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   कुमार गुंजन

चुनाव प्रचार के अंतिम दिन समान नागरिक संहिता को प्रदेश में लागू करने की बात कह मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भले ही अपनी तरफ से जो मास्टर स्ट्रोक दागा, उसे राजनीतिक विश्लेषक भाजपा की बौखलाहट के चलते निकला ऐसा मास्टर स्ट्रोक मान रहे हैं जिसका खास लाभ शायद ही पार्टी को मिले

उत्तराखण्ड की सबसे बड़ी समस्या पलायन है। महंगाई और बेरोजगारी तो राष्ट्रीय मुद्दा है ही। यह यहां भी कम नहीं है। इन बुनियादी मुददों के रहते चुनाव में मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जुमे का अल्पवकाश, हिजाब जैसे मुद्दे छाए रहे। उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव से सभी बुनियादी मुद्दे गौण रहे। कांग्रेस मंहगाई और बेरोजगारी में सरकार को घेरने की कोशिश करती रही। लेकिन चुनाव प्रचार जैसे-जैसे आगे बढ़ा विकास के ये मुद्दे दफन हो गए। मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जुमे की छुट्टी पर आकर बात अटक गई। कांग्रेस के एक छुटभैये नेता ने मुस्लिम यूनिवर्सिटी पर बयान क्या दिया, भाजपा उनके सभी पुराने चिट्ठे को बाहर निकाल लाई। शायद भाजपा के नेताओं को इससे भी बात बनती नजर नहीं आई तो पार्टी ने प्रचार के अंतिम दिन अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। यह ब्रह्मास्त्र है, समान नागरिक संहिता का। प्रचार के अंतिम दिन मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने इस पर बड़ा बयान दिया। जिसके बाद लोग इस पर चर्चा कम ज्यादा चर्चा इस बात पर करने लगे कि पार्टी ने ऐसा क्यों किया होगा। कुछ लोगों ने माना कि भाजपा ने चुनाव पूर्व ही हार मान ली है। तभी मुख्यमंत्री को प्रचार के अंतिम दिन इसकी घोषणा करना पड़ी।

मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने चुनाव प्रचार के अंतिम दिन अपना मास्टर स्ट्रोक चला। तत्काल लोगों को कुछ समझ में नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ? मुख्यमंत्री धामी ने एक न्यूज एजेंसी को बुलवाकर उसके सामने लिखित बयान को पढ़कर इसका एलान किया। एलान होते ही मीडिया पर चर्चा का दौर शुरू हो गया। कांग्रेस से लेकर सभी विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया। कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व तो शुरू से ही इसके खिलाफ रहा है। जबकि भाजपा के मुख्य मुद्दों में यह शामिल रहा है। इसे उत्तराखण्ड भाजपा ने और आगे बढ़ा दिया है।

मुख्यमंत्री के इस कथित मास्टर स्ट्रोक की आलोचना कांग्रेस के नेताओं ने तत्काल करने में देर नहीं लगाई। उन्होंने विरोध तो किया लेकिन कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व इस पर थोड़ी बहुत असमंजस की स्थिति में भी दिखा। वे इस पर विचार-विमर्श और मंथन करना चाहते थे। मगर चुनाव को देखते हुए उनके पास समय नहीं था। चुनावी माहौल में वह प्रदेश भर से फीडबैक लेने का प्रयास करती दिखी। ताकि इस पर एक ठोस स्टैंड लिया जा सके। हालांकि चुनाव को देखते हुए ज्यादा समय इस पर कांग्रेस को नहीं मिल पाया। कांग्रेस की तरफ से इसका तत्काल जवाब देते हुए प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि ‘भाजपा के पास विकास का एजेंडा ही नहीं है। वह जनता को भरमाने की कोशिश कर रही है। समान नागरिक संहिता राज्य सरकार का विषय नहीं है। यह कार्य संसद का है। वह चुनाव को ऐसे मुद्दों से सिर्फ प्रभावित करना चाह रही है। इसके अलावा उनकी मंशा कुछ और नहीं है।’ वहीं नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह ने कहा, ‘भाजपा के पास अपने काम गिनाने को कुछ नहीं है। इसलिए वह चुनाव के दौरान कभी मुस्लिम यूनिवर्सिटी तो कभी जुमे की छुट्टी पर शोर मचाती रही। भाजपा अब जो भी कर ले उसका जाना तय है। भाजपा की सरकार जब बनेगी ही नहीं तो समान नागरिक संहिता लागू करने की बात ही बेमानी है।’

