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Uttarakhand

बंदोबस्त के सहारे भूमि सुधार

पहाड़ी एवं सीमांत प्रदेश के लिए भूमि-कानून बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह सामरिक दृष्टि से भी जरूरी है। इसके बावजूद उत्तराखण्ड जैसे सीमांत राज्य में अभी तक अपना भू-कानून नहीं बना है। आजाद भारत में पहली बार 1956-64 में बने आधे-अधूरे कानून से ही काम चलाया जा रहा है जबकि इसकी मांग दशकों से हो रही है

प्रदेश में पिछले कई महीनों से नए भूमि कानून की मांग उठ रही है। चुनावी वर्ष में यह मांग जोर पकड़ने लगी है। राजनीतिक दलों ने भी इसे मुद्दा बना लिया है। उत्तराखण्ड क्रांति दल, कांग्रेस सहित सत्तारूढ़ भाजपा ने भी इस पर हामी भरी है। यह 2002 में होने वाले पहले विधानसभा चुनावों से एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। इस मांग के बीच यह जानने की कोशिश बेहद महत्वपूर्ण है कि प्रदेश में भूमि बंदोबस्त की ऐतिहासिक स्थिति कैसी रही है। प्रदेश में मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अलग-अलग कानूनी प्रावधान हैं। पहाड़ में अभी संजायती खाते हैं। एक-एक खाते में साठ खातेदारों के नाम दर्ज हैं। इन संयुक्त खातों में दर्ज भूमि भले ही आपसी बंटवारे से आपस में बंटी हुई हो पर कानूनी रूप से प्रत्येक खाते में हर खातेदार का उसके दर्ज हिस्से के बराबर बनता है। पहाड़ के ग्रामीण क्षेत्रों में गांव की सीमाओं के अंदर व्यक्तिगत नाप भूमि के अतिरिक्त सारी गौचर, पनघट, वन पंचायत, मरघट आदि समस्त संजायती भूमि राजस्व अभिलेखों में सरकार के नाम दर्ज हैं। प्रदेश की अधिसंख्य आबादी की आजीविका का मुख्य आधार कृषि, उद्यान एवं पशुपालन रहा है। जहां तक भूमि बंदोबस्त का सवाल है तो अब तक प्रदेश में 12 बार भूमि बंदोबस्त हो चुके हैं। ब्रिटिशकाल से पूर्व जो भूमि बंदोबस्त उत्तराखण्ड में हुआ वह मनु स्मृति के आधार पर किया गया था। अंग्रेजों से पूर्व सिर्फ एक बार वर्ष 1812 में गोरखाओं ने भूमि बंदोबस्त कराया। ब्रिटिशकाल में पहला भूमि बंदोबस्त 1815-16 में हुआ। सन् 1815 में अंग्रेज अधिकारी गार्डनर ने कुमाऊं व अंग्रेज अधिकारी टेल ने सन् 1816 में गढ़वाल में भू-बंदोबस्त कराया था।

सबसे महत्वपूर्ण बंदोबस्त 9वां माना जाता है जो वर्ष 1963 से 1973 के बीच हुआ। कारण इसकी वैज्ञानिक पद्वति मानी गई। अंग्रेज अधिकारी जीके विकेट के समय हुए इस बंदोबस्त में पर्वतीय भूमि को पांच वर्गों तलाऊ, उपराऊ, अव्वल, उपराऊ दोयम, इजरान व कंटील में विभाजित किया गया। ब्रिटिश काल का अंतिम भूमि बंदोबस्त सन् 1928 में अंग्रेज अधिकारी इबटसन के नेतृत्व में हुआ। फिर आजादी के बाद ही 1960-64 में 12वां भूमि बंदोबस्त हुआ। वर्ष 1960 आजादी से पहले अंग्रेज शासकों ने यहां ग्यारह बार भूमि बंदोबस्त किये। वर्ष 1818 ई में कुमाऊं अंग्रेज शासकों के अधीन आ गया। कमिश्नर गार्डनर ने वर्ष 1815-16 के बीच पहला बंदोबस्त किया। उसके बाद ट्रेल ने 1817 में दूसरा, 1818 में तीसरा व 1820 में चौथा बंदोबस्त कराया। पांचवा बंदोबस्त वर्ष 1823 में हुआ। फिर 1821 में छठा बंदोबस्त हुआ। वर्ष 1832 में सातवां किया। ट्रल के बाद कर्नल गार्डनर कुमाऊं कमिश्नर बने। उन्होंने सन 1834 में आठवां बंदोबस्त किया। फिर सर बेटन ने 1842 से 1846 तक नवां भूमि बंदोबस्त किया। दसवां बंदोबस्त विकेट ने 1863 से 1873 के बीच किया। इसे कुमाऊं का प्रथम वैज्ञानिक बंदोबस्त कहा जाता है। इस बंदोबस्त में प्रत्येक गांव के नक्शे, खसरे बनाए गए। भूमि को तलाऊ, उपराऊ, अब्बल, दोयम, इजरान, कटली आदि विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया गया। विकेट ने गांव की काश्तभूमि के अलावा उससे लगी ऐसी भूमि को भी नपवाया, जो भविष्य में काश्त में आ सकती थी। इसे बेपड़ा भूमि कहा जाता है। इस भूमि पर सिलसिला काश्त के नाम से वर्ष 1880 से पूर्व तक पहाड़ के काश्तकार अपनी भूमि का विस्तार करते रहे। 1899 से 1902 के बीच ग्यारहवां बंदोबस्त सर गूज ने करवाया।

आजादी के बाद हमारी लोकप्रिय सरकारों ने मैदानी क्षेत्र के किसानों की समस्याओं और हितों को ध्यान में रखकर ही कृषि विकास की नीतियां बनाई। फिर 1956 से 64 के बीच केवल एक बार भूमि बंदोबस्त किया। इस दौरान चीन एवं पाकिस्तान के युद्धों के कारण यह बंदोबस्त भी पूरी तरह से नहीं हो पाए। तब से 46 सालों के भीतर भूमि की बनावट में काफी बदलाव आ चुका है। जगह-जगह भूस्खलनों एवं नदी कटावों से भूमि की प्रकृति काफी बदल गई है। नगरीकरण की प्रक्रिया में भूमि में जगह-जगह नए-नए कस्बे और मोटर मार्गों के किनारे आबादी बस गई है। नगरीय क्षेत्रों में नाप भूमि के अतिरिक्त भूमि को नजूल भूमि कहा जाता है। यह राजस्व अभिलेखों में संबंधित नगर निकाय के नाम दर्ज और इस भूमि में फ्री होल्ड की सुविधा
उपलब्ध है। फ्री होल्ड में नगर निकाय की जमीन की कीमत का भुगतान कर उक्त जमीन खरीददार व्यक्ति के नाम हो जाती है।

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