कार्य के लिए दिया था उस जमीन पर वह कार्य न होकर वाणिज्यिक गतिविधि के लिए कैसे दे दी गई? गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय से जमीन लेते समय यह करार किया गया था कि इस जमीन पर वाणिज्यिक गतिविधि नहीं बल्कि कृषि कार्य के लिए प्रयोग में लाया जाएगा। यही नहीं बल्कि इस जमीन पर हाईटेक मंडी बनाने का भी प्रस्ताव किया गया था। लेकिन न तो इस जमीन पर खेती-बाड़ी की गई और न ही हाईटेक मंडी का निर्माण किया जा सका। नोएडा की कंपनी को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से नियमों के विपरीत जाकर कार्य किए गए। कहा जा रहा है कि नोएडा की इस कंपनी को लाभ पहुंचाने के चक्कर में मंडी के उच्चाधिकारी यह भी भूल गए कि जमीन को व्यावसायिक उपयोग के लिए नहीं दिया जा सकता है। बहरहाल, गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय प्रशासन ने मंडी की इन बातों के मद्देनजर अपनी जमीन को वापस लेने के लिए न्यायालय की शरण ले ली है।

   

तत्कालीन मंडी निदेशक धीरज सिंह गर्ब्याल का आदेश जिसके आधार पर नोएडा की कंपनी को दी गई जमीन

 

इस तरह किया गया अनुबंध

 

रिसर्च संस्थान के लिए तय जमीन पर बनी अशोक लेलैंड की पार्किंग

26 जून 2018 को मंडी समिति और नोएडा की कंपनी मैसर्स प्रोविज मैन सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड के मध्य अनुबंध किया गया। दोनों के बीच 15 बिंदुओं पर सहमति बनी। जिसमें तय हुआ कि जमीन को नोएडा की कंपनी को समिति की 20 एकड़ जमीन 57 पैसे प्रति वर्ग फुट की दर यानी 49, 6000 प्रतिमाह देना निर्धारित हुआ। प्रतिबंध में यह भी तय हुआ कि किराए का भुगतान प्रति माह की 10 तारीख तक करना अनिवार्य होगा। निर्धारित तारीख तक किराया जमा न करने की दशा में समिति को भूमि खाली कराए जाने का पूर्ण अधिकार होगा। जिसमें द्वितीय पक्ष यानी कि नोएडा की कंपनी का कोई दावा मान्य नहीं होगा। पहला अनुबंध 5 वर्ष के लिए होगा। इसके बाद उत्तराखण्ड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड (मंडी समिति) रुद्रपुर के प्रबंध निदेशक के अनुमति के बाद किराया संशोधन के साथ अगले 5 वर्षों तक बढ़ाया जा सकेगा। इसमें यह भी तय हुआ कि जिस कंपनी को यह जमीन दी जाएगी वह कोई पक्का निर्माण नहीं कर पाएगा। जो भी अस्थाई निर्माण कार्य किया जाएगा उसका पूर्व में लेआउट बनाकर तकनीकी महाप्रबंधक उत्तराखण्ड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड रुद्रपुर से स्वीकृत किया जाएगा। उसके बाद ही अस्थाई निर्माण कार्य कराए जाने की अनुमति प्रदान की जाएगी।


मंडी को चार साल में तीन करोड़ की चपत
बिंदु संख्या 13 में यह भी स्पष्ट किया गया कि अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन करने पर प्रथम पक्ष यानी कि उत्तराखण्ड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड को अधिकार होगा कि वह अनुबंध को निरस्त कर सकता है। इन शर्तों के बाद नोएडा की मैसर्स प्रोविज मेन सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने इसी जमीन को अशोक लेलैंड कंपनी को दोगुने से भी अधिक किराए पर दे दिया। अशोक लेलैंड से नोएडा की कंपनी ने प्रतिमाह 11 लाख 32 हजार 560 रुपए वसूला। यह किराया 1 साल का एक करोड़ 35 लाख 90 हजार 720 होता है। जबकि 3 साल का चार करोड़ 7 लाख 72 हजार 160 रुपए। कहा जा रहा है कि अगर मंडी नोएडा की कंपनी को न देकर सीधे ही अशोक लेलैंड को किराया पर दे देती तो उसे पिछले चार साल में करीब तीन करोड़ का राजस्व का नुकसान न होता। यह तीन करोड़ मंडी के खाते में आता। हालांकि गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय से लीज डीड की शर्तों को देखें तो यह नियम कानून के विपरीत होता।

