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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में सबसे ज्यादा शोर उत्तर प्रदेश को लेकर है। वहां मुद्दों से ज्यादा पाकिस्तान, जिन्ना, कैराना जैसे जिन्न की आवाज सुनाई पड़ रही है। यानी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में बुनियादी मुद्दों से ज्यादा हिंदू-मुसलमान का शोर चारों ओर सुनाई दे रहा है। वहीं पड़ोसी राज्य उत्तराखण्ड में हालात इससे बिल्कुल अलग है। विधानसभा का चुनाव यहां भी है। प्रदेश के 13 में से 4 जिलों में मुसलमानों की आबादी अच्छी-खासी है। पूरे प्रदेश की आबादी देखें तो इनकी संख्या 13 फीसदी से ज्यादा है। फिर भी मुसलमान चर्चा के केंद्र में नहीं है। यहां तक कि इस समुदाय को कांग्रेस छोड़ अन्य दल भी टिकट नहीं देते हैं। आखिर ऐसा क्यों है? क्या मुस्लिम वोटरों का यहां आधार मजबूत नहीं है या फिर मुसलमानों की सामाजिक स्थिति उत्तर प्रदेश से भिन्न है। यहां की राजनीति में मुसलमान कहां है?

 

  • कुमार गुंजन

दो दशक पहले उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखण्ड अस्तित्व में आया। हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर यहां के पूर्णतः मैदानी जिले हैं। अन्यथा यहां का अधिकांश हिस्सा पहाड़ी है। यहां विधानसभा की 70 और लोकसभा की पांच सीटें हैं। हरिद्वार, देहरादून, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जिलों में मुस्लिम वोटर निर्णायक स्थिति में है। इन चार जिलों में प्रदेश की लगभग आधी विधानसभा सीटें हैं। फिर भी जब बात मुस्लिम नेताओं को टिकट और उनके विधायक बनने की आती है तो इनकी संख्या न के बराबर ही है। वर्तमान विधानसभा में मात्र दो मुस्लिम विधायक हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया। भाजपा ने ऐसे भी यहां आज तक किसी भी चुनाव में मुस्लिम को टिकट नहीं दिया है। कांग्रेस ने पिछले चुनावों में तीन मुस्लिमों को उम्मीदवार बनाया था। ये तीनों हरिद्वार जिले से थे। उनमें से दो मुस्लिम प्रत्याशी विधायक निर्वाचित हुए थे। मंगलौर से काजी मोहम्मद निजामुद्दीन और पिरान कलियर से फुरकान अहमद चुनाव जीते थे। वहीं कांग्रेस ने लक्सर से भी मुस्लिम को मैदान में उतारा था। लेकिन लक्सर सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार हाजी तसलीम चुनाव हार गए थे। प्रदेश में अब तक चार बार विधानसभा के आम चुनाव हुए। इन चुनावों में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रहा है। दोनों पार्टियां बारी-बारी से सरकार भी बनाती रही है। भाजपा तो छोड़ दीजिए, कांग्रेस सरकार के मंत्रिमंडल में भी कभी मुस्लिम मंत्री शामिल नहीं हो पाएं हैं।

वर्तमान विधानसभा चुनाव की तस्वीर भी कोई अलग नहीं है। भाजपा ने फिर से एक भी मुस्लिम को उम्मीदवार नहीं बनाया है। कांग्रेस ने इस बार सिर्फ दो मुस्लिमों को अपना उम्मीदवार बनाया है। इस बार सबसे ज्यादा बहुजन समाज पार्टी ने तीन मुस्लिमों को टिकट दिया है। पहली बार आम आदमी पार्टी भी पूरी तैयारी के साथ चुनाव मैदान में है। आम आदमी पार्टी ने दो मुस्लिमों को अपना उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस की बात करें तो पार्टी ने हरिद्वार जिले की मंगलौर सीट से सीटिंग विधायक काजी निजामुद्दीन को उम्मीदवार बनाया है। इसी जिले की पिरान कलियर सीट से वर्तमान विधायक फुरकान अहमद को पार्टी ने टिकट दिया है। इस बार भी पार्टी ने केवल हरिद्वार जिले में ही मुस्लिमों को उम्मीदवार बनाया है। जबकि ऊधमसिंह नगर में भी मुस्लिमों की संख्या कहीं ज्यादा है। लेकिन अभी तक कोई मुस्लिम टिकट पाने में कामयाब नहीं हो पाएं हैं।

