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Uttarakhand

आठवीं सूची में शामिल हो कुमाऊंनी

कुमाऊंनी भाषा का इतिहास हजार साल से भी पुराना है। इस भाषा में हर विधा का साहित्य लिखा गया है। यहां तक कि इसकी मांग पूर्व में संसद तक में उठाई जा चुकी है। अब तक साहित्य अकादमी, हिंदी अकादमी और कई सरकारी संस्थाएं कुमाऊंनी भाषा के साहित्य और लेखकों को पुरस्कृत कर चुकी हैं। बावजूद इसके इन्हें आज तक संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज नहीं किया गया। कुछ दिनों पूर्व उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच से जुड़े प्रवासियों ने गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना दिया। जबकि पिछले सप्ताह इसको लेकर हल्द्वानी में कार्यक्रम आयोजित हुआ

माऊंनी भाषा को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की मांग एक बार फिर उठ रही है। मांग यह है कि पहली कक्षा से परास्नातक कक्षा तक कुमाऊंनी भाषा की पढ़ाई अनिवार्य की जाए। साथ ही कुमाऊंनी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। पिछले दिनों हल्द्वानी में आयोजित 14 वें राष्ट्रीय भाषा सम्मेलन में एकमत से यह राय बनी कि अगर कुमाऊंनी भाषा को जिंदा रखना है तो न सिर्फ अपनी आम बोलचाल की भाषा में इसे अपनाना है, बल्कि लेखन के साथ कानूनी रूप से भी इसे मजबूती प्रदान करना जरूरी है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो वह समय दूर नहीं जब यह भाषा विलुप्त हो जाएगी। भाषा विशेषज्ञों का कहना है कि आज कुमाऊंनी भाषा के विस्तार में भले ही कमी आई हो लेकिन एक समय में यह पूरे उत्तराखण्ड की राजभाषा हुआ करती थी। पूरे कुमाऊं में इसी भाषा में राजकाज होता था। इसका इतिहास हिंदी से भी पुराना है। इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि कुमाऊंनी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। साथ ही कुमाऊंनी भाषा दिवस भी मनाया जाए।

देश में इस समय 122 अनुसूचित एवं गैर अनुसूचित भाषाएं एवं 234 बोलियां प्रचलन में हैं। कई बोलियां और भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि कुमाऊंनी भाषा को बचाया जाए। साहित्य के क्षेत्र में भी इस भाषा ने 1938 से अपने कदम बढ़ा दिए थे। माना जाता है कि फरवरी 1938 में पहली कुमाऊंनी कहानी ‘एक रूपे चित्रा’ प्रो गोविन्द बल्लभ पंत ने लिखी जो अल्मोड़ा से प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका में छपी थी। हालांकि कुमाऊंनी भाषाविदों एवं साहित्यकारों में इसको लेकर मतभेद रहे हैं। बहरहाल, कुमाऊंनी भाषा और साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति और पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच इस भाषा के प्रचार-प्रसार को लेकर प्रतिबद्ध रहा है। कुमाऊंनी में साहित्य सृजन भी हो रहा है। नित नई किताबें आ रही हैं। इसके अलावा अल्मोड़ा से डॉ हयात सिंह रावत के संपादन में ‘पहरू’ और पिथौरागढ़ से डॉ सरस्वती कोहली के संपादन में ‘आदली-कुशलि’ पत्रिका का प्रकाशन निरंतर हो रहा है। जिसमें कुमाऊंनी भाषा में लेख, कहानियां, कविताएं आदि प्रकाशित होती रही हैं। यूं तो कुमाऊंनी भाषा प्रदेश के कुमाऊं क्षेत्र में बोली जाने वाली एक बोली है। यह देश की 326 मान्यता प्राप्त भाषाओं में से एक है। आज भी करीब 25 लाख लोग कुमाऊंनी भाषा में संवाद करते हैं। भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार कुमाऊंनी बोलने वालों की संख्या प्रदेश में जनपदवार इस तरह है जनपद पिथौरागढ़ में 4.23 लाख, चम्पावत में 2.03लाख, बागेश्वर में 2.43 लाख, नैनीताल में 4.62 लाख, अल्मोड़ा में 5.61 लाख, ऊधमसिंह नगर में 86.07 हजार, रूद्रप्रयाग में 2.28 लाख, उत्तरकाशी में 2.66 लाख,चमोली में 3.50 लाख, पौड़ी में 5.72 लाख, देहरादून में 2.85 लाख, हरिद्वार में 14.63 हजार लोग कुमाऊंनी बोलने वाले हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि कुमाऊंनी भाषा लिपिब न होने से आपसी वार्तालाप तक सीमित है। यह देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। यूं कुमाऊंनी क्षेत्र में यह 20 तरह से बोली जाती है।

