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Uttarakhand

‘मेरे साथ कई बार ज्यादती हुई है’

एक समय पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी के करीबी रहे किशोर उपाध्याय 1991 में लोकसभा चुनाव लड़कर अपनी राजनीतिक पारी शुरू करना चाहते थे। लेकिन पहली बार विधानसभा पहुंचने का मौका उन्हें 2002 में टिहरी से मिला। इसी वर्ष वे राज्य की तिवारी सरकार में मंत्री बने। 2007 में फिर टिहरी से चुने गए। वर्ष 2014 में हरीश रावत ने जब मुख्यमंत्री पद संभाला तो उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई। राज्य आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने और अध्यक्ष होने के नाते किशोर राज्यसभा जाना अपना हक समझते थे। लेकिन ऐसा हो न सका। इससे उनके और हरीश रावत के बीच दूरियां भी स्पष्ट दिखाई दी। किशोर आहत हैं कि कुछ लोगों को पार्टी ने उनके काम से ज्यादा दिया। लेकिन वे टूट का कारण बने, जबकि दूसरी तरफ उनके जैसे समर्पित कार्यकर्ताओं के साथ ज्यादतियां भी हुई हैं। ‘दि संडे पोस्ट’ के खास आयोजन ‘टॉक ऑन टेबल’ में उन्होंने तमाम मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात रखी। एक सुलझे हुए राजनेता की तरह उन्होंने तमाम सवालों का शानदार ढंग से जवाब दिया। फिर भी बातचीत में चाहे-अनचाहे उनकी यह पीड़ा भी छलकती रही कि जितना उन्होंने पार्टी और समाज के लिए किया उस लिहाज से उनके साथ न्याय नहीं हुआ।


अपूर्व जोशी : आपके राजनीतिक जीवन की शुरुआत कैसे हुई?
मैं हल्या (किसान) का बेटा हूं। मुझे भाग्य पर बहुत भरोसा है। जब मैं बहुत छोटा था तो एक दिन अपने पिता के साथ दुकान पर गया। दुकान में मैंने नेहरू जी, गांधी जी, पटेल जी और इंदिरा जी के फोटो देखे। मेरे पिता जी पहले से कांग्रेस में थे। उन फोटो को देखकर मैंने पिताजी से पूछा ये कौन हैं? पिता जी ने कहा, ‘ये बहुत बड़े लोग हैं।’ मैंने कहा, इतने बड़े लोगों से मिलना चाहिए। तब पिताजी ने बताया कि ये लोग तो अब नहीं हैं। हां, इंदिरा जी हैं। मैंने ग्यारहवीं में पढ़ाई करते समय पहली बार इंदिरा जी को चिट्ठी लिखी। चिट्ठी में मैंने गरीबी, तंगहाल जैसा कुछ नहीं लिखा। मैंने लिखा कि मुझे नौकरी चाहिए। इंदिरा जी का जवाब आया। उस समय मेरा दो जगहों पर सलैक्शन हो गया था। एक बीटीसी के लिए और दूसरा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एडमिशन के लिए। मैं इलाहाबाद गया भी। मगर दुर्भाग्य से वहां बीमार पड़ गया। इलाज के लिए दिल्ली आया। मेरे मन में इंदिरा गांधी जी से मिलने की बहुत इच्छा थी। दिल्ली आने पर मैं इंदिरा जी के आवास 12 विलिंग्टन लेन में आना-जाना शुरू किया। वहां से राजनीति में धीरे-धीरे शुरूआत हुई। मैंने इंदिरा जी की गिरफ्तारी देखी। संजय जी पर लाठियां पड़ रही थी, वह भी देखा। 1977 की बात है। उस वक्त इंदिरा जी से मिलने कोई नहीं जाता था। मैं उन लोगों में से था जो उस वक्त बराबर उनसे मिलने जाते थे। उन्होंने मुझे तभी से पिक कर लिया। उसके बाद मेरा सौभाग्य रहा कि मैं राजीव जी के बहुत करीब रहा। 1984 से लेकर बाद के वर्षों तक कई बार मैं अमेठी में उनका इलेक्शन एजेंट था। उन महापुरुष के साथ काम करने का मुझे मौका मिला, यह मेरा सौभाग्य है। मुझे आज भी याद है, 1984 का चुनाव वे सबसे ज्यादा वोटों (3 लाख 14 हजार) से जीते थे। इस तरह मैं राजनीति में आया। राजीव ने मुझे 1985 में गौरीगंज से चुनाव लड़ने के लिए कहा। लेकिन हम लोग चूंकि उड़ियार वाले (गुफाओं में रहने वाले) लोग ठहरे। अक्ल नहीं होती हम लोगों को। अब समझता हूं कि यदि 1985 में गौरीगंज जाकर चुनाव लड़ता तो मेरी सीनियरटी क्या होती। 1991 में मेरी इच्छा थी कि मैं लोकसभा चुनाव लड़ूं। लेकिन उसके बाद कई चीजें होती चली गई। उत्तराखण्ड आंदोलन शुरू हुआ तो उसमें लग गया। 2002 में मैंने पहली बार विधायक का चुनाव लड़ा। हालांकि 1993 में भी जितेंद्र प्रसाद जी और हरीश रावत जी ने मुझे विधानसभा लड़ने का ऑफर किया था। उस वक्त भी मैंने कहा कि मैं तो लोकसभा ही लड़ूंगा।

अपूर्व जोशी : आप राजीव गांधी के बहुत करीब रहे। क्या राज्य बनने के बाद सोनिया जी ने ही आपको उत्तराखण्ड भेजा?
नहीं, ऐसा नहीं है। मैं उत्तराखण्ड आंदोलन में था। आज प्रदेश में जो भी हो रहा है मैं उसके लिए अपने को भी दोषी मानता हूं, क्योंकि इसके लिए मैंने कई प्रयास किए थे। इंद्रमणी बडोनी जी एक बार मुझे आकर मिले और कहे कि कुछ करो। तब वीपी सिंह प्रधानमंत्री थे। हम उनसे मिलने के लिए दिल्ली आए, पर कुछ कारणवश नहीं मिल पाए। फिर नरसिम्हा राव के दौरान भी बड़ोनी जी ने मुझे कहा। मेरा नरसिम्हा राव से ज्यादा कुछ नहीं है, ऐसा मैंने उन्हें बताया। इस पर बडोनी जी ने कहा राजेश पायलट से मिलवा दो। तब मैंने राजेश भाई से बात की। राजेश भाई ने मुझे यही सलाह दी कि तुम कांग्रेस की राजनीति करो, कहां अलग राज्य के चक्कर में लगे हो। लेकिन मैंने उन्हें समझाया। दो बार बड़ोनी जी के नेतृत्व में डेलिगेट्स राजेश पायलट से मिले। दूसरी बार खाना खाने के बाद बडोनी जी बोले कि खाना तो खा लिया, मगर बात कुछ हुई नहीं। तब राजेश भाई ने उन्हें कहा कि आप लोग आंदोलन शुरू करो। इसके बाद बडोनी जी आदि लोगों ने पौड़ी में आंदोलन शुरू किया। आंदोलन तेजी से बढ़ता गया। इसलिए आज उत्तराखण्ड में कुछ गलत होता है तो मैं अपने आपको दोषी मानता हूं।

