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कांग्रेसी दिग्गजों हरीश रावत और इंदिरा हृदयेश के बीच पिछले कुछ महीनों से चली आ रही जंग इन दिनों कुछ ज्यादा ही तेज हो गई है। दोनों एक-दूसरे को दुश्मन की तरह देख रहे हैं। नैनीताल लोकसभा सीट से भाग्य आजमाने की चाहत में दोनों नेता एक-दूसरे पर भारी पड़ने की पुरजोर कोशिश में हैं। वर्चस्व की इस जंग में पार्टी के दो बड़े नेता भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। इनमें से एक किशोर उपाध्याय प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाल चुके हैं और दूसरे प्रीतम सिंह अभी संभाल रहे हैं। उपाध्याय हरीश रावत खेमे तो प्रीतम हृदयेश खेमे में सक्रिय हैं

उत्तराखण्ड विधानसभा के लिए पिछले वर्ष २०१७ में हुए चुनाव के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने ‘दि संडे पोस्ट’ से बातचीत में कहा था कि कांग्रेस अपने संक्रमण काल (ट्रांजिशन फेस) से गुजर रही है। ये दौर आने वाले समय में कांग्रेस के लिए सब कुछ सही कर देगा। ये वो समय था जब कांग्रेस के कद्दावर नेता पार्टी छोड़ भाजपा में शामिल हो गए थे। जिसकी परिणति २०१७ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की दुर्गति के रूप में हुई। पार्टी ११ सीटों पर सिमट गई। उस समय माना गया था कि कांग्रेस की अंतर्कलह ही कांग्रेस को ले डूबी। पार्टी कार्यकर्ताओं को अपेक्षा थी कि इस हार से बड़े नेता अपने मतभेद अब भुला देंगे। लेकिन डेढ़ साल बाद भी कहीं नजर नहीं आता कि बड़े नेता अब भी सबक लेने को तैयार हैं। यहां तक कि पार्टी में दो सबसे बड़े व्यक्तित्वों पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश की लड़ाई ने आम कांग्रेसी को असमंजस में डाल दिया है। नेताओं में वर्चस्व की जंग के चलते आम कार्यकर्ताओं के बीच सवाल उठ रहे हैं कि आखिर २०१९ की लड़ाई भाजपा से लड़नी है या फिर कांग्रेस नेताओं को आपस में ही भिड़ना है? जिस प्रकार पार्टी के अंदर एक दूसरे को निपटा देने की होड़ चल रही है, वो २०१९ के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को कहां खड़ा करेगी यह ऐसा यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर कांग्रेस के कद्दावर नेता देना चाहेंगे। आम कांग्रेसी इस सवाल से जूझ रहा है। शायद ही कांग्रेस के इन अंतर्विरोधों का असर पार्टी के निचले स्तर के कार्यकर्ताओं पर पड़ रहा है। इस लड़ाई में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत एक तरफ हैं तो नेता प्रतिपक्ष डॉ इंदिरा हृदयेश एवं प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह दूसरी तरफ हैं। हालांकि अपेक्षाकृत शांत स्वभाव के प्रीतम सिंह इस लड़ाई में पार्श्व में ज्यादा हैं, लेकिन अपने आक्रामक स्वभाव और जुझारू तेवरों के लिए जानी जाने वाली डॉक्टर इंदिरा हृदयेश इस बार मुखर दिखाई दे रही हैं और ऐसा लगता है कि वे जंग में जीतने का कोई मौका चूकना नहीं चाहतीं। राजनीतिक पंडित उनके ज्यादा मुखर होने की खास वजह यह मान रहे हैं कि २०१९ के लोकसभा चुनाव में नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट से दावेदारी में वे अपना कोई पक्ष कमजोर नहीं रखना चाहती हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि तमाम विरोध और उत्तराखण्ड महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष सरिता आर्या की पार्टी छोड़ने की धमकी के बावजूद भाजपा के बागी नेता हेम आर्या व उनकी पत्नी नीमा आर्या को कांग्रेस में शामिल कर इंदिरा हृदयेश नैनीताल जिले में कांग्रेस के अंदर अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करने में सफल रही हैं। हरीश रावत खेमे की मानी जाने वाली सरिता आर्या शुरू से ही हेम आर्या को कांग्रेस में शामिल करने के खिलाफ रही हैं। हालांकि बाद में उन्होंने अपना रुख नरम करते हुए अपनी उपस्थिति में हेम आर्या को पार्टी में शामिल करने की इच्छा जाहिर की, परंतु हृदयेश खेमे ने उन्हें यह अवसर भी नहीं दिया। लिहाजा अंततः सरिता की अनुपस्थिति में ही हेम आर्या कांग्रेस में शामिल हुए। डॉ इंदिरा हृदयेश की पहल पर हेम आर्या को कांग्रेस में शामिल किए जाने के अवसर पर हुए समारोह में हल्द्वानी में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह भी मौजूद रहे। इस अवसर पर हुई राजनीतिक बयानबाजियों ने कांग्रेस के अंदर शीर्ष नेताओं के बीच खिंची तलवारों की तीखी धार का भी अहसास करा दिया। यहां नेताओं के निशाने पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हरीश रावत