बहुजन समाज पार्टी ने मंगलौर से सरवत करीम अंसारी और लक्सर से मोहम्मद शहजाद को टिकट दिया है। ये दोनों सीटें हरिद्वार जिले में हैं। बहुजन समाज पार्टी ने उमेर अंसारी को श्रीनगर सीट से तीसरा मुस्लिम उम्मीदवार बनाया है। श्रीनगर सीट पौड़ी जिले में हैं। आम आदमी पार्टी के एक मुस्लिम उम्मीदवार हरिद्वार जिले से हैं तो दूसरे ऊधमसिंह नगर से। हरिद्वार जिले की पिरान कलियर सीट पर शादाब आलम को आप ने चुनावी मैदान में उतारा है। दूसरा टिकट ऊधमसिंह नगर जिले की जसपुर सीट से युनूस चौधरी को दिया गया है। इस तरह देखें तो तीन पार्टियों ने मिलकर सात मुस्लिम उम्मीदवार इस विधानसभा चुनाव में उतारे हैं। इनमें से पांच हरिद्वार जिले की सीटों पर हैं।

हरिद्वार को धर्मनगरी कहा जाता है। पूरी दुनिया में भी इस शहर को हिंदू धर्मनगरी के रूप में पहचान मिली हुई है। लेकिन हरिद्वार में ही कलियर शरीफ का दरगाह भी है। यहां भी उर्स के महीने में देश-दुनिया से लोग माथा टेकने आते हैं। यहां की डेमोग्राफी में भी मुस्लिमों की आबादी अच्छी खासी है। यहां मुस्लिमों की तादाद करीब 35 फीसदी है। जिले में कुल 11 विधानसभा सीटें हैं। ये हैं, हरिद्वार, भेल रानीपुर, ज्वालापुर आरक्षित, भगवानपुर आरक्षित, झबरेड़ा आरक्षित, पिरान कलियर, रुड़की, खानपुर, मंगलौर, लक्सर और हरिद्वार ग्रामीण। इनमें मंगलौर, पिरान कलियर, हरिद्वार ग्रामीण, लक्सर और रुड़की ऐसी सीटें हैं जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक स्थिति में हैं। इन सीटों से मुस्लिम प्रत्याशी लड़ते और जीतते भी रहे हैं।

 

काजी निजामुद्दीन

प्रदेश के पहले विधानसभा चुनाव 2002 में तीन मुस्लिम विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। मंगलौर सीट से काजी निजामुद्दीन, बहादराबाद सीट से शहजाद और लालढांग सीट से तसलीम अहमद उस चुनाव में विधायक बने थे। उस चुनाव में ये तीनों ही विधायक बसपा के टिकट पर जीते थे। उस चुनाव में प्रदेश में एनडी तिवारी के नेतृत्व कांग्रेस की सरकार बनी थी। 2007 में राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ। कांग्रेस के स्थान पर भाजपा की सरकार बनी। लेकिन हरिद्वार जिले की इन सीटों के नतीजे ज्यों के त्यों ही रहे। 2002 की तरह ही एक बार फिर वही तीनों नेता बसपा के टिकट पर जीतकर उत्तराखण्ड विधानसभा पहुंचे। उस बार भी राज्य में यही सिर्फ तीन मुस्लिम विधायक जीते।