 

 

 

 

प्रोविज मेनसिस्टम प्रा.लि. कंपनी और अशोक लेलैंड के मध्य सब-लीज डीड

ऐसे हुआ शर्त का उल्लंघन
यहां यह भी बताना जरूरी है कि इस जमीन पर नोएडा की कंपनी द्वारा शर्तों का उल्लंघन किया गया। जिसमें शर्त नंबर दो के तहत जहां प्रत्येक महीने की 10 तारीख तक किराए का भुगतान करना था। वहां कंपनी द्वारा कई महीनों तक भुगतान नहीं किया गया। जबकि यह शर्त नंबर 3 का खुला उल्लंघन था। अनुबंध की शर्त नंबर तीन में स्पष्ट दर्ज है कि द्वितीय पक्ष यानी कि मैसर्स प्रोविज मेन सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड द्वारा अगर समय पर किराया जमा नहीं कराया जाता है तो मंडी समिति को जमीन खाली कराने का पूरा अधिकार होगा। जमीन खाली कराने से 3 माह पहले नोटिस देना होगा। इससे पहले 2019 से ही नोएडा की कंपनी द्वारा समय पर किराया जमा नहीं कराया गया। लेकिन उस दौरान अधिकारियों की कंपनी पर मेहरबानी जारी रही। जबकि होना यह था कि तत्काल प्रभाव से अनुबंध रद्द कर जमीन मंडी समिति में निहित कर देनी थी। हालांकि इस संबंध में फिलहाल मंडी परिषद की निदेशक निधि यादव ने जमीन निरस्त करने का साहस दिखाया है। जिसके तहत नोएडा की कंपनी को नोटिस जारी किया गया।

विश्वविद्यालय ने की जमीन वापसी की मांग
बहरहाल, उक्त भूमि को गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय एम्प्लायज एसोसिएशन ने वापस लेने के लिए कोशिश शुरू कर दी है। एम्प्लायज एसोसिएशन ने उपजाऊ जमीन करार देते हुए इसे वापस करने की एवज में पूर्व में किए गए एक करोड़ रुपए वापस करने पर सहमति जताई थी। लेकिन मंडी परिषद के जमीन वापस करने से इनकार के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोर्ट की शरण ली है।

याद रहे कि जमीन लेने की एवज में मंडी परिषद की ओर से तत्कालीन सर्किल रेट के अनुसार एक करोड़ रुपए का भुगतान विश्वविद्यालय को किया गया था। मंडी परिषद ने जमीन पर उन्नत कृषि योजना, मंडी समिति शिफ्टिंग सहित तमाम योजनाएं बनाई थीं।

15 फरवरी 2022 को गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय एम्प्लायज एसोसिएशन ने मंडी निदेशक को पत्र भेजकर देश-प्रदेश हित में पूरी 50 एकड़ जमीन वापस मांगी है। कहा कि जमीन हस्तांतरण के बाद से ही बंजर होने की वजह से अनुपयोगी है। इससे जमीन की उर्वरक पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। इस भूमि में तब से विश्वविद्यालय की ओर से फसलों के विभिन्न श्रेणी के उच्च गुणवत्ता युक्त 15 हजार क्विंटल से अधिक धान और गेहूं के बीजों का उत्पादन कर देश के राष्ट्रीय बीज संस्थानों के किसानों को उपलब्ध कराया जाता तो यह देश और प्रदेश हित में होता। अब बताया जा रहा है कि मंडी परिषद ने इस जमीन को वापस करने से इनकार कर दिया है।