अपूर्व जोशी : राज्य बना। पहली निर्वाचित तिवारी सरकार में आप औद्योगिक विकास मंत्री बने। मगर उस वक्त आप औद्योगिक विकास से ज्यादा तिवारी सरकार को अस्थिर करने में लगे रहे?
जब हरीश रावत जी प्रदेश अध्यक्ष बने उस वक्त हमारे साथ कोई नहीं था। मेरे पास एक ब्लू रंग की मारूति 800 थी। मैं ही चपरासी था, क्लर्क से लेकर ड्राइवर तक था। प्रदेश अध्यक्ष जी और मैं अकेले उस गाड़ी से घूमे। दिन-रात एक करके मेहनत की। फिर चुनाव का समय आया। टिकट बांटने के दौरान भी बहुत सी चीजें हुई। हरीश रावत जी का मैं अभारी हूं कि वे मेरा नाम सीआईसी तक ले गए, क्योंकि किसी ने मेरा नाम देवप्रयाग से कर दिया था। तब सोनिया जी को मीटिंग में वे बोले कि ये टिहरी से लड़ना चाहता था। अध्यक्ष का इतना कहना ही काफी था। विधानसभा चुनाव के बाद हरीश रावत के साथ अंत तक 21 विधायक थे। उस वक्त तिवारी जी के साथ बहुत कम विधायक ही थे। मैंने हरीश भाई को बोला भी कि मुझे कुछ गड़बड़ लग रही है। कहीं तो मैं बात करूं, मगर वे बहुत ही ज्यादा आश्वस्त थे कि मुझे ही मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। लेकिन फैसला तिवारी जी का हो गया। भाई साहब तो वसंत कुंज में अपने घर जाकर लेट गए। मैं रात में गया और हरीश रावत जी से कहा भाई क्या है, ठीक है, क्या करें? तब हरीश रावत जी ने कहा, नहीं कुछ नहीं इसमें एक ही तरीका है कि हम अलग हो जाएं। उधर प्रमोद महाजन जी सक्रिय हो गए थे। उन्होंने मुझे भी फोन किया किया कि आप चाहें तो दिल्ली आ जाओ, राज्यसभा आ जाओ। प्रमोद महाजन ने मुझे यही कहा कि हरीश आपकी बात मान सकता है। आप बात करो। मैंने प्रमोद जी से कहा कि मैं विधायकों के नाम लिखवाता हूं। 10-15 नाम हमने बताए और कहा कि इन्हें अपना हीरा, पन्ना या प्रधानमंत्री की कुर्सी भी दे दोगे तो तब भी ये पार्टी नहीं छोड़ेंगे। 27 साल की उम्र में हरीश रावत जी को कांग्रेस ने सांसद बनाया। इस छोटी सी घटना पर यदि वे पार्टी छोड़ देंगे तब तो दुनिया ही पलट गई। मैंने कहा कि हीरा सिंह बिष्ट, गोविंद सिंह कुंजवाल, महेंद्र सिंह माहरा और सबसे अंत में मेरा नाम लिखो जो कदापि कांग्रेस नहीं छोड़ सकते। तिवारी जी शपथ लेने जा रहे थे। एक कांग्रेस मैन के नाते मेरा फर्ज बनता है कि कोई रास्ता निकालें। मैं रात में 11 बजे सोनिया जी के आवास पर गया। पिल्ले साहब थे। मैंने उन्हें कहा, सोनिया जी से मिलना है। उन्होंने कहा मैडम तो सोने चली गई हैं। मैंने उन्हें बताया हम उनके बच्चे की तरह हैं। उनके साथ 1984 से पहले से काम कर रहे हैं। आप उन्हें बता दो कि बहुत जरूरी मिलना चाहते हैं। खैर, उन्होंने बताया तो वे आईं। उन्होंने पूछा क्या है। मैंने कहा कि तिवारी जी शपथ लेने जा रहे हैं। 21 विधायक उनके साथ नहीं हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि वे कहीं और चले जाएंगे। लेकिन यदि वे शपथ ग्रहण में नहीं गए तो संदेश तो यही जाएगा कि तिवारी जी के साथ बहुमत नहीं है। सोनिया जी ने ऑब्जर्वर को फोन किया। उन्होंने सोनिया जी को कहा ये लोग दबाव बनाने आए हैं। सोनिया जी ने मुझसे कहा तुम्हारा ऑब्जर्वर तो यह कह रहा है। मैंने कहा कि पहली बात तो यह है कि हम आपके निर्णय का सम्मान करते हैं। दूसरा हमारी रक्षा तिवारी जी से करा दीजिएगा। इनको जबरदस्ती थोपा गया है। जबकि उन्हें थोपा नहीं गया था, बल्कि खुद तिवारी जी की इच्छा थी कि वे मुख्यमंत्री बनें। मैंने तिवारी जी को यह बोला भी। देखिए राजनीति अपनी जगह है और व्यक्तिगत संबंध अपनी जगह मैं कभी नहीं चाहूंगा कि उनका कोई नुकसान हो।

अपूर्व जोशी : क्या यह सच है कि सोनिया जी उस समय हरीश रावत को पसंद नहीं करती थीं?
यदि पसंद नहीं करती तो फिर उन्हें अध्यक्ष क्यों बनातीं। कुछ लोगों ने तब यह भी कहा कि सोनिया जी प्रधानमंत्री बनना चाहती थी। तिवारी जी उनके सामने रोड़ा हो सकते थे, इसलिए उन्हें उत्तराखण्ड भेजा। यह सब गलत है। सच यही है कि तिवारी जी स्वयं उत्तराखण्ड जाना चाहते थे। जिसके लिए उन्होंने अलग-अलग माध्यम से सोनिया जी के पास संदेश भिजवाया। फोतेदार जी के माध्यम से संदेश भिजवाया कि एक बार तिवारी जी से भी पूछ लिया जाए कि वे तो नहीं जाना चाहते हैं। दूसरा वे सीनियर लीडर थे। तीसरा सतपाल महाराज एकदम से हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाए जाने के विरुद्ध थे। उन्होंने वीटो कर दिया था कि यदि हरीश रावत बनेंगे तो मैंने नहीं रहूंगा।