प्रदेश के तीसरे विधानसभा चुनाव (2012) से पहले 2008 में परिसीमन हुआ। इससे कुछ विधानसभा क्षेत्रों की डेमोग्राफी बदल गई। बहादराबाद और लालढांग सीट का परिसीमन में विलय हो गया। हरिद्वार ग्रामीण और पिरान कलियर नाम से भी नई सीट अस्तित्व में आ गई। राज्य की सत्ता इस बार भी बदली और कांग्रेस ने फिर से वापसी कर ली। लेकिन इस चुनाव में मुस्लिम विधायकों की संख्या 3 से घटकर दो रह गई। काजी निजामुद्दीन बसपा छोड़ कांग्रेस में चले गए और बसपा के टिकट पर मंगलौर सीट पर उनके सामने सरवत करीम अंसारी ने चुनाव लड़ा। सरवत करीम ने काजी निजामुद्दीन को हरा दिया। दूसरी तरफ, कांग्रेस के खेमे में एक नए मुस्लिम नेता का जन्म हो गया और पिरान कलियर सीट से फुरकान अहमद ने जीत दर्ज की।

पिछले चुनाव में बीजेपी की लहर चली। इस लहर में कांग्रेस बिखर गई। फिर भी 2017 के चुनाव में फुरकान अहमद ने दूसरी बार पिरान कलियर से चुनाव जीता। दूसरी तरफ, काजी निजामुद्दीन ने मंगलौर सीट अपने खाते में वापस कर ली। इस तरह उत्तराखण्ड की मुस्लिम पाॅलिटिक्स पूरी तरह हरिद्वार में ही केंद्रित रही। अब यहीं सवाल उठता है कि हरिद्वार को छोड़ किसी अन्य जिलों में मुस्लिम नेता क्यों नहीं तैयार हो पाए। हरिद्वार के साथ तीन और जिले ऐसे हैं जहां मुस्लिमों की मौजूदगी का प्रभाव है। ऊधमसिंहनगर जिले में करीब 23 फीसदी, नैनीताल में 13 और देहरादून में करीब 12 फीसदी मुस्लिम आबादी है। इनके अलावा अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चमोली, पौड़ी गढ़वाल, चम्पावत समेत सभी अन्य जिलों में मुस्लिम आबादी एक से तीन प्रतिशत के बीच है।

कांग्रेस ने 2012 में किच्छा सीट से मुस्लिम प्रत्याशी उतारा था लेकिन वे जीत नहीं पाए। वहीं इस बार आम आदमी पार्टी ने जसपुर सीट से मुस्लिम प्रत्याशी उतारा है। देहरादून राजधानी है और यहां करीब ढाई लाख मुस्लिम वोटर हैं लेकिन कोई भी पार्टी जिले की किसी सीट से मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा है। वरिष्ठ पत्रकार पंकज बौड़ाई कहते हैं, ‘उत्तराखण्ड एक पहाड़ी राज्य है। यहां के हालात बाकी राज्यों से बिल्कुल अलग हैं। यह आंदोलनों का राज्य है। मुस्लिम राजनीतिक रूप से जागरुक नहीं हैं। नेतृत्व के बजाय वे सिर्फ वोटर बन गए हैं।’ यही नहीं, वह आगे कहते हैं, ‘पहाड़ और मैदान का मुस्लिम भी अलग है। दोनों का स्वभाव अलग है। पहाड़ में जो मुस्लिम हैं वो वर्षों से वहीं रहते हैं जैसे बाकी पहाड़ी रहते हैं। उनका रहन-सहन भी अन्य पहाड़ियों जैसा ही है। पहाड़ में क्योंकि वो छोटे-छोटे गांव या पाॅकेट में बसे हैं लिहाजा उनकी राजनीतिक सक्रियता भी नहीं बढ़ पाई है।’

 

फुरकान अहमद

अब लेकिन प्रदेश के मुसलमानों को सक्रिय किया जा रहा है। इसकी कोशिश तेजी से चल रही है। कुछ मुस्लिम युवाओं ने ‘मुस्लिम सेवा संगठन’ बनाया है। यह संगठन करीब पांच साल से काम कर रहा है। संगठन के लोग अब चुनावी राजनीति में भी उतर रहे हैं। हाल ही में जब हरिद्वार धर्म संसद में मुसलमानों के खिलाफ आवाज उठी तो इस संगठन ने हरिद्वार से देहरादून तक प्रदर्शन किया। अब संगठन ने देहरादून जिले की 6 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। मुस्लिम सेवा संगठन के अध्यक्ष नईम अहमद कहते हैं, ‘मौजूदा नेता मुसलमानों के मुद्दे नहीं उठाते हैं। वे मुसलमानों की हिस्सेदारी का सवाल नहीं करते हैं। वह सिर्फ अपनी राजनीति करते हैं। इसलिए कांग्रेस जैसी पार्टी सिर्फ मुसलमानों का वोट लेती है, उन्हें टिकट देने से कतराती है। बीजेपी के एजेंडे में तो मुसलमान है ही नहीं।’

