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Uttarakhand

जयचंदों पर गिरेगी गाज

‘अबकी बार साठ पार’ का नारा देकर चुनाव मैदान में उतरी भाजपा को सैंतालिस सीटों पर ही विजय मिली। हालांकि पूर्ण बहुमत से कहीं अधिक सीटें पा भाजपा ने राज्य की राजनीति से जुड़े कई मिथक तोड़ डाले हैं और वह सत्ता में वापस काबिज हो चुकी है लेकिन इन चुनावों में पीठ में छूरा घोंपने वाले अपने नेताओं को वह माफ करने के मूड में नहीं है। यही कारण है कि पार्टी ने 13 सदस्यीय कमेटी बना भितरघात के आरोपों की जांच शुरू कर डाली है

उत्तराखण्ड में ‘इस बार 60 पार’ का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन चुकी है। भाजपा को अपने लक्ष्य 60 पर पहुंचने से पहले 47 पर रुकना पड़ा है। पार्टी 23 सीटों पर हार के कारणों की समीक्षा कर रही है। इसके लिए बकायदा पार्टी ने 13 सदस्यीय जांच टीम का गठन कर दिया है। यह टीम 29 मार्च से हर विधानसभा क्षेत्र में जाकर जांच कर रही है जहां भाजपा के प्रत्याशी हारे हैं। पार्टी इस पर भी गहन मंथन करेगी कि उनके प्रत्याशी हरिद्वार की पिरान कलियर सीट पर जहां जमानत जब्त करा बैठे तो वहीं हरिद्वार की दूसरी सीट खानपुर में उनका उम्मीदवार तीसरे स्थान पर कैसे पहुंचा। हालांकि हार और जीत की समीक्षा हर चुनाव के बाद होती है। लेकिन इस बार भाजपा का फोकस हार की समीक्षा के बहाने भितरघात को टटोलना है। कहा तो यह भी जा रहा है कि पार्टी के ही ऐसे नेताओं को चित किया जाएगा जिन्होंने अपने दल के प्रत्याशी को हराने के लिए विश्वासघात किया है। जांच रिपोर्ट मिलने के बाद भितरघात के आरोपी नेताओं पर पार्टी कड़ा एक्शन लेगी।

दरअसल भाजपा के लिए भितरघात उस समय बड़ा मुद्दा बन गया जब 14 फरवरी से लेकर 10 मार्च के बीच (चुनाव होने और चुनाव परिणाम तक) आधा दर्जन पार्टी प्रत्याशियों ने भितरघात के आरोप लगाए। हालांकि उन प्रत्याशियों में अधिकतर जीत चुके हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि भाजपा ने ऐसे सभी विधानसभा क्षेत्रों को जांच से मुक्त कर दिया है जहां-जहां पार्टी जीती है। लेकिन पार्टी के ही नेताओं ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। पार्टी के नेताओं ने कहा है कि जांच के दायरे में ऐसी हर विधानसभा आनी चाहिए जहां भितरघात के आरोप लगे थे। पार्टी के लिए जयचंद बने ऐसे नेताओं को सिर्फ जीत होने की वजह से छोड़ना उचित नहीं होगा।

फिलहाल, भाजपा में भितरघात पर 13 सदस्यीय जांच कमेटी 23 विधानसभा क्षेत्रों में हार के कारण तलाशेगी। 13 सदस्यीय जांच कमेटी में भाजपा के प्रदेश महामंत्री सुरेश भट्ट, कुलदीप कुमार, पुष्कर काला, विनय रूहेला, डॉ ़देवेंद्र भसीन, विरेंद्र बिष्ट, अनिल गोयल, मयंक गुप्ता, सुरेश जोशी बलवंत सिंह भोर्याल, खिलेंद्र चौधरी, बलराज पासी और कुमाऊं मंडल विकास निगम के पूर्व चेयरमैन केदार जोशी शामिल किए गए हैं। यह जांच समिति 29 मार्च से उन विधानसभा क्षेत्रों में जाकर जांच कर रही है जहां भाजपा हारी है।

उल्लेखनीय है कि विधानसभा चुनाव के दौरान कुछ सीटों पर भाजपा में भितरघात के आरोप लगे थे। मतदान संपन्न होने के तुरंत बाद लक्सर से प्रत्याशी पूर्व विधायक संजय गुप्ता ने चुनाव में भितरघात का आरोप लगाया था। उन्होंने तो प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक को ही कठघरे में खड़ा कर दिया था। लक्सर के पूर्व विधायक संजय गुप्ता ने प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक पर उनके खिलाफ काम करने का आरोप लगाया।

