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उत्तराखण्ड में अफसरशाही की निरंकुशता बड़ा मुद्दा रहा है। धामी मंत्रिमंडल में विभागों के बंटवारे के बाद से ही सतपाल महाराज, धन सिंह रावत और सौरभ बहुगुणा ने सचिवों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) लिखने का अपना विधिसम्मत अधिकार मांग लिया था। नौ सदस्यीय कैबिनेट में अन्य मंत्री भी इससे सहमत बताए गए। पहली निर्वाचित सरकार में मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में सचिवों की एसीआर विभागीय मंत्री द्वारा लिखे जाने के बाद अंतिम प्रविष्टि के लिए मुख्यमंत्री को भेजी जाती थी। लेकिन वर्ष 2008 में इस स्थापित प्रक्रिया को एक शासनादेश द्वारा परिवर्तित किया गया और विभागीय मंत्रियों को बाईपास कर दिया गया। प्रदेश की नौकरशाही ने मंत्रियों को पूरी प्रक्रिया से हटाने के लिए एक अवधारणा गढ़ी। जिसके तहत कहा गया कि मंत्रियों के पास समय का अभाव रहता है। मुख्यमंत्री सरकार के मुखिया होते हैं, इसलिए फाइल मुख्य सचिव के माध्यम से सीधे मुख्यमंत्री को भेजी जाए। इसके बाद से संबंधित फाइलें सीधे मुख्य सचिव को भेजी जाने लगीं। आरोप है कि तब से ही नौकरशाही बेलगाम है। प्रदेश के कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज का डिजिटल हस्ताक्षर प्रकरण इसी एसीआर न लिखने का नतीजा बताया जा रहा है। जिसमें एक अधिकारी ने मंत्री के अधिकारों का न केवल हनन किया है बल्कि उत्तराखण्ड की सियासत में एक बार फिर नेता बड़ा या नौकरशाही की बहस शुरू हो चुकी है

 

5 मई 2022 : कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज के पास अनुमोदन के लिए लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर अयाज अहमद को विभागाध्यक्ष बनाने का ऑनलाइन प्रस्ताव आया। उनके अनुमोदन के पश्चात् यह प्रस्ताव मुख्यमंत्री के पास भेजा जाना था। परंतु महाराज के विदेश दौरे के चलते प्रस्ताव पर अनुमोदन नहीं लिया जा सका।

14 मई 2022 : सतपाल महाराज विदेश दौरे से लौटे और अपने निजी आवास पर चले गए। अगले दिन रविवार होने के चलते महाराज अपने निजी आवास में ही रहे। जिसका फायदा उठाते हुए उनके निजी सचिव आईपी सिंह ने सरकारी आवास में जा कर फाइल में महाराज के डिजिटल हस्ताक्षर करके फाइल में अनुमोदन भी लिख दिया। जिसके बाद फाइल लोक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव को भेज दी गई। जहां से मुख्यमंत्री को फाइल भेजी गई और अयाज अहमद को लोक निर्माण विभाग का विभागीय अध्यक्ष बना दिया गया। जबकि, इस काम के लिए आईपी सिंह अधिकृत नहीं थे।

लोक निर्माण विभाग की यह पूरी कहानी बेहद दिलचस्प और हैरतनाक है। जिसमें विभागीय मंत्री के डिजिटल हस्ताक्षर करके प्रमोशन का खेल रचा गया। अफसरशाही किस कदर बेलगाम है यह इस प्रकरण से समझा जा सकता है। मंत्री के डिजिटल हस्ताक्षर करने का यह मामला कई सवाल खड़े कर रहा है। पहला यह कि इस मामले का खुलासा मई 2022 में ही हो चुका था तो उसी दौरान मुकदमा दर्ज क्यों नहीं किया गया, जबकि उसी समय महाराज के जनसंपर्क अधिकारी कृष्ण मोहन द्वारा देहरादून के थाना डालनवाला में धोखधड़ी, जालसाजी और आईटी एक्ट के तहत तहरीर दी गई थी।