मुख्यमंत्री के इस एलान के बाद देहरादून और हरिद्वार जैसे मैदानी शहरों के लोगों ने इस पर चर्चा की। लेकिन पहाड़ी शहरों और कस्बों में चर्चा न के बराबर हुई। देहरादून निवासी राजवीर सिंह रावत इस पर कहते हैं, देखिए, अधिकतर लोग चाहते तो हैं कि सबके लिए कानून एक जैसा हो। लेकिन इस पर चर्चा होनी चाहिए। बहस होनी चाहिए। मुख्यमंत्री का इस पर एलान के समय को देखते हुए महसूस हो रहा है कि भाजपा चुनाव हार रही है। इसीलिए पार्टी ने चुनाव प्रचार के अंतिम दिन इसकी घोषणा की। उन्हें रिपोर्ट मिली होगी कि भाजपा हार रही है। इसलिए इस मुद्दे को मास्टर स्ट्रोक की तरह इस्तेमाल किया है। चुनाव में इसका असर तो नतीजा आने के बाद ही पता चलेगा। ‘राजवीर सिंह की बातें तर्कपूर्ण और हकीकत के करीब लगती है। यदि भाजपा इस मुद्दे पर गंभीर होती तो वह इसे अपने घोषणा पत्र में शामिल करती। भाजपा का घोषणा पत्र चुनाव प्रचार खत्म होने या कहें मुख्यमंत्री के इस एलान से सिर्फ तीन दिन पहले जारी हुआ था। इसके अलावा आज की भाजपा में इतने महत्वपूर्ण घोषणा से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से चर्चा नहीं हुई होगी, ऐसा भी नहीं है। फिर पार्टी ने इसे घोषणा पत्र में शामिल क्यों नहीं किया?

हालांकि देहरादून के सियासी गलियारों में यह भी सरगोशियां चल रही है कि कांग्रेस ने तत्काल इसका विरोध तो किया क्योंकि उसे भी पता है कि कई लोग इसके पक्ष में हैं। इसलिए उसने सिर्फ बयानों में इसका विरोध दर्ज कराया। जमीन पर लोगों के सामने इसकी चर्चा कांग्रेस नहीं कर रही है। इसलिए कहा जा रहा है कि कांग्रेस के लिए भाजपा के इस मास्टर स्ट्रोक का तत्काल काट निकलना आसान नहीं है। इसके समर्थक बुद्धिजीवियों को भी समझ में नहीं आ रहा है कि भाजपा ने अंतिम समय में समान नागरिक संहिता का एलान क्यों किया। यदि पार्टी इसे घोषणा पत्र या फिर चुनाव के पहले चर्चा में लाती तो उसे अवश्य इसका लाभ भी मिलता। पिछले चुनाव में भाजपा तीन चौथाई से ज्यादा बहुमत लेकर सत्ता पर काबिज हुई थी। पार्टी के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। अपनी उस जीत को बरकरार रखने और दोहराने की। यदि किसी प्रकार बहुमत लेकर पार्टी सत्ता में आती है तो कांग्रेस उसे भाजपा की हार और अपनी जीत ही बताऐगी क्योंकि आज कांग्रेस के पास केवल 10 विधायक हैं। साथ ही वह मुख्यमंत्री के इस मास्टर स्ट्रोक पर भी खुलकर मुखर हो जायेंगे। चुनाव के कड़े मुकाबले में शह और मात का खेल तो खत्म हो गया है। अब देखना सिर्फ यह बाकी है कि इस शह और मात के खेल में बाजी किसके हाथ लगती है। उत्तराखण्ड में बेशक चुनाव प्रचार के अंतिम दिन भाजपा ने इसे समान नागरिक संहिता को मुद्दा बनाया। लेकिन देश में इसे फिर से चर्चा में ला ही दिया है। हो न हो भाजपा का यह तीर चला उत्तराखण्ड से गया हो लेकिन कहीं उसका निशाना उत्तर प्रदेश तो नहीं है, क्योंकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसका स्वागत किया है। ऐसे भी भाजपा तीन मुद्दों (राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता) को लेकर खड़ी हुई थी। इनमें से दो पूरे हो चुके हैं। बस तीसरा, समान नागरिक संहिता बाकी बचा है।

समान नागरिक संहिता पर सुप्रीम सुझाव
बेशक समान नागरिक संहिता का मामला उत्तराखण्ड में उठा है, लेकिन यह मामला कोर्ट में भी है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर कई हाई कोर्ट भी इसे लागू करने के लिए केंद्र सरकार को कह चुके हैं। इसी साल जनवरी महीने में केंद्र सरकार ने देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के मामले पर दिल्ली हाई कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया है। दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल हलफनामा में कहा गया है कि मामला लॉ कमीशन के समक्ष लंबित है। लॉ कमीशन इस पर गहराई से विचार कर रहा है। हलफनामे में यह भी कहा गया है कि लॉ कमीशन के रिपोर्ट के बाद ही केंद्र सरकार इस पर कोई फैसला लेगी। केंद्र सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे के मुताबिक समान नागरिक संहिता लागू करने का सरकार ने अभी कोई विचार नहीं किया है। लॉ कमीशन के रिपोर्ट के बाद ही केंद्र सरकार इस पर अपना रुख तय करेगा।