अपूर्व जोशी : मगर मेरा सवाल था कि आप लोग पूरे पांच साल तक तिवारी जी के लिए समस्या पैदा करते रहे?
नहीं। कई और भी मसले थे। मेरे जैसे लोगों को टिहरी की जनता ने दो बार विधायक बनाया। मैं वहां के लोगों का आभारी हूं। तिवारी जी ने मेरे ऊपर शूरवीर सिंह सजवाण को बैठा दिया। टिहरी पर आप कोई बैठक लेंगे और विधायक को नहीं बुलाएंगे। तो इससे खराब बात और क्या होती। मैंने उसका विरोध किया था। पुनर्वास का मसला था। मैं तो टिहरी बांध ही नहीं बनने देना चाहता था। मेरा मानना है कि गंगा के साथ इतनी जनभावना जुड़ी हुई है। इसलिए उसके साथ कोई प्रयोग नहीं करना चाहिए। इस प्रकार अलग-अलग मुद्दों पर झगड़ा बढ़ता गया। मगर मैंने कभी सरकार गिराने का काम नहीं किया। एक बार तिवारी जी ने मेरे पितातुल्य व्यक्ति के सामने मेरे बारे में कहा कि अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। तो मुझे लगता है कि जब मैं अमेठी का काम देखता था और तिवारी जी मुख्यमंत्री थे तो शायद मेरी कोई बात उन्हें चुभ गई होगी। एक और चीज, राजनीति में वाद चलता है। उन्हें भी लगा होगा कि ब्रह्मणवाद के कारण किशोर मेरे साथ आएगा। मगर मैं हरीश रावत के साथ मजबूती से खड़ा रहा। उससे भी वे नाराज हो सकते थे। एक समय आया जब लोगों ने तिवारी जी की सरकार गिरानी चाही तो मेरे पास भी आए। इस पर मैंने कहा कि भाई सरकार तो मैं नहीं गिराऊंगा। कोई रास्ता निकालते हैं। मैं दिल्ली आया। रास्ता यह निकला कि तिवारी जी दिल्ली आएंगे और हरीश रावत मुख्यमंत्री बनेंगे। सब तय हो गया था। फिर क्या हुआ। तिवारी जी 10 जनपथ गए और वहां कहा कि मैं कुछ दिन और उत्तराखण्ड की सेवा करना चाहता हूं।

अपूर्व जोशी : आप क्या मानते हैं कि अध्यक्ष के रूप में हरीश रावत ने तिवारी सरकार को मजबूती दी?
देखिए राजनीति में हर कोई मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनना चाहता है। राजनीतिक व्यक्ति की निश्चित रूप से महात्वाकांक्षा होती है। हरीश रावत जी की महात्वकांक्षा रही होगी। मगर हमने तिवारी जी को काम करने में कभी परेशान नहीं किया। हम कभी सरकार गिराना नहीं चाहते थे। हम तो चाहते थे कि वे दिल्ली आ जाएं। यदि वे दिल्ली में होते और सोनिया जी प्रधानमंत्री नहीं बनती तो वे प्रधानमंत्री होते। उन्होंने बहुत बड़ी गलती की।

दाताराम चमोली : दिल्ली में सोनिया जी के करीबी चाहते थे कि तिवारी जी दिल्ली न आएं, क्योंकि यदि वे दिल्ली आ जाते तो गांधी परिवार के करीब रहते। इसलिए वे लोग ही चाहते थे कि तिवारी जी उत्तराखण्ड में रहें, क्या ऐसा था?
वे बड़े लोग हैं। मैं यह नहीं जानता। लेकिन अंत में 2007 के एक-डेढ़ साल पहले यह तय हो गया कि तिवारी जी दिल्ली आएंगे और हरीश रावत मुख्यमंत्री बनेंगे। आपके सवाल का जवाब इसी में है। यदि बड़े नेता नहीं चाहते होते तो यह तय कैसे होता।

अपूर्व जोशी : आप और हरीश रावत ने लंबे समय तक एक होकर काम किया। दोनों करीबी रहे। कहा जाता है कि जब वे मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने ही आपको प्रदेश अध्यक्ष बनवाया। अध्यक्ष बनते ही आप उनके खिलाफ हो गए, क्यों?
मेरे साथ अजीब हुआ। मैं क्या था और कहां पहुंचा। इसलिए मैं कहता हूं कि मैं भाग्य में विश्वास करता हूं। 1984 में जब राजीव जी प्रधानमंत्री की शपथ लेने वाले थे तो उन्होंने कहा था कि उस समारोह में किशोर उपाध्याय जरूर रहेगा। मेरे जैसा नालायक उसके बाद राजीव जी से कभी मिला ही नहीं। वो तो 1989 में मेरे एक मित्र ने कहा, चलो राजीव जी से मिलते हैं। तब मैं उनसे मिलने गया। जिनकी एक बोली से मुख्यमंत्री बनते और बिगड़ते हों, मैं तो नालायक था कि उनका लाभ नहीं ले पाया और सिस्टम से बाहर हो गया। मुझे लगता है कि 12 या 13 बार मेरे साथ ज्यादती हुई। 1991 में लोकसभा का टिकट मिलना चाहिए था। तब से लेकर 2002 तक कोई टिकट नहीं मिला। 2002 में मेरे योगदान के मुताबिक मुझे कैबिनेट मंत्री होना चाहिए था। मैं मानता हूं कि उस चुनाव में चेहरा हरीश रावत का था, मगर उसके पीछे रणनीति किशोर उपाध्याय की थी।

अपूर्व जोशी : आपको 2002 में राज्यमंत्री क्यों बनाया। क्या हरीश रावत ने आपका स्टैंड नहीं लिया?
बिल्कुल। उन्हें स्टैंड लेना चाहिए था। 2004 में भी उन्हें मेरे लिए स्टैंड लेना चाहिए था। यह मैं वैसे ही नहीं कह रहा हूं। आखिर मैंने पार्टी के लिए जीवन लगा दिया।

अपूर्व जोशी : आखिर हरीश रावत ने स्टैंड क्यों नहीं लिया?
यह तो हरीश रावत ही बतायेंगे। वही इसका जवाब दे सकते हैं। मैं नहीं दे सकता।

अपूर्व जोशी : मगर अध्यक्ष बनाने में तो उनका योगदान बताया जाता है?
पांच साल बहुगुणा जी ने और 2012 से 2017 के बीच पांच साल हरीश रावत जी ने मेरा समय बर्बाद कर दिया। इसका जवाब हरीश रावत जी दे सकते हैं कि क्या किसी को अध्यक्ष बनाना उनके अधिकार क्षेत्र में है। क्या किशोर उपाध्याय सोनिया गांधी- राहुल गांधी को नहीं जानता या वे मेरे योगदान को नहीं जानते। उनसे सहमति ली गई होगी। उन्होंने सहमति दी। इसके लिए आभारी हूं। लेकिन सिर्फ यह कहा जाएगा कि हरीश रावत जी ने ही मुझे अध्यक्ष बनाया तो मैं समहत नहीं हूं। यदि उन्होंने कंधा लगाया तो मैंने भी तो उन्हें बनाने के लिए कंधा लगाया था न। हमारा सब कुछ अच्छा चल रहा था। देश में पहली बार मुख्यमंत्री और अध्यक्ष का इतना अच्छा कॉम्बीनेशन था। ब्राह्मण-ठाकुर, गढ़वाल-कुमाऊं के बाद हम दोनों एक साथ थे। लोगों को लग रहा था कि हम चमत्कार करेंगे। हमने किया भी।