इस मुद्दे पर पिरान कलियर से कांग्रेस के मुस्लिम विधायक फुरकान अहमद से ‘दि संडे पोस्ट’ ने बात की। उनका कहना है कि ‘कांग्रेस सबको साथ लेकर चलने वाली पार्टी है। यहां कोई किसी में भेद नहीं करता। हरीश रावत और प्रीतम सिंह समेत हमारा नेतृत्व सबको समान अवसर देने में विश्वास रखता है। पार्टी ने अल्पसंख्यकों को हिस्सेदारी भी दी है। धीरे-धीरे लोग जुड़ रहे हैं। युवाओं को आगे आकर अपनी सक्रियता दिखानी चाहिए। पार्टी के लिए काम करते रहेंगे तो निश्चित ही पार्टी टिकट में हिस्सेदारी भी सुनिश्चित करेगी।’

 


शादाब ने बढ़ाई फुरकान की चिंता

  • दि संडे पोस्ट डेस्क
इ. शादाब आलम

विधानसभा का चुनावी दंगल शुरू हो चुका है। अगले महीने 14 फरवरी को प्रदेश के सभी 70 विधानसभा सीटों के लिए मतदान होना है। सभी दलों के उम्मीदवार अपने -अपने दावों के साथ चुनावी मैदान में उतर चुके हैं। इस बार भाजपा-कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी भी पूरी तैयारी के साथ ताल ठोक रही है। हरिद्वार के पिरान कलियर सीट से आम आदमी पार्टी के इंजीनियर शादाब आलम को मैदान में उतारा है। यहां मतदाताओं के बीच वे अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। इससे कांग्रेस से दो बार विधायक रहे फुरकान अहमद और उनके समर्थकों की चिंता बढ़ गई है।

इंजीनियर शादाब आलम काफी समय से अपने प्रचार-प्रसार और जनसंपर्क कर रहे हैं। क्षेत्र के लोगों को यहां की समस्याओं से रू-ब-रू करा रहे हैं। कलियर क्षेत्र में ऐसे भी समस्याओं का अंबार लगा है। शादाब आलम आरोप लगा रहे हैं कि दो बार तक विधायक रह चुके फुरकान ने क्षेत्र की जनता की कोई सुध नहीं ली। इसलिए उन्हें तीसरी बार मौका देना कहीं से उचित नहीं है। इसके साथ ही शादाब आलम क्षेत्र की जनता को केजरीवाल सरकार के अच्छे कार्यों को भी बता रही है। इसके अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उत्तराखण्ड की जनता से जो-जो वादे किए हैं, उसके बारे में भी बता रहे हैं।

वे क्षेत्र की जनता से वादा कर रहे हैं कि अगर उनकी सरकार बनती है तो दिल्ली की तर्ज पर 300 यूनिट बिजली मुफ्त दी जाएगी। युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान किए जाएंगे। उनका कहना है कि आप पार्टी एक ईमानदार पार्टी हैं। पार्टी जो वादा करती है, उसे वह पूरा करती है। जिसकी जीती-जागती मिसाल दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में चलने वाले आप पार्टी की सरकार है। आप सरकार ने दिल्ली में हर संभव जनता से किए गए वादों को निभाने की कोशिश की है। इसी का परिणाम है कि दिल्ली की जनता ने दोबारा पूर्ण बहुमत से पार्टी को सत्ता में बैठाया। कुल मिलाकर ‘आप’ प्रत्याशी के चलते ‘कांग्रेस’ प्रत्याशी को नुकसान होता स्पष्ट नजर आ रहा है।

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