सुप्रीम कोर्ट भी देश में समान नागरिक संहिता लागू करने को लेकर सुझाव दे चुका है। कोर्ट ने तो इसे लागू नहीं किए जाने पर सवाल भी उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 44 की अपेक्षाओं के मुताबिक सरकार ने समान नागरिक संहिता बनाने की कोई ठोस कोशिश नहीं की। सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता बनाने के संबंध में पहली बार अप्रैल 1985 में सुझाव दिया था। संविधान के इस अनुच्छेद के तहत समान नागरिक संहिता को लागू करना राज्यों की जिम्मेदारी है। ताकि राज्य में सभी नागरिकों को एक समान जीने का अवसर मिल सके। समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब है कि भारत में रहने वाले किसी भी धर्म, जाति और समुदाय के व्यक्ति के लिए एक समान कानून होना। कोर्ट भी इसे एक धर्मनिरपेक्ष कानून मानता है जो सभी धर्म के लोगों के लिए समान है और किसी भी धर्म या जाति के पर्सलन लॉ से ऊपर है। लेकिन शुरू से ही राजनीतिक दल इस पर राजनीति करते आए हैं। कुछ को इससे अपना वोट बैंक गड़बड़ाने का डर सताता रहा है। इसलिए वे कभी इस पर खुलकर सामने नहीं आये। समान नागरिक संहिता के तहत किसी भी धर्म या समुदाय में शादी, तलाक और जायदाद से जुड़े मामलों में पूरे देश में एक ही कानून होगा। यानी किसी धर्म या समुदाय का अपना पर्सनल लॉ नहीं होगा।

फिलहाल देश में मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय के अपने कानून हैं। वहीं हिंदू सिविल लॉ अलग हैं। हिंदू सिविल लॉ के दायरे में हिंदुओं के अलावा सिख, जैन और बौद्ध समुदाय के लोग आते हैं। इसलिए कहा जाता है कि अलग-अलग समुदाय के पर्सनल लॉ के बदले सभी समुदायों को एक कानून के तहत लाया जाए। वर्तमान समय में देश के दो राज्यों में यह लागू है। गोवा में साल 1961 से समान नागरिक संहिता लागू है। गोवा के अलावा पुड्डुचेरी में भी समान नागरिक संहिता लागू है। गोवा में 1961 से लागू इस कानून में समय के साथ बदलाव भी किए गए हैं। 1961 में गोवा के भारत में विलय के बाद भारतीय संसद ने गोवा में ‘पुर्तगाल सिविल कोड 1867’ को लागू करने का प्रावधान किया। इसी के तहत वहां समान नागरिक संहिता लागू हो गयी। इस कानून के अंतर्गत वहां शादी-ब्याह, तलाक, दहेज, उत्तराधिकार के मामलों में हिंदू, मुसलमान और ईसाइयों पर एक ही कानून लागू है। यही पुड्डुचेरी में भी है। इन मसलों पर वहां भी सभी समुदाय पर एक ही कानून लागू होता है।

बात अपनी-अपनी

उत्तराखण्ड में भाजपा की सरकार शपथ लेते ही प्रदेश में यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) पर एक कमेटी बनाएगी। यह कमेटी प्रदेश में यूनिफॉर्म सिविल कोड का ड्राफ्ट तैयार करेगी। इस यूनिफॉर्म सिविल कोड से विवाह, तलाक, जमीन, संपत्ति और उत्तराधिकार के मसले पर सभी नागरिकों के लिए समान कानून बनेगा। चाहे वे किसी भी धर्म के हों।
पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री

भाजपा यह चुनाव हार गई है। खुद उनके नेताओं का आत्मविश्वास डगमगा गया है। पिछले चुनाव में प्रदेश की जनता ने जिसे ऐतिहासिक जीत दी हो, वह पांच साल में बुरी तरह, हार रही हो। इसका एक ही कारण है कि पार्टी ने कोई काम नहीं किया। वे सिर्फ मुख्यमंत्री बदलते रहे।
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री

उत्तराखण्ड देवभूमि है। वहां ऐसे किसी भी कानून का स्वागत ही होगा। राज्य आंदोलन के समय से ही प्रदेश में बुद्धिजीवियों, स्वैच्छिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ आम लोगों का एक वर्ग समान नागरिक संहिता के पक्ष में रहा है। पिछले कुछ समय से यही वर्ग प्रदेश की जनसांख्यिकी बदलाव को लेकर भी मुखर रहा है। लेकिन समय कम होने के कारण मतदान पर इसके प्रभाव का आकलन तत्काल करना मुश्किल है।
दुर्गा प्रसाद नौटियाल, राज्य आंदोलकारी

मुख्यमंत्री के एलान के बाद भी पर्वतीय क्षेत्रों में समान नागरिक संहिता की कोई चर्चा नहीं हुई। पहाड़ के न शहरी इलाकों में न ही कस्बाई क्षेत्रों में लोग इस पर चर्चा कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में तो चर्चा का सवाल ही नहीं है। मतदान पर इसका असर पड़ा या नहीं यह अभी कहना मुश्किल होगा।’
जगदीश पोखरियाल, सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ पत्रकार

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