मतदान के बाद गुप्ता का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसने राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी। गुप्ता ने प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक पर सीधा हमला बोला और उन पर उन्हें चुनाव हराने की साजिश रचने का बेहद गंभीर आरोप जड़ दिया। कुछ ही मिनटों में उनका यह सोशल मीडिया की सनसनी बन गया था। इस बयान के जरिये विपक्षी दलों ने इसे हरिद्वार और प्रदेश में भाजपा के चुनाव में खराब प्रदर्शन से जोड़कर पेश किया।

प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक पर लक्सर विधानसभा में ही नहीं बल्कि हरिद्वार ग्रामीण सीट पर करारी हार के भी आरोप लगे हैं। यहां से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की पुत्री अनुपमा रावत चुनाव जीती हैं। बताया जाता है कि हरिद्वार ग्रामीण से भाजपा के प्रत्याशी स्वामी यतीश्वरानंद को हराने के लिए गोटियां फिट की गई। जिसमें मदन कौशिक की भूमिका बताई जा रही है। खासकर आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी नरेश शर्मा के चुनाव लड़ने के कारण उन पर आरोप लगाए हैं। यहां से आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी नरेश शर्मा को उनका रिश्तेदार बताया जा रहा है।

हरिद्वार ग्रामीण की हार को भाजपा की हरिद्वार जिले से दो मंत्री बनने की आपसी स्पर्धा से जोड़कर देखा जा रहा है। पूर्व में हरिद्वार जिले से मदन कौशिक के साथ ही स्वामी यतीश्वरानंद को कैबिनेट में स्थान मिला था। इस बार चर्चा थी कि पार्टी 1 जिले में 2 मंत्री नहीं बनाएगी। मदन कौशिक पर आरोप है कि इसके चलते ही उन्होंने रणनीतिक षड्यंत्र तैयार किया जिसका शिकार होकर स्वामी यतीश्वरानंद चुनाव हार गए। हरिद्वार के अलावा अन्य जिलों के पार्टी प्रत्याशियों ने भी अपनी ही पार्टी के नेताओं पर भितरघात के आरोप लगाए हैं, इनमें चंपावत के विधायक कैलाश गहतोड़ी और काशीपुर से विधायक हरभजन सिंह चीमा भी शामिल हैं। चुनाव परिणाम आने से पहले दोनों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। जिसमें उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं को उन्हें हराने के गंभीर आरोप लगाए। हालांकि दोनों ही अपने-अपने विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीत गए।

काशीपुर के चार बार के विधायक रहे हरभजन सिंह चीमा ने अपनी पार्टी की नेता जो फिलहाल नगर निगम की मेयर भी हैं पर आरोप लगाए। उनके अनुसार नगर निगम काशीपुर की मेयर ऊषा चौधरी द्वारा उनके चुनाव में विश्वासघात कर कांग्रेस प्रत्याशी को सपोर्ट किया गया। हालांकि पार्टी ने जो जांच टीम बनाई है उन्हें काशीपुर में भितरघात के आरोपों की जांच करने का जिम्मा नहीं सौंपा गया है। जांच टीम उन्हीं विधानसभा सीटां पर जांच करेगी जहां उनकी पार्टी के प्रत्याशी हारे हैं। इससे काशीपुर के वर्तमान विधायक त्रिलोक सिंह चीमा के पिता पूर्व विधायक हरभजन सिंह चीमा बेहद नाराज हैं। अब उन्होंने भाजपा पर भितरघातियों को शह देने के आरोप लगा डाले हैं।

इनके अलावा यमुनोत्री से विधायक केदार सिंह रावत और डीडीहाट विधायक बिशन सिंह चुफाल ने भी पार्टी पदाधिकारियों पर चुनाव के दौरान सहयोग न करने की बात कही है। ऊधमसिंह नगर की किच्छा विधानसभा से भाजपा के प्रत्याशी रहे पूर्व विधायक राजेश शुक्ला ने भी अपने साथ विश्वासघात करने के आरोप लगाए। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहां कि पार्टी का एक मंत्री जो इस समय ऊधमसिंह नगर से ही चुनाव लड़ रहे हैं उन्हें हराने के लिए चुनावी चौसर बिछा रहे थे। चुनाव परिणाम आने के बाद यह सीट भाजपा से निकलकर कांग्रेस के खाते में चली गई। तब से ही भाजपा के अंदर खलबली मची हुई है।

