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अवैध कब्जों ने कॉर्बेट और कोसी की फिजा को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। बड़े लोगों के होटल-रिसॉर्ट ने सरकारी भूमि पर इस तरह अतिक्रमण कर डाला कि जंगली जीव व्याकुल हैं। ये जीव कोसी में पानी पीने नहीं जा पा रहे हैं

विश्व प्रसिद्ध कार्बेट नेशनल पार्क में रिसॉर्ट और होटल मालिकों ने नियम -कानूनों की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। नैनीताल के पर्यटक शहर रामनगर से कुछ आगे निकलते ही कार्बेट पार्क की सीमा शुरू हो जाती है। यहां से मरचूला, सल्ट, मानिला और रानीखेत, अल्मोड़ा को जाने वाले नेशनल हाईवे और कोसी नदी के बीच में स्थित आलीशान रिसॉर्ट कहीं पर सरकारी तो कहीं वन विभाग की जमीन पर कब्जा किए बैठे हैं। रामनगर सहित कई शहरों के लिए जीवन दायिनी कोसी नदी के किनारों पर कई दिसॉर्ट वर्षों से अतिक्रमण किए हुए हैं। यहां तक कि रिसॉर्ट और होटल मालिकों ने निर्माण करके कोसी नदी को इस तरह बाधित कर दिया है कि जानवर नदी में पानी तक पीने नहीं आ सकते हैं। इस तरह कोसी कॉरीडोर को अपने कब्जों में लेने वाले ऐसे रिसॉर्ट और होटल मालिकों के खिलाफ हिमालयन युवा संस्थान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर करके चुनौती दी। सालों तक न्यायालय की चली कानूनी कार्यवाही के बाद ४४ रिसॉर्ट और होटलों को अतिक्रमण का दोषी पाया गया है। राज्य के मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।

सामाजिक संस्था हिमालयन युवा ग्रामीण विकास समिति के अध्यक्ष मयंक मैनाली ने इस बाबत हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी। जिसमें उन्होंने कहा था कि रामनगर से आगे कार्बेट नेशनल पार्क के ढिकुली एरिया में बने होटल एवं रिसॉर्ट ने नियम-कानूनों की अवहेलना कर सरकारी, वन विभाग और बंजर जमीन को कब्जे में लिया हुआ है। यहां तक कि जानवरों के प्यास बुझाने का महत्वपूर्ण कोसी कारीडोर भी होटल एवं रिसॉर्ट ने अतिक्रमित कर लिया है। इससे भी ज्यादा खौफनाक यह है कि जिस कोसी नदी के पानी से उत्तराखण्ड के कई शहरों की प्यास बुझती है इसमें भी इन होटल रिसॉर्ट का गंदा पानी प्रवाहित होता है। इस याचिका का संज्ञान लेते हुए पूर्व में होईकोर्ट के आदेश पर ढिकुली के साथ ही कार्बेट नेशनल पार्क रेंज में करीब १३ रिसॉर्ट एवं होटल ऐसे पाए गए थे। याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ एवं न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ ने सरकार से पूछा कि अब तक अतिक्रमणकारियों पर क्या कार्रवाई हुई है। इसके अलावा पार्क की कितनी भूमि पर रिसॉर्ट अथवा होटल स्वामी काबिज हैं? हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में दी गई जानकारी से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। सरकार की रिपोर्ट के अनुसार रामनगर में कार्बेट नेशनल पार्क के आस-पास ४४ होटल एवं रिसॉर्ट द्वारा सरकारी एवं वन भूमि पर कब्जा कर व्यावसायिक हित साधे जा रहे हैं। मुख्य सचिव की ओर से बताया गया कि कोर्ट के आदेश के अनुपालन में सात अप्रैल २०१८ को जिलाधिकारी नैनीताल द्वारा रामनगर के रिसॉर्ट का भौतिक निरीक्षण किया गया। जिसमें पता चला कि ४४ होटल एवं रिसॉर्ट द्वारा सरकारी जमीन, वन विभाग की जमीन, वन भूमि, सरकारी बंजर जमीन, वर्ग तीन एवं वर्ग चार की जमीन पर कब्जा किया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इन रिसॉर्ट मालिकों पर २०१० से ही डीएफओ कार्यालय में वन अपराध में मामला दर्ज है। इनमें से १३ रिसॉर्ट सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जा कर व्यावसायिक हित साध रहे हैं। इससे संबंधित वाद एसडीएम कोर्ट में लंबित है। जबकि सरकारी जमीन पर कब्जा जमाए बैठे होटल एवं रिसॉर्ट पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

राज्य सरकार द्वारा हाईकोर्ट में दी गई रिपोर्ट में जिन होटल रिसॉर्ट का कब्जा बताया गया है उनमें रेजेंड क्यू बोहराकोर, माइरिका आनंद, वन ढिकुली, क्यारी इन, तरंगी रिसॉर्ट, इनफिसिटी रिसॉर्ट, कार्बेट रीवर साईड, वाइल्ड क्रस्ट, कार्बेट वाइल्ड रीवर वन्या, टाइगर टे्रक रिसॉर्ट ढिकुली, कार्बेट गेटवे आमोद, कूष्ण रिट्रीट रिसॉर्ट, टाइगर कैंप, कार्बेट रामगंगा रिसॉर्ट, मरचूला, होटल सोल्लुव, मरचूला होटल रीवर व्यू रिट्रिट, कार्बेट हाइडवे, कार्बेट रीवर, कार्बेट रीवर, स्केप शामिल हैं। इसके अलावा कार्बेट में एक भाजपा नेता के रिसॉर्ट का भी कब्जा है।

बात अपनी-अपनी

इस मामले में अभी कार्यवाही चल रही है। कुछ मामले कोर्ट में चल रहे हैं इसलिए उन पर कार्यवाही नहीं हो सकी है। फिलहाल हमने पांच रिसॉर्ट से अतिक्रमण हटवा दिया है।
पारितोष वर्मा, उपजिलाधिकारी रामनगर

कोसी नदी कॉरिडोर को अवरुद्ध कर बेतरतीब बनाए गए रिसॉर्ट्स में निर्माण के समय ही मानकों का ध्यान नहीं रखा गया। संवेदनशील वन्य जीव क्षेत्र में मानकों को ताक पर रखकर वन क्षेत्र, राजस्व और राजकीय भूमि पर किए गए अतिक्रमण को न्यायालय में मुख्य सचिव ने शपथ पत्र पर स्वीकार कर लिया है। ऐसे में प्रशासन द्वारा अतिक्रमणकारी ऊंचे रसूख वाले रिसॉर्ट स्वामियों को बख्शना सवाल खड़े करता है। जबकि अतिक्रमण हटाने के नाम पर आम लोगों के टिनशेड को भी प्रशासन गैरसंवेदनशील तरीके से ध्वस्त कर देता है। न्यायालय द्वारा सख्त रुख अपना कर यदि मुख्य सचिव का शपथ पत्र न मांगा गया होता तो सच्चाई कभी सामने न आती।
दुष्यंत मैनाली, वरिष्ठ अधिवक्ता हाईकोर्ट नैनीताल

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