अपूर्व जोशी : अलग होकर?
अलग होकर नहीं। नरेंद्र मोदी के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पहली बार हमने ही उत्तराखण्ड में रोका। एआईसीसी मीटिंग में मैंने यह बात कही। हरीश रावत जी दुर्घटना के बाद घायल पड़े थे। हम तीनों सीट पर उपचुनाव जीते। गड़बड़ यहां पर हुई कि जब हम उपचुनाव जीते तो ‘अमर उजाला’ ने जीत पर एक समीक्षा लिखी। उन्होंने लिखा कि उत्तराखण्ड में हरीश रावत और किशोर उपाध्याय का डेडिकेटेड कॉम्बीनेशन बन गया है। भाजपा को यह जोड़ी यहां से उखाड़ फेंकेगी। इसका क्रेडिट दोनों को जाता है। मुझे लगता है हरीश रावत जी को वो भाषा अच्छी नहीं लगी। वहीं से डिफरेंसेज शुरू हुआ। मुझे नहीं कहना चाहिए। उस चुनाव में जिस व्यक्ति ने हमें सबसे ज्यादा मदद की हरीश भाई ने उन्हें सबसे पहले हटा दिया। वह भी मंत्री के कहने पर। हो सकता है उनको लगता हो कि उत्तराखण्ड में यदि कांग्रेस है तो मेरी वजह से है। उसके बाद पहली बार राज्यसभा का फैसला हुआ, मैंने स्वीकार किया। दूसरी बार फैसला हुआ, मैंने स्वीकार किया। तीसरी बार फिर राज्यसभा का फैसला किया गया, जबकि राहुल जी ने मेरी तारीफ की थी। उस निर्णय ने गढ़वाल-कुमाऊं, ब्राह्मण-ठाकुर का डिफरेंसेज पैदा कर दिया। क्यों ऐसा निर्णय हुआ, बता नहीं सकता। यह हरीश रावत और आलाकमान जानते होंगे। मगर पार्टी वर्कर को यह फैसला अच्छा नहीं लगा। पार्टी वर्कर को उस दिन लग गया कि हमें मार दिया गया है। कार्यकर्ताओं की निराशा के चलते उसी दिन हम चुनाव हार गए थे। हमारा वर्कर उसी दिन से घर में बैठ गया था।

अपूर्व जोशी : आपने एक बार कहा था कि केदारनाथ धाम में हरीश रावत ने आपसे राज्यसभा भेजने का वादा किया था। क्या यह सही है?
हम दोनों वहां साथ गए थे। यदि वे अब इससे मुकर जाएंगे तो मैं कुछ नहीं कह सकता। हम डबल स्टैंड नहीं कर सकते। हरीश रावत अध्यक्ष हैं तो उन्हें राज्यसभा जाना चाहिए। मगर किशोर उपाध्याय अध्यक्ष है तो उसे क्यों नहीं जाना चाहिए।

अपूर्व जोशी : हरीश रावत जी कहते हैं कि पार्टी अलाकमान का निर्णय था कि दलित को राज्यसभा भेजा जाए?
देखिए, पार्टी का निर्णय था या नहीं इस पर मैं नहीं कह सकता। हां, तब निर्णय लेने का अधिकार हरीश रावत जी का था। राहुल गांधी अध्यक्ष हैं। मैं उस पर भी कुछ नहीं कह सकता।

अपूर्व जोशी : व्यक्तिगत तौर पर आपका क्या विचार है?
निर्णय हरीश रावत जी का था?

प्रेम भारद्वाज : आपके अब तक के राजनीतिक कैरियर में सबसे बड़ा योगदान किसका रहा है?
मेरे कैरियर में सबसे बड़ा योगदान राजीव गांधी जी का है। जिन्होंने एक किसान के बेटे को पहचान दी। दूसरा यदि हरीश रावत जी सोनिया गांधी के पास मेरा नाम अध्यक्ष के लिए नहीं ले जाते तो शायद मैं अध्यक्ष नहीं बनता।

दाताराम चमोली : हरीश रावत ने राज्यसभा भेजने में आप पर भरोसा क्यां नहीं किया? प्रदीप टम्टा पर ज्यादा भरोसा क्यों किया?
इसका जवाब किशोर उपाध्याय के पास नहीं है। या फिर किशोर उपाध्याय अतिविश्वास का शिकार हो गया।

दाताराम चमोली : कहीं ऐसा तो नहीं कि हरीश रावत प्रदीप टम्टा को आपसे ज्यादा योग्य मानते हों?
ये तो वही जान सकते हैं।

गुंजन कुमार : आपने कहा आपको राज्यसभा नहीं भेजने के दिन ही कांग्रेस वर्कर घर बैठ गया। घर बैठने वाले वर्कर सिर्फ गढ़वाल क्षेत्र के थे या पूरे प्रदेश के?
पूरे प्रदेश के वर्कर।
गुंजन कुमार : गढ़वाल के एक नेता को राज्यसभा नहीं भेजने से कुमाऊं के वर्कर क्यां नाराज होंगे?
हमने इस तरीके से कभी सोचा नहीं कि गढ़वाल और कुमाऊं अलग हैं। मैं तो जनता और वर्कर का आभारी हूं कि उसके बावजूद उन्होंने वही प्यार और स्नेह मेरे साथ रखा। अल्मोड़ा के लोगों ने प्यार दिया। एक भावना बन जाती है। वर्कर की भावना होती है कि हमारे अध्यक्ष इतना मेहनत कर रहे हैं तो उन्हें आगे जाना चाहिए और उनकी भावना के उलट निर्णय होता है तो वर्कर को चोट पहुंचती है। इसलिए भावना बड़ी चीज है। पार्टी का वर्कर सेना का जवान है।

गुंजन कुमार : वर्कर की भावना की जानकारी 2017 में चुनाव हारने के बाद मिली?
मैंने तो उसी दिन कह दिया था।

गुंजन कुमार : राज्यसभा के निर्णय से लेकर 2017 के चुनाव में एक-डेढ़ साल का समय था। जब आपको वर्कर की भावना का पता पहले दिन ही चल गया तो प्रदेश अध्यक्ष के नाते उनकी नाराजगी दूर करने की चेष्टा क्यों नहीं की। या आपने पार्टी को हराने के लिए हवा दी?
मैं क्या हवा देता। मैं तो शांत हो गया। मैं दो बार राहुल जी के पास इस्तीफा लेकर गया। एक बार जब सरकार गिरी और दूसरी बार जब हम हार गए। मैं उनका आभारी हूं कि उन्होंने मेरा इस्तीफा स्वीकर नहीं किया।