राजेश शुक्ला का सीधा इशारा कैबिनेट मंत्री रहे अरविंद पांडेय की तरफ था। भाजपा के बागी उम्मीदवार अजय तिवारी का चुनाव लड़ना शुक्ला की हार का कारण बताया गया। अजय तिवारी निर्दलीय तौर पर चुनाव लड़कर 6 हजार वोट पा गए। जबकि राजेश शुक्ला किच्छा में कांग्रेस के तिलक राज बेहड़ से 9 हजार वोटों से पीछे रह गए। बताया तो यहां तक जा रहा है कि अरविंद पांडेय ने कांग्रेस प्रत्याशी तिलक राज बेहड़ से सेटिंग-गेटिंग की राजनीति की। उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्र गदरपुर में बेहड़ समर्थकों का वोट हासिल किया तो किच्छा में उनके समर्थकों का झुकाव बेहड़ की तरफ रहा। सियासी गलियारों में यह चर्चा पहले ही चल गई थी कि इस बार भाजपा पूर्वांचल के दो विधायक अरविंद पांडेय और राजेश शुक्ला में से किसी एक को मंत्री बनाएगी। चर्चा में नाम राजेश शुक्ला का आगे चल रहा था। राजेश शुक्ला मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के करीबी नेताओं में गिने जाते हैं।

अब आरोप लग रहे हैं कि अरविंद पाण्डेय ने यह मानकर कि कहीं राजेश शुक्ला उनका नंबर न काट दे इसलिए शुक्ला को चुनावों में ही ठिकाने लगा दिया। अरविंद पांडेय के बारे में कहा जा रहा था कि वह चुनाव नहीं जीतेंगे। इसके पीछे शिक्षा मंत्री के न जीतने का मिथक भी बताया जा रहा था। लेकिन वह मिथक तोड़ चुनाव जीत गए। बावजूद इसके धामी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया। इसके पीछे का कारण किच्छा विधानसभा सीट से पार्टी प्रत्याशी की हार बताई जा रही है।
जांच कमेटी का सबसे बड़ा केंद्र खटीमा विधानसभा सीट है। यहां से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी दो बार चुनाव जीत चुके हैं। लेकिन इस बार वह तीसरा चुनाव हार गए। इसके लिए उन्होंने बकायदा अपना एक ओएसडी प्रमोद जोशी को नियुक्त किया हुआ था कि वह विधानसभा क्षेत्र के लोगों की समस्याओं का समाधान कराएंगे। यही नहीं उनके ही दूसरे सबसे खास जन संपर्क अधिकारी सत्य प्रकाश रावत भी इसी विधानसभा के निवासी हैं। अपने चुनाव की कमान पुष्कर सिंह धामी ने सत्य प्रकाश रावत उर्फ सत्या के ही हाथ में सौंप रखी थी। चर्चा है हम हम हम हम हम हम हम हम हम हम कि धामी ने जिस सेनापति को चुनाव का जिम्मा सौंपा उनसे ही सबसे ज्यादा पार्टी के नेता और कार्यकर्ता खफा थे। इसके परिणाम स्वरूप भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने विधानसभा में काम नहीं किया। हालांकि इसे पार्टी के नेताओं का ओवर कान्फिडेंश भी कहा गया।

लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह सामने आ रही है कि खटीमा विधानसभा क्षेत्र में पार्टी के एक सीनियर लीडर ने धामी को चुनाव हराने के लिए राजनीतिक षड्यंत्र रचा। सूत्रों की मानें तो पार्टी के इस नेता के दूत ने खटीमा विधानसभा क्षेत्र में जाकर कांग्रेस प्रत्याशी भुवन कापड़ी को आर्थिक सहयोग भी दिया था। हालांकि भाजपा जांच के बाद उक्त सीनियर लीडर और उनके दूत पर क्या एक्शन लेगी यह तो समय ही बताएगा। लेकिन खटीमा क्षेत्र के लोगों की मानें तो पुष्कर सिंह धामी के साथ पार्टी के नेताओं द्वारा खण्डूड़ी प्रकरण को दोहराया गया। जिस तरह 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी को उनके ही विधानसभा क्षेत्र कोटद्वार में शिकस्त दी गई और उसमें उनकी ही पार्टी के कुछ जयचंदां की संलिप्तता बताई गई थी ऐसा ही इस बार खटीमा में भी हुआ।

 