जिसमें सोरयाली, जोहारी, मझ कुमारिया, दानपुरिया, अस्कोटी, सिराली, सोरपाली, चुगरख्यैली, कमईया, गंगोला, खसपरजिया, फल्दकोटि, आदि उपबोलियां हैं। लेकिन नई पीढ़ी द्वारा हिंदी एवं अंग्रेजी का अधिक इस्तेमाल करने की वजह से इस भाषा में वार्तालाप करने और लिखने वालों में कमी आ रही है। विगत दिनों हल्द्वानी में पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच द्वारा आयोजित महोत्सव में कुछ महत्वपूर्ण प्रस्ताव इस भाषा को लेकर पारित हुए। जिसमें कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल, एसएसजे विश्वविद्यालय अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय में एमए में कुमाऊंनी भाषा पढ़ाई जाए। कुमाऊंनी के विकास के लिए कुमाऊंनी भाषा अकादमी का गठन किया जाए।

उत्तराखण्ड भाषा संस्थान की ओर से कुमाऊंनी रचनाकारों को प्रतिवर्ष सम्मानित और पुरस्कृत करने की व्यवस्था राज्य एवं केंद्र सरकार करे। उत्तराखण्ड भाषा संस्थान एवं कुमाऊंनी भाषा के रचनाकारों को प्रतिवर्ष पुस्तक प्रकाशन को सहायता देने का प्रावधान किया जाए। इसके अलावा इस वर्ष के महोत्सव में बहादुर सिंह बनौला स्मृति कुमाऊंनी साहित्य सेवी सम्मान गौरीदत्त ओझा और गिरीश जोशी, दिलीप सिंह खेतवाल स्मृति कर्मयोगी पुरस्कार नारायण सिंह बिष्ट एवं बचुली देवी रावत स्मृति निबंध लेखन योजना पुरस्कार आनंद सिंह बिष्ट को प्रदान किया गया। इसके अलावा कुमाऊंनी भाषा व संस्कृति के प्रचार-प्रसार में लगे दर्जनों लोगों को भी स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

हमें अपनी युवा पीढ़ी को मातृभाषा से जोड़ने और कुमाऊंनी में साहित्य विकास के लिए हर तरह से राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर काम करने की जरूरत है। नए-नए विषयों पर कुमाऊंनी में लेखन जरूरी है जिससे कुमाऊंनी भाषा का विस्तार हो सके।
डॉ. हयात सिंह रावत, संपादक ‘पहरू’

कुमाऊंनी भाषा के समक्ष कई तरह के संकट खड़े हैं। पहला तो यह कि नई पीढ़ी इससे पूरी तरह उदासीन है। वह हिंदी और अंग्रेजी के अधीन हो चुकी है। लिखना तो दूर उन्हें इसे बोलने में भी हीनता महसूस होती है। दूसरा पुरानी पीढ़ी एवं आजकल के लोग इसे बोलते तो हैं लेकिन लेखन बहुत कम होता है। पूरे कुमाऊं के अंदर ही देखिए कहीं भी कुमाऊं में लिखे होल्डिंग नजर नहीं आते। दुकानों एवं तमाम तरह के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, घरों के नाम कुमाऊंनी भाषा में लिखे नजर नहीं आते। जो लेखन हो भी रहा है वह बहुत कम है। हमें आपस में वार्तालाप के साथ ही सोशल मीडिया पर भी कुमाऊंनी में लेखन को बढ़ावा देने का प्रयास करना चाहिए।
डॉ. हरीश अंडोला, दून विश्वविद्यालय

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