गुंजन कुमार : संगठन का आपको लंबा अनुभव रहा है। फिर भी आपके अध्यक्ष रहते पार्टी में बड़ी टूट हुई। क्या वह आपकी नाकामयाबी नहीं थी?
जब सरकार होती है तो अध्यक्ष के हाथ में ज्यादा कुछ होता नहीं है। मुख्यमंत्री ज्यादा ताकतवर होते हैं। मेरे ख्याल से इसकी शुरुआत अमृता रावत को मंत्री पद से हटाकर नया मंत्री बनाने से हुई है। उसके बाद बात बढ़ती गई। मैं मानता हूं कि मेरे अध्यक्ष रहते पार्टी में टूट हुई। मैंने नैतिक जिम्मेदारी ली और तत्कालीन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष को अपना इस्तीफा भी दिया। मैं इस प्रयास में था कि अमृता जी को यदि हटाया गया तो सतपाल महाराज या बहुगुणा जी के किसी करीबी को मंत्री पद देते। दूसरा दो खाली मंत्री पद को भरने में समय लगाया। तीसरा यह हुआ कि पीडीएफ कहां है? पूछा गया। उन्होंने कहा हम और पीडीएफ साथ हैं, जबकि मेरा स्टैंड था कि यदि पीडीएफ नेता हमारे सिंबल पर चुनाव लड़ते हैं तो ठीक है नहीं तो हम उनके साथ नहीं हैं। लेकिन क्या हुआ, आप सभी ने देखा।

दाताराम चमोली : उपचुनाव में तीन सीट जीतने के बाद कांग्रेस पूर्ण बहुमत में आ गई थी। फिर पीडीएफ को साथ रखने की हरीश रावत की क्या मजबूरी थी?
यह तो हरीश रावत ही बता सकते हैं। उनका कहना यह था कि हमारी राष्ट्रीय पार्टी है। इससे संदेश ठीक नहीं जाएगा। जब हम संकट में हैं तो साथ लाते हैं और संकट खत्म होने पर उन्हें हटा देते हैं। इसका मैंने समर्थन किया।

दाताराम चमोली : आप टिहरी से चुनाव क्यों नहीं लड़े?
मैं पांच साल से टिहरी नहीं गया था। इसलिए वह हमारा क्षेत्र नहीं हो सकता था। मैंने हाईकमान को कह दिया था कि जिसका हक बनता है, उसे टिकट दिया जाए। मैं यदि हक बनने वाले के हक की रक्षा नहीं कर सकता, तो काहे का अध्यक्ष। मैंने कहा यह अच्छी बात नहीं। इन लोगों ने ही निर्णय लिया और क्षेत्र का चयन भी इन्हीं लोगों ने किया।


आदेश भाटी : आपने कहा राज्यसभा घटना के बाद पार्टी कार्यकर्ता नाराज होकर घर बैठ गए। क्या उनकी नाराजगी खत्म हुई या अभी भी बरकरार है?
मैं निवर्तमान अध्यक्ष हूं। मैं आज वर्तमान अध्यक्ष के कार्यकाल की बात करूं तो यह अच्छी बात नहीं होगी। मैं इस सबसे अलग होकर उत्तराखण्ड के सवाल पर आजकल काम कर रहा हूं। मैं आजकल वन अधिकार पर काम कर रहा हूं। हम पहले आत्मनिर्भर थे। नमक और गुड़ के अलावा हम बाकी सब चीजें अपने क्षेत्र में तैयार करते थे। हमने तीन बार गलती की। 1947 में जब संविधान में कहा गया हरिजन और गिरीजन को समान अधिकार। तो हम हरिजन के समान अधिकार क्यों नहीं ले पाए? 1971-72 में दूसरी गलती हुई जब वन कानून (फॉरेसट एक्ट) बना। तब भी हमने लड़कर अपने अधिकार की रक्षा नहीं की। जब मैं तिलाड़ी गया तब पता चला कि हमारे पूर्वज कितना कुछ हमारे लिए छोड़ गए। मगर हम उसकी रक्षा नहीं कर पाए। हमारे पास 72 फीसदी क्षेत्र वन है। फिर भी आप हमें वनवासी नहीं मान रहे हो। यह अच्छा नहीं है।

आकाश नागर : जब आपकी सरकार थी तक सचिवालय के चौथे तल पर एक नेता बहुत पॉवरफुल थे। मुख्यमंत्री उन्हीं के कहे निर्णय लेते थे। आपने क्या महसूस किया?
मुझे नहीं लगता कि हरीश रावत जी किसी के कहने पर कोई निर्णय लेते हैं। वे अपने आप निर्णय लेते हैं। यह परसेप्शन ठीक नहीं है।

गुंजन कुमार : मैं फिर से पार्टी की टूट पर आता हूं। टूट के लिए क्या हरीश रावत जिम्मेवार थे।
नहीं।

गुंजन कुमार : पार्टी अध्यक्ष (आप) नहीं, मुख्यमंत्री (हरीश रावत) नहीं, तो फिर कौन?
जिसको पार्टी उनके हक से ज्यादा दे देती है वही टूट का कारण बनते हैं।

गुंजन कुमार : ज्यादा देने की गलती किसने की?
आप देखिए न। जो उस समय के पहले मुख्य मंत्री थे, उनसे ज्यादा काम किशोर उपाध्याय ने राज्य के लिए किया। फिर भी मैं मुख्यमंत्री नहीं बना। और वे लोग जिनका योगदान कम था कहीं ज्यादा पा गए। इन ज्यादा पाने वालों ने ही पार्टी छोड़ी। राजनीति में महत्वाकांक्षा तो होनी चाहिए, प्रतिद्वंदिता भी चल सकती है, मगर दुश्मनी नहीं।

गुंजन कुमार : किसको, किससे दुश्मनी थी?
यदि सतपाल महाराज जी ये समझें कि हरीश रावत मेरे दुश्मन हैं तो पार्टी में यह अच्छा नहीं है। मुझे लगता है, उस मानसिकता ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया है।

अपूर्व जोशी : 2002 में हरीश रावत नहीं आए। 2012 में क्या हुआ कि हरीश पुनः मुख्यमंत्री नहीं बनाए गए। उनके सामने विजय बहुगुणा आ गए?
यह मिलियन डॉलर का सवाल है। इसका जवाब मेरे पास भी नहीं है। दअरसल उस वक्त मैं बाहर था। मुझे कहीं से पता चला कि प्रभारी किसी सांसद को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं। तब मैंने कहा था कि यदि सांसद में से बनाना है तो हरीश रावत को बनाना चाहिए। यदि विधायक में से बनाना है तो पार्टी से ज्यादा काम सीएलपी ने किया। दो लोगों ने तब सबसे ज्यादा आंदोलन किया था। एक मैं दूसरा हरक सिंह रावत, तो मैंने हरक का नाम लिया। यदि अध्यक्ष को बनाना है तो यशपाल आर्या को बनाना चाहिए। यदि महिला को बनाया है तो इंदिरा हृदयेश को बनाएं। मगर इनमें से कोई का बनकर विजय बहुगुणा बने। यह कैसे हुआ, मुझे नहीं पता।