 

बात अपनी-अपनी
नोएडा की कंपनी मैसर्स प्रोविज मैन सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड तयशुदा किराया समय पर नहीं दे रही थी। जिसके आधार पर हमने कंपनी को जमीन खाली करने का नोटिस दे दिया है।
निधि यादव, प्रबंध निदेशक मंडी परिषद उत्तराखण्ड

मैंने पिछले दिसंबर में ही मंडी समिति के अध्यक्ष पद का चार्ज लिया है। मुझे इस मामले का पूरा पता नहीं है। लेकिन इतना जानते हैं कि तत्कालीन निदेशक द्वारा की गई इस डील से मंडी समिति को कई करोड़ का घाटा हुआ। इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई की जानी जरूरी है। इस जमीन का किराया हमारी मंडी समिति रुद्रपुर में ही आता है। मंडी की जमीन पर भारी मुनाफा कमाने के बाद भी नोएडा की यह कंपनी मंडी समिति को समय पर किराया नहीं देती। इस कंपनी पर 40 लाख से अधिक किराया बाकी था। जिसमें से कुछ दे दिया गया जबकि अभी भी 4 महीने का किराया बाकी है। मंडी निदेशक निधि यादव जी ने इसके खिलाफ कार्यवाही की है। उन्होंने अब तक का किराया वसूलने के लिए सख्त एक्शन लिया है। मंडी निदेशक निधि यादव जी ने इस कंपनी को जमीन खाली करने का नोटिस दे दिया है। पहले जहां मंडी समिति को इस जमीन पर किराए से करोड़ों रुपया महीने का घाटा उठाना पड़ रहा था अब ऐसा नहीं होगा। आगे से हम ऐसा नहीं होने देंगे कि कोई बाहर की कंपनी आकर हमारी जमीन को किराए पर ले और उस पर भारी मुनाफा कमा कर दूसरी कंपनियों को किराए पर दे दे।
के. के. दास, अध्यक्ष मंडी समिति रुद्रपुर

जी हां, आप सही कह रहे हैं कि यह जमीन हमें गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय से ली गई थी। तब यहां हाईटेक मंडी बनाने तथा उन्नत खेती करने का प्रावधान था। बाद में पता नहीं किस आधार पर पर यह जमीन नोएडा की एक कंपनी को किराए पर दे गई मैं नहीं जानता हूं। लेकिन इतना जरूर पता है कि कई सालों से यह कंपनी तयशुदा किराया तक मंडी को समय पर नहीं दे पा रही थी। फिलहाल इस जमीन को खाली कराने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
लवकेश गोस्वामी, सचिव कृषि उत्पादन मंडी समिति रुद्रपुर जमीन पर कमर्शियल एक्टिविटी होने के कारण पंतनगर यूनिवर्सिटी एंप्लाइज एसोसिएशन जमीन वापसी के लिए हाईकोर्ट में गई थी। तब से यह मामला हाई कोर्ट में है।
इमरान मलिक, विधि अधिकारी कृषि मंडी निदेशालय, रुद्रपुर

मंडी में किराए की पूरी राशि जमा कर दी गई है। पांच साल तक जमीन का अनुबंध जारी रहेगा। जमीन खाली करने का कोई मामला मेरे संज्ञान में नहीं है।
लईक, प्रतिनिधि मैसर्स प्रोविज मेनसिस्टम

यह 50 एकड़ जमीन बेहद उपजाऊ है। किसानों को इसका कोई लाभ नहीं हुआ है। जिस 20 एकड़ जमीन को नोएडा के कंपनी को बहुत कम किराए में दिया गया उस पर खेती-बाड़ी की जाती तो उसी से कई गुना अधिक कमाई होती। लेकिन मंडी समिति ने अपने कमीशन के चक्कर में करोड़ों रुपए का राजस्व का घाटा करा दिया। पिछले चार साल में 4 करोड़ रुपए का घाटा हो चुका है।
रवि शंकर जोशी, शिकायतकर्ता

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