कांग्रेस में क्यों नहीं हुई जांच कमेटी गठित
भाजपा ने प्रदेश में 47 सीट जीतने और सत्ता हासिल करने के बाद भी पार्टी के जयचंदां की जांच करने के लिए कमेटी गठित कर दी है। लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस इस मामले में अभी तक बयानबाजी तक ही सिमटी हुई है। बावजूद इसके कि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने लालकुआं से अपनी हार के पीछे पार्टी के ही कुछ नेताओं का हाथ होना स्वीकार किया है। यही नहीं बल्कि कभी हरीश रावत के सिपहसालार रहे रणजीत सिंह रावत ने तो पार्टी अनुशासन की खुलकर धज्जियां उड़ाई। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत पर टिकट बेचने के गंभीर आरोप लगाए हैं। रणजीत रावत ने मीडिया के सामने यह बयान भी दिए। उनका यह बयान वायरल भी हुआ।


धारचूला से तीसरी बार कांग्रेस के विधायक बने हरीश धामी ने भी पार्टी के एक नेता पर उन्हें हराने की कोशिश करने के आरोप लगाए हैं। हरीश धामी के समर्थक सोशल मीडिया पर लगातार लिख रहे हैं कि पार्टी के उस नेता ने हरीश धामी को हराने के लिए धारचूला विधानसभा क्षेत्र में पैसे भी भिजवाए। कांग्रेस में ऐसे गंभीर आरोप लगने के बाद भी पार्टी रहस्यमय चुप्पी साधे हुए हैं। यह समझ से परे हैं। लोगों का कहना है कि कांग्रेस अपने आप में सुधार करके आगे बढ़ने के बजाय सिर्फ आपसी मतभेदों में उलझ कर रह गई है।

 

भाजपा को चाहिए था कि जब मैंने पार्टी के नेताओं पर पार्टी विरोधी कार्य करने के आरोप लगाए तो उनको तभी निकाल देना चाहिए था। पार्टी सब कुछ जानते हुए भी उनको नहीं निकाल रही है। ऐसे में पार्टी को नुकसान ही होगा। अपनी ही पार्टी के नेताओं का विरोध करने वालों की संख्या अधिक हो जाएगी। विरोधियों के ओपन होने के बाद भी पार्टी का क्लियर स्टैंड न लेना कहीं न कहीं दर्शाता है कि पार्टी में सच स्वीकार करने की हिम्मत नहीं है। मुझे हैरानी इस बात की है कि अभी भी जांच कमेटी ने सिर्फ उन विधानसभा क्षेत्रों को शामिल किया है जहां पार्टी चुनाव हारी है। जबकि उन्हें काशीपुर जैसे विधानसभा क्षेत्र में भी जांच करानी चाहिए। काशीपुर में जांच का विषय होना चाहिए कि पार्टी के नेता किस तरीके से अपनी ही पार्टी के नेता को हराने पर तुले हुए थे। काशीपुर ही नहीं बल्कि ऐसी सभी विधानसभा सीटों को पार्टी द्वारा अपनी जांच में शामिल किया जाना चाहिए जहां-जहां के प्रत्याशियों ने अपने यहां भितरघात के आरोप लगाए थे।
हरभजन सिंह चीमा, पूर्व विधायक काशीपुर

 

हमारी जांच का विषय केवल भितरघात ही नहीं बल्कि यह भी है कि पार्टी 60 पार का नारा देने के बावजूद 47 पर ही क्यों अटकी? यही नहीं बल्कि हम इसकी भी जांच कर रहे हैं कि इस बार विपक्षी दल की 8 सीट कैसे बढ़ी। साथ ही उनके मत प्रतिशत 4 प्रतिशत बढ़ने का कारण भी तलाशा जाएगा। कैंडिडेट हारा यह चिंता का विषय नहीं बल्कि चिंता का विषय यह है कि भाजपा क्यों हारी। उस क्षेत्र के पन्ना प्रमुख से लेकर जिला प्रमुख तक की जांच की जाएगी कि आखिर पार्टी के साथ मन से काम किसने नहीं किया। क्योंकि 2024 में लोकसभा चुनाव होने हैं और बहुत जल्दी ही निकाय चुनाव भी होंगे। इससे पहले ही यह जांच करके आरोपियों पर कार्रवाई करना जरूरी है। इससे यह संदेश जाएगा कि कोई भी पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त व्यक्ति बच नहीं पाएगा। इस जांच और समीक्षा में 2 लोकसभा क्षेत्र नैनीताल और हरिद्वार पर विशेष फोकस किया गया है। क्योंकि यहां नैनीताल में 14 विधानसभा सीटों में से 6 पर कांग्रेस जीती है। जबकि हरिद्वार में 11 विधानसभा सीटों में से भाजपा के खाते में सिर्फ 3 सीट आई है।
केदार जोशी, पूर्व अध्यक्ष कुमाऊं मंडल विकास निगम

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