गुंजन कुमार : तब तो चर्चा थी कि पेटी से मुख्यमंत्री बनाया गया?
इसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता।

आदेश भाटी : तो क्या उस वक्त पार्टी का निर्णय गलत था?
कांग्रेस वर्कर के नाते पार्टी के किसी निर्णय को किशोर उपाध्याय गलत नहीं कह सकता। किशोर उपाध्याय को तीन बार राज्यसभा के लिए कंसीडर नहीं किया गया। 2014 में लोकसभा के लिए कंसीडर नहीं किया, फिर भी मैं इसे पार्टी का गलत निर्णय नहीं कहूंगा।

गुंजन कुमार : आज कांग्रेस में बड़े नेताओं की कमी है, मगर पार्टी में गुटबाजी कम नहीं हुई है, क्यों?
गुट हर जगह रहते हैं। परिवार में भी रहता है। परिवार में चार भाई हैं वहां भी गुट होता है। लेकिन कांग्रेस का सौभाग्य रहा है कि पार्टी उससे मजबूत हुई है।


गुंजन कुमार : कांग्रेस की हार का कारण भी गुटबाजी मानी जाती है?
हमारे मन में गुट हो, लेकिन पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता भी हो। जिस तरह दस लोग पार्टी को छोड़कर गए, इस तरह का गुट नहीं होना चाहिए। इस तरह का गुट पार्टी को नुकसान पहुंचाता है। मैंने कहा कि मुझे हराने के लिए किसने क्या-क्या किया। यह मानसिकता ठीक नहीं है। मैं मानता हूं कि पार्टी में गुट हैं। लेकिन अब उस तरह से गुट नहीं हैं, जैसे पहले थे। मैंने प्रीतम सिंह को कहा है कि पार्टी ने आपको अध्यक्ष बनाया है। किशोर उपाध्याय शत- प्रतिशत पार्टी के निर्णय के साथ है और रहेगा।

गुंजन कुमार : कुछ दिनों पहले तक चर्चा थी कि आप, प्रीतम सिंह, इंदिरा हृदयेश पार्टी के त्रिमूर्ति हैं और यह त्रिमूर्ति हरीश रावत के सामने खड़ी है। क्या यह सही है?
कोई किसी को रोक नहीं सकता। हरीश रावत, विजय बहुगुणा, सतपाल महाराज को पार्टी ने बनाया है। हम सबको पार्टी के बारे में सोचना चाहिए। यदि कोई समझता है कि वह पार्टी से बड़ा है, तो उसकी हालत किशोर उपाध्याय जैसी हो जाएगी।

गुंजन कुमार : सरकार गिरने के बाद जौली ग्रांट हवाई अड्डे पर हरीश रावत जी एक पत्रकार के साथ अपनी सरकार फिर से बहाल करने का प्रयास कर रहे थे। मेरा सवाल यह है कि वह प्रयास हरीश रावत का व्यक्तिगत था या पार्टी ने उन्हें निर्देश दिया था?

इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी, क्योंकि जिस वक्त उस सीडी को लेकर बीजेपी दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही थी उस वक्त एआईसीसी में अंबिका जी के साथ प्रेस को मुझे एड्रेस करना था। उसके ठीक पहले बीजेपी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसका मतलब यह है कि वह सोच-समझ कर किया गया था। मैंने उसी वक्त रावत से जी बात की कि यह क्या है? उसका हम लोगों ने पॉलिटिकल जवाब दिया। इसलिए इस बारे में मुझे जानकारी नहीं है। जितने भी लोग पार्टी छोड़कर गए किशोर उपाध्याय ने विजय बहुगुणा से लेकर सभी से बात की कि ऐसा न करें। आप थोड़ा धैर्य रखिए।

दाताराम चमोली : जब आपने बहुगुणा को धैर्य रखने के लिए कहा, तब बहुगुणा ने आपको क्या कहा।
तब उन्होंने कहा कि आप हरीश रावत को बदल दीजिए। फिर हम इस पर विचार कर सकते हैं।

दाताराम चमोली : आप यह कहना चाहते हैं कि हरीश रावत के कारण यह सब हुआ?
हरीश रावत जी के कारण नहीं हुआ। मैं तो वह बता रहा हूं जो बहुगुणा जी ने कहा। यह जरूरी नहीं है कि जो विजय बहुगुणा जी ने कहा वह शत-प्रतिशत सही कहा होगा। इसलिए मैं कहता हूं कि हवाई अड्डे वाले प्रकरण की मुझे कोई जानकारी नहीं थी।

गुंजन कुमार : प्रदेश अध्यक्ष को जानकारी नहीं थी। मतलब यह हरीश रावत का व्यक्तिगत प्रयास था?
फ्यूडल सिस्टम में जब राजा का राजपाट चला जाता है तो वह अपने प्राण देकर भी राज-पाट बचाता है। मैं उसे गलत नहीं मानता। उस दौरान दोनों में क्या बात हुई, उससे आप सहमत -असहमत हो सकते हैं। लेकिन अपनी सरकार को बचाने के लिए एक मुख्यमंत्री के प्रयास से आप असहमत नहीं हो सकते।

आकाश नागर : आपकी पार्टी की सरकार (विजय बहुगुणा सरकार) के दौरान टिहरी विस्थापितों को ऋषिकेश में मिली जमीन में घोटाला हुआ। तब आपने एक बार भी टिहरी विस्थापितों के लिए आवाज नहीं उठाई?
मैं राजनीति में आने से पहले टिहरी आंदोलन में रहा हूं। 1982 में मैं इन लोगों को राजीव जी से मिलवाने ले गया। उस समय 15 दिन हिमाचल प्रदेश में रहा और वहां बांध विस्थापितों को देखा। तब समझ में आया कि इतने दिनों में इनकी समस्या खत्म नहीं हुई। यहां भी यही होने वाला है। तब मैं आकर टिहरी में महापंचायत करने लगा। उसका अच्छा संदेश गया। सरकार पर दबाव बना। सबसे ज्यादा बेमानी टिहरी विस्थापितों के साथ हुई है। आप देखेंगे कि 18 जीओ टिहरी विस्थापितों के लिए बने हैं। जिनमें परिवार के एक सदस्य को नौकरी। विस्थापितों से पानी-बिजली का बिल नहीं लिया जाएगा। तीसरा, जहां विस्थापितों को पुनर्वासित किया जाएगा, वहां उन्हें सारी सुविधाएं देंगे। तीनों में से एक भी पूरी नहीं हुई। मैं हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब तक अंतिम व्यक्ति का पुनर्वास नहीं हो जाता आप सुरंग बंद नहीं करेंगे। आज भी सभी का पुनर्वास नहीं हुआ है। लेकिन सुरंग बंद कर दी गई। तिवारी जी से मेरे डिफरेंसेज पुनर्वास को लेकर हुए। मैं हमेशा लड़ता रहा। जिसका पॉलिटिकल खामियाजा मुझे भुगतना पड़ा। सिर्फ आमबाग ही नहीं इस तरह की जहां-जहां भी जमीने हैं सभी जगह इसी तरह का घोटाला हुआ है। आज टिहरी विस्थापित भीख मांगने के कगार पर आ गए हैं। उन सभी घोटालों की जांच होनी चाहिए। उस समय आम बाग की जांच क्यों रोकी गई। इसके बारे में सरकार ही कुछ कह सकती है?