आखिर 7 दिसंबर को मुकदमा दर्ज किया तो गया लेकिन इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि इस मामले में जांच की गई थी और एक जांच अभी लंबित चल रही है। पूर्व में अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी के आदेश पर अपर सचिव प्रताप शाह के द्वारा जांच की गई थी। जिसमें शाह द्वारा जांच में आरोपों को सही नहीं पाया गया था और जांच खत्म कर दी गई। मुख्यमंत्री धामी के हस्तक्षेप से अपर सचिव ललित मोहन रयाल की अध्यक्षता में एक नई जांच कमेटी बनाई गई। जिसमें लोक निर्माण के संयुक्त सचिव और सचिवालय प्रशासन के अधिकारी भी शामिल हैं। जांच कमेटी द्वारा सचिवालय प्रशासन ने इस मामले से जुड़े प्रपत्र और अन्य अभिलेख मांगे, लेकिन सचिवालय प्रशासन ने आरोपी के खिलाफ कोई भी आरोप पत्र होने से मना कर दिया। इस तरह से दूसरी जांच कमेटी की जांच शुरू भी नहीं हो पाई।

सवाल यह है कि छ माह पूर्व जब सतपाल महाराज के जनसंपर्क अधिकारी ने इस मामले में थाने में तहरीर दी तो मामले को बेहद हल्के में क्यों लिया गया और जांच-जांच का खेल क्यों खेला गया? सवाल यह भी है कि जब जांच में कुछ साफ नही निकला तो छह माह बाद मुकदमा क्यों दर्ज किया गया? क्या कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज को अपनी ही सरकार के अधिकारियों की जांच पर विश्वास नहीं है? सवाल यह भी है कि क्या इस प्रकरण के आरोपी अधिकारियों को बचाया जा रहा है? फिलहाल यह मामला सतपाल महाराज की प्रतिष्ठा से जुड़ी होने के चलते बेहद चर्चित हो गया है। सचिवालय कर्मचारी संघ भी खासा नाराज बताया जा रहा है। संघ का कहना है कि जब मामले की जांच चल रही है तो मुकदमा दर्ज क्यों करवाया गया है?

आरोपी अयाज अहमद

बता दें कि जिस अयाज अहमद को लोक निर्माण विभाग का विभागीय अध्यक्ष बनाया गया। यह वही है जिन पर इसी विभाग के देहरादून कार्यालय में अगस्त 2020 में संविदा के तहत कार्यरत एक महिला कम्प्यूटर ऑपरेटर द्वारा यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए जा चुके हैं। जिस पर विशाखा गाइड लाइन के तहत एक विभागीय जांच कमेटी का गठन किया गया। लेकिन तब पीड़िता इस जांच से संतुष्ट नहीं हुई। साथ ही उसने जांच में भेदभाव के आरोप भी लगाए थे। उस दौरान लोक निर्माण विभाग मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के पास ही था। 2021 में धामी राज्य के मुख्यमंत्री बने और सतपाल महाराज को लोक निर्माण विभाग का मंत्री बनाया गया तो पीड़िता ने एक बार फिर महाराज के सम्मुख अपनी फरियाद रखी। इस पर महाराज ने जनवरी 2022 को इंजीनियर अयाज अहमद के खिलाफ यौन शोषण के आरोपों की जांच करवाए जाने के आदेश दे दिए। इस मामले में जांच किस दिशा में पहुंची यह तो अभी साफ नहीं है लेकिन चर्चा है कि अयाज अहमद के शासन में बड़ी पकड़ के चलते जांच को ही ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

बहरहाल, डिजिटल हस्ताक्षर प्रकरण से इतना तो साफ हो गया है कि मंत्री सतपाल महाराज की अपने ही विभागीय अधिकारियों के ऊपर कोई पकड़ नहीं है और न ही उनका अपने विभाग में कोई भय है। वैसे भी सतपाल महाराज वर्तमान सरकार के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ और त्रिवेंद्र के कार्यकाल में हमेशा अपने विभागीय अधिकारियों की कार्यशैली से नाराज दिखाई देते रहे हैं। चाहे वह लोक निर्माण विभाग हो या पर्यटन या सिंचाई विभाग के अधिकारी रहे हों। महाराज भाजपा सरकार के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि धामी पार्ट टू में भी उन्हें पिछली सरकार के सभी बड़े अहम मंत्रालयों का जिम्मा सौंपा गया। कई अन्य मंत्रियो के विभागों को बदला गया लेकिन महाराज के विभागों को बदलने की हिम्मत धाकड़ धामी भी नहीं दिखा पाए। आज भी सतपाल महाराज प्रदेश सरकार में दूसरे नंबर के कैबिनेट मंत्री बने हुए हैं। जबकि विभागों के हालातों को देखें तो सबसे ज्यादा सवाल महाराज के विभागों पर ही उठते रहे हैं।

 

 

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