थे। प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने थराली विधानसभा उप चुनाव के बाद हार की जिम्मेदारी स्वयं लेने के हरीश रावत के बयान पर कटाक्ष किया कि उनका लंबा राजनीतिक जीवन रहा है और वे प्रदेश को काफी कुछ समझते हैं। वहीं नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने कहा कि विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद राहुल गांधी प्रीतम सिंह को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। उन्होंने यह कहकर भी रावत पर हमला किया कि पहले पार्टी कुछ लोगों की प्राइवेट लिमिटेड बन गई थी। जिस कारण कांग्रेस ११ सीटों पर सिमट गई। हृदयेश के इस हमले के बाद हल्द्वानी भ्रमण पर आए पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इंदिरा हृदयेश को कांग्रेस की कोलम्बस की संज्ञा देते हुए कहा ‘अच्छा मैं आलाकमान की पसंद नहीं होता तो मुझे मुख्यमंत्री बनाया ही क्यों जाता? अगर २०१७ से पहले कांग्रेस प्राइवेट लिमिटेड पार्टी थे तो प्रीतम सिंह व इंदिरा हृदयेश भी उसी का एक हिस्सा थे। उन्होंने कहा कि पार्टी से नये लोग जुडं़े किसी को कोई एतराज नहीं है। लेकिन इसके लिए पहले पार्टी में सहमति बना लेनी जरूरी है। प्रीतम सिंह और इंदिरा हृदयेश ने हल्द्वानी में रावत के खिलाफ जो तीखे हमले किए उनको देखते हुए रावत भी चुप नहीं बैठे। इंदिरा हृदयेश को कोलंबस की संज्ञा देने के साथ ही वे जमीन पर भी सक्रिय हो गए। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय को साथ लेकर उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से उनके जन्म दिन पर जो मुलाकात की, राजनीतिक विश्लेषक उसे रावत की इसी सक्रियता से जोड़कर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि राहुल को जन्म दिन की बधाई देने के बहाने रावत और किशोर ने राहुल गांधी से प्रदेश संगठन की कार्यकारिणी के गठन को लेकर भी व्यापक चर्चा की। उन्हें बताया गया कि किस तरह पार्टी संगठन में बाहरी नेताओं को तरजीह दी जा रही है। प्रदेश में जल्दी ही कार्यकारिणी का विस्तार होना है। इसमें दोनों प्रमुख खेमे अपने-अपने लोगों को जगह दिलाने की होड़ में हैं। एक-दूसरे पर भारी दिखने के लिए इंदिरा हृदयेश और प्रीतम गुट ने जहां हल्द्वानी में हेम आर्या और नीमा आर्या को पार्टी में शामिल किया तो वहीं हरीश रावत और किशोर गुट ने टिहरी विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ चुके राजेश्वर पैन्यूली और नैनीताल के पूर्व भाजपा नेता हेम लाल आर्या को पार्टी में शामिल किया है। राजनीतिक तौर पर देखें तो कांग्रेस नेताओं के बीच जंग की असली वजह २०१९ का लोकसभा चुनाव ही है। इंदिरा हृदयेश नैनीताल से चुनाव लड़ना चाहती हैं तो हरीश रावत भी यही इच्छा जता चुके हैं। यही वजह है कि फरवरी माह में हल्द्वानी में हुए एकजुटता सम्मेलन में भी दोनों नेताओं के मतभेद खुलकर सामने आए थे। तब हरीश रावत ने मोबाइल फोन के जरिये जो संबोधन किया था उस पर हृदयेश इतनी भड़क उठी थीं कि उन्होंने नेतृत्व को पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ने वाले बयानों पर अंकुश लगाने की राय दे डाली थी। मंच से हृदयेश और प्रीतम सिंह ने भी हरीश पर कटाक्ष किये थे। प्रीतम सिंह ने तो यहां तक कहा था कि यदि मुझे लोकसभा चुनाव लड़ना होगा तो टिहरी से लडूंगा और विधायकी का चकरौता से। मुझे दूसरी सीटों का समीकरण बनाने-बिगाड़ने से कोई मतलब नहीं है। फिलहाल कांग्रेस के बड़े नेताओं का फोकस व्यक्तिगत रूप से आगामी २०१९ का लोकसभा चुनाव है जिनमें वे विरोध के बावजूद अपना-अपना कुनबा बढ़ाकर दावेदारी मजबूत करना चाहते हैं। लेकिन देखना होगा कि उनके ये अंतर्विरोध २०१९ के चुनाव तक जारी रहते हैं या उनके ये कदम सिर्फ स्वयं को मजबूत करने के लिए हैं? या फिर वे पार्टी को भी कुछ समर्पित करना चाहते हैं?

वैसे इंदिरा जी ने यह खोज करने में देर लगा दी। यह उनकी नई खोज है। वह तो कांग्रेस की कोलंबस हैं। एक बात और है, पहली बार ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस में टिकट अनुभव के बजाय किसी और तरीके से बंटता है।
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री

हेम आर्या के कांग्रेस में शामिल होने का कहीं कोई विरोध नहीं है। राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी तो एक मिस्ड कॉल कर कांग्रेस से जुड़ने की बात कह रहे हैं। जो कांग्रेस की विचारधारा का सम्मान करते हैं। उन सभी का कांग्रेस स्वागत करती है।
डॉ इंदिरा हृदयेश, नेता प्रतिपक्ष

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