आकाश नागर : उसके आपकी हरीश रावत की सरकार आई फिर भी आप चुप रहे।
दाताराम चमोली : सरकार ने तो जीओ लाकर विस्थापितें की जमीनें बेचने को और आसान बना दिया?
देखिए, मैं कभी चुप नहीं रहा। मैं पुनर्वास के मुद्दे को लेकर विधानसभा के अंदर ही आंदोलन पर बैठा। वहां से जब कुर्ता फाड़कर मुझे बाहर फेंका गया तो चंबा में बैठा। मुझे लगता है। लोग मेरी भावना को समझ नहीं पाए या हम उन्हें समझा नहीं पाए। हमें उतना समर्थन नहीं मिला जितनी अपेक्षा थी। कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि तिवारी जी का हाथ पकड़कर मैं टिहरी में हॉर्टिकल्चर की यूनिवर्सिटी लेकर गया। दो महीने यूनिवर्सिटी वहां चली। जैसे ही बीजेपी की सरकार आई और वे उसे पौड़ी लेकर चल गए।


अपूर्व जोशी : प्रतिपक्ष का नेता बनाते समय आप युवा जोश की पैरवी कर रहे थे। आपने करण माहरा का नाम दिया था। एक तरह से इंदिरा जी का रास्ता रोक रहे थे। क्या यह सही है?
अध्यक्ष के रूप में मुझे अपनी बात रखनी चाहिए। मैंने हाईकमान के सामने कहा था कि यदि महिला को बनाना चाहते हैं तो इंदिरा हृदयेश ने सरकार चलाने में बहुत मदद की थी। यदि उनसे कुछ अलग पर विचार कर रहे हैं तो गोविंद सिंह कुंजवाल वरिष्ठ नेता हैं। यदि आप किसी युवा के बारे में सोच रहे हैं तो करण माहरा जी मेरे पास आए थे। वे इच्छा रखते हैं। यदि मेरी इन बातों को कोई यह सोचे कि मैं किसी का रास्ता रोक रहा था तो यह गलत है।

अपूर्व जोशी : त्रिवेंद्र सरकार खनन, एनएच-74 से लेकर कई मुद्दे हैं, जिनमें घिर रही है। मगर आप लोग सरकार के विरोध में कहीं नजर नहीं आ रहे हैं?
मैंने पहले भी कहा कि मेरे सक्सेसर जो हैं, वह ठीक काम कर रहे हैं या नहीं यह कहूं तो यह ठीक बात नहीं होगी। इंदिरा हृदयेश विधानसभा में मुद्दे उठा रही हैं।

गुंजन कुमार : विधानसभा नहीं आप सड़क पर आंदोलन करते कहीं नजर नहीं आ रहे हैं?
बहुत सारे प्रोग्राम पार्टी ने किए हैं।

अपूर्व जोशी : क्या आपको लगता है कि अभी एक मजबूत विपक्ष की भूमिका कांग्रेस निभा रही है? केवल हरीश रावत सक्रिय नजर आते हैं?
हर चीज का एक समय होता है। व्यक्तिगत तौर पर हरीश रावत जी का हम आदर करते हैं। वे हमसे उम्र में भी बड़े हैं और वरिष्ठ भी हैं।

अपूर्व जोशी : आप लोग आपस में मिलते-जुलते नहीं है?
अभी तो राहुल जी ने बैठक बुलाई थी। उसमें सब लोग थे।

अपूर्व जोशी : वह तो राहुल गांधी ने बुलाया था?
प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में हम सब लोग एक साथ बैठे थे। ऐसा नहीं है कि हम बैठते नहीं हैं।

अपूर्व जोशी : यदि बैठते तो गोविंद सिंह कुंजवाल जैसे गांधीवादी नेता को जिला अध्यक्ष बनाने के लिए सार्वजनिक रूप से इस्तीफा देने की बात नहीं कहनी पड़ती?
कई त्रुटियां होती हैं। यह मानव स्वभाव है। यदि गलितयां नहीं होंगी तो हम भगवान हो जायेंगे। हो सकता है मुझसे, प्रीतम सिंह जी, गोविंद सिंह जी से कोई गलतियां हुई होंगी। उन सभी गलतियों को हम दूर करेंगे और एक मजबूत और सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाएंगे।


अपूर्व जोशी : पार्टी की बड़ी टूट और ऐतिहासिक हार के बावजूद हरीश रावत को महासचिव, असम प्रभारी आदि बनाने का क्या कारण?
मैंने सबसे पहले हरीश रावत के निर्णय का स्वागत किया। हमारा व्यक्तिगत मतभेद हो सकता है, प्रेम हो सकता है लेकिन जब राज्य की बात आती है तो उसमें मेरे ख्याल से विशाल हृदय रखना चाहिए। उत्तराखण्ड में मुख्यतः दो ही पार्टियां हैं। कांग्रेस यदि कोई निर्णय लेती है तो बीजेपी पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। नारायण दत्त तिवारी जी के बाद पहली बार पार्टी ने उत्तराखण्ड को इतना बड़ा सम्मान दिया है।

अपूर्व जोशी : क्या हाईकमान ने इशारा किया है कि 2022 में नेतृत्व हरीश रावत करेंगे?
2022 में क्या हो होगा यह अभी नहीं कह सकते। तब नेतृत्व कोई तभी करेगा जब हम अपने आप को सशक्त बना लें कि हम उत्तराखण्ड में सरकार बना लेंगे। नेतृत्व का जहां तक सवाल है तो कांग्रेस में एक परिपाटी है कि कांग्रेस अध्यक्ष निर्णय लेते हैं या चुनकर आए विधायक नेतृत्व पर फैसला लेते हैं। हमारे संविधान में दोनों व्यवस्थाएं हैं। ज्यादातर मामलों में विधायकों से राय लेकर निर्णय लेने की परंपरा रही है। उत्तराखण्ड में आज जो स्थिति है उस पर तो हम यही कहेंगे कि हम कितने भी नालायक हों मगर बीजेपी से तो बेहर ही हैं। कांग्रेस उत्तराखण्ड के हित के बारे में सोचती है। आज जो बीजेपी अपने विधायकों से पैसा इकट्ठा कर रही है, क्या वह सही है। उत्तराखण्ड के दो-चार विधायकों को छोड़ दें तो किसकी हैसियत 50 लाख रुपए देने की है। बीजेपी ने 25-25 करोड़ रुपए इकट्ठे किए और दिल्ली लेकर आ गए। किसी ने उस पर सवाल नहीं उठाया।

आकाश नागर : 2022 तो अभी दूर है। 2019 नजदीक है। कांग्रेस में लोकसभा के प्रत्याशी ढूंढे नहीं मिल रहे हैं। फिर कैसे आप सशक्त बनेंगे?
कांग्रेस के लिए बीजेपी कोई चुनौती है, ऐसा मैं नहीं मानता। इसका कारण मैं बताता हूं। 2014 में मोदी जी को जीत मिली, उसे मैं मोदी जी की जीत नहीं मानता। चुनावपूर्ण अन्ना जी, रामदेव, रविशंकर जी ने जो किया, उसका सम्मलित प्रोडक्ट नरेंद्र मोदी हैं। इस चुनाव में वे अकेले लड़ेंगे। उत्तराखण्ड में बीजेपी ने हमें नहीं हराया। हमने खुद को प्रदेश में हराया है। हमसे कुछ गलतियां हुई। बीजेपी में जो लोग गए वे कांग्रेस के ही थे। संसद में भी आप देखेंगे तो बीजेपी के सांसदों में से 40 फीसदी लोग बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा में विश्वास ही नहीं करते। वे दूसरे दलों से आए हुए हैं। विधानसभाओं में भी वही हैं। इसलिए हमारे लिए यदि चुनौती है तो कांग्रेस खुद में है। लोकसभा चुनाव में हमारे पास प्रत्याशी की कोई कमी नहीं है।

प्रेम भारद्वाज : आप लड़ रहे हैं?
मैं तो बहुत पहले से लोकसभा लड़ना चाहता हूं। लेकिन पार्टी कहेगी तब। पार्टी को अभी कहना चाहिए, क्योंकि हमारे पास समय नहीं है। पार्टी के पास संसाधन नहीं हैं। इसलिए पार्टी जिसे टिकट देना चाहती है, उसे अभी से कह देना चाहिए। तभी उम्मीदवार तैयारी करेगा। अगर पार्टी मुझे कहेगी तो निश्चित रूप से मैं लडूंगा। यदि पार्टी मुझे चुनाव नहीं लड़वाती है तो किशोर उपाध्याय जिस तरह अपना चुनाव लड़ता उसी तरह से दूसरे प्रत्याशी को चुनाव लड़वाएगा। इसलिए अभी जरूरत है, राहुल गांधी के नेतृत्व में एकजुट होकर चुनाव लड़ना। यदि हम एकजुट हो गए तो पांचों सीट आसानी से जीत सकते हैं। तीन-चार बिंदु ऐसे हैं, जिनका मोदी जी ने सिर्फ सपना दिखाया। किया कुछ नहीं। उन्होंने कहा ‘मां गंगा ने बुलाया है’ गंगा नदी के लिए क्या किया। अब तक वे कभी गंगोत्री देखने नहीं आए। ऑल वेदर रोड के लिए सवा लाख पेड़ काट लिए। ब्लास्टिंग कर रहे हैं। पर्यावरण का क्या होगा। क्या पहाड़ बचाया गया।

दाताराम चमोली : आपको ऑलवेदर रोड सही प्रोजेक्ट लग रहा है?
इससे वहां की इकोनॉमी खत्म हो जाएगी।

गुंजन कुमार : ऑलवेदर रोड से इकोनॉमी कैसे खत्म हो जाएगी?
देखिए, हमारे यहां तीर्थाटन है। जो लोग तीर्थ के लिए आते हैं। उनसे स्थानीय लोगों की इकोनॉमी जुड़ी हुई है। हमारे यहां रोजगार का सबसे बड़ा माध्यम ट्रांसपोर्ट है। ट्रांसपोर्ट में लगे लोग यात्रा सीजन के तीन-चार महीने में जो कमाई करते है उससे साल भर घर चलाता है। यही स्थिति छोटे-छोटे ढाबे वालों की भी है। ऑलवेदर रोड आते ही इनका रोजगार खत्म हो जाएगा। यदि आप हजारों रोजगार छिन जाने को विकास कहते हैं तो फिर मैं कुछ नहीं कह सकता।

दाताराम चमोली : आपकी सरकार ने भी तो स्थानीय घोड़े- खच्चर वालों की परवाह न करते हुए केदारनाथ के लिए हैलिकॉप्टर सेवाएं शुरू की। प्रशासन ने उनके रजिस्ट्रेशन से ज्यादा ध्यान हवाई सेवा पर दिया?
कहीं पर कुछ गलत होता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करता। जहां तक हैलिकॉप्टर की बात है तो हमने कहा आपदा क्षेत्र में कम से कम एक हैलीपैड बनाना चाहिए।

आकाश नागर : पिछले 18 सालों में परिवहन व्यवस्था हम सुदृढ़ नहीं कर पाए। रोजाना दुर्घटना और मौतें हो रही हैं, क्यों?
दुर्घटनाओं के तीन मुख्य कारण हैं। धुमाकोट और टिहरी में हुई बड़ी दुर्घटना का कारण था सड़क में गड्ढा। सबसे पहला कारण खराब सड़के हैं। उसके बाद मशीनरी है। उसको हम ठीक नहीं रखते। तीसरा कारण हम परिवहन व्यवस्था में लगी मेन पावर को सही ट्रेनिंग नहीं देते। किसी को भी ड्राइवर बनाकर गाड़ी दे दी जाती है। इस सबके अलावा हम पर्वतीय क्षेत्र के बारे में सम्रगता से नहीं सोचते हैं। हमारे पास मध्य हिमालय का विकास कैसे होना चाहिए, इसका कोई मॉडल नहीं है।

प्रेम भारद्वाज : पूरी बातचीत में आप दो स्थानों पर असहज हुए थे। एक तो जब आपने कहा 12-13 बार आपके साथ ज्यादती हुई है। दूसरी बार जब हरीश रावत का जिक्र आया तो क्यों आप असहज हुए?
जहां आदमी सबसे ज्यादा विश्वास करता है, वहां वह इस गलतफहमी में रहता है कि मैं इस विश्वास के काबिल हूं। लेकिन दूसरा उसे काबिल न समझे तब व्यक्ति के दिल, दिमाग और भावना को प्रभावित करता है।

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